बचपन की यादें हमेशा दिल के करीब होती हैं, खासकर जब वो गांव से जुड़ी हों। गांव का बचपन तो मानो एक खुली किताब की तरह होता है, जिसमें हर पन्ने पर मस्ती, दोस्ती और बेफिक्री की कहानियाँ लिखी होती हैं।
सुबह की ताज़ी ठंडी हवा, पक्षियों की चहचहाहट और दूर से आती मवेशियों की घंटियों की आवाज़... जैसे ही आँख खुलती, माँ की मीठी आवाज़ सुनाई देती—"चलो, उठो! स्कूल का वक्त हो गया!" लेकिन स्कूल जाने से पहले भी एक अलग ही मज़ा होता था—खेतों में जाकर ताज़े फल तोड़ना, बैलों के साथ खेलना, और कभी-कभी बगैर नहाए ही भागकर स्कूल पहुंच जाना।
स्कूल की ओर जाते हुए रास्ते में बहुत सारी शरारतें होतीं। दोस्तों के साथ धूल भरी पगडंडियों पर खेलते-कूदते जाना, कभी किसी के खेत से गन्ना या अमरूद तोड़ लेना, तो कभी रास्ते में बहती नहर में पैर डुबोकर ठंडक का मज़ा लेना। स्कूल पहुँचने में देर हो जाती तो मास्टर जी की डांट भी सुननी पड़ती, लेकिन वो डांट भी अपनेपन से भरी होती थी।
Mitti ki khushbu 83
बचपन…
एक ऐसा दौर, जहाँ ज़िंदगी बहुत हल्की हुआ करती थी।
न कोई ज़िम्मेदारी, न कल की चिंता।
बस आज था, और आज ही सब कुछ था।
गाँव की वो कच्ची गलियाँ आज भी याद आती हैं,
जहाँ नंगे पाँव दौड़ते थे और मिट्टी पैरों से बात किया करती थी।
शाम होते ही दोस्तों की आवाज़ें गूँजने लगती थीं—
“चलो खेलने चलें…”
कभी गिट्टे, कभी कंचे,
तो कभी नहर के किनारे बैठकर घंटों बातें।
किसी को मोबाइल की ज़रूरत नहीं थी,
क्योंकि दोस्त सामने हुआ करते थे, स्क्रीन में नहीं।
माँ की आवाज़ दूर से आती थी—
“अंधेरा हो रहा है, घर आ जाओ।”
और हम सोचते थे,
काश शाम थोड़ी और देर से आए।
बरसात के दिन आज भी याद आते हैं,
जब काग़ज़ की नाव बनाकर पानी में छोड़ देते थे,
और वो नाव हमारे सपनों की तरह बहती चली जाती थी।
स्कूल से छुट्टी मिल जाए,
तो लगता था जैसे पूरी दुनिया जीत ली हो।
एक पेंसिल, एक कॉपी,
और मास्टर जी की डाँट—
आज सोचो तो वो भी प्यारी लगती है।
आज सब कुछ है—
मोबाइल, पैसा, काम…
पर वो बचपन नहीं है।
वो बेफिक्री नहीं है।
सच कहा गया है—
बचपन सिर्फ़ उम्र नहीं होता,
वो एक एहसास होता है
जो सिर्फ़ यादों में ज़िंदा रहता है।
1 month ago | [YT] | 3
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Mitti ki khushbu 83
बचपन में हमारे गाँव के बाहर, नहर के पास एक छोटी-सी पुलिया हुआ करती थी। वो कोई खास जगह नहीं थी दुनिया की नजर में, मगर हमारे लिए वो पूरी दुनिया थी। स्कूल से लौटते ही या शाम ढलते ही हम दोस्त वहीं जाकर बैठ जाया करते थे। न किताबें होती थीं, न घड़ी का डर — बस समय था और अपनापन।
नहर का ठंडा-ठंडा पानी धीरे-धीरे बहता रहता था। पानी की आवाज़ ऐसी लगती थी जैसे कोई कहानी सुना रहा हो। कभी कोई पत्ता बहता हुआ आता, कभी मछली पानी में छलांग मार देती, और हम सब उसे देखकर बच्चों की तरह खुश हो जाते। उस पुलिया पर बैठकर हमने ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा।
वो पुलिया सिर्फ बैठने की जगह नहीं थी, वो हमारी महफ़िल थी। वहीं बैठकर हम सपने बुना करते थे — कोई कहता मैं शहर जाऊँगा, कोई कहता ट्रक चलाऊँगा, कोई मास्टर बनना चाहता था। किसी को नहीं पता था कि ज़िंदगी आगे चलकर किसे कहाँ ले जाएगी, मगर उस पल में सब बराबर थे।
शाम के वक्त जब सूरज ढलने लगता था, नहर का पानी सुनहरा हो जाता था। दूर खेतों से आती हवा में मिट्टी की खुशबू घुली रहती थी। कभी-कभी किसी किसान की आवाज़ आती — “अरे बच्चों, घर जाओ अब।” मगर हम थोड़ी देर और बैठने की ज़िद करते थे।
वहीं पुलिया पर बैठकर हमने हँसना सीखा, झगड़ना सीखा और फिर खुद ही मान जाना भी सीखा। कभी किसी दोस्त की जेब से गुड़ निकल आता, कभी भुना हुआ चना। वो थोड़ी-सी चीज़ें आज की बड़ी-बड़ी दावतों से कहीं ज़्यादा मीठी लगती थीं।
बरसात के दिनों में वही पुलिया और भी खास हो जाती थी। नहर उफान पर होती, पानी तेज़ बहता, और हम डरते भी थे और मज़ा भी लेते थे। माँ की डाँट याद आती थी, मगर दोस्त साथ हों तो डर भी खेल बन जाता था।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वो पुलिया सिर्फ सीमेंट और पत्थर की नहीं थी, वो हमारे बचपन की नींव थी। आज न वो दोस्त रोज़ मिलते हैं, न वो फुर्सत है, और शायद न ही वो पुलिया वैसी बची होगी। मगर दिल के किसी कोने में आज भी वही पुलिया मौजूद है।
जब ज़िंदगी थका देती है, तो आँखें बंद करते ही वही नहर, वही पुलिया और वही दोस्त दिखाई देते हैं। तब समझ आता है कि असली अमीरी वही थी, जब हमारे पास कुछ नहीं था — सिवाय एक-दूसरे के।
1 month ago | [YT] | 3
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Mitti ki khushbu 83
बचपन…
एक ऐसा दौर, जहाँ वक़्त के पास पंख नहीं थे
और ज़िंदगी के कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ नहीं होता था।
सुबह माँ की आवाज़ से नींद खुलती थी,
“उठ जा, स्कूल का टाइम हो गया।”
और हम रज़ाई में मुँह छुपाकर सोचते थे—
काश आज इतवार होता।
न स्कूल की टेंशन थी,
न पैसे की फ़िक्र,
न कल की चिंता।
बस आज था…
और आज में ढेर सारी शरारतें।
गली में कंचे खेलना,
गिट्टे, पिट्टू, लंगड़ी,
कभी पतंग उड़ाना
तो कभी बिना वजह दौड़ लगाना।
घुटने छिल जाते थे,
मगर रोने से ज़्यादा
फिर से खेलने की जल्दी रहती थी।
दादी–नानी की कहानियाँ,
रात को चारपाई पर लेटे-लेटे
भूत, राजा और परियों की बातें सुनना।
नींद कब आ जाती थी,
पता ही नहीं चलता था।
बरसात में काग़ज़ की नाव बनाकर
नालियों में बहाना,
और यह सोचकर खुश होना
कि मेरी नाव सबसे आगे जाएगी।
छोटी-छोटी बातों में खुशी मिल जाती थी—
एक नई पेंसिल,
एक चॉकलेट,
या पापा के साथ बाज़ार जाना।
आज जब बड़े हो गए हैं,
तो सब कुछ है—
मगर वो सुकून नहीं।
वो बेफ़िक्री नहीं।
वो मासूम हँसी नहीं।
बचपन सच में अमीर होता है,
क्योंकि वहाँ खुश रहने के लिए
ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।
काश…
ज़िंदगी एक बार फिर
हमें थोड़ा सा बचपन लौटा दे।
1 month ago (edited) | [YT] | 3
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Mitti ki khushbu 83
सोचता हूँ... कितना प्यारा था वो ज़माना,
जब मेला हमारे लिए किसी जादू से कम नहीं होता था।
ना जेब में पैसे होते थे ज़्यादा,
पर दिल में खुशियाँ समंदर जैसी भरी रहती थीं।
वो कुल्फी वाला जब “ठंडी कुल्फी ले लो” की आवाज़ लगाता था,
तो जैसे पूरा मेला उसी आवाज़ पर ठहर जाता था।
बरफ के गोले की ठंडक सिर्फ ज़ुबान पर नहीं,
दिल तक उतर जाती थी।
रंग-बिरंगी बर्फ़, नीला, लाल, पीला —
हर रंग में अपनी ही एक छोटी-सी खुशी मिलती थी।
वो झूले वाले झूले…
जहाँ हम डरते भी थे, और हँसते भी थे।
कभी किसी ने धक्का ज़्यादा दे दिया तो चीख निकल जाती,
पर अगले ही पल फिर झूले पर चढ़ जाते थे।
क्योंकि डर से ज़्यादा मज़ा उस मस्ती में था।
मेले के कोने में मिट्टी के खिलौनों की दुकानें,
लकड़ी के बांसुरी की मीठी धुन,
और चने-भुट्टे की खुशबू —
सब कुछ आज भी यादों में बसा हुआ है।
वो गुब्बारे वाला, जो हमें देखकर मुस्कुराता था,
और हम उसे देखकर सोचते थे —
“काश, ये सारा गुब्बारा का गुच्छा हमारा होता…”
अब वक़्त बदल गया है,
मेले अब वैसे नहीं लगते,
कुल्फी की मिठास अब वैसी नहीं लगती।
मोबाइल और कैमरे ने तो तस्वीरें बना दीं,
पर वो असली यादें — वो जो दिल में बनती थीं —
अब कहीं खो सी गई हैं।
फिर भी जब कभी ठंडी हवा में बरफ का स्वाद आता है,
तो आँखें बंद होते ही सामने वही मेला घूमने लगता है…
वो हम, हमारे दोस्त,
वो कुल्फी, वो बरफ, वो झूला,
और वो बेफिक्र हँसी —
जो शायद अब सिर्फ़ यादों में ही मिलती है।
4 months ago | [YT] | 0
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youtube.com/shorts/3u-HTgP7WY...
5 months ago | [YT] | 0
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Mitti ki khushbu 83
5 months ago | [YT] | 5
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Mitti ki khushbu 83
5 months ago | [YT] | 4
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Mitti ki khushbu 83
7 months ago | [YT] | 1
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Mitti ki khushbu 83
10 months ago | [YT] | 4
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Mitti ki khushbu 83
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10 months ago | [YT] | 2
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