Travelers मुसाफिर 🙏
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Few beautiful moments which one catch by me...
I hope these clips will also bring sweet smile on your lips...👍
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World Around Me Pratibha Patil.
√●●ज्ञान का देवता सरस्वती है। ज्ञान के लिये लोग इस देवता की उपासना किया करते हैं। सरस्वती शब्द स्त्रीलिंग है। इसलिये सरस्वती की उपासना ज्ञान की देवी (स्त्री) रूप में भी की जा रही है। अज्ञानी उपासक इसके स्वरूप को नहीं जानते। स् + असुन सरस् सरति इति जो चलता है वह सरस्/सर है। जल चलता है। प्रकाश (किरण) चलता है। वायु चलती है। सूर्य चलता है। पृथ्वी चलती है। मह चलते हैं। मन चलता है। आत्मा चलती है। शरीर चलता है। प्राण चलता है। संसार चलता है।
> इसलिये ये सब सरस् है।
सरस् + वतुप्= सरस्वत्।
इसका अर्थ है- उदकवान् (नदी), प्रकाशवान (सूर्य चन्द्रदि अह नक्षत्र), गतिवान् (प्राणी, वायु, मन यान)।
√ ★★सरस्वत् + ङीष् = सरस्वती ।स्त्रीलिंग होने से इसका अर्थ अपुरुषवाचक होना चाहिये। इसलिये =सरस्वती नदी, वाणी, पृथ्वी, प्रकाशरश्मि, सुनारी।
" वाग्वै सरस्वती ।"
( शतपथ ब्राह्मण ५|५|४| १६ |)
√◆सरन्ति सर्वा विद्याः येन तत् सरस् । सरस् युक्तः यः स सरस्वती सरस्वती = विद्वान् पुरुष विदुषी नारी वेद वाणी ऋषिवाक्य वास्तव में, सरस्वती का अर्थ है-सत्यवाक्। यह मेरे मस्तिष्क से उद्भूत हो, हाथों में उतरती और लेखनी के माध्यम से श्री महाराज जी तक पहुँचती है।
√●सरस्वती को वन्दना करने वाले इसके वास्तविक स्वरूप को समझे बिना इसकी वन्दना के लिये दूसरों को प्रेरित वा बाध्य करते हैं। इसलिये वे अपने प्रयत्न में सफल नहीं होते। इन बालबुद्धि जनों को मेरा नमस्कार सरस्वती स्वाहिनी (हंस पर आरूढ़ है, शुक्लाम्बरधरा (श्वेतवस्त्र धारण करने वाली है, जायान्धकारापहा (जड़ रूप अन्धकार को दूर करने वाली है, जगद्व्यापिनीम् (विश्व में सर्वत्र रहने वाली) है तथा वीणापुस्तकधारिणीम् (योगा एवं पुस्तक धारण करने वाली) है। वास्तविक अर्थ है-हंस सूर्य हन् हन्ति अन्धकारम् । जो अधिकार का नाश करे वह हंस है। शुक्ल= श्वेत, अम्ब = आकाश, शुक्लाम्बरधरा= श्वेत आकाश अर्थात् दिन में विद्यमान सूर्य रश्मि। यह रश्मि हंस (सूर्य) में विद्यमान है। अतः हंसवाहिनी= सूर्य में रहने वाली अग्नि यह अग्नि संसार में सर्वत्र पायी जाती है। इसलिये जगद्व्यापिनी है। अन्धकार जड़ प्रकृति है। प्रकाश से यह भाग जाता है। इसलिये ज्योतिर्मय अग्नि को जाड्यान्धकारापहा कहते हैं। वी (गतौ प्राप्तौ दीप्ती) वेति+ न →वीणा (दीप्तिमान गतिशील सुन्दर रश्मि) । पुष (पोषति पुष्यति पुष्णाति ) + क्त= पुस्त →पुस्तक= पोषण, विकास करने वाला गुण वीण पुस्तक धारिणी = पोषण एवं विकास के गुणधर्म वाली सुन्दर प्रकाश रश्मि।
√●प्रकाश रश्मियों की पर्याप्तता सम्पूर्णता अर्थात् जिसमें सब प्रकार की किरणें पूर्णता के साथ विद्यमान हों, वह कमल वा सूर्य है। अल् प्रत्याहार है। अल् सभी वर्ण/ अक्षर, नामाख्यात। अल् से अलम् शब्द सिद्ध होता है। अलम् = सबकी पराकाष्ठा। इस प्रकार, हंस = कमल = सूर्य । कमलासना = हंसवाहनी= सिंहवाहिनी । कमल में निवास करने वाली शक्ति लक्ष्मी लक्ष् लक्ष्यते देखना → लक्ष्मी जिससे देखा जाता है, अर्थात् प्रकाशरश्मि।
√●सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी ये तीनों समानार्थक एवं समानगुण धर्म वाले शब्द, देवता है सब का अर्थ प्रकाशमान अग्नि है। ये तीन नहीं एक देव हैं। सरस्वती दुर्गा = लक्ष्मी = ज्योति हंस = सिंह= कमल = सूर्य ज्योतिषे नमः | सूर्याय नमः ।
√●सरस्वती देवी सूर्य की बहन है। बहन का अर्थ है-सहोदरा, एक ही उदर से साथ-साथ उत्पन्न होने वाली। सरस्वती का वैदिक नाम अम्बिका है। अम्बिका सृष्टि उत्पादिका पालिका । अम्ब (गतौ अम्बति, गर्भधारणेसेवायाम् ज्ञानेशब्दे वा अम्बते)→
अम्बिका= सरस्वती। यह मन्त्र है...
"एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहा
एष ते रुद्र भागः आखुस्ते पशुः ॥"
(यजु. ३।५७)
√★ सू + अस् + ऋन् = स्वस् → स्वस्रा = बहन (किरण)। रुद्र = सूर्य / अग्नि । रुद्र एष ते भागः स्वस्रा अम्बिकया सह = हे रुद्र (शिव) | यह तेरा भाग (आहुति) है, तेरी बहन अम्बिका के साथ ।अग्नि = रूद्र। अम्बिका = प्रकाश ।अग्नि की ज्वाला = रुद्र ।ज्वाला का प्रकाश = अम्बिका। प्रज्जवलित यज्ञाग्नि में ज्वाला एवं प्रकाश दोनों होता है, दोनों साथ-साथ उत्पन्न होते हैं। इसलिये इन दोनों को भाई-बहन के रूप में चित्रित किया गया है। रुद्र = शिव। अम्बिका =पार्वती। शिव-पार्वती =भाई-बहन= उष्णता ज्योतिर्मयता । उष्ण पुरुष है, ज्योति स्त्री है। दोनों अभिन्न = साथ-साथ हैं। यह पुरुष-स्त्री की जोड़ी है। अग्नि में ज्योति, ज्योति में अग्नि (उष्णता / दाहकता) = पुरुष में स्त्री, स्त्री में पुरुष = रुद्र में अम्बिका अम्बिका में रुद्र। ऐसा जो जानता है, वह ज्ञानी (सारस्वत) है। उसे मेरा सहस्र नमस्कार !
√★तम् जुषस्व स्वाहा = उस (साम्बिकया रुद्र) का सेवन करो। यह सम्यक् =कथन सत्य घोषणा= स्वाहा है।
√★ रुद्र एषं ते भागः आखु ते पशुः= हे रुद्र । यह तेरी अहुति है, तेरे लिये मेरा समर्पण है। है रुद्र ! आखु तेरा पशु है। आखु (सम्यग् खुदा हुआ) = हवनकुण्ड, आकाश पशु आश्रय, शय्या रुद्र (सूर्य) का पशु (वाहन) आखु (चूहा है। सूर्य, महगण नक्षत्रगण का स्वामी होने से गणेश है। यह सतत आकाश में रहता है। अतः आकाश इसका वाहन / आश्रय / शय्या है। हवनकुण्ड अग्नि का आश्रय / वाहन है। अतएव आखु= चूहा / मूषक/ आकाश/ हवनकुण्ड ।
√★इस मन्त्र में, रुद्र सूर्य है, अम्बिका इसकी ज्योति है, आखु आकाश है, पशु इसका आश्रय (ठहरने का स्थान) है। पशु पर सवारी की जाती है। आकाश पशु पर सवार सूर्य अपनी सहोदरा रश्मि से दीप्तिमान होता रहता है। पृथ्वी पर यही सूर्य अग्नि नाम से यज्ञवेदी हवनकुण्ड के आखु पर आरूढ़ होकर अपनी ज्वाला के द्वारा आभायमान होता है। अम्बिका युक्त रुद्र को ही आहुति दी जाती है। अम्बिका विहीन रुद्र आहुति के अयोग्य होता है। केवल रुद्र को दी गई आहुति सर्वथा व्यर्थ जाती है। अम्बिका युक्त रुद्र = साम्बिकया रुद्र =प्रकाशमान सूर्य = ज्वालायुक्त अग्नि। वेद में अम्बिका को सुभद्रिका तथा काम्पीलवासिनी कहा गया है। मंत्र है...
"अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥"
(यजु. २३ । १८)
√★अम्बा = अम्बिका =अम्बालिका = दुर्गा = लक्ष्मी = सरस्वती = सूर्य रश्मि। एक ही शक्ति के तीन सम्बोधन हैं। क्योंकि विश्व त्रयम्बकम् है। त्रयम्बकम्= अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका=दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती।
√★अम्बे अम्बिके अम्बालिके= हे अम्बे (अन्धकार नाशिके रश्मि) । हे अम्बिके (उष्मा प्रदायिके ज्योति) हे अम्बालिके (आर्दता अवशोषिके, शुद्धिकारिके किरण) ।
√★मा ससस्ति, न नयति = नहीं प्राप्त कर पाता है, न ले जाता है। अर्थात् अपने अधिकार में नहीं ले सकता है, यशस्वी नहीं होता है।
√★कश्चन अश्वकः = कोई क्षुद्रपुरुष / कुत्सित मनुष्य।[ अश्व की लीद (विष्ठा) उठाने वाला, देख भाल करने वाला अश्वक कहलाता है ।]
√★सुभद्रिकाम् = अतिकल्याणकारी, सुन्दर एवं शुभप्रदा।
√★काम्पीलवासिनीम् = स्वर्ग (लोक) में निवास करने वाली पिल् क्षेपणे पेलयति-वे के सुखं कम्पील इति + स्वार्थे अण् = काम्पील = सुखद। सुख ऊपर स्वर्ग में है। वासिनी = रहने वाली। सूर्यरश्मियों का निवास ऊपर द्युलोक में है। इसलिये ये काम्पीलवासिनी कही जाती हैं। महाभारत में अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को काशिराज की कन्या कहा गया है। 【काशृ दीप्तौ काशते, काश्यते + राजृदीप्तौ राजति-ते →
काशिराज = महान् दीप्तिमान = सूर्य । 】इस प्रकार अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका सूर्य की तीन कन्याएँ (किरणें) हैं। एक ही किरण/ ज्योति के तीन गुण धर्म हैं- सात्विक, राजसिक, तामसिक सत् रज तम की प्रधानता से किरणें तीन प्रकार की हैं। सत् प्रधान रश्मि = अम्बा रज प्रधान रश्मि अम्बिका। तम प्रधान रश्मि = अम्बालिका। हवन कुण्ड में भी तीन प्रकार की ज्योतियाँ होती हैं।
√★१. निर्धूम अशब्द ज्योति = अम्बा।
√★२. सधूम अशब्द ज्योति = अम्बिका।
√★३. सधूम सशब्द ज्योति = अम्बालिका।
√★ यज्ञकुण्ड की ये क्रमशः सात्विक, राजसिक एवं तामस ज्वालाएँ हैं। तीन प्रकार प्रकाश हैं।
"त्रिनाके विदिवेदिवः।"
( ऋग्वेद ९।११३।९)
तीन धारण सामथ्यों से युक्त गृह हैं।
"त्रिधातवः परमा अस्य गावः।"
(ऋग्वेद५ । ४७।४ )
√★सत्व रजस् तमस् का बना ब्रह्माण्ड रूप यह देह है।
"यस्य त्रिघात्ववृतम् ।"
( ऋग्वेद ८ । १०२ । १४ ।)
√★प्रकृति के तीन गुणों का फल है-सुख, दुःख, मोह सतोगुण सुखदायक है। सुख ज्ञान है। सरस्वती इसकी देवी है। चतुर्थ भाव में इसका प्राधान्य है।
√★ रजोगुण रागात्मक है, इसलिये दुःखद है। यश प्रतिष्ठा दुःख है। लक्ष्मी इसकी देवी है। दशम भाव में इसका प्रभाव है।
√★ तमो गुण मोह में डालने वाला है। दुर्गा देवी इसका मूर्तरूप है। सप्तम भाव इससे मारक हो जाता है।
√★★भाव ४, भाव, भाव १० मिलकर भाव १ को प्रभावित करते हैं। अर्थात् शरीर वा शरीरभारी हर जीव सुख-दुःख एवं मोह से ग्रस्त है। इन तीनों भावों के अंकों का योग= ४+७+१०=२१।
"त्रिसप्त समिधः कृताः।"
(यजु ३१।१५)
【५ तन्मात्रा + ५ भूत + ५ ज्ञानेन्द्रिय+५ कर्मेन्द्रिय १ मन】
२१=२+१+३।
"आहस्ते त्रीणि दिव बन्धनानि ।"
(यजु. २९।१४)
√★सुख दुख और मोड़ के तीन बन्धन है। कोई सुखी कोई दुःखी, कोई मुग्ध मत है। इस निरात्मक संसार को मेरा नमस्कार ।
√★देव एक है और सत्य है। यह सर्वप्रथम है। इसलिये यह अग्नि है। इसके अनेक नाम हैं। यथा-रुद्र विष्णु शिव ब्रह्म सूर्य भव-। इसी प्रकार, देवी भी एक है। यह देव की पूरक सहयोगी प्रतिद्वन्द्वी विपक्षी साथी एवं अशत्रु है। इसके भी अनेक नाम है यथा- सरस्वती लक्ष्मी दुर्गा उपा अम्बा अम्बिका अम्बालिका श्री। यह देवी देव की बहन है।→
√★[ वह् → वहन (बहन) ढोने वाली] है। देव अग्नि (दाहकत्व) है। देवी किरण (प्रकाशिका) है। देवी के बिना देव शोभा नहीं पाता जिस अग्नि में ज्याला/ ज्योति नहीं है, वह दाहक होते हुए भी अशोभनीय / अपूज्य है। जिस सूर्य में किरण नहीं है, वह अदर्शनीय / अपूज्य है। ज्योति स्त्री/देवी है। अग्नि पुरुष / देव है। स्त्री के बिना पुरुष शोभा नहीं पाता सौम्यता के बिना कठोरता शोभा नहीं पाती देवी के बिना देव अपूज्य होता है-ज्योति के बिना अग्नि व्यर्थ है। इसलिये सगुण देव की उपासना अकेले नहीं उसकी अभिन्न शक्ति के साथ करनी चाहिये। निर्गुण बड़ा अकेले उपास्य है। राम अग्नि है, सीता उसकी ज्योति है। दोनों मिलकर सूर्यरूप ब्रह्म हैं और सदा उपास्य हैं। शिव अग्नि है, पार्वती उसकी ज्योति है। रुद्र अग्नि है. अम्बिका उसकी ज्योति है। विष्णु अग्नि है, लक्ष्मी उसकी ज्योति है। ब्रह्म अग्निमा जननी हैदर है, पुरी (सामना) है। इस ज्योति का अग्नि भर्ता (पति) है, पिता (जनक) है. भाई (सहोदर)है, पुत्र (आत्मज) है। इसलिये, उमामहेश्वराभ्यां नमः । सीतारामाभ्यां नमः | राधाकृष्णाभ्यां नमः। लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः। अग्निज्योतिभ्यां नमः ।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद् साभार copy pest
17 hours ago | [YT] | 3
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World Around Me Pratibha Patil.
ॐ नमः शिवाय 🕉️🪷🔱
1 week ago | [YT] | 10
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World Around Me Pratibha Patil.
ॐ ऎम ह्रिम क्लिम चामुंडाय्ये विच्चे 🕉️🔱🙏🏻
2 months ago | [YT] | 13
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World Around Me Pratibha Patil.
5 months ago | [YT] | 17
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World Around Me Pratibha Patil.
ॐ नमः शिवाय 🕉️🔱
5 months ago | [YT] | 14
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World Around Me Pratibha Patil.
ॐ नमः शिवाय 🔱🕉️🚩
5 months ago | [YT] | 26
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World Around Me Pratibha Patil.
नमो दैव्ये नमो नमः
5 months ago | [YT] | 74
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World Around Me Pratibha Patil.
ॐ नमः शिवाय... 🕉️🔱🚩
5 months ago | [YT] | 13
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World Around Me Pratibha Patil.
सावन का पहला दिन... 🕉️🔱🙏🏻
5 months ago | [YT] | 5
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World Around Me Pratibha Patil.
Har har Mahadev... 🔱🕉️
11 months ago | [YT] | 54
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