इस पंचमकाल में इस भरत क्षेत्र में तीर्थंकरों का अभाव है किन्तु उनकी वाणी को धारण करने वाले आचार्य भगवान ही आज तीर्थकर प्रभु के समान पूज्य हैं। प. पू. प्राकृत भाषा चक्रवर्ती, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी आचार्य श्री 108 वसुनंदी जी मुनिराज राष्ट्र संत सिद्धांत चक्रवर्ती आ. श्री विद्यानंद जी मुनिराज के परम प्रभावक अंतेवासी शिष्य हैं।

आचार्य श्री वसुनंदी जी मुनिराज - एक महासंघ के नायक है। इनके मीठे-मीठे उपदेश सरलता से हृदयंगम हो जाते हैं। इनकी ओजस्वी व मिष्ट वाणी के कारण इनके उपदेश देशभर में 'मीठे प्रवचन' के रूप में विख्यात हैं। इन्होंने अभी तक लगभग 1.5 लाख प्रमाण पद प्राकृत साहित्य की रचना कर विश्व साहित्य को एक अनुपम निधि प्रदान की है।

आचार्य श्री के प्रवचन जिनागम के अनुकूल जीवन को उल्लास, उमंग व प्रेरणा से भरने वाले हैं। मानव जीवन को समीचीन दिशा व दशा प्रदान करने वाले हैं।

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