मन की प्रकृति है संग्रह करना
मन की प्रकृति हमेशा ही संग्रह करने की होती है। जब यह स्थूलरूप में होता है तो च़ीजों का संग्रह करना चाहता है, जब यह थोड़ा-सा विकसित होता है तो ज्ञान का संग्रह करना चाहता है।
वे सारी बातें जिन्हें आप सोचते और महसूस करते हैं तथा स्वयं के बीच जब एक दूरी बनाने लगते हैं तो इसे ही हम चेतना कहते हैं।
जब इसमें भावना प्रबल होती है तो यह लोगों का संग्रह करना चाहता है, इसकी मूल प्रकृति बस यही है कि यह संग्रह करना चाहता है। मन एक संग्रहकर्ता है, हमेशा कुछ न कुछ एकत्रित करना, बटोरना चाहता है। जब कोई व्यक्ति यह सोचने और विश्वास करने लगता है कि वह आध्यात्मिक मार्ग पर है तो उसका मन तथाकथित आध्यात्मिक ज्ञान का संग्रह करने लगता है।
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Jay Shree Ram 🚩 https://youtu.be/pEIBErvkHD8
2 years ago | [YT] | 5
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https://youtu.be/mA36zqnG274
2 years ago | [YT] | 3
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https://youtu.be/8HDnS8_l0zE
2 years ago | [YT] | 3
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@spiritualthoughts8924 @spiritualthoughts8924
2 years ago | [YT] | 4
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