🇮🇳 " हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर, हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर , वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर, गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर , तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !
अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था, रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था , किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था, हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था , दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !
अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है, मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है , कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है, कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है , मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !
नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके, याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके , आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के, और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके , पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !
एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में, अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें , सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में, भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में , बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !
सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं, पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं , खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं! खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं , जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !
नौजवानों ! यही मौका है उठो खुल खेलो, खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो , देश के वास्ते सब अपनी जवानी दे दो , फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो , देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ? "
- राम प्रसाद 'बिस्मिल'
भारत के महान क्रांतिकारी …. काकोरी के अमर हुतात्मा...
पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी अशफाक उल्ला खां 'वारसी' जी ठाकुर रोशन सिंह जी राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जी
Sangram Singh Rajput
समझ नही आया , लेकिन गाता अच्छा है
2 years ago | [YT] | 1
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Sangram Singh Rajput
🇮🇳
" हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !
अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !
अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !
नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !
एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !
सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !
नौजवानों ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जवानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ? "
- राम प्रसाद 'बिस्मिल'
भारत के महान क्रांतिकारी ….
काकोरी के अमर हुतात्मा...
पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' जी
अशफाक उल्ला खां 'वारसी' जी
ठाकुर रोशन सिंह जी
राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जी
को सश्रद्ध सादर नमन् एवं विनम्र श्रद्धांजलि!🙏🙏🌹🌹
3 years ago | [YT] | 3
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Sangram Singh Rajput
Somtime Alone
3 years ago | [YT] | 5
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Sangram Singh Rajput
प्राकृतिक सौंदर्य की 1 झलक 🚘🚘❓️
3 years ago | [YT] | 1
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