ShrihitHarivansh-Kripaa

जय जय श्री हरिवंश ।।
जय जय राधावल्लभ श्री हरिवंश।
जय जय श्री वृन्दावन श्री वनचंद ।।

श्री हित धर्मी रसिक,
आप सभो को जय जय श्री हरिवंश ।

चन्द्र मिटे, दिनकर मिटे, मिटे न नित्य विहार ।
दृढ़वत श्रीहरिवंश को मिटे न नित्य विहार ।।

यहाँ युगल जोड़ी श्री लाड़ली लाल का नित्य विहार हैं। नित्य लीला हैं । सखिया अपने भाव से श्रीजी की सेवा सुख पाती हैं ।

निकसि कुञ्ज ठाड़े भये, भुजा परस्पर अंश ।
श्री राधावल्लभ मुख कमल निरख नैन हरिवंश ।।
श्री हरिवंश के नेत्रो से ही नित्य लीला अनुभव सुख पा शकते है । वाणी ही लीला का सुख देती हैं।

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Shri Radhavallabhlal

जय जय श्रीहरिवंश ।।