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Divya Samagam
1 year ago | [YT] | 0
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Divya Samagam
धनतेरस पर ये 3 चीजें अवश्य खरीदें, बदल जाएगी आपकी किस्मत! धनतेरस पर क्याना खरीदें#PremanandJiMaharaj
1 year ago | [YT] | 0
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Mahakal Sarkar Mere Mahakal Sarkar @mhakal_bholenath_shivsankr.
2 years ago | [YT] | 5
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जय श्री कृष्णा @hindupurantv
2 years ago | [YT] | 5
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हर हर महादेव
2 years ago | [YT] | 5
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भागवत गीता की एक कथा @DivyaSamagam
श्री भागवत गीता में वर्णित इस कथा के अनुसार प्राचीन काल के एक राजघराने में एक लड़के का जन्म हुआ उस लड़के को बहुत ही कम उम्र में राजशाही सुख-सुविधाओं से दूर शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुकुल भेज दिया गया. जिस गुरुकुल में वह बालक शिक्षा ग्रहण कर रहा था वहां का वह सबसे होनहार विद्यार्थी था.गुरुकुल में उस बालक ने सारे हिंदू वेद पुराण और शास्त्रों का अध्ययन किया.परंतु दुर्भाग्य से उस बालक के अभी गुरुकुल की शिक्षा समाप्त भी नहीं हुई थी कि उसके माता-पिता एवं भाई-बहन एक प्राकृतिक आपदा में मारे गए,माता पिता व अपने भाई बहन को खोने के कारण हुआ बालक सांसारिक मोह माया से विरक्त हो गया,और गुरुकुल से शिक्षा पूर्ण करने के बाद उसने प्रण लिया की वह अपना संपूर्ण जीवन लोगों की भलाई में व्यतीत करेगा.
एक सन्यासी और राजा की कथा
उसके बाद वह बालक सन्यासी बन गया और वह सांसारिक वस्तुओं से दूर हिमालय की जंगलों में चला गया. फिर उसने वहां लंबे समय तक तपस्या की और तपस्या पूर्ण होने के बाद उस सन्यासी ने लोगों को शिक्षा देना आरंभ कर दिया.समय के साथ-साथ उस सन्यासी की चर्चा चारों ओर होने लगे,और दूर-दूर से लोग उनके पास शिक्षा प्राप्त करने और अपनी समाधान का समस्या खोजने आने लगे. सन्यासी सभी लोगों की समस्या बड़े ही आसानी से सुलझा देता जिस वजह से वह कुछ ही समय में पूरे राज्य में मशहूर हो गया. दुरभाग्य से उस समय उस राज्य का एक राजा क्रूर व्यक्ति हुआ करता था उसे जब उस सन्यासी के बारे में पता चला तो उसने सन्यासी से मिलने का निश्चय किया और अगली सुबह वह अपने राजमहल से निकल उस सन्यासी के कुटिया जा पहुंचा.
वहां पहुंच कर उसने उस सन्यासी से भेंट की जिसके बाद एक चमत्कार हुआ, वह राजा पहले ही मुलाकात में सन्यासी के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसी समय से अच्छाई की राह पर चलने की ठान ली और मन ही मन सोचने लगा कि इतनी छोटी सी मुलाकात में वह सन्यासी मुझे इतना बदल सकता है तो यह अगर हमेशा मेरे साथ रहने लगे तो मेरी तो जिंदगी ही बदल जाएगी, इसके बाद राजा सन्यासी से अपने साथ राजमहल चलने के लिए आग्रह करने लगा,राजा के आग्रह को सन्यासी ठुकरा ना सके और वह राजमहल चलने को तैयार हो गए. राजा सन्यासी को साथ लेकर राजमहल की ओर चल दिए, राजमहल पहुंचने पर सन्यासी का खूब आदर सत्कार किया गया उसके बाद राजा ने सन्यासी को कमरे में भोजन करवाया.
भोजन के पश्चात सन्यासी ने राजा को धन्यवाद दिया और राजा से जाने की आज्ञा मांगी, जिसपर राजा ने सन्यासी से कहा कि आप हमारे बगीचे में जब तक चाहे रह सकते हैं आपको यहां किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं होगी, यह सुनकर सन्यासी ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. उसके बाद राजा ने अपने सेवकों से कहा कि बगीचे में सन्यासी का रहने खाने का प्रबंध किया जाए. राजा की आज्ञा के अनुसार सेवकों ने बगीचे में एक सुंदर सी कुटिया का निर्माण कर दिया उसके बाद वह सन्यासी कई सालों तक उस कुटिया में रहे और इस दौरान राजा ने भी उनकी खूब सेवा की. परंतु कई सालों बाद एक दिन अचानक राजा और रानी को आवश्यक कार्य से दूसरे राज्य जाना पड़ा और उन्होंने एक सेवादार को उस सन्यासी की सेवा के लिए नियुक्त कर दिया.
परंतु वह सेवादार राजा के जाने के बाद बीमार पड़ गया और अपने घर चला गया और कभी लौट कर नहीं आया.ऐसे मे सन्यासी को कोई भोजन देने वाला भी नहीं था.उधर कुछ दिनों बाद जब राजा अपने पड़ोस के राज्य से वापस आए तो सन्यासी ने क्रोध में आकर उस राजा को खूब डांटा,और राजा से कहा- हे राजन, जो जिम्मेदारी तुम पूरी नहीं कर सकते हो वो उठाते ही क्यों हो, तब राजा ने सन्यासी से क्षमा मांगते हुए कहा – हे भगवान यदि कोई मुझसे भूल हो गई हो तो मैं उसके लिए क्षमा मांगता हूं मुझे क्षमा कर दीजिए,कुछ देर बाद मामला शांत हो गया.रानी भी यह सब चुपके से देखती पर शांत रही.उसके बाद राजा ने उस सन्यासी को कोई भी शिकायत का मौका नहीं दिया और उसकी खूब सेवा की. परंतु कुछ दिनों बाद एक बार फिर राजा को एक आवश्यक कार्य से राज्य के बाहर जाना पड़ा,मगर इस बार राजा ने राज्य के बाहर जाने से पहले रानी को निर्देश दिया कि जब तक मैं नहीं आता आप स्वय सन्यासी की सारी जरूरतों का पूरा ध्यान रखेंगे.
उसके बाद रानी हर रोज भोजन पकवाकर सन्यासी को भेज देती,लेकिन एक दिन रानी नहाने के लिए चली गई और सन्यासी को भोजन देना भूल गई सन्यासी ने काफी देर तक भोजन को आने का इंतजार किया पर ज़ब भोजन नहीं आया तो सन्यासी सोच में पड़ गया. उसके बाद सन्यासी ने सोचा कि वह खुद महल में जाकर देखें और वह महल पहुंच गया वहां जाकर उसकी नजर रानी पर पड़ी और वह रानी के रूप को देखकर चकित रह गया रानी की सुंदरता सन्यासी के मन में घर कर गई. सन्यासी रानी के रूप की सुंदरता को भुला ना सका और वह खाना पीना छोड़ कर अपनी कुटिया में पड़ा रहा उसने कई दिनों तक कुछ भी नहीं खाया जिस वजह से वह बहुत ही कमजोर हो गया फिर कुछ समय बाद राजा वापस लौट आया और उसे सन्यासी के हाल का पता लगा तो वह सीधे सन्यासी के पास पहुंच गए और उन्होंने सन्यासी से कहा आप बहुत कमजोर हो गए हैं और किस गहरी सोच में डूबे हुए हैं,क्या मुझसे कोई भूल हो गई है.
तब सन्यासी ने राजा को बताया कि हे राजन मैं आपकी रानी की अद्भुत सुंदरता के फेर में पड़ गया हूं और रानी के बिना जिंदा नहीं रह सकता. यह सुनकर राजा ने सन्यासी से कहा कि आप मेरे साथ महल चलिए मैं आपको रानी दे दूंगा,फिर राजा सन्यासी को लेकर महल चले गए,भाग्य से उस दिन रानी ने अपने सुंदर गहने व वस्त्र पहने हुए थे. राजा रानी के पास पहुंचे और कहा आपको सन्यासी की मदद करनी चाहिए वो बहुत कमजोर पड़ गए हैं और मैं नहीं चाहता कि किसी ज्ञानी पुरुष की हत्या का कलंक मेरे सर लगे. उसके बाद राजा ने रानी से पूछा कि क्या आप यह पाप अपने सर लेना चाहते हैं,तब रानी ने राजा से पूछा कि सन्यासी के यह दुख का कारण क्या है? राजा ने कहा सन्यासी आप की अद्भुत सुंदरता के दीवाने हो गए हैं.
यह सुनकर रानी ने कहा है कि हे राजन आप चिंता ना करें मुझे पता है कि मुझे क्या करना है जिससे ना कि आपके माथे पर एक सन्यासी की हत्या का पाप लगेगा और ना ही मेरी पतिव्रता धर्म नास होगी.और फिर राजा ने रानी को सन्यासी को सौंप दिया. उसके बाद सन्यासी रानी को लेकर कुटिया पर पहुंचा तो रानी ने सन्यासी से कहा कि हमें रहने के लिए घर चाहिए यह सुन सन्यासी तुरंत राजा के पास गया और कहा हे राजन हमें रहने के लिए घर चाहिए राजा ने उनके लिए घर का प्रबंध किया. सन्यासी रानी को लेकर जब घर पहुंचा तब रानी ने कहा घर तो बहुत गंदा है और इसकी हालत तो बहुत खराब है सन्यासी फिर राजा के पास पहुंचा और कहा आपने जो घर मुझे दिया है वह घर की हालत तो बहुत खराब है,तब राजा ने उस घर की हालत ठीक करवा दी.
फिर रानी ने नहा धोकर बिस्तर पर आ गई और सन्यासी भी बिस्तर पर आ गया,उसके बाद रानी ने सन्यासी से कहा क्या आपको पता है कि आप कौन थे और आप क्या बन गए,आप एक महान सन्यासी थे जिसके लिए राजा भी स्वयं सारी जरूरत की वस्तुओं को उपलब्ध कराते थे और आज आप वासना के कारण मेरे गुलाम हो गए हैं.यह सुनकर सन्यासी को महसूस हुआ कि वह तो एक सन्यासी हैं,जो अपनी सारी सुख-सुविधाओं को छोड़कर शांति की तलाश में जंगलों में चले गए थे.सन्यासी जोर जोर से चिल्लाने लगा और रानी से कहा क्षमा कीजिए मैं अभी आपको राजा को सोप के आता हूं.तब रानी ने प्रश्न किया महाराज जब उस दिन आपको भोजन नहीं मिला तो आप बहुत क्रोधित हो गए थे मैंने आपका यह रूप पहली बार देखा था तभी से मैंने आपके व्यवहार में परिवर्तन महसूस किया.
तब सन्यासी ने रानी को समझाया कि जब मैं जंगल में था तो मुझे समय पर भोजन भी नहीं मिला करता था पर महल में आने के बाद मुझे सुविधाएं मिली और मैं उसके मोह में फंस गया मुझे इसके प्रति लगाव उत्पन्न हो गया और फिर इनको पाने का लालच हो गया और ज़ब मुझे नहीं मिला तो क्रोध उत्पन्न हुआ,सन्यासी ने बताया सच तो यह है कि अगर इच्छा पूरी ना हो तो क्रोध उत्पन्न होता है ओर यह पूरी हो जाए तो लालच बढ़ जाता है.फिर सन्यासी ने बताया कि यही इच्छा की पूर्ति मुझे वासना की दीवार तक ले आया और मैं आपके प्रति आकर्षित हो गया,इसके बाद सन्यासी को समझ आ गया कि अब उसे जंगलों में लौट जाना चाहिए और उन्होंने ऐसा ही किया. भागवत गीता में भी श्रीकृष्ण ने नरक के तीन द्वार बताए हैं और यही वह तीन द्वार हैं काम, क्रोध और लोभ और आज की इस कलयुग में भी इंसान इन्ही चीजों में उलझा हुआ है जिसके कारण उन्हें शांति नहीं मिलती? @hindupurantv
2 years ago (edited) | [YT] | 2
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Divya Samagam
https://youtu.be/cmlqvcRTsP4
2 years ago | [YT] | 2
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Divya Samagam
मृत्यु भोज खाना सही है या गलत
गरुड़ पुराण के अनुसार जब कोई मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसके परिजनों को आत्मा की शांति और यमलोक की यात्रा तय करने के लिए दर्पण और पूजा करने चाहिए. ताकि मृत जीवात्मा को इस कठिन यात्रा पर चलने की शक्ति मिल सके दरअसल जब जीवात्मा शरीर का त्याग करती है तो वह निर्बल हो जाती है ऐसे में उसकी परिजन 12 दिनों तक जो पिंडदान करते हैं उसे खाने से जीवात्मा को चलने की शक्ति मिलती है. मृत्यु के बाद जो 10 दिनों तक पिंड दान किए जाते हैं उससे मृत आत्मा के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है 11 वे और 12 वे दिन के पिंडदान से शरीर पर मांस और त्वचा का निर्माण होता है फिर 13 वे दिन जब 13 वी की जाती है तब मृतक के नाम से जो पिंड दान किया जाता है उससे ही वह यमलोक तक की यात्रा तय करती है.
मान्यता है कि आत्मा 12 दिन तक पैदल चलकर कई कष्टों को झेल कर अपने गंतव्य अर्थात प्रभु धाम तक पहुंचती है इसीलिए हिंदू धर्म में 13 वी करने का विधान है. परंतु कहीं कहीं समय के अभाव हो या फिर अन्य कारणों से भी तेरहवीं या फिर 12वीं की जाती है इस दिन मृतक के पसंदीदा खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं और फिर ब्रह्मभोज आयोजित कर ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर मृतक की आत्मा की शांति की प्रार्थना की जाती है. यहां पर आपकी जानकारी के लिए बता दें की ब्रह्मभोज को भी आजकल मृत्यु भोज कहा जा रहा है
जो उचित नहीं है क्योंकि ब्रह्म भोज से ब्राह्मणों को ही कराया जाता है ना कि रिश्तेदारों को यह गांव वाले को गरुड़ पुराण के 11 वे दिन महा ब्राह्मणों को भोज और 13 के दिन एक 13 या फिर अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोज कराना चाहिए साथ ही ब्राह्मणों को सफेद साफी जनेऊ एकमात्र दान दिया जाना चाहिए इससे आत्मा को शांति मिलती है.
अब मित्रों आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि अगर मृत्यु भोज का प्रावधान नहीं है तब फिर इसकी शुरुआत कैसे हुई दरअसल गरुड़ पुराण मैं पगड़ी रस्म का भी उल्लेख मिलता है यह रस्म तब की जाती है जब परिवार के मुखिया का मृत्यु होती है इसके बाद घर का नया मुखिया चुना जाता है और घर के सबसे अधिक उम्र के जीवित पुरुष रश्मिक तरीके से पगड़ी बांधे जाते हैं.
दरअसल पगड़ी संस्कार या तो अंतिम संस्कार के चौथे दिन या फिर 13 वे के दिन आयोजित किया जाता है यही नहीं कि घर का नया मुखिया चुने जाने पर रिश्तेदार और गांव वाले को भोज के लिए आमंत्रित किया जाता है जिसे आजकल मृत्यु भोज से जोड़कर देखा जा रहा है. अब आते हैं अंतिम सवाल पर अगर कोई मृत्यु भोज का आयोजन करा रहा है
तो क्या वह गलत है और जो भोज खा रहे है क्या वह कोई पाप कर रहे हैं. तो मित्रों इसका उत्तर वैसे सीधे तौर पर तो हमारे धर्म शास्त्रों में नहीं मिलता लेकिन अगर आप महाभारत के अनुशासन पर्व के एक प्रसंग पर गौर करेंगे तो आपको इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा.
दरअसल यह बात महाभारत की युद्ध से पहले की है श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जाकर संधि करने को कहा भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन को हर तरह से युद्ध नहीं करने की सलाह दी लेकिन जब दुर्योधन नहीं माना तो श्री कृष्ण वहां से लौटने लगे. ऐसे में दुर्योधन ने उन्हें भोजन करने के लिए कहा तब
श्री कृष्ण ने कहा हे दुर्योधन जब खिलाने वाले और खाने वाले का मन प्रसन्न हो तभी भोजन करना चाहिए लेकिन जब दोनों के दिल में दर्द और पीड़ा हो ऐसी स्थिति में कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा भोजन व्यक्ति की उर्जा का नाश कर देता है.
और मित्रों जब किसी सगे संबंधी की मृत्यु होती है तब तेरहवीं पर आने वालों और जिनके घर में मौत हुई है दोनों के मन में विरह का दर्द होता है ऐसे में भोजन करवाने वाला और करने वाला दोनों ही दुखी होते हैं
अतः मृत्यु भोज या 13 वी पर भोजन नहीं करना चाहिए मित्रों अंतिम में बस इतना ही कहूंगा कि दिखावे से भरी इस दुनिया में मृत्यु भोज एक तरह का दिखावा है जिस पर लोग लाखों रुपए खर्च करते हैं इसलिए हमें ना मृत्यु भोज करना चाहिए और ना ही इसमें शामिल होना चाहिए?
2 years ago | [YT] | 1
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Divya Samagam
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2 years ago | [YT] | 1
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