||आयुर्वेद की विरासत को आगे बढ़ाना ||

यहां हम बात करते हैं। आयुर्वेद, योग, की। किस प्रकार से अपने आहार-विहार, को ठीक, संतुलित, कर रोगमुक्त जिया जाए। अपनी ऋषि परंपरा को आगे बढ़ाने की। इस परंपरा में महर्षि चरक, सुश्रुत, बाणभट्ट, धन्वंतरि आदि अनेक आयुर्वेद के महान विद्वानों और आधुनिक ऋषि परंपरा मे अनेक आयुर्वेद के अन्य महान विद्वानों ने जो भी आयुर्वेद की परंपरा से जुड़े है और आगे बड़ा रहे है। उन सब की बदौलत यहां हम उन सब के विचारों को आगे बढ़ाने, उन पर चलने का एक छोटा सा प्रयास मात्र कर रहे हैं।

महर्षि सुश्रुत के अनुसार -

समदोष: समाग्निश्च समधातुमलक्रिय: ।
प्रसन्नात्मेन्द्रिमन: स्वस्थ इत्यभिधीयते।।

शरीर के वात, पित्त एवं कफ मे साम्य हो, पंचमहाभूतों की पांच अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु एवं आकाश। सप्तधातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र) और जठर अग्नियों का समान रहना तथा रस, रक्त आदि धातुओं और मल, मूत्र, पसीना आदि मलो का पोषण धारण तथा निष्कासन आदि क्रियाओं का ठीक-ठाक होना। तथा आत्मा इंद्रियों एवं मन का प्रसन्न रहना। ये सब बातें जिस व्यक्ति में विद्यमान हो उसे स्वस्थ कहा जाता है|