Decoding Ancient Wisdom with Mantra Science & Meditative Techniques for the Modern Mind.
Hi, I’m Reetika Agarwal.
With 15+ years of corporate experience and 13+ years of spiritual exploration, I help professionals understand Devi Consciousness , Manifestation , Karmic patterns, and inner alignment through practical Ancient wisdom.
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Reetika Agarwal
रात हो चुकी थी—करीब नौ बज रहे थे। डिनर के बाद मैं यूँ ही बाहर टहलने निकली।
परिसर में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी की प्रतिमा के पास से गुज़रते हुए मेरी नज़र उस पूरे दृश्य पर जाकर ठहर गई।
ऊपर आकाश में पूरा चंद्रमा अपनी शीतल किरणें बिखेर रहा था, पास लगे स्पीकर से ‘ॐ’ की मद्धम ध्वनि वातावरण में तैर रही थी और नीचे जल अत्यंत शांत भाव से बह रहा था।
दृश्य इतना सुंदर था कि मैं वहीं ठिठककर खड़ी हो गई और एकटक उसे निहारने लगी…
और न जाने क्यों… बिना किसी वजह के आँखों में हल्की-सी नमी उतर आई।
फिर मैंने उस पूरे परिसर का चक्कर लगाना शुरू किया।
ज़मीन से मुस्कुराते फूल, विशाल वृक्ष और करीने से सजी क्यारियाँ... मैं आगे निकल जाती, फिर लौटकर आती और दोबारा रुककर बस उन्हीं चीज़ों को टकटकी लगाए निहारती।
मुझे दूसरों का तो नहीं पता, पर यह मेरा अपना सच है—
आप चाहे अद्वैत को कितना भी समझ लें, सारे भाष्य पढ़ लें, या तंत्र और ध्यान के सारे कॉन्सेप्ट्स जान लें... पर जैसे ही आँखें बंद होती हैं, मन ललिताम्बा के उसी एक साकार रूप में बह जाता है।
फिर भीतर भक्ति की वही एक पुरानी तड़प जाग उठती है कि काश! एक बार अपने इष्ट को अपनी इन भौतिक आँखों के सामने साक्षात देख लूँ।
लेकिन उस रात... ज़मीन पर फैली लताएँ, मद्धम हवा में झूमते वृक्ष और अनंत आकाश में चमकते तारे निहारते हुए अचानक भीतर कुछ कौंधा।
लगा कि दुर्गा सप्तशती के रात्रिसूक्तम् में जिन लताओं और वृक्षों का वर्णन है, और ललिता सहस्रनाम में जिस चंद्रमा की बात कही गई है—वह साक्षात यही तो हैं!
उस नीरव शांति में अहसास हुआ कि चारों तरफ़ केवल और केवल ललिताम्बा ही व्याप्त हैं।
लौटकर मैंने रात्रिसूक्तम् और तांत्रिक देवी सूक्तम् को न जाने कितनी बार पढ़ा और आँखें बंद करके सुना।
वेदोक्त रात्रिसूक्त में ऋषिका कहती हैं—
"ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्युद्धतः। ज्योतिषा बाधते तमः॥"
(अर्थात् यह देवी केवल घाटियों और पर्वतों में ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रेंगती लताओं से लेकर आकाश छूते वृक्षों तक पूरी प्रकृति में व्याप्त हैं—और अपने प्रकाश से हमारे भीतर के अज्ञान-रूपी अंधकार को हरती हैं।)
उस क्षण भीतर कौंधा कि जिन्हें मैं अब तक किसी 3D साकार रूप में खोज रही थी, क्या साक्षात वही भगवती यहाँ नहीं हैं?
ज़मीन पर फैली लताएँ, झूमते वृक्ष, और ऊपर जगद्गुरु शंकराचार्य जी के मस्तक के ठीक पीछे षोडश कलाओं से चमकता वह शीतल चंद्रमा... लगा कि यह सब उसी ललिताम्बा का विराट स्वरूप ही तो है जो इस नीरव रात्रि के रूप में मेरे सामने प्रकट है।
....................
इस बात को स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि किसी सत्य को समझ लेना और उसे भीतर घटित होते हुए अनुभव करना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
ज्ञान को शायद शब्दों में बाँधा जा सकता है… अनुभूति को नहीं।
उस एक पल भीतर जो घटित हुआ, उसे पूरी तरह शब्दों में ढाल पाना शायद संभव ही नहीं। फिर भी, उस भाव को एक रूप देने और उसे शब्दों में पिरोने की यह मेरी एक छोटी-सी कोशिश है।
फिर मन में एक और सवाल उठा—आख़िर जब भी मैं इस जगह पर आती हूँ, मुझे ऐसी अलग-सी अनुभूति क्यों होती है?
क्या स्थानों की भी अपनी चेतना और ऊर्जा होती है?" 🌌✨
मैं तो अपने अपार्टमेंट में भी टहलती हूँ, पार्कों में भी जाती हूँ, पेड़-पौधों को देखती हूँ… फिर उस दिन इसी जगह ऐसा गहरा अनुभव क्यों हुआ?
क्योंकि यह पहली बार नहीं था।
इससे पहले भी, जब मैं एक मेडिटेशन प्रोग्राम के लिए यहाँ ठहरी थी, तब भी एक हल्की-सी अनुभूति हुई थी।
लेकिन इस बार वह भाव कहीं अधिक गहरा था।
इसका कोई सीधा उत्तर तो मेरे पास नहीं है। लेकिन एक ख़याल ज़रूर आता है—शायद इस जगह की अपनी साधना-परंपरा का भी इसमें कुछ असर हो।
ठीक पीछे गुरुकुल में ललिताम्बिका का मंदिर है। वहाँ वेद-वेदांग और आगम शास्त्रों के विद्वान ऋत्विक श्रीसूक्त की आहुतियाँ देते हैं और हर शुक्रवार श्रीललिता सहस्रनाम का सामूहिक पाठ होता है।
पास ही आश्रम में हर दिन हज़ारों साधक ध्यान में बैठते हैं।
और नवरात्रि के नौ दिनों में यहाँ नवचण्डी/शतचण्डी महाहोम होता है,
इन नौ दिनों में एक लाख से भी अधिक साधक प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होकर इस महाचण्डी होम के साक्षी बनते हैं और सामूहिक ध्यान-साधना में जुड़ते हैं।
…….
शायद इसीलिए, जब भी मैं यहाँ आती हूँ और आँखें बंद करती हूँ, मेरे भीतर वह भाव अपने आप जाग जाता है।
हालाँकि यह intense but subtle experience & feeling परमानेंट नहीं होता, आता है और चला जाता है... पर अब भगवती से बस यही एक प्रार्थना रहती है कि यह भाव भीतर सदा के लिए ठहर जाए,
ताकि हर कण में केवल उनका ही स्वरूप दिखे—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'।
................................
PS
कभी देवी-साधना को मानव-मन की कल्पना समझकर—जैसा कि कुछ Meditation organisations में समझाया जाता है—और तंत्र के एक विकृत रूप को देखकर, मैंने देवी-साधना का मार्ग ही छोड़ दिया था।
जब मेडिटेशन करना सीखा, तो लगा कि शांति, प्रेम और Self-Realization ही असली Spirituality है—और तंत्र मार्ग में देवी-साधना तथा Meditation दो अलग रास्ते हैं।
लेकिन 15 साल तक भटकने और समझने के बाद जाना कि अलग रास्ते हैं ही नहीं!
इसी यात्रा और इसके वैज्ञानिक पक्ष को मैंने अपनी पुस्तक ‘शक्ति से शिव तक’ में साझा किया है, ताकि भ्रांत धारणाओं के कारण कोई साधक इस मार्ग से न भटके।
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अपनी ऑडियंस से सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगी—
अगर पुस्तक शक्ति से शिव तक’ न भी पढ़ पाएं, तो कोई बात नहीं—बस एक बार दुर्गा सप्तशती और ललिता सहस्त्रनाम को फिर से उठाकर पढ़िए, इस बार एक नई दृष्टि से।
आपकी अपनी
रीतिका दीदी
जय मां कामाक्षी, जय मां ललितांबिका।
1 week ago (edited) | [YT] | 142
View 36 replies
Reetika Agarwal
आज तंत्र शब्द सुनते ही हमारे मन में सबसे पहले षट्कर्म—मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन जैसी क्रियाओं की छवि उभरती है।
मुझे आज भी याद है, 2015–16 के आसपास, इन क्रियाओं और तंत्र को लेकर सामने आने वाली बातों ने मेरे मन में बहुत गहरे प्रश्न खड़े कर दिए।
क्या तंत्र का अर्थ वास्तव में यही है?
क्या देवी-साधना का उद्देश्य किसी शक्ति को प्राप्त करके अपने सांसारिक कार्य करवाना है?
क्या भगवती की साधना भी इन क्रियाओं तक ही सीमित है?
इन सवालों ने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया था।
और उस समय, इन प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने पर, मैंने 2015–16 में देवी-साधना का मार्ग पूरी तरह छोड़ दिया था।
लेकिन शायद मेरी यात्रा यहीं समाप्त नहीं होनी थी।
क्योंकि जिन प्रश्नों ने मुझे देवी से दूर किया था, उन्हीं प्रश्नों के उत्तर मुझे एक दिन फिर उसी देवी की ओर वापस ले जाने वाले थे।
**श्रीराजराजेश्वरी माँ ललिता की ज्ञानशक्ति ने धीरे-धीरे मेरे सामने तंत्र का एक ऐसा व्यापक स्वरूप खोला, जिसे मैं पहले जानती ही नहीं थी।**
मुझे समझ में आने लगा कि **तंत्र क्या है,
आगम क्या हैं,
साधना की इतनी विविध परंपराएँ क्यों बनीं
और
तंत्र का वास्तविक उद्देश्य केवल चमत्कार या किसी दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करना नहीं है।
कुछ समय पहले मेरे चैनल पर लगातार queries आने लगीं, जिनमें कई युवा स्तोत्र पढ़कर या कुछ क्रियाएँ करके जीवन में कोई shortcut ढूँढ़ना चाहते थे।
आज तक मैंने देवी पर जितने भी videos बनाए हैं, उनमें मैंने हर विषय को तर्क और consciousness की दृष्टि से समझाने की कोशिश की है,
ताकि देवी-साधना को केवल आस्था नहीं, बल्कि उसकी गहरी आध्यात्मिक समझ के साथ देखा जा सके......
फिर भी .....
जब भी देवी और साधना की बात होती, सवाल घूम-फिरकर बार-बार वहीं आ जाते।
मन में आता—“ये लोग समझते क्यों नहीं?”
आजकल इन विषयों - षट्कर्म की काफी चर्चा है और यही topics Youtube Podcast Market में सबसे ज़्यादा चल रहे हैं,
लेकिन केवल Views और CTR बढ़ाने के लिए इन विषयों पर सनसनी या अनावश्यक चर्चा करना—इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है।
मेरी प्राथमिकता हमेशा से Meditation और Consciousness की समझ रही है।
और जहाँ तक देवी-साधना की बात है, मेरे लिए यह केवल किसी शक्ति को प्राप्त करने का विषय नहीं, बल्कि भक्ति, आत्मबोध और चेतना की एक आंतरिक यात्रा है।
ललिता सहस्रनाम की श्रृंखला पूरी होने के बाद मैं चाहती थी कि अब अपने चैनल को देवी-साधना के इन विषयों से थोड़ा अलग करके एक नई दिशा दूँ।
ऐसी बहुत-सी बातें थीं, जिन्हें मैंने अपने 15 वर्षों के corporate career के साथ-साथ सीखा और समझा था, लेकिन अभी तक आपसे साझा नहीं किया था—
🧘♀️ Meditation
🌿 Somatic Healing
🧠 Neuro-Linguistic Programming (NLP)
🔮 Astrology
मैंने इसलिए मैंने सोचा था कि अब धीरे-धीरे चैनल को उसी दिशा में ले जाऊँगी।
इसी वजह से देवी-साधना से जुड़े कई ऐसे videos भी मैंने hide कर दिए,
क्योंकि मैं अपने चैनल पर ऐसी mindset वाली audience नहीं चाहती थी, चमत्कार षट्कर्म या त्वरित परिणामों की तलाश में इन विषयों से जुड़ती हो
लेकिन कहानी इतनी जल्दी खत्म नहीं होनी थी....
शायद भगवती के तरीके कुछ अलग होते हैं।
वह अपना कार्य अपने ही तरीके से करवाती हैं।
खैर…
कल मैंने “महातन्त्रा” नाम के पीछे छिपे अर्थ और उसके रहस्य को विस्तार से समझाते हुए, तंत्र को उसके व्यापक आध्यात्मिक और आगमिक संदर्भ में समझने का प्रयास किया है।
जितना भगवती ने मुझे समझने और जानने की प्रेरणा दी, उतना ही ज्ञान आप तक पहुँचाने की मैंने कोशिश की है।
Video : https://youtu.be/2Pd-QTHxAQg?si=X2Aqi...
मैंने अपनी पुस्तक में भी इस पूरे विषय को जितना संभव हो सका, उतने सरल, सहज और स्पष्ट शब्दों में समझाने का प्रयास किया है।
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..........................
आपकी अपनी,
रीतिका दीदी।
जय माँ कामाक्षी।
जय माँ ललिता अम्बिका।
जय माँ राजमातंगी। 🙏🌺
3 weeks ago (edited) | [YT] | 130
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Reetika Agarwal
कल मेरे जन्मदिन पर घर में रुद्राभिषेक सम्पन्न हुआ। 🙏
इस रुद्राभिषेक की एक और विशेषता ने मेरा ध्यान खींचा।
अनुष्ठान के आरंभ में तीन कलश स्थापित किए गए।
पहला वरुण देव का…
दूसरा श्री गणपति का…
और तीसरा इष्ट देव का, जिनका पूरे विधि-विधान से आवाहन किया गया।
इसके बाद जो बात मुझे सबसे अलग लगी, वह थी रुद्राभिषेक की यह परंपरा।
सामान्यतः हम जिस रुद्राभिषेक को देखते हैं, उसमें यजमान स्वयं शिवलिंग पर जल, दूध, दही और अन्य द्रव्यों से अभिषेक करता है। वह पूरे अनुष्ठान का सक्रिय सहभागी होता है।
लेकिन यहाँ विधि कुछ भिन्न थी।
यहाँ दो वेदपाठी ब्राह्मण, जिन्होंने बचपन से ही गुरुकुल में शैव आगम और वेदों की परंपरागत शिक्षा प्राप्त की है, सम्पूर्ण रुद्राभिषेक और वैदिक अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। >>
उनके साथ एक स्वामीजी होते हैं, जिनका केंद्र केवल अनुष्ठान कराना नहीं, बल्कि साधकों को Meditation की अवस्था में ले जाना होता है।
और साधक के लिए
न कोई मंत्र बोलना…
न कोई अभिषेक करना…
केवल एक ही साधना रहती है—
आँखें बंद करना…
अपने भीतर उतरना…
#Meditate
जब श्री रुद्रम का नमकम गूँज रहा था, बार-बार केवल एक ही भाव भीतर उतर रहा था—
"नमः... नमः... नमः..."
जैसे-जैसे नमकम और चमकम का पाठ आगे बढ़ता गया, अचानक लगा कि दुर्गा सप्तशती के राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा, ललिता सहस्रनाम —ये तीनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के तीन आयाम हैं।
उसी क्षण कई महीने पहले मेरी प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक याद आया—
“शक्ति से शिव तक।”
और
कल उस शीर्षक का एक नया आत्ममंथन प्रारम्भ हुआ।
………
ललिता सहस्रनाम में “रागस्वरूपपाशाढ्या” नाम आता है।
माँ ललिता ने एक हाथ में पाश और दूसरे हाथ में अंकुश धारण किया है।
पाश हमारे राग, आसक्ति और मोह का प्रतीक है, जबकि दूसरे हाथ का अंकुश हमारे अनियंत्रित मन और अहंकार की ओर जाने वाली प्रवृत्तियों को नियंत्रित करती हैं।
मेरे लिए पाश की यह यात्रा 2023 में शुरू हुई।
पहला पाश था—मृत्यु।
पहले माँ का कैंसर…
अस्पतालों के अनगिनत चक्कर…
और फिर कुछ ही दिनों बाद माँ का इस संसार से चले जाना।
फिर भगवती ने दूसरा पाश दिखाया।शरीर।
2024 में छह बड़ी सर्जरी, बार-बार अस्पताल में भर्ती होना और लगातार स्वास्थ्य चुनौतियों ने शरीर की क्षणभंगुरता का बोध कराया।
फिर तीसरा पाश आया…पहचान
व्यवसाय, पहचान और वर्षों से बनाई हुई छवि।
जब वह भी छूटने लगी, तब समझ आया कि मैं व्यवसाय नहीं, अपना “मैं” खोने से डर रही थी।
और फिर आया चौथा पाश—रिश्ते।
तभी पहली बार दुर्गा सप्तशती के राजा सुरथ और समाधि वैश्य कथा नहीं रहे…
वे मेरे अपने जीवन में घटने लगे।
लगभग पच्चीस वर्षों तक उस कथा को पढ़ा…
लेकिन उसका वास्तविक अर्थ मुझे जीवन ने समझाया।
तब जाना—
महामाया केवल शास्त्रों में नहीं, हमारे जीवन में भी घटती हैं।
……….
कल रुद्राभिषेक के दौरान जब नमकम और चमकम की ध्वनि पूरे वातावरण में गूँज रही थी,
न जाने क्यों उसी क्षण भीतर सब कुछ एक साथ जुड़ने लगा।
सच कहूँ…
मैंने कभी मोक्ष को समझने की कोशिश ही नहीं की।
क्योंकि मैं तो भगवती के दिए हुए भोग में ही प्रसन्न थी।
फिर समझ में आया…
भगवती केवल देती ही नहीं हैं…
समय आने पर छोड़ना भी सिखाती हैं।
श्री रुद्रम का शिवतत्त्व—
जो कुछ पकड़ता नहीं…
कुछ रोकता नहीं…
केवल साक्षी बनकर देखता है।
मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं द्रष्टा बन गई हूँ।
सच तो यह है कि मैं आज भी द्रष्टा होना सीख रही हूँ…
शास्त्रों का मर्म शब्दों से नहीं खुलता।
वह तब खुलता है, जब भगवती स्वयं अपने पाश का अनुभव कराती हैं।
और शायद…
जब महामाया के पाश को पहचानकर, ललिता के अंकुश को स्वीकार करते हुए, शिव के साक्षी भाव में बैठना प्रारम्भ होता है…
उसी क्षण “भोग से मोक्ष” की यात्रा भी प्रारम्भ होती है।
शायद… यही “शक्ति से शिव तक” की यात्रा है।
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आपकी
रीतिका दीदी
जय माँ कामाक्षी।
जय माँ ललिताम्बिका। 🙏🌺
1 month ago (edited) | [YT] | 116
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Reetika Agarwal
चैनल पर एक भाई का कमेंट पढ़ा। उन्होंने लिखा कि वे हरियाणा से हैं। जैसे हममें से उत्तर भारत के बहुत-से लोग माँ कामाक्षी के बारे में नहीं जानते, वैसे ही वे भी उनसे अनजान थे। इस चैनल के माध्यम से उन्होंने माँ कामाक्षी के बारे में जाना और तिरुपति बालाजी से लौटते समय उनके दर्शन के लिए पहुँचे। वहाँ उन्हें ऐसा अनुभव हुआ, जिसने उनके हृदय को भीतर तक स्पर्श कर दिया
उनकी यह यात्रा पढ़कर मुझे अपनी ही कामाक्षी यात्रा याद आ गई।
फ़र्क बस इतना था कि मेरा तो कामाक्षी जाने का कोई प्लान ही नहीं था।
मैं कांची कामाक्षी के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी।
सन 2016 में मैंने अपने पिताजी के गुरुजी (जो अब ब्रह्मलीन हो चुके हैं) की आज्ञा से ललिता सहस्रनाम का पाठ शुरू किया था। लेकिन उस समय मुझे श्रीविद्या क्या है, ललिता सहस्रनाम का गूढ़ अर्थ क्या है, इनमें से कुछ भी नहीं पता था।
मैं तो बस श्रद्धा और विश्वास से प्रतिदिन उसका पाठ करती थी।
2018 में हम तिरुपति बालाजी के दर्शन करने गए थे।
फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी।
तिरुपति बालाजी से लौटते हुए हम कांचीपुरम शहर पहुँचे।
वहाँ पहुँचने के बाद Google Maps ने न जाने क्यों हमें मुख्य मार्ग की बजाय शहर की गलियों से ले जाना शुरू कर दिया।
हम भी बिना कुछ सोचे उसके बताए रास्ते पर चलते रहे।
हम एक गली से दूसरी गली में निकलते रहे…
अचानक हमारी गाड़ी मंदिर के पीछे की ओर वाले प्रवेश द्वार के सामने जाकर रुक गई।
उस समय हमें यह भी नहीं पता था कि यह कौन-सा मंदिर है।
लेकिन वहाँ से स्तोत्रों की ध्वनि आ रही थी।
एक अलग ही पॉज़िटिव ऊर्जा थी,
बिना यह जाने कि यह कौन-सा मंदिर है, मन ने कहा—चलो, अंदर चलकर दर्शन करते हैं।
मैं मंदिर के प्रांगण में बैठ गई और अपने मोबाइल पर खोजा—
“यह कौन-सा मंदिर है? इसका इतिहास क्या है?”
तभी मुझे पता चला कि यह कांची कामकोटि पीठम् है, जिसे परंपरा में माँ का नाभि स्थान भी कहा जाता है।
यह मंदिर शक्ति पीठों में भी विशेष स्थान रखता है।
परंपरा के अनुसार, जब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माँ सती के शरीर के अंग पृथ्वी पर गिरे, तब कांची में उनकी नाभि (नाभि-स्थान) गिरी।
इसलिए इसे ‘नाभि-स्थान’ या ‘ओड्याण पीठ’ भी कहा जाता है।
कांची कामाक्षी मंदिर को कामकोटि पीठ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ‘कामकोटि’ का अर्थ है—असंख्य (कोटि) कामनाओं को पूर्ण करने वाली परम शक्ति।
कांची की परंपरा के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने अपने जीवन का अंतिम समय यहीं व्यतीत किया और यहीं ब्रह्मलीन हुए।
रामायण की परंपरा के अनुसार, राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति की कामना से यहीं पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था।
उस दिन मुझे अपनी ही अज्ञानता पर हँसी भी आई।
दो साल से मैं ललिता सहस्रनाम का पाठ कर रही थी…
ललिता सहस्रनाम में ‘कामाक्षी’ नाम तो रोज़ पढ़ती थी, लेकिन मैंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि ‘कामाक्षी’ नाम का एक भव्य मंदिर भी होगा।
मैं तो बस श्रद्धा से ललिता सहस्रनाम का पाठ कर रही थी।
न नामों का अर्थ पता था, न उनके पीछे का दर्शन, न श्रीविद्या की कोई समझ थी
…………….,
2018
मैं मंदिर के अंदर गई…
और जैसे ही मैंने पहली बार माँ कामाक्षी के दर्शन किए…
आज भी उस क्षण को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती।
बस इतना कह सकती हूँ—
वह मेरे लिए “Love at First Sight” था…..❤️
बाद मैं मंदिर प्रांगण में बनी दुकानों की ओर चली गई।
वहीं मेरी मुलाकात एक संत जैसे व्यक्ति से हुई।
उनका चेहरा अत्यंत तेजस्वी था। एक ऐसी शांति और मुस्कान थी जिसे शब्दों में बताना कठिन है।
उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर रख दी।
तस्वीर के एक ओर माँ बाला थीं और दूसरी ओर माँ ललिता।
स्वाभाविक रूप से मुझे लगा कि शायद वे मंदिर के कोई पंडित या सेवक होंगे। इसलिए मैंने उस तस्वीर के बदले उन्हें दक्षिणा देने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मुस्कुराकर पैसे लेने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने बस वह तस्वीर मेरे हाथ में रखी…
जब मैं वहाँ से लौटकर आई, तब शायद मुझे भी नहीं पता था कि मेरी ज़िंदगी की दिशा बदल चुकी है।
आज लगभग आठ साल हो गए हैं। न जाने कितनी बार माँ कामाक्षी ने अपने चरणों में बुलाया।
अब तो मंदिर के बहुत-से चेहरे भी परिचित हो गए हैं।
सिक्योरिटी गार्ड हों, भीड़ को व्यवस्थित करने वाले सेवक हों, महापेरियावा शंकराचार्य गणपति मंदिर के बगल में बने डोनेशन काउंटर पर सेवा करने वाले लोग, या अभिषेक से पहले हमारा संकल्प करवाने वाले पुजारी—बार-बार जाने से उनमें से कई लोगों को मैं चेहरे से पहचानने लगी हूँ।
लेकिन सच कहूँ, मेरी नज़र आज भी हर बार उसी व्यक्ति को ढूँढ़ती है… जिन्होंने आज से लगभग आठ साल पहले बिना कुछ कहे मेरे हाथ में माँ बाला त्रिपुरसुंदरी की वह छोटी-सी तस्वीर रखी थी।
आज भी जब मैं कामाक्षी अम्मा के दर्शन के लिए जाती हूँ, तो अनायास ही उस दुकान के पास रुक जाती हूँ। चारों ओर नज़रें दौड़ाती हूँ, मन में एक ही आशा रहती है—शायद वे फिर से दिखाई दे जाएँ। लेकिन आठ साल बीत गए… आज तक मुझे उनका वैसा तेजस्वी स्वरूप दोबारा कभी नहीं दिखा।
इस लेख को समाप्त करने से पहले एक बात अवश्य कहना चाहूँगी।
ललिता सहस्रनाम का पाठ तो मैंने 2016 में शुरू कर दिया था, लेकिन ललिता सहस्रनाम को समझने की यात्रा… और श्रीविद्या को जानने की यात्रा… कांची कामाक्षी मंदिर से लौटने के बाद ही प्रारंभ हुई।
आज आपकी रीतिका दीदी अगर आपको श्रीविद्या के बारे में कुछ बता पाती हैं, तो मैं पूरे विनम्र भाव से यही कहूँगी कि यह सब माँ कामाक्षी की कृपा है।
इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है।
इसलिए माँ राजमातंगी को प्रणाम किए बिना, उनके श्रीचरणों में नतमस्तक हुए बिना और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त किए बिना यह लेख मेरे लिए पूर्ण हो ही नहीं सकता।
माँ राजमातंगी को प्रणाम करते हुए, अपनी कलम को यहीं विश्राम देती हूँ।
जैसे माँ ने मुझे अपने चरणों तक पहुँचाया, वैसे ही यदि मेरी यह छोटी-सी लेखनी किसी और के हृदय में भी माँ कामाक्षी के दर्शन की प्रेरणा जगा दे, तो मैं यही समझूँगी कि भगवती ने मुझे अपनी कृपा का एक छोटा-सा माध्यम बनाया है।
मैंने जैसे कहा था, मेरे लिए माँ कामाक्षी का पहला दर्शन “Love at First Sight” था।
उस भाव को शब्दों में बाँधना आज भी मेरे लिए संभव नहीं है। बस इतना ही कह सकती हूँ—
“वो मोहब्बत, मोहब्बत ही क्या,
जिसमें लोग मुझे देख कर तुझसे
मोहब्बत ना करने लगे,
और वो इबादत, इबादत ही क्या,
जिसमें लोग तुझे मुझमें ना देखने लगे।”
🙏
PS :
अगर आप माँ कामाक्षी के दर्शन के लिए कांचीपुरम जाने की योजना बना रहे हैं, तो यह प्लेलिस्ट आपकी पूरी यात्रा की योजना बनाने में मदद करेगी।
https://www.youtube.com/watch?v=rQhZZ...
आपकी अपनी,
रीतिका दीदी।
जय माँ कामाक्षी।
जय माँ ललिता अम्बिका।
जय माँ राजमातंगी। 🙏🌺
1 month ago (edited) | [YT] | 106
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Reetika Agarwal
वाराही नवरात्रि की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏❤️
वैसे तो मैंने कभी अलग से माँ वाराही की साधना नहीं की।
जितना जाना है, जितना पढ़ा है, जितना जपा है, वो सिर्फ ललिता है.
लेकिन माँ वाराही की ऊर्जा का 2024 जो अनुभव मुझे हुआ,वो शायद शब्दों से परे है ...
फिर भी एक कोशिश कर रही हूँ, उस ऊर्जा को जो मैंने महसूस की अपने व्यक्तिगत भावों को शब्द देने की.
मुझे आज भी याद है, शायद जुलाई या अगस्त 2024 की बात होगी। मैं चेन्नई गई थी और मन में एक ही इच्छा थी कि इस बार कांचीपुरम जाकर कामाक्षी अम्मा के दर्शन अवश्य करूँगी।
लेकिन जैसे ही चेन्नई पहुँची, मुझे 102° बुखार हो गया।
मैंने सोचा, शायद एक-दो दिन में बुखार उतर जाएगा और फिर मैं कांचीपुरम चली जाऊँगी। इसी उम्मीद में मैं दो दिन तक होटल में ही रुकी रही।
लेकिन माँ की इच्छा शायद कुछ और ही थी।
बुखार तब तक नहीं उतरा, जब तक हमारे वापस लौटने का समय नहीं आ गया। अंत में बिना दर्शन किए ही मुझे वापस लौटना पड़ा।
उस दिन मन में बस एक ही भाव आया—
“शायद अभी भगवती ने बुलाया नहीं है।”
फिर अक्टूबर 2024 में एक स्वप्न आया।
स्वप्न में एक ओर माँ थीं और दूसरी ओर भगवान विष्णु।
माँ की मूर्ति के आगे दीप प्रज्वलन किया, और पीछे से एक आवाज़ आई.
माँ ने बस इतना कहा—“मैं तुम्हारे साथ हूँ।” मुझे केवल यही याद है।
उसके बाद अचानक कांचीपुरम जाने का अवसर बन गया।
सबसे पहले मैं भगवान विष्णु के मंदिर गई, क्योंकि स्वप्न में भगवान विष्णु दिखे थे तो मुझे लगा कि शायद भगवती की ये इच्छा है कि मैं इस मंदिर में दर्शन करूँ. कामाक्षी मंदिर के पास ही विष्णु मंदिर है लेकिन कभी भी मैं इन आठ सालों में नहीं गई वहाँ दर्शन करने.
जब मैं कांचीपुरम पहुँची, पास स्थित श्री उलगालांथा पेरुमाल मंदिर की ओर बढ़े।
वहाँ भगवान विष्णु अपने वामन (त्रिविक्रम) अवतार में विराजमान हैं।
दर्शन के बाद जब मैं मंदिर से बाहर निकल रही थी, तभी एक अज्ञात महिला मेरे पीछे-पीछे आई और बार-बार कहने लगी—भगवान विष्णु की मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए
“भू देवी… भू देवी…”
उसकी भाषा तो तमिल मुझे नहीं समझ में आई, लेकिन इतना समझ में आया कि वो भूदेवी, भूदेवी कहके मुझे कुछ समझाना चाह रही है.
उस समय मैं समझ नहीं पाई कि वह ऐसा क्यों कह रही थीं।
बाद में जब मैंने इसके बारे में जाना via google search तब पता चला कि भगवान के साथ वहाँ श्रीदेवी और भूदेवी विराजमान हैं।
भूदेवी भगवान विष्णु की शक्ति हैं, जो पृथ्वी (भू) का दिव्य स्वरूप हैं।
विशेष रूप से वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी (भूदेवी) का उद्धार किया।
जैसे प्रत्येक देवता या अवतार के साथ उनकी दिव्य शक्ति का भी वर्णन मिलता है, उसी प्रकार शाक्त परंपरा में माँ वाराही को भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति माना गया है।
उस यात्रा के दौरान एक और बात मैंने बहुत गहराई से महसूस की।
अचानक से मेरे सामने बार-बार माँ वाराही से जुड़े संकेत आने लगे। ऐसा लग रहा था मानो किसी न किसी माध्यम से उनका नाम और उनका स्वरूप मेरे सामने बार-बार आ रहा हो।
एक बार मैं बिना किसी विशेष उद्देश्य के एक साड़ी की दुकान में गई।
जैसे ही अंदर प्रवेश किया, सबसे पहले मेरी नज़र माँ वाराही की मूर्ति पर पड़ी। उस क्षण भी मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है।
इस वाराही नवरात्रि के पावन अवसर पर मैं माँ वाराही की वही दिव्य प्रतिमा आपके साथ साझा कर रही हूँ, जिसके दर्शन मुझे कांचीपुरम में हुए थे।
फिर कामाक्षी अम्मा के मंदिर के प्रांगण में मैं बैठकर ललिता सहस्रनाम का पाठ कर रही थी।
बाहर वर्षा हो रही थी, इसलिए हम एक ओर बैठ गए थे, जहाँ अम्मा का एक बड़ा चित्र लगा हुआ था।
तभी एक महिला वहाँ आई।
उनका स्वरूप मैंने कांचीपुरम में पहले कभी नहीं देखा था।
सामान्यतः दक्षिण भारत की महिलाएँ बहुत सुंदर श्रृंगार और गजरा पहनती हैं, लेकिन वे एकदम अलग थीं—काली साड़ी, हाथों में काली चूड़ियाँ और पूरी तरह सफेद बाल।
उन्होंने पहले अम्मा के सामने सिर झुकाकर प्रणाम किया।
अम्मा को सर झुकाया और कुछ तो उसने तमिल में बोला, जो मुझे कुछ समझ में नहीं आया.
फिर मेरे पास आईं, मेरे सिर पर हाथ रखा और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गईं।
आज तक मुझे नहीं पता कि वे कौन थीं।
कांचीपुरम से लौटने के बाद मेरे जीवन में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आया।
मेरे जीवन में मानो कर्मों का एक तीव्र विस्फोट हुआ।
एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ घटती चली गईं, जिन्होंने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
मुझे 4 कई बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा।
उस समय सच कहूँ तो मुझे लगा था कि शायद मैं जीवित नहीं बचूँगी।
जब स्वप्न में भगवती ने मुझसे कहा था—
“मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
उस समय सच कहूँ तो मुझे लगा कि शायद इस जन्म में मेरी साधना पूर्ण नहीं हो पाएगी।
भगवद्गीता का एक सिद्धांत बार-बार मन में आ रहा था कि साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती; जहाँ से साधक अपनी साधना छोड़ता है, अगले जन्म में वहीं से उसकी यात्रा आगे बढ़ती है।
इसलिए मैंने उस समय भगवती के वाक्य “मैं तुम्हारे साथ हूँ” का अर्थ अपने मन में यही लगाया कि शायद माँ मुझे आश्वस्त कर रही हैं—“यदि इस जन्म में तुम्हारी साधना पूर्ण नहीं हो पाई, तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूँगी और तुम्हारी यात्रा अधूरी नहीं रहेगी।”
ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले मुझे स्वामी प्रेमानंद जी द्वारा सुनाई गई कथा याद आ रही थी—कि जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि हृदय से ईश्वर का स्मरण हो, तो वही सबसे बड़ा आश्रय बन जाता है।
शायद इसलिए उस दिन मेरे भीतर कोई भय नहीं था। मैं केवल “कामाक्षी… कामाक्षी…” का नाम लेते हुए ऑपरेशन थिएटर में गई।
फिर जो हुआ, वह केवल भगवती की कृपा थी।
लेकिन भगवती की कृपा से नवरात्रि की विजयदशमी के दिन मुझे नया जीवन मिला।
जब उन कठिन सर्जरियों से मैं सुरक्षित बाहर आ गई, तब मुझे बार-बार दो ही बातें याद आने लगीं—कांचीपुरम में उस रहस्यमयी वृद्ध महिला का मेरे सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखना… और स्वप्न में भगवती के वे शब्द—
“मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
तब जाकर मुझे लगा कि शायद मैं उन दोनों घटनाओं का अर्थ उस समय समझ ही नहीं पाई थी।
मेरे लिए माँ वाराही की ऊर्जा ऐसी लगी, जो जीवन में गहरे कर्मों का सामना बहुत तीव्रता से कराती है और भीतर छिपी चीज़ों को सामने ले आती है।
उस समय मुझे ऐसा लगा मानो जीवन में एक बड़ा कार्मिक विस्फोट हुआ हो।
मैंने कभी अलग से माँ वाराही की साधना नहीं की। मैं मुख्यतः ध्यान मार्ग की साधक हूँ।
लेकिन पिछले आठ वर्षों में जब-जब मुझे भगवती से जुड़े ऐसे स्वप्न आए, उनके बाद जीवन में घटित घटनाओं ने मुझे सोचने पर मजबूर किया।
मैं यह दावा नहीं करती कि हर स्वप्न दैवी संकेत होता है।
लेकिन इतना अवश्य मानती हूँ कि चेतना और मानव अनुभव के बारे में आज भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे विज्ञान पूरी तरह समझ नहीं पाया है।
शायद इस ब्रह्मांड में कुछ ऐसी सूक्ष्म प्रक्रियाएँ भी कार्य करती हैं, जिन्हें हम अभी पूरी तरह शब्दों या सिद्धांतों में बाँध नहीं पाए हैं।
…और कांचीपुरम…
न मैं वहाँ की भाषा जानती हूँ, न उस शहर को। वहाँ की गलियाँ, वहाँ की परंपराएँ, वहाँ का जीवन—कुछ भी मेरा अपना नहीं है।
फिर भी, हर बार वहाँ पहुँचते ही एक अजीब-सी अपनापन की अनुभूति होती है।
ऐसा लगता है जैसे यह शहर अनजान नहीं, बहुत पुराना परिचित हो।
जैसे हर गली, हर मंदिर, हर कोना मुझे अपने पास बुला रहा हो।
इस अनुभूति को शब्दों में बाँधना मेरे लिए आज भी कठिन है।
बस मन में बार-बार यही पंक्तियाँ गूँजती हैं—
“मेरा तुझसे है पहले का नाता कोई,
यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई…
जय माँ कामाक्षी। जय माँ वाराही। 🙏🌺
1 month ago (edited) | [YT] | 99
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Reetika Agarwal
आज कामाक्षी अम्मा के दर्शन करके वापस बेंगलुरु लौटने का दिन था। सुबह लगभग 6 .45 बजे हम कांचीपुरम से निकल गए। लगभग 70- 72 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद, लगा कि कहीं Breakfast कर लिया जाए।
हाईवे पर चलते-चलते एक कैफ़े दिखाई दिया—Divine Café। बाहर से ही जगह बहुत सुंदर और शांत लग रही थी। प्रवेश द्वार पर श्री यंत्र बना हुआ था और भगवान लक्ष्मी-नारायण की सुंदर प्रतिमा भी थी। बस, वहीं रुकने का मन हो गया।
पिछले कई दिनों से लगातार यात्रा पर थे, इसलिए रोज़ बाहर का ही खाना खा रहे थे।
नाश्ते में हमने इडलीअप्पम और वेण पोंगल (Ven Pongal) ऑर्डर किया। मुझे दक्षिण भारत का वेण पोंगल हमेशा से बहुत पसंद है।
जब नाश्ता आया, तो मैंने पहला निवाला जैसे ही मुँह में रखा, मैं कुछ पल के लिए रुक गई।
खाना बहुत साधारण था, लेकिन उसके साथ जो अनुभूति थी, वह बिल्कुल साधारण नहीं थी।
नॉर्मल रेस्टोरेंट या होटल के खाने जैसी वाइब्रेशन तो नहीं लग रही जो इतने दिन से हम कांचीपुरम में या रास्ते में हाइवे पे खा रहे हैं.
उस भोजन में एक ऐसी शांति और तृप्ति महसूस हो रही थी, जिसे शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए आसान नहीं है।
हमारे घर के पास हर रविवार भगवद्गीता की क्लास, उसके बाद हरिनाम संकीर्तन और फिर प्रसाद का आयोजन होता है।
जब भी मैं वहाँ प्रसाद ग्रहण करती हूँ, पहला निवाला लेते ही हृदय में एक ऐसी शांति उतरती है, जिसे शायद शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए संभव नहीं है।
और ठीक वैसी ही अनुभूति मुझे इस कैफ़े के भोजन को खाते समय हो रही थी।
मैं यह नहीं कहूँगी कि दोनों एक जैसे थे, लेकिन जिस प्रकार की शांति, तृप्ति और सात्विक वाइब्रेशन मुझे प्रसाद में महसूस होती है,….उसी जैसी कोई अनुभूति इस साधारण-से नाश्ते में भी मन के भीतर उतर रही थी।
अगर आप दक्षिण भारत में यात्रा करेंगे, तो एक बात आपको लगभग हर जगह देखने को मिलेगी। चाहे कोई बड़ा साड़ी शोरूम हो, ज्वेलरी स्टोर हो या रेस्टोरेंट—प्रवेश द्वार पर अक्सर भगवान की सुंदर प्रतिमा, छोटा-सा मंदिर या फिर श्री यंत्र अवश्य दिखाई देता है। कई स्थानों पर भगवान विष्णु-लक्ष्मी, कहीं वाराही, तो कहीं राजमातंगी की भी प्रतिमाएँ स्थापित होती हैं।
इसलिए जब मैंने इस कैफ़े के बाहर श्री यंत्र और लक्ष्मी-नारायणी की प्रतिमा देखी, तो मुझे इसमें कुछ असामान्य नहीं लगा। दक्षिण भारत में यह संस्कृति बहुत सामान्य है और यही इसकी खूबसूरती भी है।
लेकिन जिस बात ने मुझे वास्तव में आश्चर्यचकित किया, वह बाहर की प्रतिमा नहीं, बल्कि अंदर परोसे गए भोजन का अनुभव था।
मैं बार-बार यही सोच रही थी—
“आख़िर इस साधारण-से भोजन में ऐसा क्या है? इसकी वाइब्रेशन इतनी अलग क्यों महसूस हो रही है?”
तभी कैफ़े के सुपरवाइज़र हमारे पास आए। बहुत विनम्रता और मुस्कुराहट के साथ उन्होंने पूछा,
“मैडम, सब ठीक है? कुछ और चाहिए?”
उनका व्यवहार इतना सहज और सम्मानपूर्ण था कि बातचीत अपने-आप शुरू हो गई।
हमने उनसे पूछा, “क्या यह कैफ़े नया है? हम इस रास्ते से कई बार आए हैं, लेकिन पहली बार इसे देखा है।”
उन्होंने बताया कि यह कैफ़े लगभग आठ महीने पहले शुरू हुआ है। फिर उन्होंने जो बात बताई, उसने मेरे मन में चल रहे सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया।
उन्होंने कहा,
“यहीं पास में श्रीपुरम का लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेम्पल है। यह कैफ़े उसी ट्रस्ट द्वारा संचालित है। यहाँ जो भी भोजन बनता है, उसे सबसे पहले लक्ष्मी-नारायणी भगवान को भोग लगाया जाता है। पंडित वैदिक मंत्रों के साथ पूजा करते हैं। उसके बाद वही भोजन यहाँ कैफ़े में परोसा जाता है।
उनकी बात सुनते ही मेरे मन में चल रहा प्रश्न समाप्त हो गया।
मैं पिछले कुछ मिनटों से बार-बार यही सोच रही थी कि आखिर इस साधारण-से भोजन में इतनी शांति क्यों महसूस हो रही है? इसकी वाइब्रेशन इतनी अलग क्यों लग रही है?
और उसी क्षण लगा कि भगवान ने बिना मेरे कुछ पूछे ही मेरे मन का उत्तर दे दिया।
जिस अनुभूति को मैं शब्द नहीं दे पा रही थी, उसका कारण अब सामने था।
उन्होंने आगे बताया कि यहाँ से कुछ ही दूरी पर श्रीपुरम लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेम्पल स्थित है, जो लगभग 1,500 किलोग्राम सोने से निर्मित है।
मंदिर की पूरी संरचना श्री यंत्र की अवधारणा पर बनाई गई है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए वहाँ आते हैं।
उन्होंने बड़े प्रेम से कहा, "अगर आपके पास थोड़ा समय हो, तो मंदिर के दर्शन भी ज़रूर कीजिए।"
सच कहूँ तो, उसी समय पहली बार मुझे इस मंदिर के बारे में विस्तार से पता चला।
लेकिन इस बार हमारा कार्यक्रम वापस बेंगलुरु लौटने का था, इसलिए वहाँ जाना संभव नहीं हो पाया।
हाँ, अब मन में एक इच्छा अवश्य है कि जब भी दोबारा माँ कामाक्षी का बुलावा आएगा और यदि श्रीपुरम का भी बुलावा होगा, तो वहाँ अवश्य जाऊँगी।
वापसी के पूरे रास्ते मैं बस एक ही बात सोचती रही...
भोजन का असली स्वाद शायद उसके मसालों में नहीं,
जब वही भोजन पहले भगवान को अर्पित होकर प्रसाद बनता है, मंत्रों की ध्वनि और प्रार्थना के बीच तैयार होता है, तो शायद उसमें कुछ ऐसा जुड़ जाता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है।
खैर, इस बार समय की कमी के कारण मैं श्रीपुरम लक्ष्मी नारायणी गोल्डन टेम्पल के दर्शन नहीं कर पाई। यह मंदिर श्री यंत्र की संरचना पर निर्मित है और इसके बारे में जितना सुना, उससे मन में वहाँ जाने की इच्छा और भी बढ़ गई।
अगर आप कभी बेंगलुरु से चेन्नई, चेन्नई से बेंगलुरु, या कांचीपुरम की यात्रा सड़क मार्ग से कर रहे हों और रास्ते में वेल्लोर पड़ता हो, तो समय निकालकर इस मंदिर के दर्शन अवश्य कीजिए।
अगर आप वहाँ जाएँ, तो अपना अनुभव मेरे साथ ज़रूर साझा कीजिएगा। हो सकता है और यदि माँ कामाक्षी के साथ श्रीपुरम का भी बुलावा होगा, तो अगली बार मैं भी वहाँ दर्शन करने अवश्य जाऊँगी। 🙏
2 months ago (edited) | [YT] | 92
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Reetika Agarwal
इस समय मैं कांचीपुरम में हूँ। माँ कामाक्षी मंदिर प्रांगण में बैठी तो पिछले कुछ दिनों की एक-एक घटना अपने आप जुड़ने लगी।
कुछ दिन पहले मुझे माँ कामाक्षी के मंदिर का एक स्वप्न आया था।
लेकिन वह स्वप्न बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा आज का कामाक्षी मंदिर दिखाई देता है।
मंदिर की बनावट, वातावरण और पूरा स्वरूप वर्तमान मंदिर से काफी अलग था।
स्वप्न में सबसे पहले मुझे माँ काली की मूर्ति के दर्शन हुए।
उसके बाद एक महिला मेरे पास आई और बोली, “अब तुम कामाक्षी के दर्शन करो।”
वह मुझे अपने साथ आगे ले गई और फिर मुझे माँ कामाक्षी के अत्यंत सुंदर दर्शन हुए।
जब सुबह मेरी आँख खुली, तब भी भीतर वही अनुभूति बनी हुई थी कि मैं कामाक्षी अम्मा के मंदिर में ही थी।
लेकिन मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—कामाक्षी के इस स्वप्न में सबसे पहले माँ काली क्यों दिखाई दीं?
मैंने आज तक माँ काली की विशेष उपासना नहीं की है।
इसलिए सहज ही मन में विचार आया कि शायद कांचीपुरम में कामाक्षी मंदिर के आसपास कोई काली मंदिर होगा और भगवती चाहती हों कि इस बार वहाँ भी दर्शन करूँ।
जिज्ञासा में मैंने गूगल पर सर्च किया—
“Kali Temple near Kamakshi Temple, Kanchipuram.”
पहला ही परिणाम देखकर मैं कुछ क्षण के लिए ठिठक गई।
मुझे पता चला कि इस स्थान का प्राचीन नाम “कालीकोट्टम” (Kalikottam) माना जाता है और प्राचीन परंपराओं में इसे माँ काली से जुड़ा हुआ क्षेत्र बताया गया है।
पिछले 8- 9 वर्षों से माँ कामाक्षी के दर्शन के लिए कांचीपुरम आते हुए और कांचीपुरम में इस मंदिर का इतिहास जब पढ़ा तो सिर्फ इतना ही ज्ञात था. कि यहाँ देवी की अत्यंत उग्र शक्ति थी, जिसे आदि शंकराचार्य जी ने श्रीचक्र की स्थापना के माध्यम से शांत एवं सौम्य स्वरूप में प्रतिष्ठित किया।
लेकिन यह परंपरा कि यह स्थान कभी माँ काली से भी जुड़ा रहा है, मेरे लिए बिल्कुल नई जानकारी थी।
पिछले आठ-नौ वर्षों में मैंने एक बात बहुत स्पष्ट रूप से अनुभव की है। जब-जब मैंने अपनी इच्छा से कांचीपुरम जाने की योजना बनाई, किसी न किसी कारणवश मैं कभी पहुँच ही नहीं पाई।
कई बार आधे रास्ते से वापस लौटना पड़ा, और एक बार तो चेन्नई पहुँचने के बाद भी, जब मंदिर मात्र 30 -40 किलोमीटर दूर था, तब भी परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि मुझे लौटना पड़ा।
जब उनका बुलावा होता है, तब उससे पहले किसी न किसी रूप में स्वप्न अवश्य आते हैं, और उसके बाद ही यात्रा सहज रूप से पूरी हो पाती है।
भीतर बार-बार यही भाव उठ रहा था कि शायद कांचीपुरम का बुलावा आने वाला है।
इसी बीच मेरे मन में एक और संकल्प भी चल रहा था।
इन दिनों मेरे यूट्यूब चैनल पर ललिता सहस्रनाम की श्रृंखला चल रही है। मन में बार-बार यही भाव आता था कि इस कार्य को शीघ्र पूरा करूँ, ताकि माँ के सामने खड़े होकर कह सकूँ—
“अम्मा, जो कार्य आपने मुझे सौंपा था, उसे अपनी सामर्थ्य भर पूरा करने का प्रयास किया है।”
मुझे लगा था कि शायद बुलावा एक-दो महीने बाद आएगा। लेकिन माँ की योजना कुछ और ही थी।
शुक्रवार को अचानक भीतर से प्रेरणा हुई कि अभी दर्शन के लिए निकलना चाहिए।
हम यात्रा पर निकल भी पड़े। लेकिन आधे रास्ते पहुँचने के बाद ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि हमें वापस लौटना पड़ा।
उस समय मन में यही आया—शायद अभी समय नहीं आया है।
लेकिन अगले ही दिन, शनिवार की सुबह ठीक पाँच बजे अचानक मेरी आँख खुल गई। भीतर से जैसे किसी ने बहुत स्पष्ट कहा—
“अब चलो।”
मैं बिना अधिक सोचे तुरंत निकल पड़ी। इस बार पूरी यात्रा बिना किसी रुकावट के सम्पन्न हुई और आज माँ कामाक्षी के चरणों में बैठी हूँ।
आज यहाँ बैठकर पिछले कुछ दिनों की हर घटना अपने आप जुड़ती हुई महसूस हुई—स्वप्न में माँ काली के दर्शन, उसके बाद माँ कामाक्षी, फिर कांचीपुरम के इतिहास में कालीकोट्टम का उल्लेख, और अंततः आज यहाँ पहुँचना।
इन सबका अंतिम उत्तर मेरे पास नहीं है। लेकिन इतना अवश्य लगा कि कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती हैं, जो हमारी सामान्य तर्क-बुद्धि से परे होती हैं।
न्यूरोसाइंस आज भी स्वप्नों के रहस्य को पूरी तरह नहीं समझ पाई है। कुछ उन्हें मस्तिष्क की स्मृतियों का पुनर्गठन मानते हैं, तो कुछ उन्हें गहरी अंतर्दृष्टि का माध्यम मानते हैं।
लेकिन इसने मुझे एक बार फिर यह एहसास कराया कि शायद कभी-कभी हमारे स्वप्न हमें ऐसी दिशा या जानकारी दे देते हैं, जिसे हमारा जाग्रत मन अभी तक नहीं जानता।
शायद भगवती की यही इच्छा रही हो कि यह छोटी-सी जानकारी मेरे माध्यम से उन माँ काली के साधकों और भक्तों तक भी पहुँचे, जिनका कभी माँ कामाक्षी के दर्शन का बुलावा आए।
बाकी मैं तो बस एक माध्यम मात्र हूँ। किसे कब बुलाना है, किसे किस मार्ग से अपने पास लाना है—यह सब माँ की ही इच्छा है।
किसी एक साधक को भी माँ के चरणों तक पहुँचने की प्रेरणा मिले, तो मैं समझूँगी कि भगवती ने मुझे अपना माध्यम बनाकर अपना कार्य करवा लिया।
आपकी,
रीतिका दीदी
जय माँ कामाक्षी। 🌺
2 months ago (edited) | [YT] | 148
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Reetika Agarwal
Shlok 44-50 | Part1 | Stages of Meditation #meditation
3 months ago (edited) | [YT] | 18
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Reetika Agarwal
डेढ़ साल पहले जब मैंने अपना self funded बिज़नेस operations बेचा था, तब बच्चों के कपड़ों का पूरा स्टॉक मैंने नहीं बेचा। टीशर्ट्स, baby ब्लैंकेट्स… मैंने उन्हें संभालकर रख लिया था…
और पिछले एक साल से मैं धीरे-धीरे यही Multiple Orphanages distribution कर रही हूँ — गोविंद रूपी उन बच्चों तक ये कपड़े पहुँचाने की।
आज जो बचा हुआ फाइनल स्टॉक था, उसका डिस्ट्रीब्यूशन करना था।
हमने एक-एक करके बड़े Multiple कार्टन्स तैयार किए थे।
हर कार्टन में लगभग 100-दो सौ बच्चों की शर्ट्स पैक की थीं, साथ में कुछ ब्लैंकेट्स और ज़रूरत का सामान भी रखा था।
मैंने मन में तय किया था कि आज इस सेवा के इस final चरण को पूरा कर दूँगी।
इसलिए आज कुछ अनाथालयों की फाइनल लिस्ट बनाई थी, जहाँ जाकर ये आख़िरी कार्टन्स देने थे।
गाड़ी में पूरे कार्टन रखे और निकल पड़े।
लेकिन जैसे ही घर से निकले, अचानक इतनी तेज बारिश शुरू हो गई कि कुछ समझ ही नहीं आया।
बैंगलोर के एक हिस्से में मूसलाधार बारिश थी, दूसरे हिस्से में मौसम बिल्कुल सामान्य।
सड़कें जाम हो गईं। गाड़ियाँ रेंग रही थीं।
तभी रास्ते में एक Orphanage दिखा — जो हमारी बनाई हुई लिस्ट में था ही नहीं।
हमने एक-दूसरे को देखा और कहा,
“इतना ट्रैफिक है… क्यों न एक कार्टन पूरा यहीं डिस्ट्रीब्यूट कर देते हैं?”
हमने गाड़ी रोकी। बारिश अब भी ज़ोरों से हो रही थी।
दरवाज़ा खटखटाकर अंदर गए। वहाँ पता चला कि उस orphanage आश्रम में 28 बच्चे रहते हैं।
वह एक साईं बाबा आश्रम था।
जब हमने कपड़ों और ब्लैंकेट्स के बारे में बताया, तो उन्होंने कहा —
“मैडम, हमने बहुत सारे डोनर्स को मैसेज भेजे थे। बच्चों के कपड़ों की बहुत ज़रूरत थी। देखिए, ये बंकर बेड हैं… इनके लिए ब्लैंकेट्स भी चाहिए थे।
आप शायद यूँ ही नहीं आईं… साईं बाबा ने आपको भेजा है।
उस पल मैं कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल शांत हो गई।
मुझे ऐसा महसूस हुआ कि शायद इस ब्रह्मांड में उन बच्चों को सच में ज़रूरत थी… और उस मूल प्रकृति ने खुद रास्ता बनाया।
बारिश शुरू कर दी।
ट्रैफिक में रोक दिया।
और धीरे-धीरे हमें उस आश्रम की देहरी तक पहुँचा दिया… जो हमारी लिस्ट में भी नहीं था।
मैंने जीवन का एक बहुत गहरा लेसन सीखा —
जब आपकी पुकार दिल से निकलती है, तब केवल इंसान नहीं… पूरी प्रकृति आपकी सहायता करने लगती है।
कभी बारिश बनकर…
कभी एक मोड़ बनकर…
उन बच्चों को सच में ज़रूरत थी।
वो साईं बाबा से प्रार्थना कर रहे थे… मदद माँग रहे थे… और शायद पूरी प्रकृति उनकी उस पुकार को सुन रही थी।
शायद हमें सिर्फ एक माध्यम बनाकर भेजा गया था।
और सच कहूँ तो ये मेरी ज़िंदगी का पहला ऐसा अनुभव नहीं था।
इससे पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है… जिसे शायद मैं फिर कभी शेयर करूँगी।
लेकिन उस दिन एक बात और गहराई से समझ आई —
चाहे हम उसे साईं बुलाएँ…
चाहे ललिता…
चाहे ईश्वर या मूल प्रकृति…
उसे पता होता है कि किसकी पुकार कब सच्चे दिल से निकली है… और किस तक किसे पहुँचाना है।
और अपने सभी सब्सक्राइबर्स से मैं बस यही कहना चाहूँगी —
जीवन में कुछ कार्य केवल प्रयत्न से नहीं, प्रार्थना से संभव होते हैं।
क्योंकि जब पुकार सच्चे हृदय से निकलती है, तब प्रकृति स्वयं रास्ते बनाने लगती है।
देवी इसलिए “भक्तवत्सला” हैं…
“भक्तिवश्या” हैं…
“भक्तिगम्या” हैं…
और शायद आज उन मासूम बच्चों के भाव…
उनकी सच्ची प्रार्थना…
उनकी भक्ति ही थी जिसने इस मूल प्रकृति को हमारी गाड़ी वहाँ तक पहुँचाने के लिए प्रेरित किया।
बारिश भी उसी की थी…
रास्ता भी उसी का था…
और शायद हम भी उसी की योजना का एक छोटा सा माध्यम थे।
आपकी रीतिका दीदी
जय माँ कामाक्षी।
जय माँ ललिता।
3 months ago (edited) | [YT] | 87
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Reetika Agarwal
जब हमने यह सफर शुरू किया था, तो मेरा एकमात्र लक्ष्य था—ललिता सहस्रनाम को 'चेतना' (Consciousness) के स्तर पर समझाना। लेकिन, इस यात्रा के दौरान हम कहीं भटक गए।
पिछले 1.5 वर्षों में आप सभी के साथ जुड़कर और आपकी हज़ारों क्वेरीज को पढ़कर मुझे कुछ बहुत अनुभव हुए हैं।
इन अनुभवों , जिसे मैं आज आपके साथ Share करना चाहती हूँ
- गुरु और दीक्षा (10-20% Queries): कई लोग बाहरी गुरु या दीक्षा के इंतज़ार में हैं, उन्हें लगता है कि दीक्षा लेते ही उनके कर्म और संघर्ष खत्म हो जाएंगे। मैंने कुछ समय तक इन सवालों के उत्तर देकर उन्हें समझाने की पूरी कोशिश की As Spiritual Seeker लेकिन ये topic और इस तरह के प्रश्नो की श्रृंखला अंत होने की कोई सीमा ही नहीं नज़र आरही
मै कोई गुरु नहीं
यदि आप चमत्कार की खोज में हैं, तो आप गलत जगह आ गए हैं।
यहाँ केवल तार्किक साधना और चेतना के विज्ञान की बात होती है।
- शॉर्टकट का चक्र (20-30% Queries ): आज एक बड़ी संख्या मंत्रों को 'जादुई समाधान' समझकर 'मंत्र-हॉपिंग' कर रही है।
आज एक मंत्र, कल दूसरा, और परसों किसी और देवी का—हर नई समस्या के लिए एक नया शॉर्टकट! हम यह भूल गए हैं कि मंत्र कोई दवा नहीं है जो बाहर से काम करेगी।
हम 'कर्म योग' (Karmic Action), 'स्किल डेवलपमेंट' (Skill building) और 'माइंडसेट अपग्रेड' पर काम करने के बजाय, बस यह चाहते हैं कि कोई स्तोत्र पढ़ लें और हमारी मेहनत बच जाए।
यह 'Victim Mindset' है, न कि एक विजेता (Achiever)।
- मूल उद्देश्य से भटकाव (50-60% Queries): अक्सर लोग मुझसे पंचदशी, षोडशी स्तोत्र और विभिन्न मंत्रों , स्तोत्र के बारे में पूछते हैं। लेकिन इन कर्मकांडीय सवालों के जवाब देने की प्रक्रिया में, हमारा मूल उद्देश्य— 'चेतना का विज्ञान'—कहीं पीछे छूट जाता है। मैं चाहती हूँ कि हम केवल स्तोत्रों तक सीमित न रहें, बल्कि उसके पीछे के विज्ञान को समझें।
यदि आपने ललिता सहस्रनाम और मंत्र विज्ञान के मूल सिद्धांतों को गहराई से समझ लिया, तो आप स्वयं किसी भी स्तोत्र या मंत्र को डिकोड करने में सक्षम हो जाएंगे। मेरा उद्देश्य आपको अपने ऊपर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि आपको इतना समर्थ बनाना है कि आप हमारे प्राचीन मंत्र शास्त्र को एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझ सकें।
आवश्यकता है कि आप अंधविश्वास और जादू-टोने जैसे प्रपंचों से बाहर निकलें और मंत्रों को बदलने की भागदौड़ के बजाय, चेतना की वास्तविक गहराई में उतरें
मेरा स्टैंड:
मैंने अपने 15 साल कॉर्पोरेट और स्टार्टअप की दुनिया में बिताए हैं।
मैंने यह आध्यात्मिक यात्रा शॉर्टकट्स के लिए नहीं, बल्कि सत्य की खोज के लिए शुरू की थी।
मैंने हमेशा मंत्रों और देवी-शक्ति को एक उच्च 'चेतना विज्ञान' (Consciousness Science) के रूप में देखा है।
लेकिन मुझे यह देखकर मायूसी होती है कि हमारी चर्चाएँ अक्सर एक 'मंत्र रेस' (Mantra Race) बनकर रह गई हैं।
मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ:
मैं यह स्पष्ट करना चाहती हूँ कि यह कभी भी मेरे विज़न का हिस्सा नहीं रहा, और न ही मैंने कभी ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दिया है।
मैं बहुत कोशिश करती की मंत्र विज्ञान को लॉजिक से समझा सकू
इसीलिए, मैंने अपने चैनल Playlist & Videos को रिफ़ाइन करने की Process में हूँ । अब हमारा फोकस पूरी तरह से:
अब हमारा फोकस:
* Consciousness Science (चेतना का विज्ञान)
* Mindset Upgrading (दृष्टिकोण में बदलाव)
* Karmic Alignments (कर्मों का तालमेल)
* Cosmic Astro-Science (ब्रह्मांडीय विज्ञान)
...पर रहेगा।
मैं आपको भ्रम में नहीं रखना चाहती। मेरी यह ईमानदारी शायद आज आपको कठोर लगे,
लेकिन
मेरा लक्ष्य यह है कि हम हर समस्या को अंधविश्वास की दृष्टि से नहीं, बल्कि विज्ञान और तर्क की दृष्टि से देखें—ताकि आपका नजरिया -Mindset बदले
.........................................................................................
कहते हैं कि इस ब्रह्मांड की अपनी एक भाषा होती है, और जापान में इसे कहते है —'एन' (En)(En - 縁)। इसका अर्थ है भाग्यशाली संयोग या दैवीय जुड़ाव।
जब कोई अजनबी हमारी जिंदगी में आता है या कोई घटना अचानक घटती है, तो वह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का एक संकेत होता है
आज जब मैं पीछे मुड़कर अपनी और आपकी इस 16,000 लोगों की यात्रा को देखती हूँ, तो मुझे इसमें एन' (En - 縁) दिखाई देते हैं।
हमारी यह यात्रा दैवीय संकेतों से शुरू हुई थी और हमारा मिलना एक संयोग था।
मैंने यह 'एन' (En - 縁) यानी यह दैवीय जुड़ाव इसीलिए महसूस किया, क्योंकि इस यात्रा ने मुझे यह मौका दिया कि मैं आपको समझ सकूँ।
मैंने जो कुछ भी सीखा, वो आपकी समस्याओं को देखकर ही समझा।
शायद यह मेरी एक छोटी सी कोशिश थी कि मैं आपके जीवन के देखने का नज़रिया (Perspective) बदल सकूँ।
मेरा एकमात्र विज़न आपको उस 'अनंत चेतना' (Infinite Consciousness) से जोड़ना है, जो ललिता सहस्रनाम का सार है।
उस अनंत चेतना में अपार क्षमताएं (Infinite Capabilities) छिपी हैं…और वो चेतना आप हो
क्या ये आप समझ पा रहे है ?
अगर हाँ, तो इस सफर को एक नई और स्पष्ट दिशा के साथ शुरू करते हैं।
आपकी
रितिका दीदी
3 months ago (edited) | [YT] | 60
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