Vaishnavi
निर्मल मन जन सो मोहिं पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।अर्थात् निर्मल मन से ही ईश्वर की अनुभूति की जा सकती है। ईश्वर को प्रेम चाहिए वह प्रेम का भूखा है। ईश्वर के प्रति यदि व्यक्ति छल, कपट रखकर उसे प्राप्त करना चाहता है तो यह कदापि संभव नहीं है।
1 year ago | [YT] | 1,549
Vaishnavi
निर्मल मन जन सो मोहिं पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।
अर्थात् निर्मल मन से ही ईश्वर की अनुभूति की जा सकती है। ईश्वर को प्रेम चाहिए वह प्रेम का भूखा है। ईश्वर के प्रति यदि व्यक्ति छल, कपट रखकर उसे प्राप्त करना चाहता है तो यह कदापि संभव नहीं है।
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