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यह अगाध निधि मधुर रस, छवि कछु कही न जाइ।
चटक चहे सब ही पियो, पै इक बूंद समाइ ॥
- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (1)

प्रिया प्रियतम के इस अथाह मधुर रस रूपी निधि की छवि का वर्णन करना असंभव है। चटक रूपी मन सम्पूर्ण रस का पान करना चाहता है, परंतु एक बूंद ही उसे पूर्ण रूप से रस में डुबा देती है।