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यह अगाध निधि मधुर रस, छवि कछु कही न जाइ।
चटक चहे सब ही पियो, पै इक बूंद समाइ ॥
- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (1)

प्रिया प्रियतम के इस अथाह मधुर रस रूपी निधि की छवि का वर्णन करना असंभव है। चटक रूपी मन सम्पूर्ण रस का पान करना चाहता है, परंतु एक बूंद ही उसे पूर्ण रूप से रस में डुबा देती है।



चलो मन ! श्री वृंदावन धाम।
जहें विहरत नागरि अरु नागर, कुंजनि आठों याम।
भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम।
प्यास लगे तो तरणि-तनुजा, तट पिवु सलिल ललाम ।
नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम।
ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय, तन्मय रहु अविराम ।
पै "कृपालु" मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम ॥

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम-माधुरी (01)