Hello dosto I am Gaurav Bansal, B.com( LLB ), My purpose is to teach you law , I thank youtube that provides me this opportunity to teach students upto remote areas.
Law-Shots
Legal advisor ⚖️
Advocate at District & Session Court ⚖️
Criminal & civil lawyer 🧑🎓
☎️ -
न्यायालय प्रक्रियाओं में महारत हासिल करें !
हमारे चैनल पर पाएं:
सिविल और क्रिमिनल ड्राफ्टिंग
अदालती नियमों की स्पष्ट व्याख्या
- मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने के टिप्स
अनुभवी वकीलों और न्यायाधीशों के अंतर्दृष्टि
अदालती दस्तावेजीकरण और प्रक्रिया
अदालती शिष्टाचार और एटिकेट
- साक्ष्य प्रबंधन और प्रस्तुति
वकालत कौशल और तर्क
सब्सक्राइब करें और अपने अदालती कौशल को मजबूत बनाएं!
(नये वकीलों के लिए एक अनिवार्य संसाधन !)
🙏 स्वागत है आपका Law Shots चैनल पर।
✅ चैनल को Subscribe कीजिए और Bell Icon दबाइए ताकि आपको हर नया वीडियो सबसे पहले मिले।
Law-Shots (Your Legal Guide)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था को लेकर बेहद सख्त और चौंकाने वाली टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि राज्य में पुलिस अधिकारी नियमित रूप से जजों पर, खासकर चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) पर, मनचाहे आदेश दिलवाने के लिए दबाव बना रहे हैं और यह स्थिति उत्तर प्रदेश को पुलिस स्टेट की ओर धकेल रही है, जिसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राज्य सरकार के वकील से कहा कि कोर्ट उत्तर प्रदेश को पुलिस स्टेट बनने से रोकेगा। यह टिप्पणी उन्होंने राजीव कृष्णा और अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद से बातचीत के दौरान की।
कोर्ट ने डीजीपी और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया था। उनसे यह बताने को कहा गया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों में गोली मारने यानी तथाकथित ‘एनकाउंटर कल्चर’ पर रोक लगाने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह पाया कि खासकर सेवा में नए पुलिस अधिकारी, जिला अदालतों में न्यायिक अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि लगभग हर जिले में कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का खुला उल्लंघन हो रहा है। जस्टिस देशवाल ने टिप्पणी की कि उन्हें ऐसा एक भी मामला नहीं मिला, जहां कानून या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सही ढंग से पालन किया गया हो।
कोर्ट ने कहा कि जब भी कोई न्यायिक अधिकारी या CJM किसी मामले में पुलिस से यह सवाल करता है कि आदेशों का पालन क्यों नहीं किया गया, तो अक्सर उस जिले के पुलिस अधीक्षक और न्यायिक अधिकारी के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। यह अब आम चलन बन गया है कि SP किसी खास आदेश के लिए न्यायिक अधिकारी पर दबाव डालना शुरू कर देता है।
जस्टिस देशवाल ने यह भी खुलासा किया कि पुलिस और न्यायपालिका के बीच बढ़ते टकराव को शांत करने के लिए एक CJM का तबादला तक करना पड़ा। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह समस्या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के अधिकांश जिलों में यही हाल है।
कोर्ट ने कहा कि उन्हें जिला जजों से लगातार फीडबैक मिल रहा है कि युवा पुलिस अधिकारी, खासकर IPS अधिकारी, खुद को न्यायिक अधिकारियों से ऊपर समझने लगते हैं और उन पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पुलिस किसी आदेश से संतुष्ट नहीं है तो उसके पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं, वह जिला जज के सामने रिवीजन दाखिल कर सकती है या आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकती है, लेकिन दबाव बनाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बार एसोसिएशन के नेताओं से उन्हें इनपुट मिले हैं कि कई बार वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सीधे कोर्टरूम में घुसकर न्यायिक अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, जो न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ है।
जस्टिस देशवाल ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के बीच आपसी सम्मान बेहद जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा। कोर्ट ने दो टूक कहा कि किसी भी पुलिस अधिकारी को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वह किसी न्यायिक अधिकारी से श्रेष्ठ है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई न्यायिक अधिकारी मंच पर बैठा होता है, चाहे वह जूनियर डिवीजन का ही क्यों न हो, उस समय वह कोर्टरूम में मौजूद हर व्यक्ति से ऊपर होता है। जस्टिस देशवाल ने यह भी बताया कि उन्होंने ट्रायल कोर्ट के जजों को निर्देश दिए हैं कि निरीक्षण के दौरान भी वे मंच से न उठें, क्योंकि उस समय प्रोटोकॉल के अनुसार न्यायिक अधिकारी सर्वोच्च होता है।
डीजीपी राजीव कृष्णा ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि यदि कहीं प्रोटोकॉल का पालन नहीं हो रहा है तो उसे सख्ती से लागू कराने के निर्देश जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कानून की गरिमा सर्वोपरि है और इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।
अंत में कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि पुलिस और न्यायपालिका के बीच अहंकार का टकराव किसी भी तरह से जनता के हित में नहीं है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सजा देने की शक्ति केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। डीजीपी ने भी इस बात से सहमति जताई कि पुलिस को हर हाल में कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होगा।
3 weeks ago | [YT] | 0
View 0 replies
Law-Shots (Your Legal Guide)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत किसी लोक सेवक (public servant) के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत तभी प्रस्तुत की जा सकती है, जब शिकायतकर्ता पहले धारा 175(3) का अनुपालन करे।
अर्थात्, शिकायतकर्ता को यह दिखाना अनिवार्य है कि उसने पहले पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) के समक्ष शपथ-पत्र (affidavit) सहित लिखित शिकायत दी थी।
यह निर्णय जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने दिया। खंडपीठ के समक्ष यह प्रश्न था कि क्या धारा 175(4) एक स्वतंत्र प्रावधान है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट मौखिक शिकायत पर भी कार्रवाई कर सकता है, या फिर यह धारा 175(3) का ही एक प्रक्रियात्मक विस्तार है, जिसमें Priyanka Srivastava Vs. State of U.P. (2015) में निर्धारित सुरक्षा उपाय लागू होंगे।
धारा 175(3) और 175(4) का संबंध
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 175(4) कोई स्वतंत्र या अलग-थलग प्रावधान नहीं है, बल्कि इसे धारा 175(3) के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि:
किसी लोक सेवक के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के समक्ष सीधे शिकायत दाखिल कर जांच का आदेश नहीं मांगा जा सकता,
जब तक कि शिकायतकर्ता यह न दिखाए कि उसने पहले धारा 173(4) BNSS के तहत पुलिस अधीक्षक से संपर्क किया था और
उसके बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ-पत्र सहित आवेदन प्रस्तुत किया गया हो।
अदालत ने कहा:
“पुलिस अधीक्षक के समक्ष उपलब्ध उपाय का सहारा लेना, न्यायिक मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र को सक्रिय करने के लिए एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है।”
प्रक्रिया को दरकिनार करने की अनुमति नहीं
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि धारा 175(4) को एक स्वतंत्र प्रावधान मान लिया जाए, तो इससे शिकायतकर्ता कानून द्वारा स्थापित क्रमबद्ध प्रक्रिया (statutory hierarchy) को दरकिनार कर सकेगा।
ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति बिना शपथ-पत्र और बिना पहले पुलिस अधीक्षक से संपर्क किए, सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष लोक सेवक के विरुद्ध शिकायत कर सकेगा, जो कि विधायी मंशा के विपरीत होगा।
अदालत ने कहा कि ऐसा करने से असंगत और अवांछित परिणाम उत्पन्न होंगे, क्योंकि धारा 175(3) स्पष्ट रूप से धारा 173(4) के तहत किए गए प्रयास और शपथ-पत्र की मांग करती है, जबकि धारा 175(4) को अलग-थलग पढ़ने से यह सुरक्षा समाप्त हो जाएगी।
अदालत के निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निष्कर्ष इस प्रकार संक्षेपित किए:
धारा 175(3) और 175(4) को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ पढ़ा जाना चाहिए; धारा 175(4), धारा 175(3) का ही विस्तार है।
जांच का आदेश देने की शक्ति मुख्य रूप से धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट को प्राप्त होती है। धारा 175(4) भी यह शक्ति देती है, लेकिन लोक सेवकों से जुड़े मामलों में एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित करती है।
धारा 175(4) में प्रयुक्त शब्द “शिकायत (complaint)” का अर्थ मौखिक शिकायत नहीं है। इसे उसी प्रकार के आवेदन के रूप में समझा जाएगा, जैसा धारा 175(3) में है—अर्थात् शपथ-पत्र से समर्थित लिखित आवेदन, जिसमें संज्ञेय अपराध के आरोप हों।
निष्कर्ष
अदालत ने दो टूक कहा कि लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों में वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य है, और कोई भी शिकायतकर्ता निर्धारित प्रक्रिया को छोड़कर सीधे मजिस्ट्रेट के पास नहीं जा सकता।
3 weeks ago | [YT] | 0
View 0 replies
Law-Shots (Your Legal Guide)
Happy constitution day 🎉
"रुतबा मेरे सर को आपके संविधान से मिला है, यह सम्मान भी मुझे तेरे संविधान से मिला है।
औरों को जो मिला है वो मुक़द्दर से मिला होगा, हमें तो मुक़द्दर भी आपके संविधान से मिला है।"
आप सभी को संविधान दिवस की हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएँ।
आज हम उस पवित्र ग्रंथ को नमन करते हैं जिसने इस देश को समानता, सम्मान, अधिकार और साहस का बल दिया। परम पूज्य बाबा साहेब की दूरदृष्टि से रचा गया हमारा संविधान हम सबके संघर्षों का मार्गदर्शक और उम्मीदों का आधार है।
आज का दिन केवल उत्सव नहीं—यह शपथ का दिवस है। परम पूज्य बाबा साहेब द्वारा प्रदत्त न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के अद्वितीय मूल्यों को मजबूत रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
आओ, शपथ लें — हम अपने संविधान, अपने अधिकारों और अपने न्याय की रक्षा में सदैव दृढ़ रहेंगे।
2 months ago (edited) | [YT] | 1
View 0 replies
Law-Shots (Your Legal Guide)
Court marriage ⚖️🧑🎓
1 year ago | [YT] | 1
View 0 replies
Law-Shots (Your Legal Guide)
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सेक्शन 7 ,8
1 year ago | [YT] | 2
View 0 replies