Pyara Bharatvarsh (Shiva)

Namaste friends.....Let's explore India.Here you will find many different colours of India.


Pyara Bharatvarsh (Shiva)

Words of Shri Ratan Tata

1 year ago | [YT] | 0

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

राष्ट्रवादी उदारवादी और कभी भी अपने सिद्धांतों से ना सौदा करने वाले श्री रतन टाटा जी का निधन अत्यंत दुख़द है।

रतन टाटा जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी कुछ अनुसरणीय बातें :-

* अगर आप तेज चलना चाहते हैं, तो अकेले चलिए। लेकिन अगर आप दूर तक जाना चाहते हैं, तो साथ साथ चलें
*सत्ता और धन’ मेरे दो प्रमुख सिद्धांत नहीं हैं
*अगर लोग आप पर पत्थर मारते हैं तो उन पत्थर उपयोग अपना महल बनाने में कर ले
*दुनिया में करोड़ो लोग मेहनत करते है, फिर भी सबको अलग-अलग परिणाम प्राप्त होते है, इस सब के लिए मेहनत करने का तरीका जिम्मेदार है, इसलिए व्यक्ति को मेहनत करने के तरीके में सुधार करना चाहिए।
*दूसरों की नकल करने वाले व्यक्ति थोड़े समय के लिए तो सफलता प्राप्त कर सकते हैं लेकिन जीवन में बहुत आगे नहीं बढ़ सकते हैं
* आपको अभी अपने शिक्षक सख्त और डरावने लगते होंगे क्योंकि आपका अभी तक बॉस नाम के प्राणी से पाला नहीं पड़ा हैं।
* तुम्हारी गलती सिर्फ तुम्हारी है, तुम्हारी असफलता सिर्फ तुम्हारी है, किसी को दोष मत दो। अपनी इस गलती से सीखो और आगे बढ़ो
*तुम्हारे माँ बाप तुम्हारे जन्म से पहले इतने नीरस और उबाऊ नही थे। जितना तुम्हें अभी लग रहा है। तुम्हारे पालन पोषण में उन्होंने इतने कष्ट उठाये कि उनका स्वभाव बदल गया।
* अच्छी पढ़ाई करने वाले और कड़ी मेहनत करने वाले अपने दोस्तो को कभी मत चिढ़ाओ। एक समय ऐसा आएगा कि तुम्हें उसके नीचे भी काम करना पड़ सकता है।
* मुझे अपने देश पर गर्व है, लेकिन हमें जातिवाद और सांप्रदायिकता से मुक्त एक अखंड भारत बनाने के लिए एकजुट होने की जरूरत है, हमें सभी के लिए समान अवसर वाले भारत का निर्माण करने की आवश्यकता है, अगर हम अपने नजरिए को ऊँचा रखते हैं और निरंतर विकास, समृद्धि और समान अवसर लोगों तक पहुँचाते हैं तो हम वास्तव में महान राष्ट्र हो सकते हैं
N ONE OF MY FAVORITE AND I MEAN IT 💔

#ratantata#rip

1 year ago | [YT] | 1

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

*🍁 सुहागन की बिंदी 🍁*


बाहर फेरीवाला आया हुआ था, कई तरह का सामान लेकर। बिंदिया, काँच की चूड़ियाँ, रबर बैण्ड, हेयर बैण्ड, कंघी, काँच के और भी बहुत सारे सामान थे। आस-पड़ोस की औरतें उसे घेर कर खड़ी हुई थीं।

एक बाबा काफी देर तक गेट पर अपनी लाठी टेककर खड़े रहे। जैसे ही औरतों की भीड़ छँटी, बाबा अपनी लाठी टेकते हुए फेरी वाले के पास पहुँच गए और उसका सामान देखने लगे। शायद वे कुछ ढूँढ़ रहे थे। कभी सिर ऊँचा करके देखते, कभी नीचा। जो देखना चाह रहे थे, वह दिख नहीं रहा था।

हैरान परेशान बाबा को फेरी वाले ने देखा तो पूछा---"कुछ चाहिए था क्या बाबा आपको ?

बाबा ने सुनकर अनसुना कर दिया। धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए फेरी के ही चक्कर लगाने लगे। कहीं तो दिखे वो, जो वे देखना चाह रहे हैं। फेरी वाले ने दोबारा पूछा---"बाबा कुछ चाहिए था क्या ?"

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पंडित आशीष शर्मा कथावाचक 7587246456

अबकी बार बाबा ने फेरीवाले से कहा --"हाँ बेटा!"
"क्या चाहिए ?-- बताओ मुझे, मैं ढूँढ़ देता हूँ।"

"मुझे ना--वो बिंदिया चाहिए थी।"

"बिंदिया क्यों चाहिए बाबा ?"
बाबा ने अम्मा की और संकेत करते हुए बताया---"अरे! मेरी पत्नी के लिए चाहिए समझदार।"

बाबा का उत्तर सुनकर फेरीवाला हँस दिया। "किस तरह की बिंदिया चाहिए?"

"बड़ी-बड़ी गोल बिंदिया चाहिए। बिल्कुल लाल रंग की।"

फेरीवाले ने बिंदिया का पैकेट निकाल कर दिया--यह देखो बाबा, ये वाली ?"

"अरे, नहीं-नहीं, ये वाली नहीं।बिल्कुल लाल सी।"

फेरीवाले ने वो पैकेट रख लिये और दूसरा पैकेट निकाल कर दिखाया--"बाबा ये वाली ?"

"अरे तुझे समझ में नहीं आता क्या? बिल्कुल लाल-लाल बिंदिया चाहिए।"

फेरी वाले ने सारे पैकेट निकाले और फेरी के एक और फैला कर रख दिए--आप स्वंय ही देख लो बाबा! कौन सी बिंदिया चाहिए?"

बाबा ने अपने काँपते हाथों से बिंदियों के पैकेट को इधर-उधर किया और उसमें से एक पैकेट निकाला--"हाँ-हाँ, ये वाली।"

बाबा के हाथ में बिन्दी का पैकेट देखकर फेरीवाला मुस्कुरा दिया। बाबा ने तो मेहरून रंग की बिन्दी उठाई थी।

"कितने की है ?"

"दस रुपये की है बाबा।"

"अच्छा ! कीमत सुनकर बाबा का दिल बैठ गया। फिर भी बोले-- "ठीक है, अभी लेकर आता हूँ।"

बाबा लाठी टेकते हुए पलट कर जाने लगे। तब तक घर में से बहू आती दिखी। उसे देखकर बाबा बोले--"अरे बहू, जरा दस रुपये तो देना। फेरी वाले को देने हैं।"

"अब क्या खर्च करा दिया आप लोगों ने ?" बहू ने लगभग चिल्लाते हुए कहा।

"अम्मा के लिए बिंदिया खरीदी थी। उसकी बिंदिया खत्म हो गई थी। कई बार बोल चुकी है"---बाबा ने धीरे से कहा।

"बस-बस, आप लोगों को और कोई काम तो है नहीं। बेवजह का खर्चा कराते रहते हैं। सत्तर साल की हो चुकी हैं अम्मा। क्या अभी भी बिंदिया लगाएंगी ? इस उम्र में भी न जाने क्या-क्या शौक हैं ?"

"देख बेटा, बात शौक की नहीं है। अम्मा भी सुहागन है, इसलिए उसका मन नहीं मानता। सिर्फ दस रुपये ही तो माँग रहा हूँ। अन्दर जाकर दे दूँगा।"

"कहाँ से दे दोगे ? जो पैसे देंगे, वह भी तो मेरे पति की ही कमाई है। मेरे पास कोई पैसे नहीं हैं।"

इतना कहकर बहू बड़बड़ाती हुई अन्दर आ गई। अम्मा ने खाट पर लेटे-लेटे ही बाबा को संकेत किया।

बाबा ने पलटकर बिन्दी फेरी में वापस रख दी और लाठी टेकते हुए अम्मा के पास आकर बैठ गए। बाबा ने देखा अम्मा की आँखों में आँसू थे।

"क्षमा करना पार्वती! मैं तेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर पाया।"

"रहने दो जी, बेचारी बहू भी परेशान हो जाती होगी। काहे दिल पर ले कर बैठ जाते हो ? बिन्दी ही तो थी।"

"हाँ हाँ बिन्दी ही थी। कौन सी हजारों रुपये की आ रही थी।" बाबा ने व्यंग्य से हँसते हुए कहा।

"बिन्दी ही तो लगानी है जी। एक काम करो, पूजा घर में से हिंगलू ले आओ, उसी से लगा देना। पर आज अपने हाथों से बिन्दी लगा दो।"

बाबा ने अम्मा की बात सुनी और फिर लाठी टेकते हुए पूजा घर में गये। थोड़ी देर बाद बाबा हाथ में हिंगलू लिए अम्मा के पास पहुँचे।

"लो पार्वती! उठो, मैं तुम्हें बिन्दी लगा देता हूँ।"

पर अम्मा में कोई हलचल न दिखी।
बाबा ने दोबारा कहा--

"पार्वती, ओ पार्वती! सो गई क्या ? तेरी बड़ी इच्छा थी ना--बड़ी सी लाल बिन्दी लगाने की। ले देख, मैं हिंगलू ले आया हूँ। अब बड़ी सी लाल बिन्दी लगा दूँगा। पर तू बैठ तो सही।"

पर अम्मा बिल्कुल शिथिल पड़ी हुई थीं। शरीर में कोई हलचल न थी। बाबा का दिल बैठ गया। हाथ में हिंगलू लिए अम्मा के पास ही बैठ गए। आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे, पर एक भी बोल न फूटा।

अम्मा जा चुकी थीं, हमेशा के लिए।

थोड़ी ही देर में रोना-धोना मच गया। आस-पड़ोस के लोग आ गए। बेटे को बुलाया गया और अम्मा को अन्तिम यात्रा के लिए तैयार किया जाने लगा। अम्मा को नहला-धुला, सुहागन की तरह तैयार कर, अर्थी पर लिटा कर बाहर लाया गया।

बाबा ने देखा, अम्मा के माथे पर बड़ी सी लाल बिन्दी लगी थी। बाबा उठे और घर में गए। थोड़ी देर बाद बाहर आए और धीरे-धीरे अम्मा की अर्थी के पास गये। उन्होंने अम्मा के माथे पर से बिन्दी हटा दी।

"बाबा! यह क्या कर रहे हो ? अम्मा सुहागन थीं। आप बिन्दी क्यों हटा रहे हो ?"--- बेटे ने कहा।
"बेटा ! उसका पति बिन्दी खरीदने की औकात नहीं रखता था, इसलिए हटा रहा हूँ।"

सुनकर सब लोग अवाक रह गए। बहू शर्मसार हो गई। सब ने देखा-- बाबा अपने हाथ में लाए हिंगलू से एक बड़ी सी लाल बिंदिया अम्मा के माथे पर लगा रहे हैं।

थोड़ी देर बाद बहू की चीत्कार छूट गई। बाबा भी अम्मा के साथ हमेशा-हमेशा के लिए लम्बी यात्रा पर रवाना हो गए थे।

मित्रों ! यह भावनात्मक, हृदय स्पर्शी कहानी बहुत कुछ सन्देश दे रही है। अपने समाज में सिर्फ 2-4 प्रतिशत बुजुर्गों की स्थिति ही परिवार में सम्मान जनक है। कहीं इसका मूल कारण संयुक्त परिवार का एकल परिवार में रूपान्तरण, नाते-रिश्तों की समाप्ति, धन लिप्सा की अंधी दौड़ एवं लड़के-लड़कियों का पश्चिमी मॉडल में पढ़-लिख कर सब से अधिक जानकार व बुद्धिमान होने का झूठा अभिमान, किताबी ज्ञान का होना, परन्तु व्यवहारिक ज्ञान की कमी होना तो नहीं?

*कृपया हम सभी एक छोटा सा प्रयास करें---"अपने घर के बुजुर्गों का उचित सम्मान"। सभी को एक दिन बूढ़ा होना ही है। माता-पिता के न रहने पर ही उनका महत्व मालूम पड़ता है। आपका हर पल मंगलमय हो।*
लेख:- पंडित आशीष शर्मा कथावाचक

1 year ago | [YT] | 1

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

अधिकतर घरों में बच्चे यह दो प्रश्न अवश्य पूछते हैं जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाती है तो दीपावली पर लक्ष्मी पूजन क्यों होता है? राम और सीता की पूजा क्यों नही?
दूसरा यह कि दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं?

इन प्रश्नों का उत्तर अधिकांशतः बच्चों को नहीं मिल पाता और जो मिलता है उससे बच्चे संतुष्ट नहीं हो पाते।आज की शब्दावली के अनुसार कुछ ‘लिबरर्ल्स लोग’ युवाओं और बच्चों के मस्तिष्क में यह प्रश्न डाल रहें हैं कि लक्ष्मी पूजन का औचित्य क्या है, जबकि दीपावली का उत्सव राम से जुड़ा हुआ है। कुल मिलाकर वह बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं कि सनातन धर्म और सनातन त्यौहारों का आपस में कोई तारतम्य नहीं है।सनातन धर्म बेकार है।आप अपने बच्चों को इन प्रश्नों के सही उत्तर बतायें।

दीपावली का उत्सव दो युग, सतयुग और त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी इसलिए लक्ष्मीजी का पूजन होता है। भगवान राम भी त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने घर घर दीपमाला जलाकर उनका स्वागत किया था इसलिए इसका नाम दीपावली है।अत: इस पर्व के दो नाम है लक्ष्मी पूजन जो सतयुग से जुड़ा है दूजा दीपावली जो त्रेता युग प्रभु राम और दीपों से जुड़ा है।

लक्ष्मी गणेश का आपस में क्या रिश्ता है
और दीवाली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है?

लक्ष्मी जी सागरमन्थन में मिलीं, भगवान विष्णु ने उनसे विवाह किया और उन्हें सृष्टि की धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया। लक्ष्मी जी ने धन बाँटने के लिए कुबेर को अपने साथ रखा। कुबेर बड़े ही कंजूस थे, वे धन बाँटते ही नहीं थे।वे खुद धन के भंडारी बन कर बैठ गए। माता लक्ष्मी खिन्न हो गईं, उनकी सन्तानों को कृपा नहीं मिल रही थी। उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई। भगवान विष्णु ने कहा कि तुम कुबेर के स्थान पर किसी अन्य को धन बाँटने का काम सौंप दो। माँ लक्ष्मी बोली कि यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं उन्हें बुरा लगेगा।
तब भगवान विष्णु ने उन्हें गणेश जी की विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने गणेश जी को भी कुबेर के साथ बैठा दिया। गणेश जी ठहरे महाबुद्धिमान। वे बोले, माँ, मैं जिसका भी नाम बताऊँगा , उस पर आप कृपा कर देना, कोई किंतु परन्तु नहीं। माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी।अब गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न, रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे।कुबेर भंडारी देखते रह गए, गणेश जी कुबेर के भंडार का द्वार खोलने वाले बन गए। गणेश जी की भक्तों के प्रति ममता कृपा देख माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्रीगणेश को आशीर्वाद दिया कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों, वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें।

दीवाली आती है कार्तिक अमावस्या को, भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं, वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद देव उठनी एकादशी को। माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में।इसलिए वे अपने सँग ले आती हैं अपने मानस पुत्र गणेश जी को।
इसलिए दीवाली को लक्ष्मी गणेश की पूजा होती है।

यह कैसी विडंबना है कि देश और हिंदुओ के सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नही है और जो वर्णन है वह अधूरा है।इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों और अपनी अगली पीढ़ी को भी बतायें। दूसरों के साथ साझा करना भी ना भूलेंI
जय श्री गणेश जी
जय महालक्ष्मी जी
जय जय श्री राम🙏🙏
🚩🚩🙏🙏

1 year ago | [YT] | 2

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

*भगवत्-नाम युक्त मंत्रों की महिमा :--*
(1)श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में..
चहुं जुग तीन काल तिहुं लोका।
भये नाम जपि जीव बिसोका।।
अर्थात चारों युगो , तीनों काल और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोक रहित हुए हैं।
(2)उत्तर काण्ड में कहा है--
,"कलियुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।।अर्थात कलयुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है, श्री राम का गुणगान ही एक मात्र आधार है।
(3)श्री शिक्षाष्टकम् 2 में कहा है कि--
हे प्रभू, आपने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, जिनका किसी भी समय स्मरण किया जा सकता है।अतयव कलियुग में श्री हरि के नामों और लीलाओं का भंडार जीवों को मिल गया।
(4)पद्मपुराण खण्ड 3 (स्वर्ग खण्ड) अध्याय 50 में सूत जी ने कहा है कि--
भगवान नारायण ने अपने नाम मेंअपने से भी अधिक शक्ति स्थापित कर दी है।
(5)श्री रामरक्षास्त्रोत्रम 38 में कहा कि भगवान जानते हैं कि जीव माया के अधीन है, इसलिए मेरा दिव्य चिंतन नहीं कर सकता, इसलिए भगवान ने अपने नाम मेंअपनी समस्त शक्ति भर दी जिससे जीव उनका प्रेम पूर्वक चिंतन के साथ नाम संकीर्तन कर सके जिसके फलस्वरूप उसे माया से मुक्ति व दिव्य प्रेम मिल सके।
ईश्वर के नाम का उच्चारण जीभ से होता है, चित्त से होता है, स्वरों से होता है, परन्तु उसमें लीन होते हैं - प्राण और मन। ईश्वर -नाम के उच्चारण से मन रूपांतरित होने लगता है एवं हृदय के द्वार खुलने लगते हैं। जितना जिसका अन्त:करण शुद्ध होता जायेगा, उतना ही वह परमात्मा की निकटता का अनुभव करेगा।
ईश्वर के नाम के जप से ऐसा दिव्य प्रकाश उत्पन्न होता है कि जन्म जन्मांतर के चित्त के समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं और मनुष्य को ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त होती है जिससे उसके अन्तर से ज्ञान का प्रस्फुटन होता है जिससे उसे कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता है।
कलयुग में "नाम" जप सबसे अधिक फलदाई हैं।ॐ नमः शिवाय/ॐ नमो भगवते वासुदेवाय/ ॐ नमः गणेशाय /ॐ आदि में इष्ट का नाम स्मरण के साथ नमन होने के कारण स्वतः चैत्यनित मंत्र हैं।. बगैर गुरु के भी यदि हम मंत्र का फल प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें इन नमस्कार मंत्रों केअर्थ को पूरी तरह समझ कर मन में वही भाव लाते हुए जप करना चाहिए। इस के लिए हमें छोटे-छोटे मंत्र का चयन करना चाहिए। "ॐ नमः शिवाय", "ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ( यह मंत्र नारद मुनि ने भक्त ध्रुव को भगवान के चतुर्भुज रूप को चित्त में धारण कर जप करने का उपदेश दिया था), " सोऽहम, व 'ॐ ,स्वयं में नैसर्गिक, सिद्ध,व चैतन्य युक्त दीक्षा मंत्र हैं। इनके लिए हमें किसी सिद्ध गुरु का शिष्य बनने की आवश्यकता नहीं है। हम इनका जप स्वत: कर सकते हैं।
अन्य देवताओं के स्थान पर "राम" नाम का जप सबसे शक्तिशाली है, क्योंकि राम का नाम पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों वर्षों से अनगिनत लोगों द्वारा जपा जा रहा है और पक्षियों, पर्वतों, नदियों के लिए परिचित व कण कण में समाया हुआ है।

*नाम जपने की आसान विधि:--*

*जब हम भगवान की लीलाओं के बारे मे सोंचते है, तो स्मरण के इस भाव से भगवान के नाम, रूप, गुण का स्मरण उस समय स्वतः होने लगता है। अतः स्मरण के इस भाव मे भगवान के नाम-रूप-गुण- लीला का स्मरण एक साथ होने लगता है।*

1 year ago | [YT] | 2

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा”
विघ्नहर्ता भगवान गणेश आपको सुख, समृद्धि व सफलता का आशीर्वाद प्रदान करें।
आप सभी को श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

1 year ago | [YT] | 1

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

सुप्रभात।

1 year ago | [YT] | 1

Pyara Bharatvarsh (Shiva)

सभी गुरुजनों को जिन्होंने मुझे कुछ भी सिखाया सादर प्रणाम तथा शिक्षक दिवस की शुभकामनाओं के साथ मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि उन सभी गुरुजनों का जीवन खुशियों से भर दे तथा उन्हें निरोगी रखकर दीर्घायु करेंl

1 year ago | [YT] | 1