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जय श्री राम! हर हर महादेव ! जय माता दी !
Sunder Bhakti Dham
जगतगुरु श्री वल्लभाचार्य जी श्रीनाथ जी की सेवा किया करते थे। दोनों के बीच पिता–पुत्र जैसा अनुपम, स्नेहिल और अलौकिक प्रेम था। श्रीनाथ जी केवल ठाकुर नहीं थे, वे वल्लभाचार्य जी के लाला थे।
एक दिन की बात है। वल्लभाचार्य जी लाला को सुलाने लगे। उन्होंने बड़े प्रेम से सुंदर बिछोना लगाया, किंतु लाला ने सोने से मना कर दिया।
वल्लभाचार्य जी ने पूछा—
“लाला, क्या हुआ? सोते क्यों नहीं?”
लाला बोले—
“जय जय, देखो न! यह बिछोना चुभता है, हमको नींद नहीं आती।”
गोसाई जी ने दूसरा बिछोना लगाया, उसे भी ठीक से सजाया, पर लाला कन्हैया फिर भी नहीं माने। कई बार अलग-अलग प्रकार से बिछोना लगाया गया, किंतु लाला सोए ही नहीं।
अंत में गोसाई जी ने स्नेह में डाँटते हुए कहा—
“क्यों रे लाला! फिर कैसे सोएगा?”
तब लाला ने गोसाई जी का हाथ पकड़ा, उन्हें अपने बिस्तर पर लिटाया और स्वयं उनके पेट पर लेट गए। मुस्कराकर बोले—
“जय जय, ऐसे सोएँगे हम।”
वल्लभाचार्य जी ने लाड़-प्यार में लाला को इतना बिगाड़ रखा था कि जब लाला का मन करता, किसी को पीट भी आते थे।
एक दिन लाला ब्रजवासी बालक का रूप धरकर अन्य बच्चों के साथ खेल रहे थे। तभी श्रीनाथ जी का जलघडिया (सेवक) वहाँ से गुजर रहा था।
सभी बच्चे बोले—
“भैया, हट जाओ! श्रीनाथ जी का जलघडिया आ रहा है। इसे छूना मत, यह अपरस है।”
पर लाला कहाँ मानने वाले थे। जानबूझकर वे जलघडिये से भिड़ गए। जलघडिया क्रोधित हो गया और बोला—
“मूर्ख बालक! अब मुझे फिर से स्नान करना पड़ेगा।”
उसने लाला के गाल पर जोर से थप्पड़ मार दिया।
लाला गाल पर हाथ फेरते रहे और मन ही मन बोले—
“इसका बदला तो नंद का यह लड़का जरूर लेगा।”
कुछ दिन बाद, गर्मियों का समय था। गोसाई जी ने उसी जलघडिये को बुलाकर कहा—
“लाला को गर्मी न लगे, इसलिए तुम श्रीनाथ जी को पंखा झलना।”
जलघडिये ने हाँ कर दी और गोसाई जी अपने कक्ष में चले गए।
जलघडिया सेवा तो कर रहा था, पर ठाकुर जी के प्रति उसके हृदय में प्रेम नहीं था। पंखा झलते-झलते उसे नींद आ गई और पंखा फिसलकर ठाकुर जी को लग गया।
लाला को क्रोध आया, पर उन्होंने सोचा—
“शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा किए थे, इसका एक अपराध तो क्षमा करना चाहिए।”
ठाकुर जी चुप रहे।
पर थोड़ी देर बाद जलघडिया फिर सो गया और पंखा दोबारा ठाकुर जी के मुख पर जा लगा।
अबकी बार लाला को अपने गाल पर लगा पुराना थप्पड़ याद आ गया।
बस फिर क्या था—लाला ने जलघडिये को ऐसा जोर का थप्पड़ मारा कि वह मंदिर के प्रांगण से बाहर जा गिरा।
चिल्लाने की आवाज सुनकर गोसाई जी दौड़े आए। देखा—जलघडिया गाल पकड़कर एक कोने में बैठा है।
पूछने पर वह बोला—
“मैं तो पंखा झल रहा था, तभी किसी ने थप्पड़ मार दिया।”
वल्लभाचार्य जी सीधे ठाकुर जी के पास गए और पूछा—
“क्यों रे लाला! तूने मारा इसे?”
लाला बोले—
“जय जय, नहीं मारता तो क्या करता? सेवा करते-करते सो जाता है, दो बार पंखा मेरे मुँह पर मारा। मैंने ऐसा मारा है कि अब कभी सेवा में सोएगा नहीं।”
यह केवल इसलिए नहीं कि ठाकुर जी जगद्गुरु या पीठाधीशों के साथ ही प्रेम-लीला करते हैं।
उन्हें तो सुंदर, कोमल और प्रेमपूर्ण हृदय वाले भक्त प्रिय हैं।
जब भगवान राम मिथिला गए थे, वहाँ स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों ने सुमन-वर्षा की थी।
और जब कन्हैया मथुरा गए और कंस का वध किया, तब भी मथुरावासियों ने सुमन बरसाए थे।
सुमन का अर्थ केवल पुष्प नहीं होता—
सुमन का अर्थ होता है सुंदर मन।
उसी सुंदर मन से प्रसन्न होकर ठाकुर जी भक्तों पर कृपा करते हैं।
इसलिए, हे वंदनीय भक्तों—
बाहरी आडंबर त्यागकर, केवल निर्मल हृदय और सच्चे प्रेम से ठाकुर जी की भक्ति करो।
🙏🚩
Radhe Radhe
1 month ago | [YT] | 3
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Sunder Bhakti Dham
*अमृत कथा*
*महाराज दशरथ का जन्म एक बहुत ही अद्भुत घटना है*
*पौराणिक धर्म ग्रंथों के आधार पर बताया जाता है कि एक बार राजा अज दोपहर की वंदना कर रहे थे।*
*उस समय लंकापति रावण उनसे युद्ध करने के लिए आया और दूर से उनकी वंदना करना देख रहा था। राजा अज ने भगवान शिव की वंदना की और जल आगे अर्पित करने की जगह पीछे फेंक दिया।*
*यह देखकर रावण को बड़ा आश्चर्य हुआ। और वह युद्ध करने से पहले राजा अज के सामने पहुंचा तथा पूछने लगा कि हमेशा वंदना करने के पश्चात जल का अभिषेक आगे किया जाता है, न कि पीछे, इसके पीछे क्या कारण है। राजा अज ने कहा जब मैं आंखें बंद करके ध्यान मुद्रा में भगवान शिव की अर्चना कर रहा था, तभी मुझे यहां से एक योजन दूर जंगल में एक गाय घास चरती हुई दिखी और मैंने देखा कि एक सिंह उस पर आक्रमण करने वाला है तभी मैंने गाय की रक्षा के लिए जल का अभिषेक पीछे की तरफ किया।*
*रावण को यह बात सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ।*
*रावण ऐक योजन दूर वहाँ गया और उसने देखा कि एक गाय हरी घास चर रही है जबकि शेर के पेट में कई वाण लगे हैं अब रावण को विश्वास हो गया कि जिस महापुरुष के जल से ही बाण बन जाते हैं और बिना किसी लक्ष्य साधन के लक्ष्य बेधन हो जाता है ऐसे वीर पुरुष को जीतना बड़ा ही असंभव है और वह उनसे बिना युद्ध किए ही लंका लौट जाता है।*
*एक बार राजा अज जंगल में भ्रमण करने के लिए गए थे तो उन्हें एक बहुत ही सुंदर सरोवर दिखाई दिया उस सरोवर में एक कमल का फूल था जो अति सुंदर प्रतीत हो रहा था।*
*उस कमल को प्राप्त करने के लिए राजा अज सरोवर में चले गए किंतु यह क्या राजा अज जितना भी उस कमल के पास जाते वह कमल उनसे उतना ही दूर हो जाता और राजा अज उस कमल को नहीं पकड़ पाया।*
*अंततः आकाशवाणी हुई कि हे राजन आप नि:संतान हैं आप इस कमल के योग्य नहीं है इस भविष्यवाणी ने राजा अज के हृदय में एक भयंकर घात किया था।*
*राजा अज अपने महल में लौट आए और चिंता ग्रस्त रहने लगे क्योंकि उन्हें संतान नहीं थी जबकि वह भगवान शिव के परम भक्त थे।*
*भगवान शिव ने उनकी इस चिंता को ध्यान में लिया। और उन्होंने धर्मराज को बुलाया और कहा तुम किसी ब्राह्मण को अयोध्या नगरी पहुँचाओ जिससे राजा अज को संतान की प्राप्ति के आसार हो।*
*दूर पार एक गरीब ब्राह्मण और ब्राह्मणी सरयू नदी के किनारे कुटिया बनाकर रहते थे ।*
*एक दिन वे ब्राह्मण राजा अज के दरबार में गए और उनसे अपनी दुर्दशा का जिक्र कर भिक्षा मांगने लगे।*
*राजा अज ने अपने खजाने में से उन्हें सोने की अशर्फियां देनी चाही लेकिन ब्राह्मण नहीं कहते हुए मना कर दिया कि यह प्रजा का है आप अपने पास जो है, उसे दीजिए तब राजा अज ने अपने गले का हार उतारा और ब्राह्मण को देने लगे किंतु ब्राह्मण ने मना कर दिया कि यह भी प्रजा की ही संपत्ति है*
*इस प्रकार राजा अज को बड़ा दुख हुआ कि आज एक गरीब ब्राह्मण उनके दरबार से खाली हाथ जा रहा है तब राजा अज शाम को एक मजदूर का बेश बनाते हैं और नगर में किसी काम के लिए निकल जाते हैं।*
*चलते - चलते वह एक लौहार के यहाँ पहुंचते हैं और अपना परिचय बिना बताए ही वहां विनय कर काम करने लग जाते हैं पूरी रात को हथौड़े से लोहे का काम करते हैं जिसके बदले में उन्हें सुबह एक टका मिलता है।*
*राजा एक टका लेकर ब्राह्मण के घर पहुंचते हैं लेकिन वहां ब्राह्मण नहीं था उन्होंने वह एक टका ब्राह्मण की पत्नी को दे दिया और कहा कि इसे ब्राह्मण को दे देना*
*जब ब्राह्मण आया तो ब्राह्मण की पत्नी ने वह टका ब्राह्मण को दिया और ब्राह्मण ने उस टका को जमीन पर फेंक दिया तभी एक आश्चर्यजनक घटना हुई ब्राह्मण ने जहां टका फेंका था वहां गड्ढा हो गया ब्राह्मण ने उस गढ्ढे को और खोदा तो उसमें से सोने का एक रथ निकला तथा आसमान में चला गया इसके पश्चात ब्राह्मण ने और खोदा तो दूसरा सोने का रथ निकला और आसमान की तरफ चला गया इसी प्रकार से, नौ सोने के रथ निकले*
*और आसमान की तरफ चले गए और जब दसवाँ रथ निकला तो उस पर एक बालक था और वह रथ जमीन पर आकर ठहर गया।*
*ब्राह्मण उस बालक को लेकर राजा अज के दरबार में पहुंचे और कहा राजन - इस पुत्र को स्वीकार कीजिए यह आपका ही पुत्र है जो एक टका से उत्पन्न हुआ है*
*तथा इसके साथ में सोने के नौ रथ निकले जो आसमान में चले गए जबकि यह बालक दसवें रथ पर निकला इसलिए यह रथ तथा पुत्र आपका है। इस प्रकार से दशरथ जी का जन्म हुआ था।*
*महाराज दशरथ का असली नाम मनु था और ये दसों दिशाओं में अपना रथ लेकर जा सकते थे इसीलिए दशरथ नाम से प्रसिद्ध हुये..!!*
*जय सिया राम*
1 month ago | [YT] | 1
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Sunder Bhakti Dham
*🚩मन का छलावा...*
*एक संत जी ने एक बिल्ली पाल रखी थी।बिल्ली इतनी समझदार थी कि रोजाना जब संत जी शाम के सत्संग में रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए एक दीया (चिराग़) जलाकर उसके माथे पर रख देते ,तब वो उस चिराग को सिर से गिरने नहीं देती थी।एकाग्रता से बैठी रहती थी।यह दृश्य देखकर सत्संगी जनों को बड़ा आश्चर्य होता परन्तु वे कहते कुछ नहीं।एक दिन एक सत्संगी ने बिल्ली की हकीकत का पता लगाने की एक बेहतरीन युक्ति खोजी।वह सत्संगी कहीं से एक चूहा पकड़ लाया और उसे चादर में छुपाकर, चादर ओढ़कर सत्संग में गया ।प्रतिदिन की तरह ही बिल्ली के माथे पर चिराग रख दिया गया और सत्संग शुरू कर दिया गया ।कुछ ही समय पश्चात उस सत्संगी ने चुपके से वह चूहा बिल्ली के सामने छोड़ दिया,जैसे ही बिल्ली ने चूहे को देखा,वो सब कुछ भूलकर चूहे पर झपट पड़ी और चिराग को नीचे गिरा दिया, जिससे अंधेरा हो गया,मन भी उस बिल्ली की ही तरह है।जब तक सत्संग करते हैं,ज्ञान की बातें करते हैं,या कोई इच्छित वस्तु हमारे सामने नहीं होती है।तब तक हम सब उस बिल्ली की तरह ही शान्त बने रहते हैं।जैसे ही हमारे सामने कोई इच्छित पदार्थ सामने आता है, या जैसे ही संसार में व्यवहार करने लग जाते हैं।उस समय पता नहीं सत्संग का ज्ञान कहाँ चला जाता है।और हम अपने ज्ञान रूपी चिराग को नीचे गिरा देते हैं, मन सवार हो जाता है।*
*बड़ी बात है कि प्राप्त ज्ञान को अपने अनुभव की कसौटी पर कसकर जीवन में उतार ले।*
🙏*हर हर महादेव*🙏
1 month ago | [YT] | 1
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Sunder Bhakti Dham
*माँ पार्वती और माँ गंगा के बीच विवाद?*
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देवाधिदेव महादेव को जगतपिता भी कहा जाता है, क्योंकि उनका विवाह इस संसार की शक्ति, मां पार्वती से हुआ था। शिव और शक्ति के संयोजन से ही हमारी यह प्रकृति चल रही है। वे दोनों, एक दूसरे के अर्धांग हैं और एक दूसरे के बिना अपूर्ण भी हैं। जहां, एक तरफ भगवान शिव, अनादि के सृजनकर्ता हैं, वहीं, माता पार्वती, प्रकृति का मूल स्वरूप हैं।
माता पार्वती, राजा हिमावन की पुत्री हैं, जिसके अनुसार, उन्हें, शैलपुत्री भी कहा जाता है। सनातन धर्म के अनुसार, देवी गंगा का अवतरण भी हिमालय से हुआ था, जिसके अनुसार, वे, माता पार्वती की बहन लगती हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार, इन दोनों बहनों में शिव जी को लेकर विवाद हो गया, जो संभाले नहीं संभल रहा था। आइए जानतें हैं माता पार्वती और गंगा जी के विवाद की रोचक कथा के बारे में...
शिव शक्ति
एक बार, शिव जी, अपने परम निवास, कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ बैठे थे, जहां उनके साथ में ही माता पार्वती भी ध्यान में मग्न थीं। शिव और शक्ति का यह सुदंर स्वरूप, एक साथ बहुत ही मनमोहक लग रहा था। ध्यानमग्न, माता पार्वती और अपने प्रभु शिव जी की शोभा को उनके परम भक्त नंदी जी निहार रहे थे। दोनों का यह सुंदर स्वरूप देख, नंदी जी के नेत्रों से खुशी के आंसू बहने लगे। अपने भक्त की आंखों से बहते अश्रुओं का भान जैसे ही महादेव को हुआ, उन्होंने अपने नेत्र खोले।
महादेव के समक्ष, साक्षात थीं गंगा जी
महादेव ने जैसे ही भक्त की चिंता में नेत्र खोले, उन्होंने देखा, सामने गंगा जी हाथ जोड़े खड़ी थीं। गंगा जी को देख, महादेव हैरान होते हुए बोले, “देवी गंगे, आप?!” तो उत्तर में मां गंगा बोलीं, “हे आदिपुरुष! आपके इस रूप को देखकर, मैं आप पर मोहित हो गई हूं। कृपा कर, मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें।”
मां पार्वती का क्रोध
जैसे ही मां गंगा के स्वर, माता पार्वती के कानों में पड़े, वे हैरान हो गईं। मां गंगा की यह बात सुनकर उनके नेत्र लाल हो गए और क्रोधवश, वे बोल पड़ीं, “देवी गंगा, सीमा ना लांघिए! मत भूलिए महादेव हमारे पति हैं!” यह सुनकर ठिठोली करते हुए मां गंगा बोलीं, “अरे बहन, क्या फर्क पड़ता है? वैसे भी भले ही तुम महादेव की पत्नी हो फिर भी देवाधिदेव महादेव, अपने शीश पर तो मुझे ही धारण करते हैं। जहां महादेव के साथ तुम नहीं जा सकतीं, मैं तो वहां भी पहुंच ही जाती हूं!”
गंगा की यह बात सुनते ही माता पार्वती के क्रोध का ठिकाना ना रहा, उनका क्रोध से मुख भयंकर हो गया।
मां पार्वती का गंगा को श्राप
मां गंगा के वचन सुनकर, मां पार्वती, उन्हें श्राप देते हुए बोलीं, “गंगे! तुमने मेरी बहन होने की सीमा लांघ दी है। मैं तुम्हे श्राप देती हूं कि तुम में मृत देह बहेंगी! जग जन के पाप धोते-धोते, तुम मैली हो जाओगी! तुम्हारा यह अहम टूटेगा और तुम्हारा रंग भी काला पड़ जाएगा!”
गंगा की याचना
मां गंगा, यह सुनते ही महादेव और मां पार्वती के चरणों में गिर गईं। वे, अपनी भूल का पश्चातापकर, मां पार्वती और महादेव से क्षमा याचना करने लगीं। तब महादेव ने उनसे कहा कि “हे गंगे! यह श्राप तो अब फलित होकर रहेगा परन्तु आपके पश्चाताप से प्रसन्न होकर हम आपको इस श्राप से मुक्ति देते हैं।
हे गंगे! आप जन मानस के पापों से दूषित होंगी परन्तु संतजन के स्नान से आपकी शुद्धि, आपको वापस प्राप्त होगी।” इस प्रकार, भगवान शिव ने मां गंगा को प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद से ही गंगा में स्नान से पाप धुलने लगे। तब से ही लोग, गंगा में स्नान करने के लिए दूर-दूर से आते हैं और भूल-चूक में हुए पापों से मुक्ति पाते हैं।
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1 month ago | [YT] | 3
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Sunder Bhakti Dham
*🙏🌹जय श्री शनिदेव जी महाराजजी 🌹🙏*
*☔️🌻श्री शनिदेव जी का आज का अद्भुत एवं अलौकिक दर्शन शनि 🪐 मंदिर 🛕 शिंगणापुर धाम जी से 🌻☔️
*🔱माघ, कृष्ण पक्ष, तिथि - सप्तमी, संवत् 2082, दिन - शनिवार, 10 जनवरी 2026🔱*
*🌹ॐ नमः शिवाय*🌹🙏💐
1 month ago | [YT] | 1
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Sunder Bhakti Dham
*🌳 संत की खीर 🌳*
संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे।
नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था।
भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते।
एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ?
ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है, बढ़िया खीर बना।
बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई। ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा..
बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है, तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है।
इतनी अच्छी खीर तो हमने आज तक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख।
बाबा बोले, हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही, आप ही पीओ।
ठाकुर जी बोले, बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या?
.
बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया।
भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए।
मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड़ गए ज्वर (बुखार) से बीमार।
ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है।
बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है।
वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है।
ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे, २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है।
बाबा कही आता जाता तो है नही, खीर खाने काहाँ चला गया?
ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो, तुम्हें तो कुछ नही आता है।
वैद्य जी बोले, मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा।
यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा।
ब्रजवासी बोले, ठीक है औषधि का प्रयोग करो। बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली।
ब्रजवासी पूछने लगे, बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है, खीर कहां से पायी?
रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे।
आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया...
सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा।
श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए।
श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है।
वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही।
उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही, वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है।
धन्य है ऐसे महान संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी
🙏आपका दिन शुभ और मंगलमय हो 🙏
1 month ago | [YT] | 1
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Sunder Bhakti Dham
*🌳 संत की खीर 🌳*
संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे।
नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था।
भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते।
एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ?
ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है, बढ़िया खीर बना।
बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई। ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा..
बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है, तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है।
इतनी अच्छी खीर तो हमने आज तक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख।
बाबा बोले, हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही, आप ही पीओ।
ठाकुर जी बोले, बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या?
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बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया।
भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए।
मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड़ गए ज्वर (बुखार) से बीमार।
ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है।
बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है।
वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है।
ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे, २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है।
बाबा कही आता जाता तो है नही, खीर खाने काहाँ चला गया?
ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो, तुम्हें तो कुछ नही आता है।
वैद्य जी बोले, मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा।
यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा।
ब्रजवासी बोले, ठीक है औषधि का प्रयोग करो। बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली।
ब्रजवासी पूछने लगे, बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है, खीर कहां से पायी?
रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे।
आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया...
सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा।
श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए।
श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है।
वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही।
उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही, वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है।
धन्य है ऐसे महान संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी
🙏आपका दिन शुभ और मंगलमय हो 🙏
1 month ago | [YT] | 1
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Sunder Bhakti Dham
Jai Shri Ram
4 months ago | [YT] | 2
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Sunder Bhakti Dham
Jai Shri Ram 🙏
4 months ago | [YT] | 2
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Sunder Bhakti Dham
Jai Shri Radhe 🙏
4 months ago | [YT] | 1
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