सिर ढकने को शास्त्र निषेध!! आजकल एक कुप्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते ही रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते हैं और कर्मकांड के लोग भी नहीं मना करते । जबकि पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है। शौच के समय ही सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।
*शास्त्र क्या कहते हैं ?* *उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी* *गलावृतः ।* *प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो* *निष्फलो जपः ॥* अर्थात् - पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'
*शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।* *अकृत्वा पादयोः* *शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||*
( *-कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)*
अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है)।
*सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषी*वाचमेद् बुधः।* - *कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक* *10अर्ध* ।
अर्थात्-- बुध्दिमान् व्यक्ति को जूता पहनें हुए,जल में स्थित होने पर,सिर पर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिए ।
🙏🚩 जय श्री राम 🚩🙏 आज प्रभु श्रीरामलला सरकार के दिव्य एवं अलौकिक दर्शन। मनमोहक पुष्प शृंगार, अद्भुत आभूषण और प्रभु की करुणामयी मुस्कान भक्तों के हृदय को आनंद से भर देती है। प्रभु श्रीराम की कृपा आप सभी पर बनी रहे और आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं सफलता का वास हो। "राम नाम से बड़ा कोई धन नहीं, राम कृपा से बड़ा कोई वरदान नहीं।" 🌺🙏 🚩 जय श्री राम | जय सियाराम | रामलला सरकार की जय 🚩 राम नाम संजीवनी ज्ञान सुधा सुख धाम रघुवर दया निधान को सुमरो आठों याम
भीष्म पितामह का अंतिम समय और भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति::
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर रक्त की धारा थम गई थी, किन्तु एक दिव्य दृश्य अभी शेष था। परम धर्मज्ञ, आजीवन ब्रह्मचारी, प्रतिज्ञा-पुरुष और भगवान के महान भक्त भीष्म पितामह अभी भी बाणों की शय्या पर विराजमान थे।
उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने दक्षिणायन में शरीर त्याग नहीं किया और उत्तरायण की प्रतीक्षा करने लगे। जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर तथा अनेक ऋषि-मुनियों के साथ भीष्म पितामह के दर्शन हेतु पहुँचे।
भगवान का भक्त के पास स्वयं आना::
यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक था।
जो भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, वे स्वयं अपने भक्त के अंतिम समय में उसके पास खड़े थे।
भागवत में वर्णन आता है कि भीष्म पितामह ने अपनी दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम स्वरूप पर स्थिर कर दी। उनके नेत्र प्रेम से भरे हुए थे। वे जानते थे कि अब यह शरीर छूटने वाला है, इसलिए वे अपने अन्तःकरण को केवल कृष्ण में लीन कर देना चाहते थे।
"मेरी यह बुद्धि समस्त सांसारिक तृष्णाओं से रहित होकर उस सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण में सदा-सदा के लिए स्थिर हो जाए, जो अपनी इच्छा से मानव रूप धारण कर लीला करते हैं।"
भीष्म का कृष्ण-प्रेम::
भीष्म पितामह को युद्ध का एक अद्भुत प्रसंग स्मरण आया।
जब अर्जुन की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तक तोड़ने का निश्चय कर लिया था और रथ का पहिया उठाकर उनकी ओर दौड़े थे।
"मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण अपनी स्वयं की प्रतिज्ञा छोड़कर रथ से कूद पड़े थे। उनका उत्तरीय वस्त्र कंधे से गिर रहा था और वे हाथ में रथ का पहिया लेकर मेरी ओर ऐसे दौड़े जैसे सिंह हाथी पर झपटता है।"
भीष्म के लिए यह युद्ध का दृश्य नहीं था; यह भगवान के प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण था।
अंतिम उपदेश::
भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को धर्म, राजनीति, राज्य संचालन, न्याय, दान, मोक्ष और राजधर्म का विस्तृत उपदेश दिया।
महाभारत का विशाल शान्ति पर्व और अनुशासन पर्व इन्हीं उपदेशों का अमूल्य खजाना है।
भीष्म ने कहा—
धर्मो रक्षति रक्षितः।
"जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।"
उन्होंने समझाया कि राजा का वास्तविक बल शस्त्र नहीं, धर्म है।
अंतिम दर्शन::
जब उपदेश पूर्ण हो गया और उत्तरायण का शुभ समय आ गया, तब भीष्म पितामह ने अपनी समस्त इन्द्रियों को भीतर समेट लिया।
उनकी दृष्टि केवल भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द पर टिकी हुई थी।
भागवत में वर्णन है—
स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतां कलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम्।
"हे देवताओं के देव भगवान! जब तक मैं यह शरीर नहीं त्याग देता, तब तक आप मेरे सम्मुख विराजमान रहें।"
भगवान मुस्कुरा रहे थे। भक्त और भगवान के बीच मौन संवाद चल रहा था।
भीष्म का महाप्रयाण::
अब समय आ गया था।
भीष्म पितामह ने अपने मन, बुद्धि और प्राण को श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया।
भक्त्या आवेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन्।
उन्होंने श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए प्राणों का उत्सर्ग किया।
उस समय आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी, देवताओं ने दुन्दुभियाँ बजाईं और ऋषि-मुनियों ने उनकी महिमा का गान किया।
भीष्म पितामह का जीवन हमें सिखाता है कि—
धर्म के लिए कठिनतम परिस्थितियों में भी अडिग रहना चाहिए।
भगवान का स्मरण जीवन भर करते रहने से अन्तकाल में वही स्मरण सहज हो जाता है।
मृत्यु भक्त के लिए भय का विषय नहीं, बल्कि भगवान से मिलने का उत्सव बन जाती है।
भगवान अपने सच्चे भक्त को कभी नहीं छोड़ते; उसके अंतिम क्षणों में भी उसके साथ रहते हैं।
अंततः बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने जिस कृष्ण का दर्शन किया, वही उनकी अंतिम दृष्टि बने, वही उनका ध्यान बने और वही उनका परम गंतव्य बने।
"सर्वात्मना भगवान् श्रीकृष्ण में चित्त को स्थिर करके भीष्म पितामह ने शरीर त्याग किया और परम शान्ति को प्राप्त हुए।"
यह केवल एक महायोद्धा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक महान भक्त का अपने आराध्य के चरणों में दिव्य मिलन था। ॥॥🙏 जय श्री कृष्ण 🙏॥॥
सनातन तंत्र परंपरा में योनितत्त्व को केवल भौतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार शिव चेतना के प्रतीक हैं, उसी प्रकार शक्ति सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की आधारशिला हैं। शिव और शक्ति के इस दिव्य मिलन से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन होता है।
असम स्थित माँ कामाख्या शक्तिपीठ को मंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहाँ माता सती का योनिभाग गिरा था, इसलिए यह स्थान सृजनशक्ति, मातृत्व, ऊर्जा और दिव्य चेतना का प्रतीक माना जाता है। संसार के करोड़ों साधक माँ कामाख्या को आदिशक्ति, कुण्डलिनी और समस्त शक्तियों के मूल स्रोत के रूप में पूजते हैं।
शास्त्रों में स्त्री को केवल शरीर नहीं, बल्कि ब्रह्मी, वैष्णवी और रौद्री शक्तियों का जीवंत स्वरूप माना गया है। प्रत्येक स्त्री में ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति का दिव्य त्रिकोण विद्यमान है। यही कारण है कि तंत्र परंपरा में नारी को आदर, सम्मान और शक्ति के रूप में देखा जाता है।
माँ कामाख्या की उपासना साधक को आत्मशक्ति, आत्मविश्वास, आध्यात्मिक उन्नति और कुण्डलिनी जागरण के मार्ग पर अग्रसर करती है। तांत्रिक परंपरा के अनुसार शक्ति की आराधना से साधक के भीतर छिपी चेतना जागृत होती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं।
माँ कामाख्या हमें यह संदेश देती हैं कि सृष्टि की प्रत्येक शक्ति का सम्मान करें, नारी को आदिशक्ति के रूप में देखें और अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना को पहचानें। जब शक्ति प्रसन्न होती हैं, तब ज्ञान, समृद्धि, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार स्वतः खुल जाते हैं।
यह लीला केवल भगवान के भोजन करने की कथा नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भगवान को वैभव, धन और राजसी भोग नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम प्रिय है।
जब महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे, तब दुर्योधन ने उनके स्वागत के लिए भव्य महलों, राजसी भोज और असीम ऐश्वर्य की व्यवस्था की। किन्तु भगवान जानते थे कि दुर्योधन के हृदय में प्रेम नहीं, अहंकार और स्वार्थ है।
दूसरी ओर महात्मा विदुर का घर था—न कोई वैभव, न राजसी व्यवस्था, केवल निर्मल भक्ति और भगवान के प्रति निष्काम प्रेम।
दुर्योधन का निमंत्रण::
जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया, तब भगवान ने उसे अस्वीकार कर दिया।
महाभारत में भगवान कहते हैं—
"नाहं कामान्न संरोधान्न द्वेषान्नार्थकारणात्। भुञ्जे भोजनमद्य त्वं न च मे त्वयि सौहृदम्॥"
"मैं न किसी लोभ से, न भय से और न किसी स्वार्थ से भोजन ग्रहण करता हूँ। जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ मैं भोजन स्वीकार नहीं करता।"
भगवान ने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम के बिना दिया गया भोज केवल भोजन है, प्रसाद नहीं।
विदुरजी के घर आगमन::
दुर्योधन के महल को छोड़कर भगवान सीधे विदुरजी के घर पहुँचे।
उस समय विदुरजी घर पर नहीं थे। विदुर-पत्नी (जिन्हें अनेक ग्रंथों में विदुराणी कहा गया है) भगवान को अपने द्वार पर देखकर प्रेम-विह्वल हो गईं।
उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि स्वयं द्वारकाधीश उनके छोटे से घर में पधारेंगे।
भागवत का सिद्धांत है—
"अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।"
— श्रीमद्भागवतम्
"मैं अपने भक्तों के प्रेम के अधीन रहता हूँ।"
प्रेम में विस्मृत विदुराणी::
कथा प्रसिद्ध है कि विदुराणी भगवान को देखकर इतनी प्रेममग्न हो गईं कि केले छील-छीलकर भगवान को खिलाने लगीं, पर प्रेमावेश में फल फेंक देतीं और छिलके भगवान को खिला देतीं।
श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्द से वे छिलके खाते रहे।
जब विदुरजी लौटे तो यह दृश्य देखकर चकित रह गए।
उन्होंने कहा—
"देवि! आप क्या कर रही हैं? फल फेंक रही हैं और छिलके प्रभु को खिला रही हैं!"
तब विदुराणी को होश आया और वे अत्यन्त लज्जित हुईं।
किन्तु भगवान मुस्कुराकर बोले—
"विदुर! आज जो स्वाद इन छिलकों में मिला है, वह स्वर्ग के अमृत में भी नहीं।"
यह घटना इस सत्य को प्रकट करती है—
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥"
— भगवद्गीता
"जो भक्त प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे प्रेम सहित स्वीकार करता हूँ।"
विदुरजी का साग::
एक अन्य प्रसिद्ध परम्परा के अनुसार विदुरजी के घर अत्यन्त साधारण साग और मोटा भोजन था।
न घी, न मिष्ठान्न, न राजभोग।
भगवान ने उसी साग को बड़े प्रेम से ग्रहण किया।
इसीलिए लोक में कहा जाता है—
"दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग विदुर घर खायो।"
अर्थात भगवान ने दुर्योधन के राजसी व्यंजन छोड़कर विदुर के घर का साधारण साग स्वीकार किया।
भगवान वस्तु नहीं देखते, भाव देखते हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं—
"रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेहु जो जाननिहारा॥"
अर्थात भगवान को केवल प्रेम प्रिय है।
जिस हृदय में प्रेम है, वहाँ भगवान स्वयं चले आते हैं।
विदुर के पास धन नहीं था, किन्तु भक्ति थी।
दुर्योधन के पास सम्पूर्ण वैभव था, किन्तु प्रेम नहीं था।
इसलिए भगवान ने महलों को छोड़कर भक्त के झोपड़े को चुना।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥"
"मैं सबमें समान हूँ, किन्तु जो मुझे प्रेम और भक्ति से भजते हैं, मैं उनके हृदय में निवास करता हूँ और वे मेरे हृदय में।"
इस प्रकार विदुर-गृह की यह लीला युगों-युगों से यह संदेश देती है कि भगवान को स्वर्ण के महल नहीं, प्रेम से भरा हृदय चाहिए। जहाँ निष्काम प्रेम है, वहीं वृन्दावन है, वहीं द्वारका है, और वहीं स्वयं श्रीकृष्ण का निवास है। ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
भारत के महान चिकित्सक और सर्जरी के जनक महर्षि सुश्रुत को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में सम्मानित किया गया है। 19 जून 2026 को उनकी कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया, जो चिकित्सा विज्ञान में भारत के 2600 वर्ष पुराने योगदान की वैश्विक मान्यता का प्रतीक है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी कृति सुश्रुत संहिता के माध्यम से शल्य चिकित्सा, चिकित्सा नैतिकता और सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत ज्ञान दुनिया को दिया था।
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बहुत समय पहले हिमालय की एक पवित्र गुफा में अनेक ऋषि-मुनि कठोर तपस्या कर रहे थे। तभी एक मायावी असुर ने अपने अहंकार और छल से पूरे क्षेत्र में भय और अशांति फैला दी। यज्ञ भंग होने लगे, साधकों का मन विचलित हो गया और चारों ओर अज्ञान का अंधकार छा गया। तब सभी देवताओं और ऋषियों ने आदिशक्ति की आराधना की। उनकी प्रार्थना से मां काली प्रकट हुईं, किंतु इस बार उनका स्वरूप सामान्य उग्र काली जैसा नहीं था। उनका दिव्य शरीर चंद्रमा के समान श्वेत था, वस्त्र और आभूषण भी उज्ज्वल प्रकाश से दमक रहे थे। उनके मुख पर अपार करुणा, नेत्रों में ज्ञान का तेज और मुस्कान में असीम शांति थी। यह था मां श्वेत काली का दिव्य स्वरूप। मां ने अपने तेज से असुर के हृदय में भरे अहंकार और अज्ञान का नाश कर दिया। बिना भीषण युद्ध के ही उसका क्रोध शांत हो गया और उसने माता के चरणों में समर्पण कर दिया। उस क्षण समस्त वातावरण दिव्य प्रकाश से भर उठा। ऋषियों की तपस्या पुनः आरंभ हुई और पृथ्वी पर शांति लौट आई। मां श्वेत काली का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति केवल विनाश में नहीं, बल्कि करुणा, ज्ञान, क्षमा और आत्मिक जागरण में भी निहित है। जो भक्त सच्चे मन से मां श्वेत काली का स्मरण करता है, उसके जीवन से भय, अज्ञान और नकारात्मकता दूर होकर शांति, विवेक और आध्यात्मिक प्रकाश का उदय होता है। #pkaatmagyan#viralpost #reels#maakali#god#short#video@Swamipremchandradasji@santshreepremchandradas8261 www.facebook.com/share/1HPtpVouGX/
मोहिनी अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। यह अवतार विशेष रूप से देवताओं की रक्षा तथा धर्म की स्थापना के लिए धारण किया गया था। इसका वर्णन मुख्यतः श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण तथा महाभारत में मिलता है।
समुद्र-मंथन और मोहिनी अवतार::
जब देवता और दैत्य मिलकर क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ अमृत-कलश भी प्रकट हुआ। अमृत को देखकर दैत्यों ने उसे बलपूर्वक छीन लिया। देवताओं को भय हुआ कि यदि दैत्य अमृत पी लेंगे तो अधर्म की शक्ति बढ़ जाएगी।
तब भगवान विष्णु ने अद्भुत रूप से एक अनुपम सुन्दरी का रूप धारण किया, जिसे मोहिनी कहा गया।
भागवत में भगवान के मोहिनी रूप का वर्णन इस प्रकार है—
अयाची मिश्र सुपुत्र साक्षात महादेव मंदिर निर्माण कार्य चल रहा हैं आप सभी श्रद्धालु भक्त जन से निवेदन हैं कि इस पुण्य कार्य में आप अपना आर्थिक सहयोग करें 9771364352
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सिर ढकने को शास्त्र निषेध!!
आजकल एक कुप्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते ही रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते हैं और कर्मकांड के लोग भी नहीं मना करते । जबकि पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता है। शौच के समय ही सिर ढकने को कहा गया है। प्रणाम करते समय,जप व देव पूजा में सिर खुला रखें तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा।
*शास्त्र क्या कहते हैं ?*
*उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी* *गलावृतः ।*
*प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो* *निष्फलो जपः ॥*
अर्थात् -
पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'
*शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।*
*अकृत्वा पादयोः* *शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||*
( *-कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)*
अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है)।
*सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषी*वाचमेद् बुधः।*
- *कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक* *10अर्ध* ।
अर्थात्-- बुध्दिमान् व्यक्ति को जूता पहनें हुए,जल में स्थित होने पर,सिर पर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिए ।
*शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैव* *प्रशस्यते। -(कर्मठगुरूः)*
अर्थात्-- वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान नहीं करना चाहिए ।
*उष्णीशी कञ्चुकी नग्नो* *मुक्तकेशो गणावृत।*
*अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत्* *क्वचित् ॥-*
( *शब्द कल्पद्रुम* )
अर्थात्-- सिर ढककर,सिला वस्त्र धारण कर,बिना कच्छ के,शिखा खुलीं होने पर ,गले के वस्त्र लपेटकर ।
अपवित्र हाथों से,अपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।।
*न जल्पंश्च न* *प्रावृतशिरास्तथा।-योगी* *याज्ञवल्क्य*
अर्थात्-- न वार्ता करते हुए और न सिर ढककर।
*अपवित्रकरो नग्नः शिरसि* *प्रावृतोऽपि वा ।*
*प्रलपन् प्रजपेद्यावत्तावत्* *निष्फलमुच्यते ।।* ( *रामार्च्चनचन्द्रिकायाम्* )
अर्थात्-- अपवित्र हाथों से,बिना कच्छ के,सिर ढककर जपादि कर्म जैसे किये जाते हैं, वैसे ही निष्फल होते जाते हैं ।
शिव महापुराण उमा खण्ड अ.14-- सिर पर पगड़ी रखकर,कुर्ता पहनकर ,नंगा होकर,बाल खोलकर , गले के कपड़ा लपेटकर,अशुद्ध हाथ लेकर,सम्पूर्ण शरीर से अशुद्ध रहकर और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए ।। #pkaatmagyan #ram #Santshreepremchandradasji
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🙏🚩 जय श्री राम 🚩🙏
आज प्रभु श्रीरामलला सरकार के दिव्य एवं अलौकिक दर्शन। मनमोहक पुष्प शृंगार, अद्भुत आभूषण और प्रभु की करुणामयी मुस्कान भक्तों के हृदय को आनंद से भर देती है। प्रभु श्रीराम की कृपा आप सभी पर बनी रहे और आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं सफलता का वास हो।
"राम नाम से बड़ा कोई धन नहीं, राम कृपा से बड़ा कोई वरदान नहीं।" 🌺🙏
🚩 जय श्री राम | जय सियाराम | रामलला सरकार की जय 🚩
राम नाम संजीवनी ज्ञान सुधा सुख धाम
रघुवर दया निधान को सुमरो आठों याम
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🙏🙏
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रामनाम सदा पुण्यं नित्यं पठति यो नरः ।
अपुत्रो लभते पुत्रं सर्वकामफलप्रदम् ॥'
जो व्यक्ति श्रीराम का नाम नित्य रूप से पढ़ता है, उसे पुत्र की प्राप्ति होती है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं सभी प्रकार का फल मिलता हैं जो राम नाम देगा वह कोई नहीं दे सकता हैं #अयोध्या #राम #रामनाम #rammandir #ramayana #hanumanji #fbyシvideo #मंदिर #siyaram #viralpost #viralreelsシ #viralreels #viral
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भीष्म पितामह का अंतिम समय और भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति::
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की भूमि पर रक्त की धारा थम गई थी, किन्तु एक दिव्य दृश्य अभी शेष था। परम धर्मज्ञ, आजीवन ब्रह्मचारी, प्रतिज्ञा-पुरुष और भगवान के महान भक्त भीष्म पितामह अभी भी बाणों की शय्या पर विराजमान थे।
उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उन्होंने दक्षिणायन में शरीर त्याग नहीं किया और उत्तरायण की प्रतीक्षा करने लगे। जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर तथा अनेक ऋषि-मुनियों के साथ भीष्म पितामह के दर्शन हेतु पहुँचे।
भगवान का भक्त के पास स्वयं आना::
यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक था।
जो भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, वे स्वयं अपने भक्त के अंतिम समय में उसके पास खड़े थे।
भागवत में वर्णन आता है कि भीष्म पितामह ने अपनी दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण के सुंदर श्याम स्वरूप पर स्थिर कर दी। उनके नेत्र प्रेम से भरे हुए थे। वे जानते थे कि अब यह शरीर छूटने वाला है, इसलिए वे अपने अन्तःकरण को केवल कृष्ण में लीन कर देना चाहते थे।
उन्होंने भगवान की स्तुति करते हुए कहा—
इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि।
स्वसुखमुपगते क्वचिद्विहर्तुं प्रकृतिमुपेयुषि यद्भवप्रवाहः॥
"मेरी यह बुद्धि समस्त सांसारिक तृष्णाओं से रहित होकर उस सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण में सदा-सदा के लिए स्थिर हो जाए, जो अपनी इच्छा से मानव रूप धारण कर लीला करते हैं।"
भीष्म का कृष्ण-प्रेम::
भीष्म पितामह को युद्ध का एक अद्भुत प्रसंग स्मरण आया।
जब अर्जुन की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तक तोड़ने का निश्चय कर लिया था और रथ का पहिया उठाकर उनकी ओर दौड़े थे।
उस प्रेममयी स्मृति में भीष्म ने कहा—
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञाम् ऋतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुः हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः॥
"मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण अपनी स्वयं की प्रतिज्ञा छोड़कर रथ से कूद पड़े थे। उनका उत्तरीय वस्त्र कंधे से गिर रहा था और वे हाथ में रथ का पहिया लेकर मेरी ओर ऐसे दौड़े जैसे सिंह हाथी पर झपटता है।"
भीष्म के लिए यह युद्ध का दृश्य नहीं था; यह भगवान के प्रेम का सर्वोच्च प्रमाण था।
अंतिम उपदेश::
भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को धर्म, राजनीति, राज्य संचालन, न्याय, दान, मोक्ष और राजधर्म का विस्तृत उपदेश दिया।
महाभारत का विशाल शान्ति पर्व और अनुशासन पर्व इन्हीं उपदेशों का अमूल्य खजाना है।
भीष्म ने कहा—
धर्मो रक्षति रक्षितः।
"जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।"
उन्होंने समझाया कि राजा का वास्तविक बल शस्त्र नहीं, धर्म है।
अंतिम दर्शन::
जब उपदेश पूर्ण हो गया और उत्तरायण का शुभ समय आ गया, तब भीष्म पितामह ने अपनी समस्त इन्द्रियों को भीतर समेट लिया।
उनकी दृष्टि केवल भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द पर टिकी हुई थी।
भागवत में वर्णन है—
स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतां कलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम्।
"हे देवताओं के देव भगवान! जब तक मैं यह शरीर नहीं त्याग देता, तब तक आप मेरे सम्मुख विराजमान रहें।"
भगवान मुस्कुरा रहे थे। भक्त और भगवान के बीच मौन संवाद चल रहा था।
भीष्म का महाप्रयाण::
अब समय आ गया था।
भीष्म पितामह ने अपने मन, बुद्धि और प्राण को श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया।
भक्त्या आवेश्य मनो यस्मिन् वाचा यन्नाम कीर्तयन्।
उन्होंने श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुए प्राणों का उत्सर्ग किया।
उस समय आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी, देवताओं ने दुन्दुभियाँ बजाईं और ऋषि-मुनियों ने उनकी महिमा का गान किया।
भीष्म पितामह का जीवन हमें सिखाता है कि—
धर्म के लिए कठिनतम परिस्थितियों में भी अडिग रहना चाहिए।
भगवान का स्मरण जीवन भर करते रहने से अन्तकाल में वही स्मरण सहज हो जाता है।
मृत्यु भक्त के लिए भय का विषय नहीं, बल्कि भगवान से मिलने का उत्सव बन जाती है।
भगवान अपने सच्चे भक्त को कभी नहीं छोड़ते; उसके अंतिम क्षणों में भी उसके साथ रहते हैं।
अंततः बाणों की शय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने जिस कृष्ण का दर्शन किया, वही उनकी अंतिम दृष्टि बने, वही उनका ध्यान बने और वही उनका परम गंतव्य बने।
"सर्वात्मना भगवान् श्रीकृष्ण में चित्त को स्थिर करके भीष्म पितामह ने शरीर त्याग किया और परम शान्ति को प्राप्त हुए।"
यह केवल एक महायोद्धा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक महान भक्त का अपने आराध्य के चरणों में दिव्य मिलन था।
॥॥🙏 जय श्री कृष्ण 🙏॥॥
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🌺 माँ कामाख्या और योनितत्त्व का दिव्य रहस्य 🌺
सनातन तंत्र परंपरा में योनितत्त्व को केवल भौतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार शिव चेतना के प्रतीक हैं, उसी प्रकार शक्ति सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की आधारशिला हैं। शिव और शक्ति के इस दिव्य मिलन से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन होता है।
असम स्थित माँ कामाख्या शक्तिपीठ को मंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहाँ माता सती का योनिभाग गिरा था, इसलिए यह स्थान सृजनशक्ति, मातृत्व, ऊर्जा और दिव्य चेतना का प्रतीक माना जाता है। संसार के करोड़ों साधक माँ कामाख्या को आदिशक्ति, कुण्डलिनी और समस्त शक्तियों के मूल स्रोत के रूप में पूजते हैं।
शास्त्रों में स्त्री को केवल शरीर नहीं, बल्कि ब्रह्मी, वैष्णवी और रौद्री शक्तियों का जीवंत स्वरूप माना गया है। प्रत्येक स्त्री में ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति का दिव्य त्रिकोण विद्यमान है। यही कारण है कि तंत्र परंपरा में नारी को आदर, सम्मान और शक्ति के रूप में देखा जाता है।
माँ कामाख्या की उपासना साधक को आत्मशक्ति, आत्मविश्वास, आध्यात्मिक उन्नति और कुण्डलिनी जागरण के मार्ग पर अग्रसर करती है। तांत्रिक परंपरा के अनुसार शक्ति की आराधना से साधक के भीतर छिपी चेतना जागृत होती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं।
माँ कामाख्या हमें यह संदेश देती हैं कि सृष्टि की प्रत्येक शक्ति का सम्मान करें, नारी को आदिशक्ति के रूप में देखें और अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना को पहचानें। जब शक्ति प्रसन्न होती हैं, तब ज्ञान, समृद्धि, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार स्वतः खुल जाते हैं।
माँ कामाख्या स्तोत्र
नमस्ते कामरूपायै कामाक्ष्यै वरदायिनि। विश्वमाते महादेवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते॥
कामाख्ये कामसंपन्ने कामरूपनिवासिनि। सर्वकामप्रदे देवि नमस्ते परमेश्वरि॥
जगत्सृष्टिस्थितिध्वंसकारिण्यै ते नमो नमः। आदिशक्त्यै महादेव्यै कामाख्यायै नमो नमः॥
भक्तानामभयं दात्री दुःखदारिद्र्यनाशिनि। सर्वसौभाग्यदायिन्यै कामाख्यायै नमो नमः॥
कामरूपे महापीठे सर्वसिद्धिप्रदायिनि। त्रैलोक्यजननी देवि कामाख्ये त्वां नमाम्यहम्॥
विद्यां देहि यशो देहि लक्ष्मीं देहि शुभप्रदे। पुत्रान् देहि धनं देहि कामाख्ये परमेश्वरि॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। तां कामाख्यां नमस्यामि भक्तानुग्रहकारिणीम्॥
कामाख्ये कामदायिन्यै नमो देवि नमो नमः। सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये त्वमेव शरणं मम॥
फलश्रुति
इदं स्तोत्रं पठेन्नित्यं भक्तिभावसमन्वितः। तस्य सिद्धिर्भवेद् शीघ्रं कामाख्या प्रसदाৎ ध्रुवम्॥
जय माँ कामाख्या॥ 🌺॥ आदेश ॥🌺
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श्रीकृष्ण का विदुर-गृह आगमन और भोजन लीला::
यह लीला केवल भगवान के भोजन करने की कथा नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भगवान को वैभव, धन और राजसी भोग नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम प्रिय है।
जब महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे, तब दुर्योधन ने उनके स्वागत के लिए भव्य महलों, राजसी भोज और असीम ऐश्वर्य की व्यवस्था की। किन्तु भगवान जानते थे कि दुर्योधन के हृदय में प्रेम नहीं, अहंकार और स्वार्थ है।
दूसरी ओर महात्मा विदुर का घर था—न कोई वैभव, न राजसी व्यवस्था, केवल निर्मल भक्ति और भगवान के प्रति निष्काम प्रेम।
दुर्योधन का निमंत्रण::
जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया, तब भगवान ने उसे अस्वीकार कर दिया।
महाभारत में भगवान कहते हैं—
"नाहं कामान्न संरोधान्न द्वेषान्नार्थकारणात्। भुञ्जे भोजनमद्य त्वं न च मे त्वयि सौहृदम्॥"
"मैं न किसी लोभ से, न भय से और न किसी स्वार्थ से भोजन ग्रहण करता हूँ। जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ मैं भोजन स्वीकार नहीं करता।"
भगवान ने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम के बिना दिया गया भोज केवल भोजन है, प्रसाद नहीं।
विदुरजी के घर आगमन::
दुर्योधन के महल को छोड़कर भगवान सीधे विदुरजी के घर पहुँचे।
उस समय विदुरजी घर पर नहीं थे। विदुर-पत्नी (जिन्हें अनेक ग्रंथों में विदुराणी कहा गया है) भगवान को अपने द्वार पर देखकर प्रेम-विह्वल हो गईं।
उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि स्वयं द्वारकाधीश उनके छोटे से घर में पधारेंगे।
भागवत का सिद्धांत है—
"अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।"
— श्रीमद्भागवतम्
"मैं अपने भक्तों के प्रेम के अधीन रहता हूँ।"
प्रेम में विस्मृत विदुराणी::
कथा प्रसिद्ध है कि विदुराणी भगवान को देखकर इतनी प्रेममग्न हो गईं कि केले छील-छीलकर भगवान को खिलाने लगीं, पर प्रेमावेश में फल फेंक देतीं और छिलके भगवान को खिला देतीं।
श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्द से वे छिलके खाते रहे।
जब विदुरजी लौटे तो यह दृश्य देखकर चकित रह गए।
उन्होंने कहा—
"देवि! आप क्या कर रही हैं? फल फेंक रही हैं और छिलके प्रभु को खिला रही हैं!"
तब विदुराणी को होश आया और वे अत्यन्त लज्जित हुईं।
किन्तु भगवान मुस्कुराकर बोले—
"विदुर! आज जो स्वाद इन छिलकों में मिला है, वह स्वर्ग के अमृत में भी नहीं।"
यह घटना इस सत्य को प्रकट करती है—
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥"
— भगवद्गीता
"जो भक्त प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे प्रेम सहित स्वीकार करता हूँ।"
विदुरजी का साग::
एक अन्य प्रसिद्ध परम्परा के अनुसार विदुरजी के घर अत्यन्त साधारण साग और मोटा भोजन था।
न घी, न मिष्ठान्न, न राजभोग।
भगवान ने उसी साग को बड़े प्रेम से ग्रहण किया।
इसीलिए लोक में कहा जाता है—
"दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग विदुर घर खायो।"
अर्थात भगवान ने दुर्योधन के राजसी व्यंजन छोड़कर विदुर के घर का साधारण साग स्वीकार किया।
भगवान वस्तु नहीं देखते, भाव देखते हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं—
"रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेहु जो जाननिहारा॥"
अर्थात भगवान को केवल प्रेम प्रिय है।
जिस हृदय में प्रेम है, वहाँ भगवान स्वयं चले आते हैं।
विदुर के पास धन नहीं था, किन्तु भक्ति थी।
दुर्योधन के पास सम्पूर्ण वैभव था, किन्तु प्रेम नहीं था।
इसलिए भगवान ने महलों को छोड़कर भक्त के झोपड़े को चुना।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥"
"मैं सबमें समान हूँ, किन्तु जो मुझे प्रेम और भक्ति से भजते हैं, मैं उनके हृदय में निवास करता हूँ और वे मेरे हृदय में।"
इस प्रकार विदुर-गृह की यह लीला युगों-युगों से यह संदेश देती है कि भगवान को स्वर्ण के महल नहीं, प्रेम से भरा हृदय चाहिए। जहाँ निष्काम प्रेम है, वहीं वृन्दावन है, वहीं द्वारका है, और वहीं स्वयं श्रीकृष्ण का निवास है।
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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भारत के महान चिकित्सक और सर्जरी के जनक महर्षि सुश्रुत को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में सम्मानित किया गया है। 19 जून 2026 को उनकी कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया, जो चिकित्सा विज्ञान में भारत के 2600 वर्ष पुराने योगदान की वैश्विक मान्यता का प्रतीक है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी कृति सुश्रुत संहिता के माध्यम से शल्य चिकित्सा, चिकित्सा नैतिकता और सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत ज्ञान दुनिया को दिया था।
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बहुत समय पहले हिमालय की एक पवित्र गुफा में अनेक ऋषि-मुनि कठोर तपस्या कर रहे थे। तभी एक मायावी असुर ने अपने अहंकार और छल से पूरे क्षेत्र में भय और अशांति फैला दी। यज्ञ भंग होने लगे, साधकों का मन विचलित हो गया और चारों ओर अज्ञान का अंधकार छा गया।
तब सभी देवताओं और ऋषियों ने आदिशक्ति की आराधना की। उनकी प्रार्थना से मां काली प्रकट हुईं, किंतु इस बार उनका स्वरूप सामान्य उग्र काली जैसा नहीं था। उनका दिव्य शरीर चंद्रमा के समान श्वेत था, वस्त्र और आभूषण भी उज्ज्वल प्रकाश से दमक रहे थे। उनके मुख पर अपार करुणा, नेत्रों में ज्ञान का तेज और मुस्कान में असीम शांति थी। यह था मां श्वेत काली का दिव्य स्वरूप।
मां ने अपने तेज से असुर के हृदय में भरे अहंकार और अज्ञान का नाश कर दिया। बिना भीषण युद्ध के ही उसका क्रोध शांत हो गया और उसने माता के चरणों में समर्पण कर दिया। उस क्षण समस्त वातावरण दिव्य प्रकाश से भर उठा। ऋषियों की तपस्या पुनः आरंभ हुई और पृथ्वी पर शांति लौट आई।
मां श्वेत काली का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि सच्ची शक्ति केवल विनाश में नहीं, बल्कि करुणा, ज्ञान, क्षमा और आत्मिक जागरण में भी निहित है। जो भक्त सच्चे मन से मां श्वेत काली का स्मरण करता है, उसके जीवन से भय, अज्ञान और नकारात्मकता दूर होकर शांति, विवेक और आध्यात्मिक प्रकाश का उदय होता है। #pkaatmagyan #viralpost
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भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार::
मोहिनी अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक है। यह अवतार विशेष रूप से देवताओं की रक्षा तथा धर्म की स्थापना के लिए धारण किया गया था। इसका वर्णन मुख्यतः श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण तथा महाभारत में मिलता है।
समुद्र-मंथन और मोहिनी अवतार::
जब देवता और दैत्य मिलकर क्षीरसागर का मंथन कर रहे थे, तब अनेक दिव्य रत्नों के साथ अमृत-कलश भी प्रकट हुआ। अमृत को देखकर दैत्यों ने उसे बलपूर्वक छीन लिया। देवताओं को भय हुआ कि यदि दैत्य अमृत पी लेंगे तो अधर्म की शक्ति बढ़ जाएगी।
तब भगवान विष्णु ने अद्भुत रूप से एक अनुपम सुन्दरी का रूप धारण किया, जिसे मोहिनी कहा गया।
भागवत में भगवान के मोहिनी रूप का वर्णन इस प्रकार है—
ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियम्
विचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे।
विक्रीडतीं कन्दुकलीलयालसद्-
दुकूलपर्यस्तनितम्बमेखलाम्॥
दैत्यों ने एक ऐसे उपवन में अत्यन्त सुन्दर स्त्री को देखा जो गेंद से खेल रही थी और जिसकी अनुपम शोभा सभी को मोहित कर रही थी।
दैत्यों का मोह:;
मोहिनी के रूप-माधुर्य को देखकर सभी दैत्य मोहित हो गए। उन्होंने अमृत-कलश स्वयं मोहिनी को सौंप दिया और निवेदन किया कि वह न्यायपूर्वक अमृत का वितरण करे।
तब मोहिनी ने कहा—
कथं कश्चिन्न विश्वासं
स्त्रीषु कुर्यात् कथञ्चन।
कोई बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों पर शीघ्र विश्वास नहीं करता।
किन्तु दैत्य उसके रूप-माधुर्य में इतने मोहित थे कि उन्होंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
देवताओं को अमृत प्रदान::
भगवान मोहिनी ने देवताओं और दैत्यों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया और अपनी योगमाया से केवल देवताओं को अमृत पिला दिया। दैत्य देखते ही रह गए।
इसी समय दैत्य राहु देवता का रूप बनाकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। उसने अमृत की कुछ बूंदें पी भी लीं, परन्तु भगवान ने उसे पहचान लिया।
चक्रेण छिन्नमस्तस्य
राहोः काया पतद् भुवि।
भगवान ने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक काट दिया। अमृत स्पर्श के कारण उसका सिर अमर हो गया।
भगवान शिव भी हुए मोहित::
मोहिनी रूप की महिमा सुनकर भगवान शिव ने स्वयं उस रूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की। भगवान विष्णु ने पुनः मोहिनी रूप धारण किया।
भागवत में वर्णन है—
ततो ददर्शोपवने वरस्त्रियम्
विचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे।
जब शिवजी ने उस अलौकिक सौन्दर्य को देखा तो कुछ समय के लिए भगवान की योगमाया से मोहित हो गए। इससे यह सिद्ध हुआ कि भगवान विष्णु की माया अत्यन्त अद्भुत है।
तब शिवजी ने भगवान की स्तुति करते हुए कहा—
देवदेव जगद्व्यापिन्
मायाशक्ते नमोऽस्तु ते।
हे देवाधिदेव! आपकी मायाशक्ति को नमस्कार है।
मोहिनी अवतार का आध्यात्मिक संदेश::
1. भगवान धर्म की रक्षा के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।
2. अहंकार और लोभ मनुष्य की विवेक-शक्ति को हर लेते हैं।
3. भगवान की योगमाया को समझना अत्यन्त कठिन है।
4. जो भगवान की शरण में रहता है, उसकी रक्षा भगवान स्वयं करते हैं।
नमो मोहिनिरूपाय
विष्णवे परमात्मने।
धर्मसंस्थापनार्थाय
नमस्ते पुरुषोत्तम॥
मोहिनी रूप धारण करने वाले परमात्मा भगवान विष्णु को प्रणाम है, जिन्होंने धर्म की स्थापना के लिए यह दिव्य लीला की।
यह लीला हमें सिखाती है कि भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण और धर्मरक्षा का महान उद्देश्य होता है।
~श्री हरि:~
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अयाची मिश्र सुपुत्र साक्षात महादेव मंदिर निर्माण कार्य चल रहा हैं आप सभी श्रद्धालु भक्त जन से निवेदन हैं कि इस पुण्य कार्य में आप अपना आर्थिक सहयोग करें 9771364352
2 months ago | [YT] | 5
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