POCSO Act की धारा 29... Presumption स्वतः दोषसिद्धि नहीं है...
POCSO Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण और कठोर कानून है। अधिनियम की धारा 29 अभियुक्त के विरुद्ध एक विशेष वैधानिक उपधारणा (Statutory Presumption) का प्रावधान करती है।
हालाँकि, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि *POCSO का आरोप लग जाना अपने आप में अभियुक्त की दोषसिद्धि नहीं है और न ही धारा 29 की presumption आरोप लगते ही स्वतः लागू हो जाती है।*
दिल्ली हाईकोर्ट ने *Nirmal Kumar v. State of NCT of Delhi & Anr., CRL.A. 844/2024,* में इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया कि, Section 29 की presumption को लागू करने से पहले अभियोजन को कथित अपराध के foundational facts (आधारभूत तथ्यों) को विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से स्थापित करना आवश्यक है।
*Foundational Facts क्या हैं?*
अभियोजन को मामले की परिस्थितियों के अनुसार यह स्थापित करना होता है कि.....
- कथित घटना वास्तव में घटित हुई; - पीड़ित की आयु कानून के अनुसार सिद्ध है; - कथित कृत्य POCSO Act के आवश्यक ingredients को पूरा करता है; - अभियुक्त की घटना में भूमिका विश्वसनीय साक्ष्य से जुड़ती है; तथा - उपलब्ध मौखिक, चिकित्सकीय, वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन की कहानी को विश्वसनीय रूप से समर्थन देते हैं।
जब तक अभियोजन इन मूल तथ्यों को स्थापित नहीं करता, केवल Section 29 का हवाला देकर अभियुक्त पर अपनी निर्दोषता सिद्ध करने का भार नहीं डाला जा सकता।
*Section 29 का उद्देश्य अभियोजन की कमी को पूरा करना नहीं*
धारा 29 एक महत्वपूर्ण statutory presumption है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि prosecution को अपने मूल मामले को सिद्ध करने से छूट मिल जाती है।
यदि prosecutrix के बयान में material contradictions, महत्वपूर्ण inconsistencies अथवा substantial improvements हों और साथ ही investigation में गंभीर कमियाँ हों, तो न्यायालय को पूरे साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करना होगा।
ऐसी परिस्थितियों में यदि prosecution foundational facts को संदेह से परे स्थापित करने में असफल रहता है, तो अभियुक्त को benefit of doubt मिल सकता है।
*Presumption कब लागू होगी* ?
कानूनी स्थिति को सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है!!
“पहले prosecution को अपराध की नींव सिद्ध करनी होगी, उसके बाद ही Section 29 की statutory presumption प्रभावी होगी।”
अर्थात Section 29 prosecution case का starting point नहीं, बल्कि foundational facts के स्थापित होने के बाद उत्पन्न होने वाला statutory consequence है।
जब prosecution विश्वसनीय एवं सुसंगत साक्ष्य के माध्यम से foundational facts स्थापित कर देता है, तब Section 29 के अंतर्गत presumption प्रभावी हो सकती है और उसके बाद accused पर उस presumption को rebut करने का burden आ सकता है।
POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से प्रभावी सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य की रक्षा करना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
लेकिन इसी के साथ fair trial, reliable evidence और proof beyond reasonable doubt जैसे आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांत भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
किसी कानून का कठोर होना यह नहीं दर्शाता कि उसके अंतर्गत प्रमाण का मानक कम हो जाता है।
*वास्तविक पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए और निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए—यही न्याय का मूल संतुलन है।*
निष्कर्ष...
POCSO Act की Section 29 को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि—
*Section 29 की statutory presumption automatic नहीं है। अभियोजन को पहले कथित अपराध के foundational facts को विश्वसनीय साक्ष्य से स्थापित करना होगा; उसके बाद ही Section 29 के अंतर्गत वैधानिक presumption का संचालन होगा।*
इसलिए प्रत्येक POCSO मामले में यह प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा कि क्या prosecution ने वास्तव में अपने foundational facts को विश्वसनीय, सुसंगत और कानूनन स्वीकार्य साक्ष्य से सिद्ध किया है?
कानून कठोर हो सकता है, लेकिन न्याय में प्रमाण का मानक कमजोर नहीं हो सकता।
AIBE को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण Judgment..
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Provisional Enrolment और AIBE को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट के अनुसार,
Provisional Enrolment के आधार पर वकालत करने की अवधि अधिकतम 2 वर्ष है। यानी यह व्यवस्था ऐसी नहीं है कि कोई Advocate 4–5 साल तक AIBE clear किए बिना केवल provisional enrolment के आधार पर practice करता रहे।
दो साल के भीतर AIBE qualify करना होगा। AIBE qualify करने के बाद Bar Council of India द्वारा Certificate of Practice (COP) जारी किया जाता है, जिसके बाद नियमित रूप से practice जारी रखी जा सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि “AIBE दो साल के भीतर clear करना है” और “AIBE दो साल के बाद भी दिया जा सकता है”..
इन दोनों बातों में अंतर है। परीक्षा के attempts जारी रह सकते हैं, लेकिन provisional enrolment के आधार पर practice की सीमा दो वर्ष है।
2013 में provisional enrolment और दो वर्ष की व्यवस्था लाई गई थी और बाद में BCI ने यह स्पष्ट किया कि दो वर्ष की अवधि practice के अधिकार से जुड़ी है; AIBE पास करने के लिए attempts पर ऐसी सीमा नहीं है।
अब AIBE साल में दो बार आयोजित किया जा रहा है, जिससे provisional advocates को निर्धारित दो वर्ष की अवधि में परीक्षा qualify करने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
साफ संदेश..
Provisional Enrolment = सीमित अवधि की Practice. AIBE + COP = आगे Practice जारी रखने का रास्ता। यह इलाहाबाद हाईकोर्ट का Judgment है, लेकिन AIBE स्वयं All India Bar Examination है और इसके संबंध में BCI के लागू नियमों को भी समझना आवश्यक है।
Advocate Bindu Dhabhai Rajasthan High Court, Jaipur Bench
राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC), अजमेर ने कॉलेज शिक्षा विभाग के अंतर्गत सहायक आचार्य (Law) प्रतियोगी परीक्षा–2025 के संबंध में सूचना जारी की है। लिखित (Objective Type) परीक्षा के तीनों प्रश्नपत्रों में न्यूनतम अर्हक अंक प्राप्त करने वाले नोटिस में उल्लिखित रोल नंबरों के अभ्यर्थियों को साक्षात्कार हेतु पूर्णतः अस्थायी (Purely Provisional) रूप से सफल घोषित किया गया है।
सफल घोषित अभ्यर्थी आयोग की वेबसाइट rpsc.rajasthan.gov.in/ से विस्तृत आवेदन पत्र डाउनलोड कर उसे पूर्ण रूप से भरें तथा आवश्यक शैक्षणिक/प्रशैक्षणिक, जाति एवं अन्य वांछित प्रमाण-पत्रों की फोटो प्रतियों सहित 14 अगस्त 2026 तक आयोग कार्यालय में जमा करवाएं।
विज्ञापन की शर्तों के अनुसार पात्रता की जांच के बाद ही अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया जाएगा। साक्षात्कार की तिथि की सूचना आयोग द्वारा पृथक से जारी की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: State Bar Councils में 2 महिला Co-opt Members के चयन पर स्पष्टता..
राज्य बार काउंसिल में 2 महिला Co-opt Members रखने का प्रावधान पहले से मौजूद था। सुप्रीम कोर्ट ने कोई नया प्रावधान या नया आरक्षण नहीं दिया है। इस आदेश का उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि इन दो महिला Co-opt Members का चयन किन महिलाओं में से किया जाएगा।
State Bar Council की संरचना
कुल सदस्य: 25 18 निर्वाचित (Open) सदस्य 5 महिला आरक्षित निर्वाचित सदस्य 2 Co-opt Members (महिला)
सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्पष्ट किया?
अब इन 2 महिला Co-opt Members का चयन निम्न में से किया जाएगा— ✔️ पूर्व महिला हाई कोर्ट न्यायाधीश (Former Woman High Court Judge), या ✔️ बार में निष्पक्ष छवि एवं उत्कृष्ट प्रतिष्ठा रखने वाली वरिष्ठ महिला अधिवक्ता (Senior Woman Advocate of Fair Standing at the Bar)
Co-opt Member कौन होता है?
Co-opt Member सीधे चुनाव जीतकर नहीं आता। उसका चयन निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है। चयन का आधार अनुभव, निष्पक्षता, प्रतिष्ठा और संस्थागत योगदान होता है।
Co-opt Members की भूमिका
✔️ बार काउंसिल के निर्णयों में अनुभवी मार्गदर्शन देना। ✔️ कार्यप्रणाली में Objectivity (निष्पक्षता) को बढ़ाना। ✔️ Independence (स्वतंत्रता) और Transparency (पारदर्शिता) को मजबूत करना। ✔️ संस्था के बेहतर प्रशासन और अधिवक्ताओं के हित में योगदान देना।
इस आदेश का महत्व
यह आदेश नई व्यवस्था लागू नहीं करता, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधान पर स्पष्टता (Clarification) देता है कि इन दो महिला Co-opt Members का चयन किन योग्य महिलाओं में से किया जाएगा!
Bar Council of India (BCI) ने स्पष्ट किया है कि State Bar Council में Provisionally Enrolled Advocate, Enrollment की तारीख से 2 साल तक AIBE पास किए बिना भी प्रैक्टिस कर सकते हैं।
इस दौरान आप: ..
वकालतनामा पर साइन कर सकते हैं। • कोर्ट, ट्रिब्यूनल और अन्य मंचों पर पेश हो सकते हैं। क्लाइंट को लीगल एडवाइस, ड्राफ्टिंग, नोटिस, एग्रीमेंट और अन्य सभी वैध कानूनी सेवाएँ दे सकते हैं।
लेकिन AIBE पास होने तक... Bar Association के चुनाव में वोट नहीं दे सकते। चुनाव नहीं लड़ सकते।
Bar Council की Welfare Schemes का लाभ नहीं मिलेगा।
ध्यान रखें, Enrollment के 2 साल के भीतर AIBE पास करना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर आपका प्रैक्टिस करने का अधिकार अस्थायी रूप से सस्पेंड हो जाएगा। हालांकि, Enrollment रद्द नहीं होगा। AIBE पास करने के बाद आप फिर से प्रैक्टिस शुरू कर सकेंगे। यह स्पष्टीकरण BCI ने नए Advocates के बीच चल रहे भ्रम को दूर करने के लिए जारी किया है।
क्या आपको लगता है कि यह फैसला नए Advocates के लिए राहत देने वाला है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
आज राज्यसभा में अधिवक्ताओं के लिए Advocate Protection Act की मांग पूरी मजबूती के साथ उठाई गई।
अदालत में न्याय की लड़ाई लड़ने वाला अधिवक्ता यदि स्वयं सुरक्षित नहीं होगा, तो न्याय व्यवस्था भी मजबूत नहीं हो सकती।
Advocate Protection Act कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता, अधिवक्ताओं की गरिमा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक आवश्यक पहल है।
उम्मीद है कि यह मांग केवल सदन की चर्चा तक सीमित न रहकर जल्द ही प्रभावी कानून का रूप लेगी।
Justice for Advocates is Justice for the Rule of Law....
Advocate Bindu Dhabhai
RJS se Related Abhi kuch bhi official News nahi aayi hai....
6 hours ago | [YT] | 0
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
POCSO Act की धारा 29...
Presumption स्वतः दोषसिद्धि नहीं है...
POCSO Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण और कठोर कानून है। अधिनियम की धारा 29 अभियुक्त के विरुद्ध एक विशेष वैधानिक उपधारणा (Statutory Presumption) का प्रावधान करती है।
हालाँकि, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि *POCSO का आरोप लग जाना अपने आप में अभियुक्त की दोषसिद्धि नहीं है और न ही धारा 29 की presumption आरोप लगते ही स्वतः लागू हो जाती है।*
दिल्ली हाईकोर्ट ने *Nirmal Kumar v. State of NCT of Delhi & Anr., CRL.A. 844/2024,* में इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया कि,
Section 29 की presumption को लागू करने से पहले अभियोजन को कथित अपराध के foundational facts (आधारभूत तथ्यों) को विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से स्थापित करना आवश्यक है।
*Foundational Facts क्या हैं?*
अभियोजन को मामले की परिस्थितियों के अनुसार यह स्थापित करना होता है कि.....
- कथित घटना वास्तव में घटित हुई;
- पीड़ित की आयु कानून के अनुसार सिद्ध है;
- कथित कृत्य POCSO Act के आवश्यक ingredients को पूरा करता है;
- अभियुक्त की घटना में भूमिका विश्वसनीय साक्ष्य से जुड़ती है; तथा
- उपलब्ध मौखिक, चिकित्सकीय, वैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन की कहानी को विश्वसनीय रूप से समर्थन देते हैं।
जब तक अभियोजन इन मूल तथ्यों को स्थापित नहीं करता, केवल Section 29 का हवाला देकर अभियुक्त पर अपनी निर्दोषता सिद्ध करने का भार नहीं डाला जा सकता।
*Section 29 का उद्देश्य अभियोजन की कमी को पूरा करना नहीं*
धारा 29 एक महत्वपूर्ण statutory presumption है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि prosecution को अपने मूल मामले को सिद्ध करने से छूट मिल जाती है।
यदि prosecutrix के बयान में material contradictions, महत्वपूर्ण inconsistencies अथवा substantial improvements हों और साथ ही investigation में गंभीर कमियाँ हों, तो न्यायालय को पूरे साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करना होगा।
ऐसी परिस्थितियों में यदि prosecution foundational facts को संदेह से परे स्थापित करने में असफल रहता है, तो अभियुक्त को benefit of doubt मिल सकता है।
*Presumption कब लागू होगी* ?
कानूनी स्थिति को सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है!!
“पहले prosecution को अपराध की नींव सिद्ध करनी होगी, उसके बाद ही Section 29 की statutory presumption प्रभावी होगी।”
अर्थात Section 29 prosecution case का starting point नहीं, बल्कि foundational facts के स्थापित होने के बाद उत्पन्न होने वाला statutory consequence है।
जब prosecution विश्वसनीय एवं सुसंगत साक्ष्य के माध्यम से foundational facts स्थापित कर देता है, तब Section 29 के अंतर्गत presumption प्रभावी हो सकती है और उसके बाद accused पर उस presumption को rebut करने का burden आ सकता है।
POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से प्रभावी सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य की रक्षा करना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
लेकिन इसी के साथ fair trial, reliable evidence और proof beyond reasonable doubt जैसे आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांत भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
किसी कानून का कठोर होना यह नहीं दर्शाता कि उसके अंतर्गत प्रमाण का मानक कम हो जाता है।
*वास्तविक पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए और निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए—यही न्याय का मूल संतुलन है।*
निष्कर्ष...
POCSO Act की Section 29 को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि—
*Section 29 की statutory presumption automatic नहीं है।
अभियोजन को पहले कथित अपराध के foundational facts को विश्वसनीय साक्ष्य से स्थापित करना होगा;
उसके बाद ही Section 29 के अंतर्गत वैधानिक presumption का संचालन होगा।*
इसलिए प्रत्येक POCSO मामले में यह प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा कि क्या prosecution ने वास्तव में अपने foundational facts को विश्वसनीय, सुसंगत और कानूनन स्वीकार्य साक्ष्य से सिद्ध किया है?
कानून कठोर हो सकता है, लेकिन न्याय में प्रमाण का मानक कमजोर नहीं हो सकता।
Advocate Bindu gurjar
Rajasthan high court jaipur
5 days ago | [YT] | 2
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
"सभी वकीलों को गोवा में बनने वाली National Legal Academy में लेना होगा अनिवार्य प्रशिक्षण"
5 days ago | [YT] | 3
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
AIBE को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण Judgment..
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Provisional Enrolment और AIBE को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट के अनुसार,
Provisional Enrolment के आधार पर वकालत करने की अवधि अधिकतम 2 वर्ष है। यानी यह व्यवस्था ऐसी नहीं है कि कोई Advocate 4–5 साल तक AIBE clear किए बिना केवल provisional enrolment के आधार पर practice करता रहे।
दो साल के भीतर AIBE qualify करना होगा। AIBE qualify करने के बाद Bar Council of India द्वारा Certificate of Practice (COP) जारी किया जाता है, जिसके बाद नियमित रूप से practice जारी रखी जा सकती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि “AIBE दो साल के भीतर clear करना है” और “AIBE दो साल के बाद भी दिया जा सकता है”..
इन दोनों बातों में अंतर है। परीक्षा के attempts जारी रह सकते हैं, लेकिन provisional enrolment के आधार पर practice की सीमा दो वर्ष है।
2013 में provisional enrolment और दो वर्ष की व्यवस्था लाई गई थी और बाद में BCI ने यह स्पष्ट किया कि दो वर्ष की अवधि practice के अधिकार से जुड़ी है; AIBE पास करने के लिए attempts पर ऐसी सीमा नहीं है।
अब AIBE साल में दो बार आयोजित किया जा रहा है, जिससे provisional advocates को निर्धारित दो वर्ष की अवधि में परीक्षा qualify करने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
साफ संदेश..
Provisional Enrolment = सीमित अवधि की Practice.
AIBE + COP = आगे Practice जारी रखने का रास्ता।
यह इलाहाबाद हाईकोर्ट का Judgment है, लेकिन AIBE स्वयं All India Bar Examination है और इसके संबंध में BCI के लागू नियमों को भी समझना आवश्यक है।
Advocate Bindu Dhabhai
Rajasthan High Court, Jaipur Bench
6 days ago | [YT] | 4
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
RPSC सहायक आचार्य (Law) प्रतियोगी परीक्षा–2025
राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC), अजमेर ने कॉलेज शिक्षा विभाग के अंतर्गत सहायक आचार्य (Law) प्रतियोगी परीक्षा–2025 के संबंध में सूचना जारी की है। लिखित (Objective Type) परीक्षा के तीनों प्रश्नपत्रों में न्यूनतम अर्हक अंक प्राप्त करने वाले नोटिस में उल्लिखित रोल नंबरों के अभ्यर्थियों को साक्षात्कार हेतु पूर्णतः अस्थायी (Purely Provisional) रूप से सफल घोषित किया गया है।
सफल घोषित अभ्यर्थी आयोग की वेबसाइट rpsc.rajasthan.gov.in/ से विस्तृत आवेदन पत्र डाउनलोड कर उसे पूर्ण रूप से भरें तथा आवश्यक शैक्षणिक/प्रशैक्षणिक, जाति एवं अन्य वांछित प्रमाण-पत्रों की फोटो प्रतियों सहित 14 अगस्त 2026 तक आयोग कार्यालय में जमा करवाएं।
विज्ञापन की शर्तों के अनुसार पात्रता की जांच के बाद ही अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया जाएगा। साक्षात्कार की तिथि की सूचना आयोग द्वारा पृथक से जारी की जाएगी।
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
Latest Judiciary update!!!
1 week ago | [YT] | 0
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: State Bar Councils में 2 महिला Co-opt Members के चयन पर स्पष्टता..
राज्य बार काउंसिल में 2 महिला Co-opt Members रखने का प्रावधान पहले से मौजूद था। सुप्रीम कोर्ट ने कोई नया प्रावधान या नया आरक्षण नहीं दिया है। इस आदेश का उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि इन दो महिला Co-opt Members का चयन किन महिलाओं में से किया जाएगा।
State Bar Council की संरचना
कुल सदस्य: 25
18 निर्वाचित (Open) सदस्य
5 महिला आरक्षित निर्वाचित सदस्य
2 Co-opt Members (महिला)
सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्पष्ट किया?
अब इन 2 महिला Co-opt Members का चयन निम्न में से किया जाएगा— ✔️ पूर्व महिला हाई कोर्ट न्यायाधीश (Former Woman High Court Judge), या
✔️ बार में निष्पक्ष छवि एवं उत्कृष्ट प्रतिष्ठा रखने वाली वरिष्ठ महिला अधिवक्ता (Senior Woman Advocate of Fair Standing at the Bar)
Co-opt Member कौन होता है?
Co-opt Member सीधे चुनाव जीतकर नहीं आता।
उसका चयन निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
चयन का आधार अनुभव, निष्पक्षता, प्रतिष्ठा और संस्थागत योगदान होता है।
Co-opt Members की भूमिका
✔️ बार काउंसिल के निर्णयों में अनुभवी मार्गदर्शन देना।
✔️ कार्यप्रणाली में Objectivity (निष्पक्षता) को बढ़ाना।
✔️ Independence (स्वतंत्रता) और Transparency (पारदर्शिता) को मजबूत करना।
✔️ संस्था के बेहतर प्रशासन और अधिवक्ताओं के हित में योगदान देना।
इस आदेश का महत्व
यह आदेश नई व्यवस्था लागू नहीं करता, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधान पर स्पष्टता (Clarification) देता है कि इन दो महिला Co-opt Members का चयन किन योग्य महिलाओं में से किया जाएगा!
Advocate Bindu gurjar
Rajasthan high court jaipur
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
Bar Council of India (BCI) ने स्पष्ट किया है कि State Bar Council में Provisionally Enrolled Advocate, Enrollment की तारीख से 2 साल तक AIBE पास किए बिना भी प्रैक्टिस कर सकते हैं।
इस दौरान आप: ..
वकालतनामा पर साइन कर सकते हैं। • कोर्ट, ट्रिब्यूनल और अन्य मंचों पर पेश हो सकते हैं।
क्लाइंट को लीगल एडवाइस, ड्राफ्टिंग, नोटिस, एग्रीमेंट और अन्य सभी वैध कानूनी सेवाएँ दे सकते हैं।
लेकिन AIBE पास होने तक...
Bar Association के चुनाव में वोट नहीं दे सकते।
चुनाव नहीं लड़ सकते।
Bar Council की Welfare Schemes का लाभ नहीं मिलेगा।
ध्यान रखें, Enrollment के 2 साल के भीतर AIBE पास करना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर आपका प्रैक्टिस करने का अधिकार अस्थायी रूप से सस्पेंड हो जाएगा।
हालांकि, Enrollment रद्द नहीं होगा।
AIBE पास करने के बाद आप फिर से प्रैक्टिस शुरू कर सकेंगे।
यह स्पष्टीकरण BCI ने नए Advocates के बीच चल रहे भ्रम को दूर करने के लिए जारी किया है।
क्या आपको लगता है कि यह फैसला नए Advocates के लिए राहत देने वाला है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Advocate Bindu Dhabhai
आज राज्यसभा में अधिवक्ताओं के लिए Advocate Protection Act की मांग पूरी मजबूती के साथ उठाई गई।
अदालत में न्याय की लड़ाई लड़ने वाला अधिवक्ता यदि स्वयं सुरक्षित नहीं होगा, तो न्याय व्यवस्था भी मजबूत नहीं हो सकती।
Advocate Protection Act कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता, अधिवक्ताओं की गरिमा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक आवश्यक पहल है।
उम्मीद है कि यह मांग केवल सदन की चर्चा तक सीमित न रहकर जल्द ही प्रभावी कानून का रूप लेगी।
Justice for Advocates is Justice for the Rule of Law....
Advocate Bindu gurjar
Rajasthan high court jaipur
1 week ago | [YT] | 5
View 1 reply
Advocate Bindu Dhabhai
2 weeks ago | [YT] | 3
View 2 replies
Load more