विभत्स हूँ… विभोर हूँ…
मैं समाधी में ही चूर हूँ…
घनघोर अँधेरा ओढ़ के…
मैं जन जीवन से दूर हूँ…
श्मशान में हूँ नाचता…
मैं मृत्यु का ग़ुरूर हूँ…
साम – दाम तुम्हीं रखो…
मैं दंड में सम्पूर्ण हूँ…
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