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अलंकार अग्निहोत्री का भाजपा पर बड़ा हमला: अयोध्या से भरी हुंकार कहा हमारी पार्टी के नाम में ही बसे हैं राम===========================================अंतरिक्ष तिवारी की कलम से =============================================
अयोध्या। राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा के प्रमुख अलंकार अग्निहोत्री ने रामनगरी अयोध्या पहुँचकर प्रभु श्री राम और हनुमानगढ़ी के चरणों में मत्था टेका और दर्शन-पूजन किया। इस दौरान उन्होंने सत्ताधारी दल पर तीखा हमला बोलते हुए भारतीय जनता पार्टी को भस्मासुर पार्टी' करार दिया। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा कि जिस अयोध्या की धरती से भाजपा ने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी आज उसी पावन धरा से उनके पतन की शुरुआत होने जा रही है। अलंकार अग्निहोत्री ने अपनी पार्टी के नाम की महत्ता बताते हुए कहा कि हमारी पार्टी 'राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा' के नाम में ही स्वयं प्रभु श्री राम समाहित हैं जो अधर्म के नाश का प्रतीक है। उन्होंने अपनी यात्रा को दैवीय संकेत बताते हुए साझा किया कि जैसे ही उन्होंने अयोध्या धाम की सीमा में कदम रखा ।अब सर्व समाज के उत्थान का समय आ गया है और उन्हें न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के कई अन्य राज्यों से भी भारी जनसमर्थन और सहयोग प्राप्त हो रहा है। मीडिया से रूबरू होते हुए उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने समाज के हर वर्ग चाहे वह सरकारी अधिकारी हो या आम जनता सभी का मानसिक और आर्थिक शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। विपक्षी हमलों और जांच एजेंसियों के डर पर बेबाकी से जवाब देते हुए अग्निहोत्री ने चुनौती दी कि मेरे पीछे ईडी सीबीआई या जितनी भी खुफिया एजेंसियां हैं, सब लगा दी जाएं, लेकिन मैं सर्व समाज की आवाज बुलंद करता रहूंगा। जब उनसे सवाल किया गया कि सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद बिना पैसों के वे इतना बड़ा अभियान कैसे चला रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारा समाज ही हमारी ताकत है । उन्होंने साफ कहा कि हमें न दारू बांटनी है और न ही दिखावा करना है, हम साधारण लोग हैं और साधारण जनता के हितों की बात करेंगे। भ्रष्टाचार से कमाने वालों को सोचने की जरूरत है हमें नहीं। उन्होंने भीड़ तंत्र पर कटाक्ष करते हुए कहा कि भीड़ से केवल दिखावा हो सकता है लेकिन भीड़ कभी वोट की गारंटी नहीं होती; जनता अब जागरूक हो चुकी है और साइलेंट तरीके से अपना काम करेगी। उन्हें विश्वास है कि लोग खुद जागरूकता के साथ उनके संदेश को आगे बढ़ाएंगे और साल 2027 में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिलेगा। इस दौरान उन्होंने समाजसेवी अर्चना तिवारी, कृपा निधान तिवारी, रामानंदन त्रिपाठी, दिग्विजय शुक्ला,वरुण शुक्ला ,गुलशन तिवारी के साथ कई घंटों तक विशेष रणनीति पर गंभीर चर्चा की। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि प्रभु श्री राम अयोध्या नगरी और सनातन धर्म हमारे हृदय में बसते हैं और इन्हीं आदर्शों को लेकर हम आगे बढ़ेंगे। इस अवसर पर उनके साथ वेद पांडे, प्रतीक पाठक, अशोक तिवारी, बृजेश सिंह ,अजय श्रीवास्तव, काजल पाठक, अभय मिश्रा राजन पांडे, राजेश नारायण तिवारी सोनू और केशव सहित अयोध्या के तमाम गणमान्य लोग मुख्य रूप से मौजूद रहे।

2 weeks ago | [YT] | 1

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जिला अस्पताल में लावारिस मरीज के इलाज पर हंगामा सुप्रीम कोर्ट के नियमों की अनदेखी धरने के बाद जागी संवेदनशीलता============================================================ =========== =अंतरिक्ष तिवारी की कलम से==========
अयोध्या। जिला चिकित्सालय में लावारिस मरीजों के इलाज की व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। सोमवार को रायबरेली चौराहे के पास अचेत मिले एक अज्ञात व्यक्ति को जब समाजसेवी प्रदीप यादव एंबुलेंस से सुबह 11:20 बजे अस्पताल लेकर पहुंचे, तो डॉक्टरों ने लावारिस होने का हवाला देकर उसे भर्ती करने में आनाकानी शुरू कर दी। इसके विरोध में समाजसेवी को इमरजेंसी गेट पर ही धरने पर बैठना पड़ा, जिससे अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। स्थिति बिगड़ती देख भारी पुलिस बल बुलाया गया, लेकिन अंततः एसआईसी अजय चौधरी के हस्तक्षेप के बाद ही मरीज का उपचार शुरू हो सका और उसे मेडिकल वार्ड के बेड नंबर 32 पर शिफ्ट किया गया।यह घटना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के परमानंद कटारा बनाम भारत संघ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का उल्लंघन है जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी घायल या बीमार व्यक्ति को लावारिस होने या कागजी कार्रवाई के नाम पर इलाज से मना करना असंवैधानिक है। सरकारी नियमावली के अनुसार, प्रत्येक जिला अस्पताल का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह लावारिस मरीज को तत्काल भर्ती कर निःशुल्क उपचार, दवाएं और भोजन उपलब्ध कराए। नियमों के मुताबिक, मरीज को भर्ती करने के बाद पुलिस को सूचना देना अस्पताल प्रशासन का काम है न कि तीमारदार की अनुपस्थिति में इलाज रोकना। इस मामले में ड्यूटी पर तैनात कर्मियों की संवेदनहीनता पर स्थानीय लोगों में रोष है क्योंकि इलाज में देरी करना राइट टू लाइफ अनुच्छेद 21 और मेडिकल एथिक्स का गंभीर उल्लंघन है। यदि अस्पताल प्रशासन भविष्य में भी ऐसी लापरवाही बरतता है तो संबंधित स्टाफ के खिलाफ मानवाधिकार आयोग और स्टेट मेडिकल काउंसिल में शिकायत की जा सकती है

1 month ago | [YT] | 0

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अयोध्या में साहब की कुर्सी खाली खनन माफिया की निकल पड़ी दिवाली: सरयू मां की छाती पर चल रहा नंबर वन वाला खेल aapkitakat.in/?p=834

1 month ago | [YT] | 0

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अयोध्या में भू-माफियाओं की मनमानी: बिना लेआउट जमीन बेचकर जनता को लगा रहे चूना बुलडोजर कार्रवाई भी पड़ रही फीकी aapkitakat.in/?page_id=831

1 month ago | [YT] | 0

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संतोष दुबे के विवादित बयान पर साहू मुरारी गुप्ता की सीधी चेतावनी: तेली समाज का अपमान करने वालों को उसी भाषा में मिलेगा जवाब चुप्पी साधने वाले ब्राह्मणों को भी माना जाएगा उनका समर्थक============================================ गांधी जी और प्रधानमंत्री मोदी की जाति को लेकर संतोष दुबे द्वारा दिए गए मुंह न देखने वाले अपमानजनक बयान ने अब एक भीषण सामाजिक आक्रोश का रूप ले लिया है। इस मुद्दे पर राष्ट्रीय तेली साहू महा संगठन (दिल्ली) के राष्ट्रीय अध्यक्ष साहू मुरारी गुप्ता ने एक वीडियो जारी कर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि तेली समाज का अपमान अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सामने वाला जिस भाषा में बात करेगा, उसे उसी भाषा में जवाब दिया जाएगा। गुप्ता ने ब्राह्मण समाज को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यदि वे संतोष दुबे के इस बयान का खंडन नहीं करते, तो यह मान लिया जाएगा कि वे भी इस ओछी मानसिकता और समाज को बांटने वाली साजिश का समर्थन कर रहे हैं।विवाद अब कई राज्यों में फैल चुका है और संतोष दुबे के कारण पूरा ब्राह्मण समाज निशाने पर आने लगा है। मुरारी गुप्ता ने यहाँ तक आह्वान कर दिया है कि ब्राह्मण यदि अपने बीच के ऐसे तत्वों को नहीं रोकते, तो लोग उनका सम्मान करना और पैर छूना भी बंद कर दें। समाज का कहना है कि उन्होंने सदैव ब्राह्मणों का सबसे अधिक सहयोग और सम्मान किया है लेकिन यदि बदले में अपमान मिलेगा तो समाज चुप नहीं बैठेगा। इसी बीच एक महिला का वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि "जो आज मुंह देखना पाप बता रहे हैं, उनके पूर्वज हमारे बाप-दादाओं से कर्ज लेकर मुंह छुपाकर भागते थे ताकि हिसाब न देना पड़े।संतोष दुबे जो पहले भी कई विवादों में घिर कर पीछे हट चुके हैं, इस बार सीधे तौर पर तेली-साहू समाज के स्वाभिमान से टकरा गए हैं। तेली समाज ने साफ कर दिया है कि विचारों का विरोध जाति तक नहीं आना चाहिए। समाज ने अब संतोष दुबे और उनका समर्थन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। मांग की जा रही है कि दुबे जल्द से जल्द सार्वजनिक माफी मांगें, अन्यथा यह आक्रोश एक बड़े सामाजिक टकराव और कानूनी कार्रवाई की वजह बनेगा।

1 month ago | [YT] | 0

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सत्ता की हनक या ब्राह्मण विरोध का नशा बरेली के बंधक मजिस्ट्रेट और लखनऊ वाले उस फोन का सच ========================अंतरिक्ष तिवारी की कलम से =====================
उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों जो कुछ घट रहा है वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है लेकिन इसके किरदार असली हैं और उनका दर्द भी। सवाल बड़ा है कि क्या उत्तर प्रदेश में अब अधिकारियों की निष्ठा उनकी जाति से तय होगी क्या विरोध की आवाज उठाने वाले किसी 'पंडित' को सत्ता के गलियारों में 'पागल' करार दे दिया जाएगा। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे और उसके बाद के घटनाक्रम ने शासन की नैतिकता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला केवल एक इस्तीफे का नहीं है बल्कि उस जमीर का है जो यूजीसी (UGC) के विवादित नियमों और प्रयागराज में ब्राह्मण बटुकों की चोटी खींच-खींचकर पीटे जाने के विरोध में जाग उठा था। लेकिन इस जमीर की कीमत अलंकार अग्निहोत्री को 'बंधक बनकर चुकानी पड़ी। आरोप बेहद संगीन हैं एक तरफ डीएम अविनाश सिंह का आवास और दूसरी तरफ लखनऊ से आता वह रहस्यमयी फोन कॉल। अग्निहोत्री का दावा है कि उन्होंने अपने कानों से वह बातचीत सुनी जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी झकझोर देने वाली है। उनके अनुसार जिलाधिकारी के मोबाइल पर लखनऊ से आए फोन पर दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति गरज रहा था कि साला पंडित पागल हो गया है। इस साले को रात भर अपने आवास में बंधक बनाकर रखो। इस साले को जाने मत देना। यह संवाद केवल अपशब्द नहीं है, बल्कि उस सामंती सोच का प्रमाण है जो सत्ता की खिड़की से एक हाते की तरह झांक रही है। जब रक्षक ही भक्षक की भाषा बोलने लगें और खाकी वर्दी बटुकों की चोटी का अपमान करने लगे तब एक अधिकारी का इस्तीफा देना व्यवस्था को आईना दिखाने जैसा है। मगर बदले में उसे गाली और बंधक बनाए जाने का इनाम मिलना इस बात की तस्दीक करता है कि उत्तर प्रदेश में 'ब्राह्मण विरोध' का नशा अब सिर चढ़कर बोल रहा है।सूत्रों की मानें तो यह घटना योगी सरकार के लिए किसी 'खतरे की घंटी' से कम नहीं है। शासन के गलियारों में चर्चा है कि जिस प्रकार सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों के खिलाफ जातिवादी टेक हावी हो रहा है उससे सरकार के भीतर ही दो फाड़ की स्थिति बन रही है। सूत्र बताते हैं कि हाल के दिनों में कई ब्राह्मण जनप्रतिनिधियों की नाराजगी और समुदायों के बीच बढ़ते असंतोष ने मुख्यमंत्री कार्यालय की चिंता बढ़ा दी है। विपक्ष अब इस मुद्दे को लपक चुका है और सीधे आरोप लगा रहा है कि प्रदेश में एक खास वर्ग के वर्चस्व के नाम पर अन्य वर्गों, विशेषकर ब्राह्मणों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूजीसी नियमों को लेकर सामान्य वर्ग का गुस्सा और बटुकों के साथ हुई अभद्रता ने आग में घी डालने का काम किया है। गूगल और अन्य प्लेटफार्मों पर मौजूद जानकारियों के अनुसार योगी सरकार के खिलाफ अब यह धारणा बलवती हो रही है कि ब्यूरोक्रेसी में एकतरफा जातिवाद हावी है जो आने वाले चुनावों में भाजपा के कोर वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है। यदि समय रहते इन 'लखनऊ वाले फोन कॉल्स' और अधिकारियों के मानसिक उत्पीड़न पर लगाम नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में ब्यूरोक्रेसी का यह असंतोष सत्ता के सिंहासन को हिला सकता है। अलंकार अग्निहोत्री का यह आरोप सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि उस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है जो अपनों को ही अपमानित करने की फैक्ट्री बन चुका है। क्या मुख्यमंत्री इस अज्ञात रसूखदार की शिनाख्त करेंगे या फिर स्वाभिमान की इस आवाज को फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा जवाब का इंतजार प्रदेश का हर वो शख्स कर रहा है जिसे अपनी परंपरा और अपने आत्मसम्मान पर नाज है।

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2027 की बिसात पर अयोध्या का पेंच: संगठन विस्तार में नियुक्ति न कर पाने को लेकर भाजपा और सपा के छूट रहे पसीने ================================================अंतरिक्ष तिवारी की कलम से ============================
अयोध्या। राम की नगरी अयोध्या में इस समय एक गहरा सियासी सस्पेंस बना हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों ने जो नए समीकरण पैदा किए हैं उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की रणनीतियों को पूरी तरह उलझा दिया है। आलम यह है की महानगर अध्यक्ष के साथ महानगर संगठन विस्तार और जिला अध्यक्षों की नियुक्ति न कर पाने को लेकर भाजपा और सपा दोनों ही दलों के पसीने छूट रहे हैं। महीनों बीत जाने के बाद भी अध्यक्षों के नाम तय न हो पाना यह साफ दर्शाता है कि भीतर सब कुछ ठीक नहीं है और 2027 की डगर दोनों के लिए कांटों भरी है।भारतीय जनता पार्टी के लिए अयोध्या साख का सवाल है, लेकिन यहाँ संगठन विस्तार में पनपी खींचतान नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा के भीतर इस समय मुख्य रूप से तीन अलग-अलग गुट सक्रिय हो चुके हैं जो सांगठनिक नियुक्तियों को लेकर अपने-अपने स्तर पर बिसात बिछा रहे हैं। ये तीन गुट कौन से हैं और इनका नेतृत्व कौन कर रहा है यह फिलहाल एक बड़ा सस्पेंस बना हुआ है लेकिन इनकी आपसी रस्साकशी ने आलाकमान की उलझनें बढ़ा दी हैं। भाजपा इस बार सामान्य वर्ग के पारंपरिक आधार को बचाने के साथ-साथ पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारी जद्दोजहद कर रही है। समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच एक ही टीस है प्रभु राम का वनवास तो खत्म हुआ लेकिन वर्षों से पार्टी का झंडा ढोने वालों का राजनीतिक वनवास कब खत्म होगा पार्टी नेतृत्व इन गुटों के आपसी टकराव को बड़ी गंभीरता से ले रहा है क्योंकि वे जानते हैं कि अगर संगठन विस्तार में सवर्ण, पिछड़ा और दलित वर्ग का सही संतुलन नहीं बना तो 2027 में नुकसान तय है।दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी भी उतनी ही उलझन में हैअखिलेश यादव अयोध्या की पांचों सीटों को लेकर इस बार किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं। सूत्रों की मानें तो पूर्व में राम लोटन निषाद को गोसाईगंज की जो जिम्मेदारी दी गई थी, उसे स्थानीय स्तर पर उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया, जिससे शीर्ष नेतृत्व काफी नाराज दिखा। चर्चा है कि इसी नाराजगी के कारण कमेटियां भंग की गईं लेकिन सपा ने यहाँ बड़ी राजनीतिक चतुराई दिखाई। अगर सिर्फ जिला कमेटी भंग होती तो संदेश कुछ और जाता इसीलिए सपा ने जिला और महानगर दोनों कमेटियों को एक साथ भंग कर दिया। इसके पीछे की मंशा यह थी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सपा नेतृत्व चाहता है कि नया संगठन केवल एक सीट पर नहीं बल्कि पांचों विधानसभा सीटों पर जीत का समीकरण तैयार करे।सपा अपने सामाजिक न्याय के फार्मूले के साथ-साथ इस बार सामान्य वर्ग को भी अपने साथ जोड़ने के लिए विशेष रणनीति बना रही है। चर्चा है कि सपा चौंकाते हुए सामान्य वर्ग के किसी चेहरे पर भी दांव खेल सकती है ताकि भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके। अब नए सिरे से संगठन विस्तार में जुटी सपा इंतजार करने की रणनीति पर चल रही है। सपा का पूरा जोर ऐसे चेहरों पर है जो पिछड़ी जाति अनुसूचित जाति और सामान्य वर्ग तीनों में अपनी स्वीकार्यता रखते हों। सूत्र बताते हैं कि सपा जानबूझकर रुकी हुई है ताकि भाजपा के पत्ते खुलने के बाद अपने सबसे प्रभावशाली चेहरे मैदान में उतार सके।कुल मिलाकर अयोध्या में संगठन विस्तार और अध्यक्ष पदों की यह देरी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि 2027 की सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने की एक बड़ी जद्दोजहद है। दोनों ही दल इस बात को लेकर असहज हैं कि एक ऐसा नाम कैसे चुना जाए जो सामान्य, पिछड़ा और दलित तीनों वर्गों को एक साथ साध सके। अब देखना यह है कि अयोध्या की इस सियासी बिसात पर कौन सा दल पहले अपने पत्ते खोलता है और किसकी मेहनत सफलता की नई कहानी लिखती है।

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जिला अस्पताल में अंगद का पैर जमाए बैठे डॉ. आशीष श्रीवास्तव: रसूख के आगे सिस्टम नतमस्तक आज भी खाली मिलीं कई डॉक्टरों की कुर्सियां=====================================अंतरिक्ष तिवारी की कलम से======================
अयोध्या। जिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं खबर चलने के बाद भी सुधरने का नाम नहीं ले रही हैं। भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का आलम यह है कि जिम्मेदार अपनी कुर्सियों से नदारद हैं, जबकि दूर-दराज से आई गरीब जनता इलाज के लिए दर-दर भटक रही है। दोपहर 12:00 से 1:00 के बीच जब अस्पताल परिसर का जीपीएस फोटो के साथ निरीक्षण किया गया, तो ओपीडी के अधिकांश कमरों में डॉक्टरों की कुर्सियां आज भी खाली मिलीं। जनता के खून-पसीने और टैक्स की कमाई से हर महीने मोटी सैलरी और मानदेय लेने वाले इन डॉक्टरों को अब शायद न संविधान का डर है और न ही भगवान का। जनता सवाल पूछ रही है कि अगर इन साहबों को निजी प्रैक्टिस और वीआईपी खातिरदारी का इतना ही शौक है, तो वे सरकारी कुर्सी क्यों नहीं छोड़ देते कम से कम किसी ऐसे कर्मठ डॉक्टर को मौका मिले जो ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा सके और जनता को निराशा न हाथ लगे।अस्पताल की इस बदहाली के केंद्र में डॉ. आशीष श्रीवास्तव का नाम सबसे ऊपर है, जो कई वर्षों से यहाँ अंगद के पैर' की तरह जमे हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि अस्पताल में डॉक्टरों की ड्यूटी लगाने की कमान इन्हीं के हाथों में है तो भला उनसे सवाल पूछने की हिम्मत कौन करेगा जो शख्स सबकी ड्यूटी तय करता है, उसकी ड्यूटी लगाने वाला कोई नजर नहीं आता। रसूख के साथ-साथ अहंकार का आलम यह है कि जिस कमरे में आशीष श्रीवास्तव बैठते हैं, वहां उनके न होने पर भी किसी दूसरे विशेषज्ञ डॉक्टर को बैठने की इजाजत नहीं है। अस्पताल में आज भी कई ऐसे प्रतिभाशाली और ईमानदार डॉक्टर मौजूद हैं जो निस्वार्थ भाव से जनता की सेवा करना चाहते हैं लेकिन व्यवस्था का अड़ियल रवैया उनके आड़े आता है। डॉक्टर साहब का संभवतः यह मानना है कि इस कमरे में मेरे अलावा कोई और नहीं बैठेगा, कुर्सी खाली रहेगी लेकिन दूसरा नहीं बैठेगा। इस रवैये के कारण योग्य डॉक्टरों की सेवाएं जनता को नहीं मिल पा रही हैं।लापरवाही का यह आलम केवल ओपीडी तक सीमित नहीं है, बल्कि भर्ती मरीजों की व्यवस्था में भी जानबूझकर ऐसी कमियां रखी जाती हैं कि तीमारदार डर जाएं। मरीजों को सही इलाज और सुविधाओं के लिए तरसाया जाता है ताकि वे भयभीत होकर अपने मरीज को निजी अस्पतालों की तरफ ले जाने को मजबूर हो जाएं। अस्पताल के भीतर एक खतरनाक सिंडिकेट फल-फूल रहा है। आरोप है कि ओपीडी और वार्डों में जानबूझकर अव्यवस्था फैलाई जाती है ताकि दलालों के माध्यम से मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर मोड़ा जा सके। बिना किसी आईडी कार्ड के अस्पताल में घूमने वाले बाहरी दलाल सक्रिय हैं जो सरकारी अस्पताल में व्यवस्था की कमी का डर दिखाकर मरीजों का शोषण करते हैं।
वीआईपी कल्चर का मोह इस कदर हावी है कि जब कुछ दिन पहले कुमार विश्वास प्रभु श्री राम मंदिर के दर्शन करने अयोध्या आए थे, तो डॉक्टर साहब अपनी सरकारी ड्यूटी और ओपीडी छोड़कर उनके स्वागत-सत्कार और वीआईपी मित्रता निभाने में जुट गए थे। अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि जिस दिन वह स्वागत करने गए थे, क्या उन्होंने आधिकारिक तौर पर छुट्टी ली थी या फिर ऑन-ड्यूटी रहकर ही वह अपनी 'वीआईपी मित्रता' निभा रहे थे यदि उस समय की लोकेशन की जांच की जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी। अस्पताल में अभी भी कई डॉक्टर ऐसे हैं जो जनता की सेवा को सर्वोपरि मानते हैं और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देना चाहते हैं लेकिन डॉ. श्रीवास्तव जैसे रसूखदार डॉक्टरों के सामने पूरा तंत्र असहाय नजर आता है। अब शासन-प्रशासन और डीएम साहब से जनता की एक ही मांग है कि इन अंगद के पांव
जमाए बैठे लोगों के अहंकार को तोड़ा जाए और सुनिश्चित किया जाए कि जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले ये जिम्मेदार अपने पद की गरिमा समझें।

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अयोध्या के रामपथ पर कैफ का गुंडागाज: अयोध्या पार्षद सुल्तान अंसारी को बताता है अपना बड़ा भाई नगर निगम की शह पर चल रहा अतिक्रमण और अवैध वसूली का सिंडिकेट===================================================================
अयोध्या की पावन नगरी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीरो टॉलरेंस के दावों को सरेआम चुनौती दी जा रही है। रामपथ के साहिबगंज रोड पर अतिक्रमण और अवैध वसूली का एक ऐसा काला खेल चल रहा है जिसका चेहरा कैफ नाम का व्यक्ति है। यह शख्स खुलेआम दावा करता है कि वह वर्तमान अयोध्या पार्षद सुल्तान अंसारी भाई है और पूरा सिस्टम उनकी मुट्ठी में है। इस सिंडिकेट की हनक ऐसी है कि नगर निगम खुद कैफ जैसे लोगों को आगे रखकर अवैध वसूली करवाता है और दिखावे के लिए परिवर्तन दल के माध्यम से कार्रवाई का नाटक रचा जाता है। सच्चाई यह है कि नगर निगम ने ही अतिक्रमण को सुचारू रूप से चलाने और अवैध वसूली करने की जिम्मेदारी कैफ को दे रखी है, जिसका सीधा मंत्र है ठेला लगाओ अतिक्रमण बढ़ाओ बस हमारे बंदे तक हिस्सा पहुँचाओ। इस भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ तब हुआ जब साहिबगंज रोड पर कुछ पत्रकार साथी खरीदारी करने पहुंचे और ठेला संचालकों की मनमानी का विरोध किया। इस पर कैफ ने बीच में आकर बदतमीजी की और अहंकार में यहाँ तक कह दिया कि पुलिस प्रशासन और पत्रकार सब मेरी जेब में हैं अयोध्या पार्षद सुल्तान अंसारी मेरे बड़े भाई हैं मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।मामले ने तूल तब पकड़ा जब पत्रकार ने इस गुंडागर्दी की सूचना कोतवाल को दी और मौके का वीडियो बनाना शुरू किया। खुद को सिस्टम का आका बताने वाला कैफ वीडियो बनता देख अपनी गाड़ी लेकर मौके से भाग खड़ा हुआ। हालांकि पुलिस ने एक ठेला संचालक को हिरासत में लिया है लेकिन असली मास्टरमाइंड कैफ और उसे संरक्षण देने वाले रसूखदार अब भी कानून की पकड़ से दूर हैं। हैरानी की बात यह है कि इस वसूली एजेंट को बचाने के लिए अयोध्यापार्षद सुल्तान अंसारी का बॉडीगार्ड तक मौके पर पहुँच गया और घंटों तक सिफारिशी फोन बजते रहे। यह पूरी स्थिति नगर निगम की कार्यशैली पर काला धब्बा है; एक तरफ नगर निगम का परिवर्तन दल फोटो खिंचवाने के लिए अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाता है तो दूसरी तरफ कैफ जैसे लोगों के जरिए उसी अतिक्रमण से वसूली का सिंडिकेट पालता है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या कैफ नगर निगम का आधिकारिक कर्मचारी है नगर निगम को तत्काल इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए कि क्या कैफ को उन्होंने काम पर रखा है यदि वह कर्मचारी है तो उस पर अब तक क्या कार्रवाई हुई और यदि नहीं तो वह विभाग के नाम पर वसूली कैसे कर रहा है यदि एक पत्रकार के साथ ऐसी अभद्रता हो सकती है तो आम जनता को ये लोग क्या समझते होंगे अयोध्या जैसे पवित्र स्थल पर पार्षद के नाम का सहारा लेकर चल रहा यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री की साख को बट्टा लगा रहा है। अब देखना यह है कि कानून इस सिंडिकेट पर क्या एक्शन लेता है।

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अयोध्या में कोख के हत्यारों को सिस्टम की संजीवनी: ऑडियो-वीडियो मौजूद फिर भी प्रशासन को मोतियाबिंद================================= अंतरिक्ष तिवारी की कलम से=========================================
अयोध्या। मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस के दावों को ठेंगा दिखाते हुए अयोध्या में कोख के कातिलों ने अब खुलेआम कानून को चुनौती देना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो और वीडियो साक्ष्य चिल्ला-चिल्लाकर झोलाछाप डॉक्टर और अवैध अल्ट्रासाउंड संचालक का कच्चा चिट्ठा खोल रहे हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग की 'जांच एक बंद ताले और पंचर की दुकान के आगे घुटने टेक कर लौट आई। विडंबना देखिए प्रशासन उस जगह जांच करने पहुंचा जहां ताला लटका था और जिसे वे फरार बता रहे हैं जबकि हकीकत यह है कि वह झोलाछाप डॉक्टर प्रशासन की नाक के नीचे ही कहीं और अपनी नई दुकान सजाकर मौत का व्यापार फिर से शुरू कर चुका है। वहीं उसका साथी अवैध अल्ट्रासाउंड संचालक आज भी महिला अस्पताल के पास अपनी जगह जमाए बैठा है। वायरल ऑडियो में वह स्पष्ट रूप से लिंग की जांच करने की बात कर रहा है और बेखौफ होकर कह रहा है कि हम रिपोर्ट नहीं देंगे बस यह बता देंगे कि पेट में लड़का है या लड़की। यह सीधा प्रमाण है कि वहां तकनीक का उपयोग जीवन बचाने के लिए नहीं, बल्कि बेटियों को जन्म से पहले मिटाने के लिए किया जा रहा है।हैरानी की बात यह है कि ये अपराधी अपना स्थान तक बदलने की जहमत नहीं उठा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि इस सिंडिकेट की बेखौफी के पीछे सरकारी तंत्र की ही संजीवनी काम कर रही है। कथित तौर पर फरार बताए जा रहे झोलाछाप डॉक्टर का एक करीबी रिश्तेदार जिला अस्पताल में ही तैनात है जो इस पूरे काले कारोबार को सुरक्षा कवच प्रदान कर रहा है। शायद यही वजह है कि जिस प्रशासन को एक खोई हुई सुई मिल जाती है उसे ऑडियो में नाम और मोबाइल नंबर होने के बावजूद ये अपराधी नहीं मिल रहे। प्रशासन की मौजूदा ढुलमुल कार्यवाही और सिर्फ ताले वाली दुकान की फोटो खींचकर लौट आने की प्रक्रिया को देखकर अब जनता के मन में गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर व्यवस्था इन कोख के सौदागरों के खिलाफ इतनी लाचार क्यों है। क्या एक बंद ताला पूरी जांच को ठप करने के लिए काफी हैअगर जांच टीम ने केवल औपचारिकता निभाने के बजाय पंचर दुकानदार से कड़ाई से पूछताछ की होती तो झोलाछाप डॉक्टर के घर का पता और अल्ट्रासाउंड सेंटर की गुप्त लोकेशन तक पहुंचने में चंद मिनट लगते। लेकिन यहाँ तो अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय उन्हें बचाने की पटकथा लिखी जा रही है। रिपोर्ट नहीं देंगे बस बता देंगे जैसी बातें कानून का सरेआम उल्लंघन हैं, फिर भी प्रशासन को 'साक्ष्य' नहीं मिल रहे। बेटियों को पेट में मारने वाले ये 'महापापी' यह भूल गए हैं कि यह देश संविधान और न्यायपालिका से चलता है। साक्ष्यों की पोटली अब तैयार है और यह लड़ाई मुख्यमंत्री की चौखट से लेकर अदालत के कटघरे तक लड़ी जाएगी। जब तक इन झोलाछाप कसाईयों और उनके सरकारी संरक्षकों पर बड़ी कार्यवाही नहीं होती बेटियों के सम्मान में उठने वाली यह आवाज अब थमने वाली नहीं है।@myogiadityanath @CMOfficeUP @dmayodhya @AyodhyaDivCom @ayodhya_police @UPGovt @brajeshpathakup @narendramodi

1 month ago | [YT] | 0