श्री भगवान अपने अनन्य भक्त नारद जी को फरमाते हैं:-
नांह वसामि वैकुंठों,
योगिनां हृदये न च।
मद्भक्तः यत्र गायते,
तत्र तिष्ठा म्यहम नारद।।
-हे नारद न तो मैं वैकुंठ में निवास करता हूँ और न ही योगियों के हृदय में रहता हूँ,जहां मेरे भक्त जन मेरे भजन गाते हैं मैं वहां पर ही सदा निवास करता हूँ।
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