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Dnyanesh

नमस्तेऽस्तु भगवति मातरस्मान् पाहि सर्वतः ...
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9 hours ago | [YT] | 109

Dnyanesh

राजेन्द्र दास के "अच्छे व्यक्ति" मोदी और स्वामी विधु शेखर के सनातन के "उत्कर्ष करनेवाले" मोदी के राज में इस व्यक्ति को सबूतों के अभाव में निर्दोष मुक्त कर दिया।
इसी वक्तव्य का सबूत न्यायव्यवस्था को नहीं मिला

www.instagram.com/reel/DUfC-eGD6BW/?igsh=MXNyaWtzd…

1 day ago | [YT] | 79

Dnyanesh

श्रीमद्भागवत में वर्णित क्रियायोग का नाम लगाकर ईसा की घुसपैठ।
ये व्यक्ति स्वयं को पुरी शंकराचार्य का अनुयायी भी बोलता है।
(Link comment में)

2 days ago | [YT] | 81

Dnyanesh

एक स्वार्थी Youtuber द्वारा चलाए जा रहे भ्रमयुक्त प्रचार पर कुछ भाव:–


👉 यह व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए महापुरुषों को उपयोग करता है। उनके नाम से दिखाकर अपना agenda चलाना चाहता है।

आपने notice किया होगा जब प. पू. स्वामिश्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाभाग ( पूर्वाश्रम के त्र्यंबकेश्वर चैतन्य ब्रह्मचारी) जब स्वामिश्री निग्रहाचार्य जी महाराज की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे थे– कि शास्त्रनिष्ठ, सिद्धान्तनिष्ठ हैं....आदि ( जो कि अनेक बार कह चुके हैं पूर्व में), उस समय इसने वीडियो में कट लगाया है।

👉इसमें इतना साहस नहीं कि महापुरुषों से श्री निग्रहाचार्य जी के विषय में कोई भी बात उनका नाम लेकर पूछ सके।

क्योंकि इसको भय रहता है कि ऐसा करने पर उक्त महापुरुष निग्रहाचार्य की प्रशंसा में कुछ ऐसा न बोल दे जिससे इसका पूर्वाग्रह खण्डित हो जाए।

👉और देखिए कोई विषय कितनी धूर्तता से परोसता है – उदाहरणार्थ– ये कहता है जगद्गुरु स्वामी श्री विद्याभास्कर जी महाभाग को तो उतना ही पता है जितना निग्रहाचार्य जी ने बतलाया।
अच्छा, और इसके गुरु कुछ भी बोल देंगे तो वो बात अकाट्य है, क्यों कि वो साक्षात् शिवस्वरूप हैं।
और अन्य पीठ के आचार्य कुछ कहें तो उनको पता ही क्या है! उनको जितना बताया गया उतना ही पता है।
मतलब उनके पास कोई दिव्यदृष्टि नहीं है। वे विष्णुस्वरूप नहीं है।
👉एक और उदाहरण देखिए माता शबरी प्रकरण को इसने कैसे कुटिलतापूर्वक सांप्रदायिक सिद्धान्त के साथ जोड़ दिया। जबकि यह विषय पौराणिक–ऐतिहासिक है।
इसने अपने वीडियो में कहा है कि श्रीरामानुज सम्प्रदाय में माता शबरी को भीलनी और उनके उच्छिष्ट फल खाने की बात बतलाने से रामो विग्रहवान् धर्मः कि परिभाषा खण्डित हो रही है! श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम सिद्ध नहीं हो रहें!

👉जब दो शाङ्कर पीठों में किसी पौराणिक – व्यावहारिक प्रसंग को लेकर मतभेद होने से धर्म और ब्रह्म प्रभावित नहीं हो रहा है तो माता शबरी को भीलनी और गौतम बुद्ध को अवतार मान लेने से धर्म और ब्रह्म में कहां से अंतर आ रहा है?

👉ये जो पूछ रहा है निग्रहाचार्य जी को कि उन्हें ग्रन्थ किस परम्परा से प्राप्त हुए तो यह व्यक्ति को चाहिए कि पहले ये बतलाए कि  क्या श्री निश्चलानंद सरस्वतीजी ने जितने ग्रन्थों का अध्ययन किया वो सारे शाङ्कर परम्परा से प्राप्त थे?
क्या निश्चलानंद जी ने गीताप्रस और चौखंबा के ग्रन्थों का अध्ययन नहीं किया?
और यह व्यक्ति इतना बैचेन है जानने के लिए कि ग्रन्थ किस परम्परा से प्राप्त हुएं तो ये जाकर गीताप्रेस से ही पूछ ले कि आपको ये पाण्डुलिपी कहां से प्राप्त हुई? किस मठ से प्राप्त हुई?
चौखंबा में तो यह माहिती दी हुई ही होती है।

👉यह व्यक्ति को चाहिए कि श्रृंगेरी पीठ जाकर वहां जो सब से बड़ा पुस्तकालय बना हुआ है, वहां से अग्निपुराण की लिपि प्राप्त करे। उसमें देखे कि उक्त प्रसंग है कि नहीं।

और उसमें यह प्रसंग प्राप्त होनेपर तो शाङ्कर संप्रदाय द्वारा भी सिद्ध हो जायेगा। फिर इसकी नौटंकी समाप्त हो जाएगी।

👉किन्तु सत्य तो यह है कि ये लोग प्रमाणों से भयाकुल है। स्वामी करपात्रीजी ने बोल दिया तो अब किसी भी तरह से उन्हें अकाट्य सिद्ध करना है।
माता शबरी प्रकरण में एक और बात दबे स्वर में आती है –कल्पभेद की
किन्तु ये लोग वो भी खुलकर इसलिए नहीं बोलना चाहते  क्योंकि उससे तो स्वामी निग्रहाचार्य का पक्ष सत्य सिद्ध हो जाएगा।
और कल्पभेद में ब्राह्मणी वाला केवल करपात्रीजी एंड ग्रुप को पता चला! वो भी बिना किसी ठोस प्रमाण के!
जबकि कल्पभेद तो वो माने ही नहीं, पर बाकी सब पूर्ववर्ती भीलनी वाला कल्प मानकर चले ?
जब करपात्रीजी ही कल्पभेद नहीं माने तो ये क्यों मान रहे हैं ?

हर हर महादेव

3 days ago (edited) | [YT] | 66

Dnyanesh

नारायण

4 days ago | [YT] | 24

Dnyanesh

स्वामी विधु शेखर भारती का सनातन पर एक और आघात।
इस कल्पित देवी का शास्त्रीय प्रमाण इनसे क्यों नहीं मांगना चाहिए?
स्मरण रहे स्वामी विधु० मान्य परम्परा प्राप्त आचार्य है।
खैर। सत्य तो यही है कि श्री शक्तिसंगम तन्त्र में शाङ्कर परम्परा के लुप्त होने की भविष्यवाणी ऐसे ही नहीं की गई है। हां इतना अवश्य है इतना शीघ्र ये सब होगा ऐसा नहीं लगा था।

4 days ago (edited) | [YT] | 223

Dnyanesh

🌹🌹🌹🌹🌹

5 days ago | [YT] | 320

Dnyanesh

अवश्य लाभ लें

6 days ago | [YT] | 22

Dnyanesh

शङ्कराचार्य परम्परा का वास्तविक शोधन तो हमारे परम पूजनीय स्वामिश्री निग्रहाचार्य जी महाभाग ही कर रहें हैं।
व्यक्तिगत गुरुनिष्ठा के चक्कर में शवांश तो उत्तर दे नहीं पाया।
"हमारे गुरुजी कह दिए, हमारे गुरुजी कह दिए"..!
वो मानकर बैठा है।
वास्तविक समाधान तो निग्रहाचार्य ने ही प्रस्तुत किया है।
किंतु प्रश्न यह है कि क्या उस समाधान को इसके गुरु मानते हैं?
क्या उस समाधान को श्रृंगेरी पीठ वाले मानते हैं?
नहीं।
तो इसे यह समाधान इसके गुरु ने दिया या निग्रहाचार्य ने?
अच्छा निग्रहाचार्य के कथन को तो ये प्रमाण मानता नहीं!
तो फिर निग्रहाचार्य का ही कथन दिखाकर ये अपना समाधान कैसे करवा रहा है?
और इसके अनुसार तो निग्रहाचार्य का कथन तो शाङ्कर परम्परा के विरुद्ध होगा! क्योंकि शाङ्कर परम्परा तो एकमात्र मान्य गुरुनिष्ठा वाली परंपरा है!
और इसके अनुसार तो स्वामिश्री अपारंपरिक है!
निग्रहाचार्य ने जो शोधन दिया क्या वो इसके गुरु दे पाएं?
क्या श्रृंगेरीवाले वो दे पाएं??
नहीं। वो आज भी अपनी उसी हठधर्मिता में पड़े हुएं हैं।
और यह व्यक्ति उसी हठधर्मिता का अनुसरण भी कर रहा है।
किन्तु समाधान जिन निग्रहाचार्य जी महाभाग ने दिया उन्हें ये मुंहतोड़ जवाब देने चला है, उन्हीं के कथन के आधारपर।
और कह रहा है हम expose करेंगे! 😂
अरे सुनो–
तुम्हारे गुरु जो कार्य नहीं कर पाएं वो निग्रहाचार्य महाभाग ने करके दिखाया।
समझो इसे।

6 days ago | [YT] | 85

Dnyanesh

भुशुण्डि रामायण की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता स्वीकार करते हुए स्वामिश्री करपात्रीजी।
कामिल बुल्के के खण्डन में भुशुण्डि रामायण का प्रमाण सन्दर्भित करते स्वामी करपात्रीजी।
श्रवण कुमार की माता (शूद्र वर्ण) हेतु वाल्मीकि जी ने मातरं ते तपस्विनीम् शब्द ही प्रयोग किया है। अरण्यकाण्ड से पहले अयोध्याकाण्ड नहीं पढ़ा अनपढ़ों ने ?

कुछ कह सकते हैं कि स्वामी करपात्रीजी ने लिखा है, वाल्मीकि रामायण को ही श्रीरामचरित में परमप्रमाण मानना चाहिए।
किंतु वाल्मीकि रामायण का तात्पर्य यह नहीं कि केवल तपःस्वाध्यायनिरतं से लेकर सात कांड ही वाल्मीकि रामायण माना जाए।
अपितु वहां शतकोटिप्रविस्तर रामायण को देखना है। क्योंकि यही वाल्मीकि जी की मूल रचना है।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
श्रीरामरक्षास्तोत्र मूलतः आनन्दरामायण का है। ये भी श्रीवाल्मिकी जी किन्हीं रचना है।
ऐसे तो फिर गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरितमानस अप्रमाणिक हो जायेगा।
जो कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण से इतर जाकर कोई रामायण मान्य नहीं होगी उनका तात्पर्य जैनियों द्वारा लिखे गए रामायण, पेरियार का सच्ची रामायण आदि से है।
शतकोटिप्रविस्तर रामायण तो स्वयं वाल्मीकि जी की रचना है। और उसी रामायण एक एक अंश लेकर किसी ने अध्यात्मरामायण लिखा तो किसी ने लोमष रामायण लिखा....।
ये सारे के सारे श्रीवाल्मिकी रामायण के ही अंश हैं। आनन्दरामायण में स्पष्ट रूप से इसका वर्णन है। और आनन्दरामायण में ही जो मूल रामायण है श्रीनारद मुनि ने पढ़ाया श्रीवाल्मिकी जी को तपःस्वाध्यायनिरतं वाला वो आनन्दरामायण का ही खण्ड है।
और स्वामी करपात्रीजी महाराज ने भी स्वयं रामायणमीमांसा में अनेक स्थानों पर यह लिखा है कि शतकोटिप्रविस्तर रामायण ही वाल्मीकि जी की मूल रचना है।

6 days ago | [YT] | 68