नारायण समारम्भाम् श्री शंकराचार्य मध्यमाम् ।
अस्मदाचार्य पर्यन्ताम् वंदे गुरु परम्पराम्।।
पंडित कन्हैया लाल द्विवेदी (पुरी शंकराचार्य जी महाराज के अल्पज्ञ शिष्य)
शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे |
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः ||
यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः |
यथाsन्तरम् न पश्यामि तथा में स्वस्तिरायुषि|
यथाsन्तरं न भेदा: स्यु: शिवराघवयोस्तथा||
सकंदपुराण २३ । ४१ :
यथा शिवस्तथा विष्णुर्यथा विष्णुस्तथा शिव: ।
अन्तरं शिवविष्ण्वोश्र भनागपि न विद्यते ।।
अर्थ = "जैसे शिव हैं, वैसे ही विष्णु हैं तथा जैसे विष्णु हैं, वैसे ही शिव हैं । शिव और विष्णु में तनिक भी अंतर नहीं है।"
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