बचपन की यादें हमेशा दिल के करीब होती हैं, खासकर जब वो गांव से जुड़ी हों। गांव का बचपन तो मानो एक खुली किताब की तरह होता है, जिसमें हर पन्ने पर मस्ती, दोस्ती और बेफिक्री की कहानियाँ लिखी होती हैं।
सुबह की ताज़ी ठंडी हवा, पक्षियों की चहचहाहट और दूर से आती मवेशियों की घंटियों की आवाज़... जैसे ही आँख खुलती, माँ की मीठी आवाज़ सुनाई देती—"चलो, उठो! स्कूल का वक्त हो गया!" लेकिन स्कूल जाने से पहले भी एक अलग ही मज़ा होता था—खेतों में जाकर ताज़े फल तोड़ना, बैलों के साथ खेलना, और कभी-कभी बगैर नहाए ही भागकर स्कूल पहुंच जाना।
स्कूल की ओर जाते हुए रास्ते में बहुत सारी शरारतें होतीं। दोस्तों के साथ धूल भरी पगडंडियों पर खेलते-कूदते जाना, कभी किसी के खेत से गन्ना या अमरूद तोड़ लेना, तो कभी रास्ते में बहती नहर में पैर डुबोकर ठंडक का मज़ा लेना। स्कूल पहुँचने में देर हो जाती तो मास्टर जी की डांट भी सुननी पड़ती, लेकिन वो डांट भी अपनेपन से भरी होती थी।
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Hamara gano mitti ki khushbu khet aur Kalyan bachpan ki yaden gaon ka Mausam 1990 ki yaadein bachpan
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मिट्टी की खुशबू #बचपन #1990 #purani yande #hamara gano Bachpan ki yaadein 20sal pahle ki dunyaBachpa
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