संसार में व्याप्त विष तत्व का विनाश कर अमृत तत्व का उत्कर्ष करने का कार्य भगवान ने क्षत्रिय को सौंपा एवं समय समय पर स्वयं क्षत्रिय के घर जन्म लेकर इस कार्य को कैसे किया जाये इसका आदर्श प्रस्तुत किया। लेकिन क्षत्रिय उस आदर्श से मुंह मोड़कर संसार के बहाव में बहकर स्वयं विष से आच्छादित होता गया। ऐसे में प्रथम आवश्यकता क्षत्रिय को स्वयं में व्याप्त विष का विनाश कर क्षात्र वृत्ति पर आरूढ़ होने की है। इस आवश्यकता की पूर्ति अभ्यास से संभव है। पूज्य तनसिंह जी ने इस आवश्यकता को समझा एवं 22 दिसम्बर 1946 को गीता में वर्णित अभ्यास एवं वैराग्य के मार्ग को अपनाकर श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की। अपनी सामूहिक संस्कारमयी कर्म प्रणाली द्वारा संघ तब से अनवरत व्यक्तिशः चरित्र निर्माण में संलग्न है। व्यक्ति का चरित्र ही समाज-चरित्र का आधार है। इस प्रकार सुशुप्त क्षात्र शक्ति को स्वयं की महता का भान कराकर सुसंस्कारित कर एक सूत्र में पिरोकर उसे सत्वोन्मुखी शक्ति का रूप देना श्री क्षत्रिय युवक संघ की साधना है।
Every principle of Sangh philosophy is reflected in the life of Pujya Bhagwan Singh Ji - Sangh Pr...
Shared 1 week ago
516 views
The Sangh is working hard in serving the society by giving it the status of a mother - Sangh Pram...
Shared 1 month ago
1.2K views
Shared 2 years ago
2.6K views
Shared 2 years ago
1.4K views
Shared 2 years ago
1.2K views
Shared 2 years ago
676 views
Shared 2 years ago
738 views
ऐसे थे पूज्य तनसिंह जी|जब अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती हुए सांसद को देखकर आश्चर्य में पड़े डॉक्टर
Shared 2 years ago
1.1K views
Shared 2 years ago
846 views
Shared 2 years ago
1.3K views
ऐसे थे पू. तनसिंह जी।। जब तनसिंह जी ने साथी मुस्लिम सांसद को समझाया सच्चा सनातनी राजपूत होने का अर्थ
Shared 2 years ago
3K views
Shared 2 years ago
886 views
Shared 2 years ago
508 views
Shared 2 years ago
429 views
Shared 2 years ago
4.7K views
Shared 2 years ago
2.8K views
Shared 3 years ago
2.7K views
Shared 3 years ago
1.9K views
Shared 3 years ago
2.4K views