निराकार शिव है आये गीता का ज्ञान सुनाये


rajeev kumar

देह-अभिमान हद की स्थिति है और देही अभिमानी बनना - यह है बेहद की स्थिति। देह में आने से अनेक कर्म के बन्धनों में, हद में आना पड़ता है लेकिन जब देही बन जाते हो तो ये सब बन्धन खत्म हो जाते हैं। जैसे कहा जाता बन्धनमुक्त ही जीवनमुक्त है, ऐसे जो बेहद की स्थिति में स्थित रहते हैं वह दुनिया के वायुमण्डल, वायब्रेशन, तमोगुणी वृत्तियां, माया के वार इन सबसे मुक्त हो जाते हैं इसको ही कहा जाता है जीवनमुक्त स्थिति, जिसका अनुभव संगमयुग पर ही करना है।

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बाबा कहते हैं मामेकम् याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। यह योग अग्नि है। भारत का प्राचीन योग गाया हुआ है ना। आर्टीफीशियल योग तो बहुत हो गये हैं इसलिए बाबा कहते हैं याद की यात्रा कहना ठीक है। शिवबाबा को याद करते-करते तुम शिवपुरी में चले जायेंगे। वह है शिवपुरी। वह विष्णुपुरी। यह रावण पुरी। विष्णुपुरी के पीछे है राम पुरी। सूर्यवंशी के बाद चन्द्रवंशी हैं। यह तो कॉमन बात है।

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rajeev kumar

*भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग का कान्ट्रास्ट*

मनुष्य पावन दुनिया स्वर्ग को याद भी करते हैं। कोई मरता है तो कहेंगे फलाना स्वर्गवासी हुआ। वहाँ तो बहुत मालठाल होते हैं, वहाँ से फिर यहाँ बुलाकर खिलाते क्यों हो? तुम श्रीनाथ के मन्दिर में देखेंगे – कितने माल बनते हैं। अब श्रीनाथ पुरी और जगन्नाथ पुरी, वास्तव में है एक ही बात परन्तु वहाँ श्रीनाथ द्वारे में देखेंगे तो बहुत वैभव बनते हैं और जगन्नाथ पुरी में सिर्फ फीके चावल का भोग लगता है। घी आदि कुछ नहीं पड़ता। यह फ़र्क बताते हैं – गोरा है तो ऐसे माल और सांवरा है तो यह सूखा चावल। राज़ बड़ा अच्छा है। यह बाप बैठ समझाते हैं। श्रीनाथ द्वारे में इतना भोग लगाते हैं तो फिर पुजारी लोग दुकान में बेचते भी हैं। उन्हों की कमाई का आधार भी उस पर है। मिलता मुफ्त में है फिर कमाते हैं। यह है भक्ति मार्ग। ज्ञान मार्ग सद्गति मार्ग है, गंगा स्नान से थोड़ेही सद्गति होती है। बड़ा युक्ति से समझाना है। जैसे चूहा फूंक देकर काटता है। बड़ी ही सयानापन चाहिए समझने और फिर समझाने की। कितनी नाजुक बातें हैं।

*(अ.बापदादा-14-12-2013)*

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rajeev kumar

🌟 अमूल्य चेतावनी – अभी का समय 🌟
सरकमस्टेन्स के अनुसार यह बात बहुत ध्यान में रखो—
🕊️ साइलेन्स की शक्ति
🕊️ श्रेष्ठ कर्मों की शक्ति
इन दोनों को जमा करने की “बैंक” केवल अभी,
इस संगमयुग में ही खुली है।
❌ किसी और जन्म में यह बैंक नहीं खुलेगी।
यदि अभी जमा नहीं किया,
तो फिर बैंक ही नहीं होगी—
तो जमा कहाँ करेंगे?
🔔 स्मृति रखें
👉 समय थोड़े समय का है
👉 मौका अमूल्य है
👉 जमा अभी करनी है
आज का पुरुषार्थ = कल की प्राप्ति

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rajeev kumar

लौकिक बाप – प्रजापिता – परमपिता

लौकिक बाप को पिता कहा जाता है। इसी लौकिक संसार में जिनसे प्रजा की रचना होती है, उन्हें प्रजापिता कहा जाता है।

परमपिता तो परमधाम में रहने वाले हैं। परमपिता का स्थान परमधाम है, न कि साकारी संसार।

प्रजापिता ब्रह्मा को परमधाम में नहीं कहा जाएगा, क्योंकि वह यहाँ साकारी दुनिया में कार्य में आते हैं। वे न तो परमधाम में हैं और न ही सूक्ष्मवतन में।

प्रजा सदा स्थूलवतन में होती है, और जहाँ प्रजा है, वहीं प्रजापिता का कार्यक्षेत्र होता है।

प्रजापिता को भगवान नहीं कहा जाता। भगवान का कोई शरीर का नाम नहीं होता।

जिन पर मनुष्य तन के नाम पड़ते हैं, उनसे भगवान सर्वथा न्यारा और अलौकिक है।


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स्पष्ट समझ:
• लौकिक बाप – देहधारी पिता
• प्रजापिता – साकारी माध्यम
• परमपिता – निराकार, परमधाम निवासी

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rajeev kumar

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