मैं हूँ कविकांत,मित्र,बंधु और भ्राता सा भी,
लिखता हूँ शौख से ,नयें तराने काज के,
मिलते रहो यूँ मूझे, संग रंग रूप नए,
आप सब साथ हों तो ,चिन्ता क्या अकाज़ की,
यूँ ही मैं सुनाता रहूँ, आप सब सुनते से,
फिर हम एक साथ कृपा रघुराज की,
बात मेरी ,चाह तेरी, संग फिर दौड़ चलें,
मिलाके बढ़ाएं पग एक नए राज की,

स्वागत है मित्रों आपका काविकांत में @kaavikant


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