आज रात्रि नौ बजे यूट्यूब पर लाइव रहूंगी । विषय रत्न रहेंगे । बच्चों को बिना कुंडली विश्लेषण के कौन से रत्न पहनाएं? क्या सवा पांच रत्ती का रत्न पहनना आवश्यक है ? रत्न किस आधार पर धारण करें ? और भी रत्न सम्बन्धी आपके प्रश्न और मेरे जवाब,जानने के लिए आज रात्रि नौ बजे मेरी लाइव स्ट्रीम में आप जुड़ सकते हैं । #virareels #trendingreel #astrology #weeklyhoroscope #kundlianalysis #gemstones
आज भी रात्रि आठ बजे यूट्यूब पर लाइव रहूंगी । विषय रुद्राक्ष रहेगा । रुद्राक्ष से सम्बन्धित तथा रत्नों से सम्बन्धित किसी की तरह की जानकारी आप पूछ सकते हैं । यूट्यूब का लिंक साझा कर रही हूं उम्मीद करूंगी l आप मेरा यूट्यूब चैनल भी सब्सक्राइब करेंगे।
क्या सनातनी होकर, क्या हम सनातन के मूल से ही अनभिज्ञ हैं ?
ऋग्वेद का मरुत सूक्त वृक्षों के संरक्षण तथा उनके कटने को ब्रह्म हत्या का पाप मानता है । ऋग्वेद के ही विष्णु और मरुत सूक्त में लिखा है । हे विष्णु तुम ही वृक्षों के आधार हो । तुम ही वृक्ष रूप भी हो । ऋग्वेद का मरुत सूक्त वृक्षों के संरक्षण करने को कहता है , तथा उनके कटने को ब्रह्म हत्या का पाप मानता है । ऋग्वेद के ही विष्णु और मरुत सूक्त में लिखा है । हे विष्णु तुम ही वृक्षों के आधार हो । तुम ही वृक्ष रूप भी हो । हे वृक्षों तुम विष्णु की प्रतिष्ठा तथा निवास स्थान हो । "त्वं वृक्षस्य रोहणमसि विष्णोः प्रतिष्ठा" "हे वृक्ष, तुम विष्णु की प्रतिष्ठा हो" या "हे वृक्ष, तुम विष्णु के स्थापित होने का स्थान हो"।
वृक्ष सिर्फ अपनी वेदना प्रकट नहीं कर सकते । उनका तो जीवन मनुष्य से भी अधिक होता है । मत्स्य पुराण भविष्य पुराण में कहा गया है। एक वृक्ष का कटना मनुष्य के दस पुत्रों की मृत्यु के समान है । एक बार सोचिए जरूर, वृक्ष कटने पर कोई प्रतिक्रिया न देकर हम कितने पाप कर्मों के भागीदार बन चुके हैं।
वरिष्ठ पितृ तो विकास की बलि चढ़ गये, फिर पितृ पक्ष में शान्ति किसकी की जा रही है ?
जब भी हम कोई धार्मिक कार्य करते हैं, इन सभी कार्यों का सम्बन्ध आध्यात्म से है । ऐसे ही जब हम अपने पूर्वजों के निमित्त शान्ति कराते हैं । तब ये जानना भी जरूरी है । शान्ति किसकी हो रही है ? पंचमहाभूतों से निर्मित भौतिक शरीर की या आपके किसी प्रियजन की जिसे आप मां, पिता ' या दादा - दादी अथवा किसी पूर्वज के रूप में जानते थे ? आध्यात्मिक दृष्टि से कहूं, तो शान्ति पंच महाभूतों की होती है । जिन्हें महाप्राण कहा जाता है । भूमि , जल, अग्नि, वायु जल तत्व से ही मनुष्य के भौतिक शरीर की उत्पत्ति हुई है । आप जिसे फोटो में शान्त करने की बात कर रहे हो, वो तो तब ही शान्त हो चुका था, जब उसके भौतिक देह का क्षय हुआ था । श्रीमद्भगवद गीता में भी श्री कृष्ण, अर्जुन को ज्ञान देते हुए कहते हैं ।जैंसे ही एक भौतिक देह का अन्त होता है । जीवात्मा अपने प्रत्येक जन्म को भूल जाती है । फिर मन में प्रश्न उठता है, फिर पितृ कौन है ? उत्तर है । इस प्रकृति में आच्छादित वह जीवात्मा जो वृक्षों में छोटे बड़े जीवों के रूप में निवास कर रही है । जो नदी तथा सरोवरों में वास कर रही है । जो वायु की गति से पंख पसार कर उड़ रही है । जो अग्नि प्रज्वलित करने वाले पदार्थ में भी विद्यमान है । किन्तु मूढ़ मनुष्य ने उस पर अज्ञानता वश कुल्हाड़ी से प्रहार करना शुरूकर दिया । मनुष्य के यही पित्र कुपित हुए जिन्हें देव संरक्षण प्राप्त था । महाभारत के वन पर्व , शान्ति पर्व तथा भीष्म पर्व में वृक्षों के संरक्षण की बात की गई है। आज जो प्रकृति में प्रलय देखने को मिल रहे हैं । यही हम मनुष्यों ने वृक्षों को काट- काटकर स्वनिर्मित पितृदोष. को जन्म दिया है। आज अज्ञानी मूढ़ मनुष्य पत्थर की पूजा करने के लिए बड़े - बड़े भव्य मंदिर तो बनवायेगा, किन्तु इन कंकड़ पत्थर की इमारतों को बनाने के लिए हरे-भरे वृक्षों को काटने का साक्षी बनेगा । ये वही वृक्ष हैं जिनमें मनुष्य के पित्र देव भिन्न- भिन्न जीवों के रूप में निवास करते हैं । ये वही वृक्ष थे, जिन्हें त्रिदेवों का संरक्षण प्राप्त था । आज ये वृक्ष हमारे बीच नहीं रहे । फिर प्रश्न ये है, कि हम सनातन किसे कहते हैं ? क्या है सनातन की धरोहर ? फिर पितृ प्रकृति के किस हिस्से में अपना अस्तित्व बचाकर रखे हुए हैं ?
श्रीमद्भागवत गीता श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है “अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:” अर्थात, “मैं वृक्षों में पीपल हूं। जिसके मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी तथा अग्र भाग में भगवान शिव जी का साक्षात रूप है।
पितृ पूजन का अर्थ है । पितरों का पूजन अर्थात उनका आह्वाहन, और पितृ शान्ति का अर्थ पितरों के निमित्त श्राद्ध तथा तर्पण इत्यादि कर्म ताकि आपके पितर जिस लोक में भी हैं । वहां उनकी भोजन की व्यवस्था हो तथा मानसिक शान्ति मिले । इसलिए पितृ पूजन और पितृ शान्ति दोनों ही अलग -अलग कर्म हैं । ध्यान रखें कि पितरों का पूजन नहीं किया जाता । यदि आप देवताओं की भांति पितरों को भी पूजते हैं, तो ये कर्म कल्याण कारी नहीं माना जाता, जिन्हें हम पितृ कहते हैं । ये जीवात्मा की एक जीवन से दूसरे जीवन में प्रवेश करने का घटनाक्रम होता है । बिना मनुष्य के सहयोग के ये प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती । इसी लिए भौतिक संसार में मनुष्य को श्राद्ध कर्म करने के लिए कहा गया है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से किया गया कर्म ही श्राद्ध माना जाता है । श्राद्ध का प्रथम ग्रास श्री हरि विष्णु ही प्रथम पितृ अर्यमा के रूप में ग्रहण करते हैं । ये प्रथम ग्रास ही सम्पूर्ण श्रृष्ठि की क्षुधा शान्त करता है । सृष्टि के अन्तर्गत मनुष्य के साथ जीव-जन्तु भी आते हैं। बहुत से लोग घर के मंदिर में ही अपने पित्रो की फोटो रखते हैं । फिर उनका पूजन करते हैं । ध्यान रखें पितृ ऊर्जा और देव ऊर्जा दोनों ही अलग हैं । दोनों का ही पूजा विधान अलग है । देवताओं का स्थान उत्तर-पूर्व है । तथा दक्षिण का स्थान पित्रों का है । ग्रहों की भी जब हम पित्र रूप में बात करते हैं , तो राहु ,केतु , तथा शनि पितृ ग्रह मानें जाते हैं । इनकी शान्ति की जाती है । इनका पूजन नहीं किया जाता । उपनिषदों की बात की जाय तो, देवताओं की नियुक्ति मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए की गई है । किन्तु पितृ ऊर्जा सृष्टि के संचालन में सहयोगी होती हैं । अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रेषित करना किसी भी कुल और कुटुम्ब की वृद्धि तथा समृद्धि का भी कारण है । जब हम मनुष्य पूरी समयावधि ही पित्रों के निमित्त समर्पित कर देते हैं । यही पितृ पक्ष कहलाता है। भगवान सूर्य नारायण के कन्या राशि में . प्रवेश करने पर ही पितृ पक्ष आरम्भ होता है । कन्या राशि जीवन में अनुशासन को भी दिखाती है । पितृ रूप राहु कन्या राशि को अपनी राशि मानता है । अतः कन्या राशि के जातक पितृ पक्ष में पित्रों के निमित्त दानधर्म करें, तो इन लोगों पर पित्रों की विशेष कृपा होती है।
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आज रात्रि नौ बजे यूट्यूब पर लाइव रहूंगी । विषय रत्न रहेंगे । बच्चों को बिना कुंडली विश्लेषण के कौन से रत्न पहनाएं? क्या सवा पांच रत्ती का रत्न पहनना आवश्यक है ? रत्न किस आधार पर धारण करें ? और भी रत्न सम्बन्धी आपके प्रश्न और मेरे जवाब,जानने के लिए आज रात्रि नौ बजे मेरी लाइव स्ट्रीम में आप जुड़ सकते हैं ।
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3 days ago | [YT] | 0
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क्षमा चाहती हूं लाइव 8:30 पर होगा । आप लोग लाइव स्ट्रीम में जुड़ने का प्रयास करें l
4 days ago | [YT] | 2
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आज भी रात्रि आठ बजे यूट्यूब पर लाइव रहूंगी । विषय रुद्राक्ष रहेगा । रुद्राक्ष से सम्बन्धित तथा रत्नों से सम्बन्धित किसी की तरह की जानकारी आप पूछ सकते हैं । यूट्यूब का लिंक साझा कर रही हूं उम्मीद करूंगी l आप मेरा यूट्यूब चैनल भी सब्सक्राइब करेंगे।
4 days ago | [YT] | 2
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जयपुर के सिद्ध खोले के हनुमान जी दर्शन🙏
5 days ago | [YT] | 3
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आज शाम पांच बजे यूट्यूब पर लाइव रहूंगी ।
5 days ago | [YT] | 1
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आप सभी को पंचवक्त्र एस्ट्रो की ओर से आंग्ल नव वर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं !!🎉🎉🎉
ज्योतिर्विद स्मिता ए. काला
6 days ago | [YT] | 3
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At Cousin's wedding!!
1 month ago | [YT] | 10
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क्या सनातनी होकर, क्या हम सनातन के मूल से ही अनभिज्ञ हैं ?
ऋग्वेद का मरुत सूक्त वृक्षों के संरक्षण तथा उनके कटने को ब्रह्म हत्या का पाप मानता है । ऋग्वेद के ही विष्णु और मरुत सूक्त में लिखा है । हे विष्णु तुम ही वृक्षों के आधार हो । तुम ही वृक्ष रूप भी हो । ऋग्वेद का मरुत सूक्त वृक्षों के संरक्षण करने को कहता है , तथा उनके कटने को ब्रह्म हत्या का पाप मानता है । ऋग्वेद के ही विष्णु और मरुत सूक्त में लिखा है । हे विष्णु तुम ही वृक्षों के आधार हो । तुम ही वृक्ष रूप भी हो । हे वृक्षों तुम विष्णु की प्रतिष्ठा तथा निवास स्थान हो ।
"त्वं वृक्षस्य रोहणमसि विष्णोः प्रतिष्ठा" "हे वृक्ष, तुम विष्णु की प्रतिष्ठा हो" या "हे वृक्ष, तुम विष्णु के स्थापित होने का स्थान हो"।
वृक्ष सिर्फ अपनी वेदना प्रकट नहीं कर सकते । उनका तो जीवन मनुष्य से भी अधिक होता है । मत्स्य पुराण भविष्य पुराण में कहा गया है। एक वृक्ष का कटना मनुष्य के दस पुत्रों की मृत्यु के समान है । एक बार सोचिए जरूर, वृक्ष कटने पर कोई प्रतिक्रिया न देकर हम कितने पाप कर्मों के भागीदार बन चुके हैं।
. ज्योतिर्विद स्मिता ए. काला
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3 months ago | [YT] | 4
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वरिष्ठ पितृ तो विकास की बलि चढ़ गये, फिर पितृ पक्ष में शान्ति किसकी की जा रही है ?
जब भी हम कोई धार्मिक कार्य करते हैं, इन सभी कार्यों का सम्बन्ध आध्यात्म से है । ऐसे ही जब हम अपने पूर्वजों के निमित्त शान्ति कराते हैं । तब ये जानना भी जरूरी है । शान्ति किसकी हो रही है ? पंचमहाभूतों से निर्मित भौतिक शरीर की या आपके किसी प्रियजन की जिसे आप मां, पिता ' या दादा - दादी अथवा किसी पूर्वज के रूप में जानते थे ? आध्यात्मिक दृष्टि से कहूं, तो शान्ति पंच महाभूतों की होती है । जिन्हें महाप्राण कहा जाता है । भूमि , जल, अग्नि, वायु जल तत्व से ही मनुष्य के भौतिक शरीर की उत्पत्ति हुई है । आप जिसे फोटो में शान्त करने की बात कर रहे हो, वो तो तब ही शान्त हो चुका था, जब उसके भौतिक देह का क्षय हुआ था । श्रीमद्भगवद गीता में भी श्री कृष्ण, अर्जुन को ज्ञान देते हुए कहते हैं ।जैंसे ही एक भौतिक देह का अन्त होता है । जीवात्मा अपने प्रत्येक जन्म को भूल जाती है । फिर मन में प्रश्न उठता है, फिर पितृ कौन है ? उत्तर है । इस प्रकृति में आच्छादित वह जीवात्मा जो वृक्षों में छोटे बड़े जीवों के रूप में निवास कर रही है । जो नदी तथा सरोवरों में वास कर रही है । जो वायु की गति से पंख पसार कर उड़ रही है । जो अग्नि प्रज्वलित करने वाले पदार्थ में भी विद्यमान है । किन्तु मूढ़ मनुष्य ने उस पर अज्ञानता वश कुल्हाड़ी से प्रहार करना शुरूकर दिया । मनुष्य के यही पित्र कुपित हुए जिन्हें देव संरक्षण प्राप्त था । महाभारत के वन पर्व , शान्ति पर्व तथा भीष्म पर्व में वृक्षों के संरक्षण की बात की गई है। आज जो प्रकृति में प्रलय देखने को मिल रहे हैं । यही हम मनुष्यों ने वृक्षों को काट- काटकर स्वनिर्मित पितृदोष. को जन्म दिया है। आज अज्ञानी मूढ़ मनुष्य पत्थर की पूजा करने के लिए बड़े - बड़े भव्य मंदिर तो बनवायेगा, किन्तु इन कंकड़ पत्थर की इमारतों को बनाने के लिए हरे-भरे वृक्षों को काटने का साक्षी बनेगा । ये वही वृक्ष हैं जिनमें मनुष्य के पित्र देव भिन्न- भिन्न जीवों के रूप में निवास करते हैं । ये वही वृक्ष थे, जिन्हें त्रिदेवों का संरक्षण प्राप्त था । आज ये वृक्ष हमारे बीच नहीं रहे । फिर प्रश्न ये है, कि हम सनातन किसे कहते हैं ? क्या है सनातन की धरोहर ? फिर पितृ प्रकृति के किस हिस्से में अपना अस्तित्व बचाकर रखे हुए हैं ?
श्रीमद्भागवत गीता
श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है “अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:” अर्थात, “मैं वृक्षों में पीपल हूं। जिसके मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी तथा अग्र भाग में भगवान शिव जी का साक्षात रूप है।
ज्योतिर्विद स्मिता ए. काला
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3 months ago | [YT] | 7
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क्या मनुष्य के लिए पितृ पूजन लाभकारी है ?
पितृ पूजन का अर्थ है । पितरों का पूजन अर्थात उनका आह्वाहन, और पितृ शान्ति का अर्थ पितरों के निमित्त श्राद्ध तथा तर्पण इत्यादि कर्म ताकि आपके पितर जिस लोक में भी हैं । वहां उनकी भोजन की व्यवस्था हो तथा मानसिक शान्ति मिले । इसलिए पितृ पूजन और पितृ शान्ति दोनों ही अलग -अलग कर्म हैं । ध्यान रखें कि पितरों का पूजन नहीं किया जाता । यदि आप देवताओं की भांति पितरों को भी पूजते हैं, तो ये कर्म कल्याण कारी नहीं माना जाता, जिन्हें हम पितृ कहते हैं । ये जीवात्मा की एक जीवन से दूसरे जीवन में प्रवेश करने का घटनाक्रम होता है । बिना मनुष्य के सहयोग के ये प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती । इसी लिए भौतिक संसार में मनुष्य को श्राद्ध कर्म करने के लिए कहा गया है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से किया गया कर्म ही श्राद्ध माना जाता है । श्राद्ध का प्रथम ग्रास श्री हरि विष्णु ही प्रथम पितृ अर्यमा के रूप में ग्रहण करते हैं । ये प्रथम ग्रास ही सम्पूर्ण श्रृष्ठि की क्षुधा शान्त करता है । सृष्टि के अन्तर्गत मनुष्य के साथ जीव-जन्तु भी आते हैं। बहुत से लोग घर के मंदिर में ही अपने पित्रो की फोटो रखते हैं । फिर उनका पूजन करते हैं । ध्यान रखें पितृ ऊर्जा और देव ऊर्जा दोनों ही अलग हैं । दोनों का ही पूजा विधान अलग है । देवताओं का स्थान उत्तर-पूर्व है । तथा दक्षिण का स्थान पित्रों का है । ग्रहों की भी जब हम पित्र रूप में बात करते हैं , तो राहु ,केतु , तथा शनि पितृ ग्रह मानें जाते हैं । इनकी शान्ति की जाती है । इनका पूजन नहीं किया जाता । उपनिषदों की बात की जाय तो, देवताओं की नियुक्ति मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए की गई है । किन्तु पितृ ऊर्जा सृष्टि के संचालन में सहयोगी होती हैं । अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रेषित करना किसी भी कुल और कुटुम्ब की वृद्धि तथा समृद्धि का भी कारण है । जब हम मनुष्य पूरी समयावधि ही पित्रों के निमित्त समर्पित कर देते हैं । यही पितृ पक्ष कहलाता है। भगवान सूर्य नारायण के कन्या राशि में . प्रवेश करने पर ही पितृ पक्ष आरम्भ होता है । कन्या राशि जीवन में अनुशासन को भी दिखाती है । पितृ रूप राहु कन्या राशि को अपनी राशि मानता है । अतः कन्या राशि के जातक पितृ पक्ष में पित्रों के निमित्त दानधर्म करें, तो इन लोगों पर पित्रों की विशेष कृपा होती है।
ज्योतिर्विद स्मिता ए. काला
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3 months ago | [YT] | 2
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