This Divine Channel is aimed to bring Love, Peace, Harmony and Happiness in your Life and on planet Earth with understanding of LIFE and Actual recognition of your TRUE SELF. Daily Practice of Reiki andany of the Meditations will keep you in the Present always.
During my more than 40 years of spiritual practices, I have been a catalyst for change in life of more than 100000 people . I am a transformational coach, Reiki Master Healer, Access Consciousness Practitioner, Motivational Guide, Hypnotherapist, Theta Healer, Meditation, and Spiritual Guide.
It is my passion to free people from the shackles of ignorance of anger and fear and empower them to experience their True potential easily.
I consider my life purpose is fulfilled by creating positive changes in other people’s lives. I had people who fought with their depression, cancer, etc. and I feel grateful to be associated with them and guiding them in changing their reality.
Be aware of awareness. Thanks for Being You.
Pure Reiki and Meditation
*💐दड़बे की मुर्गी !💐*
एक शिष्य अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला, ” *लोगों को खुश रहने के लिए क्या चाहिए?”*
“तुम्हे क्या लगता है?”, गुरु ने शिष्य से खुद इसका उत्तर देने के लिए कहा.
शिष्य एक क्षण के लिए सोचने लगा और बोला, “मुझे लगता है कि अगर किसी की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो रही हों… खाना-पीना मिल जाए …रहने के लिए जगह हो…एक अच्छी सी नौकरी या कोई काम हो… सुरक्षा हो…तो वह खुश रहेगा.”
यह सुनकर गुरु कुछ नहीं बोले और शिष्य को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए चलने लगे.
वह एक दरवाजे के पास जाकर रुके और बोले, “इस दरवाजे को खोलो…”
शिष्य ने दरवाजा खोला, सामने मुर्गी का दड़बा था. वहां मुर्गियों और चूजों का ढेर लगा हुआ था… वे सभी बड़े-बड़े पिंजड़ों में कैद थे….
“आप मुझे ये क्यों दिखा रहे हैं.” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा.
इस पर गुरु शिष्य से ही प्रश्न-उत्तर करने लगे.
“क्या इन मुर्गियों को खाना मिलता है?'”
“हाँ.”
“क्या इनके पास रहने को घर है?”
“हाँ… कह सकते हैं.”
“क्या ये यहाँ कुत्ते-बिल्लियों से सुरक्षित हैं?”
“हम्म”
“क्या उनक पास कोई काम है?”
“हाँ, अंडा देना.”
“क्या वे खुश हैं?”
शिष्य मुर्गियों को करीब से देखने लगा. उसे नहीं पता था कि कैसे पता किया जाए कि कोई मुर्गी खुश है भी या नहीं…और क्या सचमुच कोई मुर्गी खुश हो सकती है?
वो ये सोच ही रहा था कि गुरूजी बोले, “मेरे साथ आओ.”
दोनों चलने लगे और कुछ देर बाद एक बड़े से मैदान के पास जा कर रुके. मैदान में ढेर सारे मुर्गियां और चूजे थे… वे न किसी पिंजड़े में कैद थे और न उन्हें कोई दाना डालने वाला था… वे खुद ही ढूंढ-ढूंढ कर दाना चुग रहे थे और आपस में खेल-कूद रहे थे.
“क्या ये मुर्गियां खुश दिख रही हैं?” गुरु जी ने पूछा.
शिष्य को ये सवाल कुछ अटपटा लगा, वह सोचने लगा…यहाँ का माहौल अलग है…और ये मुर्गियां प्राकृतिक तरीके से रह रही हैं… खा-पी रही रही है…और ज्यादा स्वस्थ दिख रही हैं…और फिर वह दबी आवाज़ में बोला-
“शायद!”
“बिलकुल ये मुर्गियां खुश है, बेतुके मत बनो,” गुरु जी बोले, ” पहली जगह पर जो मुर्गियों हैं उनके पास वो सारी चीजें हैं जो तुमने खुश रहने के लिए ज़रूरी मानी थीं.
उनकी मूलभूत आवश्यकताएं… खाना-पीना, रहना सबकुछ है… करने के लिए काम भी है….सुरक्षा भी है… पर क्या वे खुश हैं?
वहीँ मैदानों में घूम रही मुर्गियों को खुद अपना भोजन ढूंढना है… रहने का इंतजाम करना है… अपनी और अपने चूजों की सुरक्षा करनी है… पर फिर भी वे खुश हैं…”
*_गुरु जी गंभीर होते हुए बोले, ” हम सभी को एक चुनाव करना है, “या तो हम दड़बे की मुर्गियों की तरह मान्यताओं रूपी पिंजड़े में रह कर जी सकते हैं एक ऐसा जीवन जहाँ हमारा कोई अस्तित्व नहीं होगा… या हम मैदान की उन मुर्गियों की तरह साहस से भरपूर एक स्वतंत्र जीवन जी सकते हैं और अपने अस्तित्व की अनन्त संभावनाओं को टटोल सकते हैं…तुमने खुश रहने के बारे में पूछा था न… तो यही मेरा जवाब है… सिर्फ सांस लेकर तुम खुश नहीं रह सकते… खुश रहने के लिए तुम्हे पूर्ण अस्तित्व को,जीवन को सचमुच जीने का साहस होनी चाहिए…. इसलिए खुश रहना है तो मान्यताओं के पिंजड़े को छोड़ो और दड़बे की मुर्गी मत बनो!”*
🙏🙏
*जो है-वह पूर्ण है*
*जिसका मन शुद्ध है*
*वह समस्त है!!*
*मस्त है।*
*धन्यवाद।*
6 days ago | [YT] | 3
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Pure Reiki and Meditation
सत्य बोध
3 weeks ago | [YT] | 0
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3 weeks ago | [YT] | 0
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Pure Reiki and Meditation
*संविद्धि सर्वकरणानि नभोनिभानि संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च। संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्।।७।।* -
यह अच्छी तरह से जान लें कि सभी इंद्रिय अंतःकरण आदि आकाश की भांति शून्य हैं, सभी विषय शून्य हैं। जो शुद्ध और असीम है उसे जानो। मैं आकाश की भांति सर्वव्यापी समरूप ज्ञान का सार हूँ।
- अवधूत गीता
यह श्लोक अवधूत गीता के अध्याय 1 का 7वां श्लोक है। यह अद्वैत वेदांत का सार है। आइये इसे तीन भागों में समझते हैं।
*1. संविद्धि सर्वकरणानि नभोनिभानि -*
करण का अर्थ है साधन। जिनसे हम जानते हैं - 5 ज्ञानेंद्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार।
अवधूत कह रहे हैं, इन्हें नभोनिभानि जानो, आकाश के समान।
आकाश का अर्थ है - शून्य, निर्लेप, जिसमें सब कुछ होता है पर आकाश किसी से लिप्त नहीं होता।
*उदाहरण:* जैसे सिनेमा हॉल का पर्दा। पर्दे पर आग लगती है, बाढ़ आती है, हीरो मरता है, पर पर्दा वैसा का वैसा रहता है। वह न जलता है न भीगता है। वैसे ही आपकी आँखें, कान, मन पर सुख-दुख की फिल्म चलती है, पर आप पर्दे के समान हो। इंद्रियाँ तो उपकरण मात्र हैं।
*2. संविद्धि सर्वविषयांश्च नभोनिभांश्च -*
विषय यानी जिनको इंद्रियाँ पकड़ती हैं - रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श, विचार, यादें, कल्पनाएँ।
ये भी आकाश के समान हैं, अर्थात इनका कोई स्वतंत्र, स्थायी अस्तित्व नहीं। ये आते हैं और चले जाते हैं।
*उदाहरण:* जैसे आकाश में बादल। बादल कितने ही घने हों, काले हों, पर वे आकाश को गंदा नहीं कर सकते। वे आकाश में हैं, आकाश से हैं, पर आकाश नहीं हैं। वैसे ही क्रोध, चिंता, खुशी, पैसा, पद, रिश्ते - ये सब चित्त के आकाश में उठने वाले बादल हैं। हम गलती से बादल को ही आकाश समझ लेते हैं।
*3. संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् -*
अब असली बात।
अमलं - जो मल से रहित है, शुद्ध है।
न हि बन्धमुक्तं - जो न तो बंधा है, न मुक्त होने की जरूरत है। बंधन और मुक्ति दोनों मन की कल्पना हैं।
ज्ञानामृतं समरसं - जो अमृत के समान ज्ञान है और समरस है, एक जैसा, जिसमें कोई भेद नहीं।
गगनोपमोऽहम् - मैं उस आकाश के समान हूँ।
*इसका सीधा अर्थ:*
तुम शरीर नहीं, मन नहीं, इंद्रिय नहीं। तुम वह विशाल आकाश हो जिसमें शरीर-मन-इंद्रिय रूपी पक्षी उड़ रहे हैं। पक्षी उड़े तो आकाश को क्या फर्क पड़ेगा?
*जीवन में कैसे उतारें?*
जब गुस्सा आये, तो देखो - यह क्रोध विषय है, नभोनिभ है, आकाश में आया बादल है। मैं आकाश हूँ, बादल नहीं।
जब इंद्रियाँ थक जाएँ, बीमार हो जाएँ, तो देखो - यह करण है, उपकरण है। उपकरण बिगड़ा है, मैं नहीं बिगड़ा। मैं तो वह हूँ जो उपकरण को भी देख रहा है।
अवधूत की साधना *कुछ करना नहीं, बल्कि जानना है -* संविद्धि। सिर्फ जान लो, पहचान लो कि मैं गगनोपम हूँ, सर्वव्यापी हूँ, अकेला नहीं, सब में हूँ और सब से परे भी।
इसीलिए अंतिम पंक्ति में कहा - *मैं बंधा हुआ नहीं हूँ कि मुझे मुक्त होना पड़े। मैं सदा से ही मुक्त आकाश हूँ।*
1 month ago | [YT] | 2
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*बार-बार टोकने की आदत — एक व्यंग्य*
कुछ लोगों के पास दुनिया को सुधारने का ऐसा अद्भुत हुनर होता है कि उन्हें हर काम में अपनी टिप्पणी देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता है। आप चुप बैठे हैं—वे पूछेंगे, “इतने चुप क्यों हो?”
आप बोलने लगें—“इतना क्यों बोल रहे हो?”
आप खाना खा रहे हैं—“धीरे खाओ।”
धीरे खाएँ—“इतना धीरे कौन खाता है?”
कम खाएँ—“कुछ खाया भी है?”
ज्यादा खाएँ—“स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते!”
ऐसे लोगों को शायद लगता है कि संसार की सारी गतिविधियाँ उनके निर्देशों के बिना अधूरी हैं।
घर में कोई व्यक्ति कोई काम कर रहा हो तो टोकने वाले की आत्मा बेचैन हो जाती है। वह दूर से ही कहेगा—
“ऐसे नहीं, ऐसे करो!”
काम करने वाला पूछे—“क्यों?”
उत्तर मिलेगा—“बस, मैं बता रहा हूँ।”
यह “बस, मैं बता रहा हूँ” वास्तव में बहुत गहरी आध्यात्मिक अवस्था है। इसमें व्यक्ति स्वयं को हर विषय का विशेषज्ञ समझने लगता है—चाहे विषय खाना बनाना हो, बच्चों की परवरिश हो, व्यापार हो, रिश्ते हों या फिर पड़ोसी के घर की व्यवस्था!
सबसे मजेदार बात यह है कि टोकने वाला व्यक्ति अक्सर यह मानता है कि वह टोक नहीं रहा, बल्कि चिंता कर रहा है।
*“मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूँ।”*
और सामने वाला मन ही मन सोचता है—
“मेरी भलाई इतनी बार हो चुकी है कि अब मुझे अपनी बुराई की भी याद नहीं रही!”
कुछ लोग तो इतने अभ्यासरत होते हैं कि सामने वाला वाक्य पूरा भी नहीं कर पाता और उनकी आपत्ति शुरू हो जाती है।
“मैं सोच रहा था कि—”
“तुम्हें सोचना ही नहीं चाहिए।”
“लेकिन मेरी बात तो सुनो—”
“मैं सब समझता हूँ।”
“लेकिन—”
“कोई लेकिन-वेकिन नहीं।”
ऐसे व्यक्ति के सामने मौन रहना ही सबसे सुरक्षित संवाद बन जाता है।
बार-बार टोकने की आदत का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि धीरे-धीरे लोग उस व्यक्ति से अपनी बातें साझा करना बंद कर देते हैं। क्योंकि उन्हें डर रहता है कि अपनी बात कहने से पहले ही उन्हें सलाह, सुधार, आलोचना और उपदेश का पूरा पैकेज मिल जाएगा।
रिश्तों में प्रेम को हमेशा बड़े-बड़े शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी सामने वाले को बस पूरा बोल लेने देना ही प्रेम होता है।
हर बात पर अपनी राय देना आवश्यक नहीं है।
हर गलती सुधारना आवश्यक नहीं है।
हर निर्णय पर टिप्पणी करना आवश्यक नहीं है।
कभी-कभी सामने वाला जानता है कि वह क्या कर रहा है—और अगर नहीं भी जानता, तो अपनी गलती से सीखने का अधिकार तो उसका है!
इसलिए अगली बार जब जी करे कि किसी को टोकें, तो एक क्षण रुककर पूछिए—
*“क्या सचमुच मेरी बात आवश्यक है, या मेरी आदत बोल रही है?”*
हो सकता है उस एक क्षण के मौन से सामने वाले को शांति मिले और आपको भी यह पता चले कि दुनिया आपके निर्देशों के बिना भी चल सकती है।
और अगर यह बात समझ में आ गई, तो बधाई!
आपने आज कम-से-कम एक व्यक्ति को बिना टोके रहने का अवसर दे दिया।
लेकिन सावधान…
इस लेख को पढ़कर किसी को यह मत टोकिए कि
*“देखा! मैं पहले से कहता था कि बार-बार टोकना गलत है।”*
वरना पूरी साधना वहीं समाप्त हो जाएगी!
1 month ago | [YT] | 3
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*परिवर्तन और स्थिरता*
सब कुछ बदल रहा है—
ऋतुएँ, रिश्ते, रास्ते,
आज की हँसी, कल की उदासी,
और समय के साथ
हमारे अपने चेहरे भी।
जो कल अपना था,
आज पराया हो जाता है,
जो आज मिला है,
कल स्मृति बन जाता है।
जीवन निरंतर बहता है—
जैसे नदी,
जो कभी एक क्षण को भी
ठहरती नहीं।
पर इस परिवर्तन के बीच
कुछ ऐसा भी है
जो कभी नहीं बदलता।
विचार बदलते हैं,
पर साक्षी नहीं बदलता।
शरीर बदलता है,
पर चेतना नहीं बदलती।
भावनाएँ आती-जाती हैं,
पर भीतर की शांति
अपनी जगह बनी रहती है।
बाहर संसार में
हर पल परिवर्तन है,
और भीतर कहीं
एक मौन आकाश है
न जन्मता है,
न मिटता है,
न आता है,
न जाता है।
शायद जीवन का रहस्य यही है—
परिवर्तन को रोकना नहीं,
बल्कि उस स्थिरता को पहचानना
जो परिवर्तन को देख रही है।
पत्ते गिरते रहें,
ऋतुएँ बदलती रहें,
लोग आते-जाते रहें,
समय अपनी गति से चलता रहे—
मैं उस मौन में ठहरूँ,
जहाँ कुछ बदलता नहीं।
सब बदल रहा है,
पर जो सबके बदलने को देख रहा है—
वही मेरा सत्य है।
और उसी सत्य में
शाश्वत स्थिरता है। 🌹
1 month ago | [YT] | 0
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Pure Reiki and Meditation
1 month ago | [YT] | 1
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Pure Reiki and Meditation
Relax and Enjoy Life Now
2 months ago | [YT] | 1
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Pure Reiki and Meditation
हंसते रहो
3 months ago | [YT] | 4
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लाइव रेकी हीलिंग प्राप्त करें
3 months ago | [YT] | 1
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