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Dnyanesh
पूज्य स्वामिश्री के अम्बा महायज्ञ के विषय के मेरे पोस्ट पर एक कोई मनोज कुमार नाम के ID ने टिप्पणी की है। स्वयं को इंजीनियर बताता है।
उसके अनुसार धर्म एक व्यापार है, और पूज्य गुरुदेव निग्रहाचार्य जी महाराज आदि सब धर्म की आड़ में व्यापार करते हैं। उसके अनुसार ब्राह्मणों ने धंधे के लिए यज्ञ आदि कराना आरम्भ किया है। इस जैसे अनेक लोगों ने स्वयं तो कभी कोई सहयोग सामाजिक और धार्मिक कार्य में किया नहीं लेकिन हिसाब लेने पहले पहुंचते हैं।
देखिए–
टेंट वाला - डेढ़ लाख, फूल वाला - पचास हज़ार , बिजली साउंड वाला - बीस हज़ार, अन्य उपकरण वाले - पचास हज़ार, जितने वाहन वाले - एक लाख, पारम्परिक वाद्ययंत्र वाले - ग्यारह हजार, कच्चा फल अनाज सब्जी वाले - एक लाख, धोबी, नाई, पत्ता बांस का काम करने वाले, सफाई वाले - पचास हज़ार, पूजा सामग्री भंडार वाले - पचास हज़ार, बर्तन वाले - पांच लाख, कपड़े वाले - ढाई लाख, और भी बहुत कुछ है, ये सब तेरी सरकारी जाति के अनुसार ST ,SC, OBC ही हैं और वहां हिन्दू के रूप में अपनी जाति का कार्य कर रहे थे, पूरी श्रद्धा से।
ब्राह्मणों ने क्या डकारा और किसका क्या लूटा ? और इस "बिज़नेस" में मुख्य मुख्य कमाई किसकी हुई ?
श्री निग्रहाचार्य जी ने तो सामाजिक सहयोग के अनुसार अपने शुद्ध अनुष्ठान से स्वकष्टार्जित धन के भी 3-4 लक्ष रुपए निवेदित किये थे।
इसने क्या दिया था ?
जो सहयोग किये, वो हिसाब मांगे तो मिलेगा भी, किन्तु ये है कौन ?
सनातनी जातिवाद एकता, अर्थव्यवस्था और कल्याण सबका कारण है।
पोलिटिकल जातिवाद तो केवल लतखोरी ही है।
अस्तु। श्रीराम
8 hours ago (edited) | [YT] | 123
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Dnyanesh
एक मास पूर्व परम पूजनीय जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामी महाभाग इन्होंने श्री अम्बायज्ञ सम्पादित किया जो कि अभूतपूर्व सिद्ध हुआ।
यज्ञ में सभी वर्णों के श्रद्धालुओं की सहभागिता थी,
सभी को अपने वर्णाश्रमोचित कार्यों का दायित्व प्रदान किया गया था। जो कि प्रायः आजकल कहीं दिखाई नहीं देता।
स्थूल रूप से व्यय था लगभग 40 लाख रुपए।
ब्राह्मणों की दक्षिणा, वरण और दान आदि मिलाकर 12 लाख।
रहने, भोजन भंडारा, यातायात आदि में 6 लाख।
वेदी, पात्र, पूजन सामग्री, फल, पुष्प श्रृंगार आदि में 7 लाख।
कन्याओं के विवाह, गोसेवा, अनेक श्राद्ध, मुंडन, रोगियों की चिकित्सा, मठ देवालय निर्माण आदि कार्यों में भी लगभग 15 लाख।
ऐसे लगभग 40 लाख खर्च हुए हैं, जिसमें केवल यज्ञ का देखें तो लगभग 25 लाख।
और एक भी रुपया न ऋण लिया गया और न किसी पोलिटिकल फंडिंग का आश्रय।
सब सामाजिक सहयोग और पूज्य स्वामिश्री के अपने कार्यक्रम की दक्षिणा मिलाकर किया गया।
विप्रदेवताओं का उत्तम रीति से सत्कार किया गया था।
ऐसा दृश्य आजकल प्रायः कहीं भी देखने को नहीं मिलता।
यहां से हम हार्दिक कामना करते हैं कि
भविष्य में लोककल्याणार्थ ऐसे अनेक शास्त्रीय महायज्ञ एवं अन्यान्य शास्त्रीय अनुष्ठान धर्म के चल विग्रह के रूप में सिद्ध हो रहे हमारे जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामी जी द्वारा सम्पादित हो और धरती पर एक अद्वितीय आदर्श स्थापित हो।
नारायण।
जय स्वामी निग्रहाचार्य।
वन्दे निग्रहकारिणीम्।।
16 hours ago | [YT] | 170
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Dnyanesh
धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाभाग अपने
"नया विश्वनाथ मंदिर क्यों" इस पुस्तक में श्री रामानुजाचार्य जी को "जगद्गुरु" से संबोधित कर रहे हैं।
और वहीं आजकल नवशांकर मतावलंबी रामानुजाचार्य जी को जगदगुरु नहीं मानते हैं।
21 hours ago | [YT] | 66
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Dnyanesh
आशीर्वादपत्र
कालाष्टमी / वैक्रम - २०८३
|| यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||
श्रीलोकपति ब्रह्मदेव के कृपाप्लुत महातीर्थ पुष्कर में चल रहे शतपुरश्चरण गायत्री महायज्ञ का निमन्त्रण प्राप्त हुआ। इस आलोक में अपनी साधनातपश्चर्यात्मिका व्यस्तता के कारण सशरीर उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त करते हुए आप सभी सज्जनों के मङ्गलाभिवर्द्धन हेतु कुछ शास्त्रानुसार प्रशस्त्यभिव्यक्ति की जाती है। यज्ञ के कई शास्त्रीय स्वरूप प्राप्त होते हैं। यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म एवं श्रेष्ठ कर्म की ऐसी फलाभिव्यक्ति के रूप में आचार्यों ने बताया है जिसके उपभोक्ता एवं अधिपति स्वयं परब्रह्म हैं, यथा - 'यज्ञः कर्मसमुद्भवः, यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म, अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च' प्रभृति प्रमाणों से सिद्ध है। यज्ञ, दान, तपस्या आदि से मनीषियों ने पवित्रता को प्राप्त किया है - 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' एवं बड़े बड़े मनीषियों के मार्गदर्शन में श्रेष्ठ राजाओं ने पापियों के निग्रह, साधुओं की रक्षा एवं यज्ञदानादि सत्कर्मों के माध्यम से पवित्र कीर्ति को प्राप्त किया है -
निग्रहेण च पापानां साधूनां सङ्ग्रहेण च।
यज्ञैर्दानैश्च राजानो भवन्ति शुचयोऽमलाः॥
(महाभारते शान्तिपर्वणि)
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार विधि, द्रव्य, भाव एवं कर्ता की शास्त्रविरोधिनी वृत्ति यज्ञ को तामसी एवं शास्त्रोक्त फल से रहित करती है -
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
एवंविध विधि की शुद्धि किन्तु भाव का स्वार्थ यज्ञ को राजसी एवं अल्पफलदायी बनाता है तथा विधि, भाव एवं कर्ता की शुद्धि और निष्काम वृत्ति से यज्ञ सात्त्विक एवं सफल होता है, यह पूर्वोक्त सन्दर्भ से ही सिद्ध है। द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञ, गानयज्ञ, जपयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, ध्यानयज्ञ, ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, कर्मयज्ञ आदि भावभोक्तृभेद से अनेक यज्ञ हैं। यज्ञ से ही देवता, पृथ्वी एवं प्रजा का धारण-पोषण आदि होता है, यह कालिकापुराण से प्रमाणित है -
यज्ञेषु देवास्तिष्ठन्ति यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
यज्ञेन ध्रियते पृथ्वी यज्ञस्तारयति प्रजाः॥
वेद के विरुद्ध जाकर यज्ञ करना लोक एवं परलोक की हानि करता है। वैदिक मर्यादा के अधीन यज्ञ हैं। यज्ञमर्यादा के अधीन देवता हैं। उन्हीं यज्ञमर्यादा के विशेषज्ञ मन्त्रज्ञ ब्राह्मणों के अधीन देवता भी होते हैं अतः ब्राह्मणों को भी देवतुल्य बताया गया है। संसार देवताओं के अधीन है, देवता मन्त्र के अधीन हैं और मन्त्र ब्राह्मण के अधीन हैं अतः ब्राह्मणों को पृथ्वी का देवता कहा जाता है, ऐसा वृद्धगौतमस्मृति के बाईसवें अध्याय में वर्णित है तथा वृद्धसूर्यारुणकर्मविपाक (के उनहत्तरवें अध्याय) में श्रीसूर्यदेव का भी वचन है।
देवाधीनं जगत्सर्वं मन्त्राधीनास्तु देवताः।
ते मन्त्रा ब्राह्मणाधीनास्तस्माद्भूदेवता द्विजाः॥
(वृद्धसूर्यारुणकर्मविपाके श्रीसूर्यः)
वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनाश्च देवताः।
देवता ब्राह्मणाधीनास्तस्माद्विप्रास्तु देवताः॥
(वृद्धगौतमस्मृतौ द्वाविंशाध्याये)
अलौकिक एवं फल के अदृष्ट होने से यज्ञादि में स्वभावतः प्रवृत्त न होने वाले मनुष्य का शास्त्र के आदेश से प्रवृत्त होना, यह निवृत्तिरूपक धर्म है। धर्म अलौकिक है, अतः उसके स्वरूप का बोध कराने वाले शास्त्र का होना युक्तिसद्गत भी है ओर आवश्यक भी, ऐसा महर्षि वात्स्यायन का चिन्तन है।
अलौकिकत्वाददृष्टार्थत्वादप्रवृत्तानां यज्ञादीनां शास्त्रात् प्रवर्तनम् ******* धर्मस्यालौकिकत्वात्तदभिधायकं शास्त्रं युक्तम्।
(कामसूत्रेषु श्रीवात्स्यायनः)
अलौकिक एवं अदृष्ट फल का नियामक होने से यज्ञ का धर्मानुसारि होना एवं यज्ञकर्ता का उसमें श्रद्धायुक्त होना अनिवार्य है। श्रद्धा से रहित होकर किया गया होम, दान, तप आदि लोक एवं परलोक में निष्फल ही माना गया है।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतन्तु यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
(श्रीमद्भगवद्गीतायां सप्तदशाध्याये)
श्रीपुष्पदन्त कहते हैं कि वेद में श्रद्धयान्वित होकर अधिकृत जन सत्कर्म करते हैं - श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः। विश्वास ही यज्ञ का मूल एवं प्राण है। मन्त्र, देवता, गुरु,
ओषधि आदि में विश्वास ही पूर्ण फल को प्रदान करता है। अविश्वास एवं व्यर्थ तर्कों से से फलहानि होती है, जैसा कि श्रीशिववाक्य है -
विश्वासमूलो यज्ञोऽयं विश्वासो यज्ञजीवनम्।
प्रामाणिकेऽस्मिन् सुश्रोणि मार्गे जीवति विश्वसन्॥
विश्वाससदृशं लोके न भूतं न भविष्यति।
मन्त्रे मन्त्रे तु कर्त्तव्ये भेषजे दैवते गुरौ॥
विश्वासमेव कुर्वाणो यथोक्तं फलमश्नुते।
अविश्वासाच्च सन्देहाद्वृथातर्कभ्रमाद्वृथा॥
(आनन्दतन्त्रे चतुर्दशपटले)
यज्ञ में विधिदृष्ट आहुति का भक्षण करने वाले भगवान् अग्नि हुताशन रूप के माध्यम से समस्त विश्व की तृप्ति के निमित्त बनते हैं। स्वयं परमात्मा ही समस्त वेदमन्त्रों का तेजोमय विग्रह अग्निदेव के रूप में प्रत्यक्ष करके स्वात्मयजन में प्रवृत्त होते हैं।
परस्य ब्रह्मणः साक्षाज्जातवेदोऽसि हव्यवाट्।
देवानां पुरुषाङ्गानां यज्ञेन पुरुषं यज॥
(श्रीमद्देवीभागवतेऽष्टमस्कन्धे द्वादशाध्याये)
"हे अग्निदेव ! आपके माध्यम से हमारी दी हुई आहुतियां सीधे परब्रह्म तक पहुंचती हैं। अन्यान्य देवता भी उन्हीं परमात्मा के अंग हैं अतः उन देवताओं के यजन के द्वारा भी आप हमारे यज्ञकर्म को सीधे परमपुरुष परमात्मा तक पहुंचाएं", इस प्रार्थना के साथ यज्ञकर्ता विश्वकल्याण का निमित्त बनता है।
वेदों के अनुसार यज्ञविहित अग्नि भी गायत्री से अभिन्न है -
अग्निर्ह वाव राजन् गायत्रीमुखम्।
(तलवकारब्राह्मण)
शक्तिसङ्गममहातन्त्रराज के अनुसार भगवती गायत्री वेदमाता हैं और प्रणव उनकी आद्याभिव्यक्ति है - वेदमाता तु गायत्री तदाद्यः प्रणवः स्मृतः। वैदिक मर्यादा की प्राणभूता भगवती गायत्री के अक्षरों के विधानोक्त अनुसन्धान से उद्भूत नादकम्पन साधक की गुप्त शक्तियों को जागृत करके उसमें दिव्य शक्तियों का सञ्चार कर देता है।
अक्षराणां तु गायत्र्या गुम्फनं ह्यस्ति तद्विधम्।
भवन्ति जागृता येन सर्वा गुह्यास्तु ग्रन्थयः॥
जागृता ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः साधकमानसे।
दिव्यशक्तिसमुद्भूतिं क्षिप्रं कुर्वन्त्यसंशयम्॥
(गायत्रीसंहितायाम्)
अनेक आध्यात्मिक शक्तियों को गुप्त होने के बाद भी गायत्री के विधिपूर्वक अनुष्ठान से प्राप्त करना सम्भव है यह शास्त्रेतिहास से सिद्ध है -
अनुष्ठानात्तु वै तस्माद्गुप्ताध्यात्मिकशक्तयः।
चमत्कारमया लोके प्राप्यन्तेऽनेकधा बुधैः॥
(गायत्रीसंहितायाम्)
मन्त्र और पुरश्चरण में वही सम्बन्ध है जो राजा एवं राज्यसम्पत्ति का है। जैसे सम्पत्तिहीन राजा अपने कार्य में पूर्ण समर्थ नहीं हो पाता, वैसे ही पुरश्चरणहीन मन्त्र भी पूर्ण प्रभावी नहीं होता है, ऐसा शक्तिसङ्गममहातन्त्र के ताराखण्ड का कथन है -
मन्त्रो राजा पुरश्चर्या राज्यसम्पत्तिरीरिता।
सम्पत्त्या तु विना राजा न शोभते महेश्वरि।
सम्पत्तिमूलमेतद्धि सर्वमेव प्रकीर्तितम्॥
त्रिपुरार्णवतन्त्र के अनुसार मन्त्र और पुरश्चरण में वही सम्बन्ध है जो वीर्य एवं शरीर का है। जैसे वीर्यहीन शरीर में स्थित चेतन पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता, वैसे ही पुरश्चरणविहीन मन्त्र भी निर्बल एवं अशक्त होता है।
वीर्यहीनो यथा देही स्वकर्मसु न क्षमः ।
पुरश्चरणहीनो यस्तथा मन्त्रः प्रकीर्तितः॥
(त्रिपुरार्णवतन्त्रे)
वेदादिबीजमूलक एवं सर्वदेवमनुव्यापिका होने से गायत्री मन्त्रसाम्राज्ञी हैं जिनकी प्रतिस्थापना नहीं होती। भगवती गायत्री के माहात्म्य में हमारे सम्प्रदाय में वर्णित सत्ययुग के युगाधिकारीमण्डल में स्थित निग्रहानुग्रहकर्ता ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने यहां तक कह दिया कि गायत्री का परित्याग करके अन्यमन्त्रों का आश्रय लेने वाले व्यक्ति मानो स्वयंप्राप्त सिद्धान्न को छोडकर भिक्षाटन में श्रम कर रहे हैं -
गायत्रीं तु परित्यज्य अन्यमन्त्रमुपासते।
सिद्धान्नं च परित्यज्य भिक्षामटति दुर्मतिः॥
गायत्री की महिमा इससे भी स्पष्ट है कि प्रत्येक देवता के परब्रह्मरूप से एकाकार बोध एवं ध्यान के साथ अपनी बुद्धि को ईश्वर में नियोजित करने हेतु विद्महे, धीमहि, प्रचोदयात् आदि शिवसङ्कल्पपदों से युक्त मन्त्र प्राप्त होते हैं। अतः समानाधिकरण से समस्त देवताओं में स्थित शक्तितत्त्व के वैशिष्ट्य का अनुसन्धान करते हुए विभिन्न सम्प्रदायोक्त प्रभेद के बाद भी गायत्रीमूलक संस्कार के कारण ब्राह्मणों को शाक्त के रूप में शास्त्रों ने स्वीकार किया है -
सर्वे शाक्ता द्विजाः प्रोक्ता न शैवा न च वैष्णवाः।
आदिशक्तिमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम्॥
(श्रीमद्देवीभागवते)
गायत्रीं जपमानास्ते सर्वे शाक्ता द्विजातयः।
(शक्तिसङ्गमतन्त्रे छिन्नमस्ताखण्डे)
अतः भगवती वेदमाता गायत्री के शतपुरश्चरणात्मक यज्ञ की शास्त्रीय मर्यादा की सीमा में सफल एवं सार्थक होने की मङ्गलकामना लोककल्याण के निमित्त करते हुए हम सम्बन्धित सज्जनों को मङ्गलाशीर्वाद प्रदान करते हैं।
|| शन्नः कौलिकः ||
|| वन्दे निग्रहकारिणीम् ||
― हंसवंशावतंस श्रीमन्महामहिम विद्यामार्त्तण्ड श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु
1 day ago (edited) | [YT] | 86
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Dnyanesh
दिव्य कालाष्टमी की अर्द्धरात्रि महानिशा में श्रीमज्जगद्गुरु स्वामी निग्रहाचार्य जी महाभाग एवं साध्वी अखण्डसौभाग्यवती अनुपमाम्बा देवी के द्वारा श्रीभगवती निग्रहेश्वरी महाकुब्जिका एवं अन्यान्य हरिहरादि ब्रह्मरूपों की महापूजा एवं कमलपुष्प से सहस्रार्चन ...
1 day ago (edited) | [YT] | 123
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Dnyanesh
कोई शिवांश नामक You Tuber जो बोल रहा था कि माता शबरी जी वाले प्रकरण में की अमुक श्लोक का अर्थ जो निग्रहाचार्य ने कहा वो गलत है। क्योंकि किसी परम्परा प्राप्त गुरु ने certify नहीं करा केवल स्वामी जी ने ग्रंथ से पढ़के बोल दिया,जो छपा हुआ है वही।
एक वीडियो में पुरी के शंकराचार्य जी महाभाग जो वैदिक परम्परा से है वे खुद किताबों से तंत्र शास्त्र पढ़ रहे हे,
क्या स्मार्त परम्परा में अब तंत्र भी पढ़ाया जाता है ( वामाचार / कौलाचार के हिसाब से ) किस तान्त्रिक आचार्य के चरणों में पढ़ा पूरी शंकराचार्य जी ने?
नहीं तो पुरी शंकराचार्य किस तान्त्रिक गुरु के सानिध्य में पढ़कर ग्रंथ लिखेंगे??
वे तो जो पब्लिकेशन छाप देगा वही मान लेंगे, जो अर्थ वो लगाएंगे उसका सत्यापन कौन करेगा?
श्री निग्रहाचार्य जी महाराज तो अपने पूज्य गुरुदेव के सामने बैठकर अनेकानेक तंत्र ग्रंथों को पढ़ें हैं। और स्वविवेक से भी अन्यान्य पारंपरिक आचार्यों से, जैसे शैवागम के, कौलागम के पाँचरात्रादि के आचार्यों की सन्निधि में आगमों पर चिन्तन मनन अध्ययन किया है।
संबंधित प्रकाशनों से बात करके उनके पारंपरिक जो संस्थान है जिनके पांडुलिपियों के आधार पर वो ग्रन्थ छाप रहे हैं, उनसे संपर्क करके उन सबों का संग्रह भी तैयार किया है स्वामीजी ने।
जहां कोई बात विचारणीय होती है वहां आचार्यों से परामर्श भी लेते हैं और जहां उन्हें आवश्यकता होती हैं वहां सप्रमाण परामर्श देते भी है। अन्य आचार्यगण भी अपने आगमों के बारे में चर्चा करते ही है, जैसे अमुक आगम के अमुक श्लोक का पारंपरिक अर्थ क्या होना चाहिए!
यहां मै स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं पूरी शंकराचार्य जी की योग्यता के बारे में कुछ नहीं कह रहा हूं ।और पुरी शंकराचार्य जी उन तंत्रों के अध्ययन में सक्षम नहीं ऐसा भी नहीं कहना चाहता।
मुद्दे की बात यह है कि शिवाश ने किस आधार पर कहा था कि केवल गुरू के सामने बैठकर अक्षरमात्र को सुन लेना ही अगर अध्ययन हो गया तो पूरी शंकराचार्य जी किससे अध्ययन करेंगे?
इस व्यक्ति ने स्वयं पुरी के शंकराचार्य जी से किन किन शास्त्रों का अध्ययन किया है? और जिन जिन शास्त्रों से वाक्यों का ये प्रमाण देता है बातों का प्रमाण देता है, क्या स्वयं पुरी शंकराचार्य जी के मुख से सामने बैठकर पढ़ा है इसने? या सीधे ही उसे सुना है?
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उससे पहले यह स्पष्ट किया जाए कि पुरी शंकराचार्य जी के अनुसार शांकर परंपरा में किन ग्रंथों को प्रमाण माना जाता है?
अथवा क्षितिज सोमानी जो स्वयं को शांकर परंपरा एकमात्र
विशेषज्ञ मानते हैं, वहीं बता दें कि शांकर परंपरा में किन किन ग्रन्थों को प्रमाण माना जाता है?
किस आधार पर माना जाता है ये रहने दीजिए ।
केवल अंतिम सूची बता दीजिये ।
पुरी शंकराचार्य जी के और अन्यान्य शंकराचार्य – वर्तमान और एक दो पीढ़ी में हुए हैं, जिनके ग्रंथों पर छेड़छाड़ होने का आक्षेप नहीं लग सकता, इनके ग्रंथों में उन्होंने जिन जिन ग्रन्थों से प्रमाण दिया है उन उन ग्रन्थों की प्रामाणिकता क्या सोमानी मानता है?
अगर शंकराचार्य जी के मत में या सोमानी के मत में भी सर्वोच्च धर्मगुरु के द्वारा संदर्भित ग्रन्थों के प्रमाण नहीं माना जाएगा तो फिर किस बात को प्रमाण माना जाएगा?
केवल सोमानी द्वारा सर्टिफाइड ग्रंथों को ही? या केवल सोमानी द्वारा सर्टिफाइड अर्थों को?
2 days ago | [YT] | 39
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Dnyanesh
मुंबई में कल कांचीकामकोटि और द्वारका पीठाधिपति शंकराचार्यों की भेट हुई।
दोनों ही पीठों के अधिकारिक insragram अकाउंट से इस बात की जानकारी प्रसारित हुई।
श्री द्वारका शंकराचार्य जी वाला पेज "जगदगुरु शंकराचार्य" शब्द का प्रयोग कांची पीठाधिपति के लिए नहीं करता है। "कांची के आचार्य" ऐसा ही केवल लिखा है।
और श्री कांची पीठ वाले पेज की पोस्ट में कांची पीठाधिपति के लिए "जगदगुरु शंकराचार्य" ऐसा लिखा गया है किन्तु श्री द्वारका पीठाधिपति के लिए शंकराचार्य तो लिखा लेकिन जगदगुरू नहीं लिखा।
तो एकमात्र सर्वोच्च सर्वमान्य सार्वभौम अकाट्य जगद्गुरूत्व में एक दूसरे को भी जगद्गुरु नहीं मान रहे।
अब रही बात की कांची पीठाधिपति शंकराचार्य हो सकते है कि नहीं, तो इस विषय में जो शास्त्रीय बात है अगर उसको
विस्तृत रूप से देखने का सामर्थ्य किसी में न भी हो, तो कम से कम धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाभाग जिनको वर्तमान के लगभग सभी शंकराचार्य अपने गुरु के रूप में देखते हैं, उन्होंने विदेश यात्रा के खण्डन में जो ग्रन्थ लिखा है उसमें "कांची के शंकराचार्य" शब्द के साथ ही परिचय दिया और शंकराचार्य अगर है तो फिर जगदगुरु शब्द तो नैसर्गिक ही हो जाता है।
ये वास्तविक हाल है 2500 की परम्परा के मठों का।
हर हर शंकर जय जय शंकर
2 days ago | [YT] | 89
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Dnyanesh
|| बहिष्कारपत्र एवं निषेधाज्ञा ||
वैशाख कृष्ण सप्तमी
वैक्रम - २०८३, गुरुवार
श्रीमणिकर्णिका घाट, काशी
| उच्च (=नीच) एवं उच्चतम (=नीचतम) - (अ)न्यायपालिका में बैठे (अ)न्यायमूर्तियों के धार्मिक बहिष्कार की घोषणा |
हिन्दुओं ! भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियों के कर्तव्य, अधिकार और सम्मान निश्चित एवं शास्त्रीय अनुशासन से सुरक्षित किये गये हैं। श्रीमहाशास्ता हरिहरनन्दन अयप्पा स्वामी के सबरीमला देवस्थान में रजस्वला स्त्रियों के प्रवेश को लेकर भारत में रहने वाली एक स्त्री ने, जो न्यायपालिका में नौकरी करती है, एक मूर्खताजन्य दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी की है जो धर्म एवं राष्ट्र के लिए अहितकारी है। जैसा कि आप जानते हैं भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के रूप में प्रसिद्ध अमाननीय उच्चतम न्यायालय हिन्दुओं के शास्त्रीय अनुशासन के विरुद्ध अपने मनोरोग और नीच मानसिकता का प्रदर्शन समय समय पर करता ही रहा है। अब इसमें नित्य नवीन आयाम प्राप्त किये जा रहे हैं। जिस संस्था को नैतिकता, न्याय और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है वहाँ ऐसे दुश्चरित्र अशिक्षित मनोरोगी भर गये हैं जो इस देश को भीतर से खोखला कर रहे हैं।
पहले ही इस देश को विदेशी पैसों पर पलने वाले दोपाये कुत्तों ने हिन्दू कोड बिल और मन्दिर अधिग्रहण एक्ट आदि के नाम पर सनातनी मठ, मन्दिर एवं गुरुकुलों को नष्ट एवं विकृत किया है और पूरे देश को मूर्ख बनाते हुए सिद्ध तथ्य "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" को न केवल नकार कर, अपितु ऐसा कहने वालों को दण्डित करके, भारतीयों को ठगने वाली (अ)न्यायपालिका प्रत्यक्ष रूप से देशद्रोह कर रही है। इसी कड़ी में सनातन धर्म की पवित्रता को डँसने हेतु तैयार एक नागिन अन्यायमूर्ति नागरत्ना ने पिछले दिनों एक ऐसा मूर्खतापूर्ण एवं दण्डनीय वक्तव्य दिया है जो अक्षम्य है। यह नागिन स्वयं को एक प्रगतिशील, शिक्षित एवं उदारवादी सशक्त महिला के रूप में दिखाने की चेष्टा तो करती है किन्तु इसकी विषभरी फुंफकार समय समय पर इसके हृदय में भरे हिन्दूद्रोह को स्पष्ट कर देती है। विदेशी हिन्दूद्रोही सत्ताओं के प्रति श्रद्धा रखने वाले और उन्हें आदर्श समझने वाले ऐसे नास्तिकों के मन में भारतीय समाज और संस्कृति के प्रति कोई सम्मान नहीं है अतः धर्मप्राण समाज को चाहिए कि ऐसे मूर्खों को माथे पर चढ़ाना बन्द करे। अंकिता भंडारी, मानसी सोनी आदि अनेक स्त्रियों पर बलात्कारी राजनेताओं के द्वारा हुए अत्याचारों पर अन्यायमूर्ति नागरत्ना की जिह्वा को लकवा मार जाता है। इस देश में जब बढ़ते व्यभिचार को रोकने हेतु पोर्नोग्राफी पर प्रतिबन्ध लगाने की बात होती है, तब भी सुप्रीम कोर्ट पोर्नोग्राफी पर प्रतिबन्ध लगाने से मना कर देता है, नागरत्ना की जिह्वा वहाँ भी लकवाग्रस्त हो जाती है।
अतुल सुभाष जैसे लोग न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर आत्महत्या भले कर लें पर उस दोषी महिला और जज को दण्डित करने के स्थान पर जमानत एवं पदोन्नति मिलती है और न्यायपालिका के चरित्र को भरे बाजार में नंगा करने वाले यशवन्त वर्मा की यशोगाथा तो आप सब नित्य सुन ही रहे हैं। एक ड्रग माफिया, जमीन दलाल और जिसके विषय में पहले के ही जज एके गोयल ने सतर्क किया था, ऐसा सूर्यकान्त इस देश की सर्वोच्च न्यायिक गद्दी पर बैठकर खुलेआम न्यायपालिका में चल रहे भ्रष्टाचार को संरक्षण देता है, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या है ? ध्यान रहे, वह वही मूर्ख है जिसने देशभर में इस्लामी आतंकवादियों के द्वारा हो रही हत्याओं का उत्तरदायी इस्लामी उन्माद को नहीं, नूपुर शर्मा के कथन को ठहराया था। जब कुछ दिन पूर्व बीआर गवई ने भगवान् विष्णु का अपमान किया था तो पूरे सुप्रीम कोर्ट के किसी एक भी जज की "औकात" हुई उसके विरुद्ध कुछ बोलने या करने की ? विकास की आड़ में अपने मित्रों को ठेकेदारी बांटने के लिए अनेक तीर्थस्थलों में सङ्घ, भाजपा के द्वारा तोड़े जाने वाले मन्दिरों को बचाने हेतु अथवा सत्ता के साथ साथ विपक्षी कांग्रेस, डीएमके आदि के द्वारा विभिन्न राज्यों में अवैध रूप से कब्जा किये गए मठ मन्दिरों को उनके मूल रूप में संरक्षित करने हेतु कोई तत्परता इन सुप्रीम नालायकों के द्वारा दिखायी गयी कभी ?
इस देश में खुलेआम ब्राह्मणों को मारने की बात होती है। दिल्ली के ही अनेक विश्वविद्यालयों में प्रशासन की जानकारी में ही ब्राह्मणों की बहू बेटियों के बलात्कार के नारे लगते हैं। बिहार में मात्र क्षत्रिय होने के कारण एक निर्दोष कन्या का बलात्कार करके उसकी हत्या सत्ता और न्यायपालिका के प्रिय "शोषित वंचित समाज" के लोगों ने की तब नागरत्ना जीवित थी या मर चुकी थी ? महालिंगम् की ब्राह्मणफोबिया के विरुद्ध याचिका को निरस्त करने हेतु नागरत्ना ने पिछले महीने ही कठोर शब्दों में फट्कार लगायी थी और कहा कि हम सभी लोगों के विरुद्ध "हेट स्पीच" को अस्वीकार करते हैं पर नागरत्ना ने यही बात ST SC ACT पर क्यों नहीं बोली ? इसका कारण है कि नागरत्ना जैसी स्त्रियां स्वयं ही सनातन धर्म और उसके उपदेष्टा अनुपालन ब्राह्मणों से घृणा करती हैं। अब अगर नागरत्ना के आंख, कान और सबसे बढ़कर मानसिक स्थिति ठीक से काम कर रहे हों तो वर्तमान में ही संघी श्वान सांसद साक्षी (महाराज ?) के द्वारा ब्राह्मणों के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से दिए गए "हेटस्पीच" पर कुछ दण्डात्मक कार्रवाई करके दिखाए। कर ही नहीं सकते !
हिन्दुओं ! यह तो वह सुप्रीमकोर्ट है जो ऐसे मनोरोगियों से भरा है ― जो व्यभिचार को नहीं, कन्यादान को अपराध मानते हैं। जो श्रीरामचरितमानस जलाने को नहीं, अपितु दही हांडी फोड़ने को अपराध मानते हैं। जो घूस लेकर जजमेंट देने को नहीं, अपितु उसपर चर्चा करने को अपराध मानते हैं। भारत को यदि विकसित, सुरक्षित और नैतिक बनना है तो न्यायपालिका जैसी अनैतिक एवं देशद्रोही संस्थाओं का कठोर दमन एक अनिवार्यता है क्योंकि भारतीय न्यायपालिका के अनेक निर्णयों में अन्यायमूर्तियों ने यह स्पष्ट कहा है कि नैतिकता और कानून दोनों अलग अलग हैं। ऐसा कहकर कानून की आड़ में अनैतिकता को बढ़ाते हुए समाज को उपद्रवियों से भरने वाले ये जज उन्हीं कानूनों की सीमा में स्वयं और अपने प्रिय उद्योगपति, नेताओं और अधिकारियों को लाकर उनके विरुद्ध निर्णय क्यों नहीं देते ?
कुछ दिन पूर्व नागरत्ना ने विवाह से पूर्व सम्भोग के विरुद्ध एक सकारात्मक बात कही थी, जिसके बाद आधुनिक पीढ़ी के वेश्यागामी पुरुष एवं लिव इन रिलेशनशिप वाली अनेक रखैलों ने नागरत्ना को कड़ी फट्कार लगायी थी। परिणामस्वरूप, नागरत्ना ने उनके नंगेपन के विरुद्ध अपनी जीभ लपलपानी बन्द कर दी। जब वेश्याओं में इतनी एकता हो सकती है तो क्या सनातन धर्म के प्रति निष्ठा रखने वाली, श्रीसीता, अनसूया, द्रौपदी, रुक्मिणी, मैत्रेयी को आदर्श मानने वाली स्वधर्मनिष्ठ पतिव्रता स्त्रियां बी*वी नागरत्ना जैसी शूर्पणखा, ताड़का, पूतना के विरुद्ध एकजुट नहीं हो सकती हैं ? जब सुप्रीमकोर्ट स्वयं को धर्मनिरपेक्ष संस्थान मानता है तो इन्हें यह अधिकार किसने दिया कि धर्म से जुड़े शास्त्रीय विधिनिषेध पर कुछ भी बोलें ? आखिर इन नास्तिकों की इतनी "औकात" हुई कैसे ? अवश्य ही हम हिन्दुओं के मौन के कारण।
कोरोना के समय जानबूझकर लोगों को वैक्सीन के नाम पर जहर दिया जाता था, बार बार उनके जीवन और स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकारों का हनन होता रहा, जिसका दुष्प्रभाव व्यापक रूप से सामने आया भी, तब ये अन्यायमूर्ति किस वेश्यालय में घुसे पड़े थे ? धार्मिक आयोजनों में कोर्ट ने महामारी संक्रमण का बहाना बनाकर रोक लगा दी थी किन्तु उसी समय सबके सामने चुनावी रैलियों में लाखों की भीड़ हो रही थी। इस देशद्रोह की अनुमति देने हेतु न्यायपालिका ने कितनी घूस ली थी ? सबसे बढ़कर कोरोना के समय छुवाछूत को बढ़ाने वाली सरकार और उन्हीं "कोविड गाइडलाइंस" के नाम पर फैसला देकर छुवाछूत बढ़ाने वाली न्यायपालिका आज छुवाछूत मिटाने के नाम पर रजस्वला स्त्रियों को बलपूर्वक हमारे पवित्र देवालयों में घुसाने चली है ? आज तीन दिन की अशुद्धि को "समझ से बाहर" बताने वाली नागरत्ना तब यह क्यों नहीं पूछ रही थी कि नैनोग्राम्स वाला कोई वायरस एक क्विंटल के मनुष्य को कैसे संक्रमित कर सकता है ? क्योंकि विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने संक्रमण को सिद्ध किया था। ऐसे ही धार्मिक शुद्धि और विधिनिषेध के विशेषज्ञ शास्त्रीय आचार्यों के अनुशासन में मर्यादामूलक छुवाछूत का पालन अनिवार्य है और उस मर्यादा के विरुद्ध भौंकने वालों का सशस्त्र विरोध होना चाहिए। सबसे बढ़कर होना तो यह चाहिए था कि यदि न्यायपालिका में नैतिकता थी, तो शास्त्रीय मर्यादाओं के सम्मान और संरक्षण के साथ यह आज्ञा देती कि मन्दिरों में शास्त्रीय विधि के अनुरूप ही प्रवेश की अनुमति या प्रतिषेध प्रभावी हो। न केवल रजस्वला स्त्रियां, अपितु भ्रूणहत्या, गोहत्या, ब्रह्महत्या, वेश्यागमन आदि पातकों से युक्त, लोकबाह्य म्लेच्छ अथवा समानान्तर प्रतिषिद्ध जनों का देवालय में प्रवेश निषिद्ध हो। किन्तु ऐसा न हुआ और न होगा क्योंकि कदाचित् चार पैर वाले कुत्तों की पूंछ सीधी हो सकती है पर दो पैर वालों की नहीं होगी।
जिस न्यायपालिका में अभिषेक मनु सिंघवी के द्वारा "जज कब बना रहे हो" की पद्धति से स्त्रियां जज बनती हों और जहां मार्कण्डेय काटजू जैसे नास्तिक भरी अदालत में महिलाओं को आंख मारकर / मरवाकर फैसले सुनाते हों, जिस न्यायपालिका में व्यभिचार और वेश्यावृत्ति को कानून के नाम पर संरक्षण दिया जाता है, उसे इस देश की जनता बहुत पहले ही कोर्ट नहीं, कोठा जान चुकी है, समझ चुकी है। अतः समस्त मान्य सम्प्रदायों के समस्त आचार्यों को यह परामर्श दिया जाता है कि समय रहते ऐसे महानीच मनोरोगियों के विरुद्ध एकजुट हों, मुखर हों। अपने सम्प्रदाय, मठ, मन्दिर, संस्कृति और पारलौकिक अभ्युदय का उपदेश अपने अनुयायियों को करते हुए सुप्रीमकोर्ट जैसी नास्तिक संस्थाओं के आक्रमण से सनातन धर्म की रक्षा करें।
भारतीय न्यायपालिका में बैठे ऐसे न्यायाधीश तथा अधिवक्ता, जो स्वयं को "सनातनी" मानते हों, उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि इस दुर्व्यवस्था के विरुद्ध एकजुट होकर शोधन करें ताकि कोई देशद्रोही मनोरोगी अपने सामने परोसी गयी शराब और वेश्या के कारण स्वयं को "योर लॉर्डशिप" मानता हुआ सनातन धर्म की शास्त्रीय मर्यादा को क्षतिग्रस्त न करे। पौरोहित्य से आजीविका चलाने वाले धर्मप्राण ब्राह्मणों अथवा विभिन्न तीर्थपुरोहितों के संगठनों से भी यह आशा की जाती है कि अन्यायपालिका के ऐसी दोगली मानसिकता वाले नालायकों के घरों में विवाह, गृहप्रवेश, श्राद्ध, नवरात्र आदि अनुष्ठानों का परित्याग करें, धनलोभ न करें। वैसे भी आप सब इनके लिए "नौकर" से अधिक कुछ नहीं। जो सनातनी हिन्दू हमारे द्वारा धर्मोपदेश सुनने हेतु विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन की योजना बना रहे हैं अथवा बना चुके हैं, उन्हें भी यह निर्देश दिया जाता है कि हमारे कथामंच पर भारतीय अन्यायपालिका से जुड़े किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट के किसी भी जज को आने की अनुमति न दें।* यदि कोई आ जाये तो उसका वशिष्ठस्मृति, मनुस्मृति एवं सम्बद्ध ग्रन्थों के द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए उस दुराचारी का बहिष्कार करके उसे यथासम्भव दण्डित करें। यदि दुर्भाग्य से आपके निकटवर्ती परिजन में कोई व्यक्ति हाईकोर्ट अथवा सुप्रीमकोर्ट का जज हो एवं उसे निमन्त्रण देना आपकी विवशता हो तो आपका आयोजन तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।
*चौपाये श्वान का कथामंच पर चढ़ना भी इसी के साथ निषिद्ध समझा जाये।
"The dogs can't be allowed barking further. Before they start biting us hysterically, they need to be tamed, either by biscuits or belt because the lowest intellects are often found in India's highest courts."
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः"
― श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानन्द गुरुजी महाभाग
3 days ago | [YT] | 183
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Dnyanesh
क्या हिन्दू धर्म अब Religion कि श्रेणी में जाने के लिए अग्रसर हो रहा है?
"शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च – एकमात्र – सार्वभौम धर्मगुरु होते हैं "
इसका इतनी तीव्र गति से प्रचार किया जा रहा है कि सर्वाधारण हिन्दू तो बुद्धि से पंगु बनकर आगे कुछ भी सोचने की विचारक्षमता ही खो रहा है।
कुछ आचार्यगण और विद्वज्जन भी स्वार्थवश इसपर या तो मौन है या इस भ्रम को व्यापक रूप से प्रसारित करने में योगदान दे रहे हैं।
क्या 2500 वर्ष पूर्व धर्म था कि नहीं?
भगवत्पाद श्री आदि शंकराचार्य जी ने किस परम्परा में संन्यास ग्रहण किया? अर्थात् पहले भी धर्म होने की बात सिद्ध हो रही है कि नहीं?
फिर ये भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है, शंकराचार्य सर्वोच्च धर्मगुरु हैं जैसे ईसाईयों के पोप होते है....आदि?
इसके दूरगामी परिणामों का किसी ने विचार किया है?
आगे चलकर कहेंगे कि शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु होते हैं 2500 वर्ष पूर्व परम्परा प्रारम्भ हुई। फिर माना जायेगा कि यहीं से हिन्दू धर्म प्रारम्भ हो गया।
1500 वर्ष पूर्व आया इस्लाम
2000 वर्ष पूर्व आया ईसाई
और 2500 वर्ष पूर्व हिन्दू??
तो उससे पहले क्या था?
तो कहे की जैन और बौद्ध धर्म थे।
तो फिर विधर्मी तो यही प्रचार कर रहे है भाई की हिंदुओं ने बौद्धों को खत्म किया।
बौद्ध स्थलों को हिन्दू मंदिरों में परिवर्तित कर दिया।
जैन तो कहते ही हैं कि भगवती सीताजी ने उड़ीसा की थी।
कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं।
वर्तमान काल तक सीमित स्वार्थ सिद्ध के लिए सनातन की दूरगामी हानि कहां तक उचित है?
शंकराचार्य अपने संप्रदाय में सर्वोच्च हो सकते हैं।
और अन्य संप्रदायाचार्यो के समकक्ष।
शासकों पर शासन करना सभी संप्रदायाचार्यो का दायित्व है। एकमात्र शंकराचार्य का नहीं।
सभी संप्रदायचार्य, यति, सन्त राजा के उपर होते हैं।
एकमात्र शंकराचार्य नहीं।
सनातन की पुनर्स्थापना में निश्चित ही शिवावतार श्री आदिशंकराचार्य जी का अप्रतिम योगदान है। किन्तु उसके कारण ये उनकी परम्परा के आचार्य धर्म के सर्वोच्च नहीं कहे जा सकते।
सनातन धर्म में पोप जैसा एकमेव सार्वभौम आचार्य नहीं होता।
अथवा कोई प्रमाण प्रस्तुत कर दे कि पूर्वकाल में - पूर्वयुगों में एकमात्र सार्वभौम आचार्य कौन थे?
4 days ago (edited) | [YT] | 81
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Dnyanesh
साथ के चित्र में (लिंगपुराण–श्लोक संख्या६०) स्पष्ट कहा गया है कि मनीषियों द्वारा ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र, मीमांसा – न्याय की रचना की गई। कुछ मनीषी इतने ही विभाजन को पर्याप्त मानकर इसमें स्थितिमति हो गए। किन्तु अन्य मनीषी विभाजन को न्यून मानकर इसका विस्तारमें प्रवृत्त हो गए।
तो जो लोग इसी बात पर स्थित हो गए कि इतना ही पर्याप्त है वो लोग आगे के विषयों को नहीं देखना चाहते है।
लेकिन बहुत से मनीषी आगे भी प्रवृत्त हुए!
जिसमें इतिहास पुराण इत्यादि विशिष्ट भेद प्राप्त होते है। इतिहास पुराण आदि के अनुशीलन की आवश्यकता यदि नहीं होती तो वो सब मनीषी क्यों आगे बढ़ते? और इतिहास पुराण का अनुशीलन नहीं करेंगे तो फिर अन्न इत्यादि से प्रोक्षण का और अन्न इत्यादि से पिष्टपशु यज्ञ का विधान कैसे प्राप्त होगा?और जो लोग प्रत्यक्ष पशुआलाभन ही केवल मानते हैं वो जरा गोमेध कर के दिखाएं, गाय प्रत्यक्ष काटकर दिखाएं, शूलगव में बैल काटकर दिखाएं।
उनका हाथ कांप जायेगा, दृढ़ वेद का संस्कार भी वहां कम नहीं करेगा।
सोमानी ने तो कभी स्वयं गोमेध किया नहीं।
यदि मीमांसा से ही सब कुछ निर्णय हो जा रहा है, तो किस युग में कौनसा कार्य करना है –
अश्वालंभं गवालंभं... वाले श्लोक इत्यादि जो प्रमाण में देते हैं बड़े बड़े मीमांसक, की ये सब कलियुग में निषिद्ध है –
ये मीमांसा के किस अधिकरण से सिद्ध हो पाता है?
तो इसके लिए तो पुराण का ही आश्रय लेना पड़ता है।
(कलिवर्ज्य प्रकरण – अश्वमेध, गोमेध, नरमेध आदि कलियुग में निषिद्ध है)
वशिष्ठ, चरक आदि के वचन मिलते हैं जिनके अनुसार गोमेध के प्रभाव से अनेकानेक रोगों के प्रदर्भाव की बात कही गई है।
जितने भी शास्त्र हैं उन सब अनुशीलन तो करना पड़ेगा। ऐसा नहीं कर सकते कि जिससे हमारी बात सिद्ध होती हो उसे ही पकड़कर बैठे रहें!
श्रीमद्देवीभागवत में ऐसे अनेक वचन मिलते हैं जहां उत्तम कोटि के ब्राह्मणों के द्वारा अन्न से यज्ञ का वर्णन मिलता है और प्रत्यक्ष पशु आलभन करनेवाले ब्राह्मणों को किञ्चित् न्यून कोटि में रखा है।
किन्तु अब बात ऐसी है कि प्रत्यक्ष पशु आलभन में एक बार मन बैठ गया तो बैठ गया। उसपर आगे कोई चिन्तन करना ही नहीं है।
केवल अपूर्व विधि और नियम विधि की बाते करते रहना है।
अपूर्व विधि इनके मत में मान्य है किन्तु एक ही यज्ञ करने की दो विधियां यदि प्राप्त हो रही हो और उन दोनों विधियों का शास्त्र में आचरण के रूप में आचार्योद्वारा अनुसरण भी किया गया हों तो वहां पर फिर उस दृष्टि से ये चिंतन क्यों नहीं करते?
और मीमांसा का निषेध तो कर नहीं रहें।
लेकिन मीमांसा को भी किस मामले में, कहां कितना व्यावहारिक रूप से प्रभावित होना है या नहीं होना है इस बात को लेकर ये लोग कलिवर्ज्य प्रकरण मानते है कि नहीं मानते हैं? और अगर यह नहीं मानते हैं तो इनके व्यक्तिगत ना मानने से क्या अन्य आचार्यगण भी नहीं मानते हैं?
जिस कर्म का आचरण देखा गया और जिस कर्म का प्रभाव देखा गया उस कर्म का प्रमाण शास्त्रों में प्राप्त होता है तो उसको हम न देखें। केवल एक मीमांसा के माथे को पकड़ घर बैठे रहे और पशुओं को पकड़कर काट दें, तो हो गया यज्ञ।
अनेकानेक वचनों में पिष्टपशु की महिमा बताई गई है उसको हम भूल जाएं और उसको अर्थवाद कह दें !
मतलब इनके वाले जितने वाक्य है वो सब यथार्थ होते है। जो जैसा है वैसा ही अभिधा में लेना है।
लेकिन निग्रहाचार्य द्वारा प्रस्तुत प्रमाण सब अर्थवाद हो जाते हैं।
जबकि वहां शास्त्र उसे अर्थवाद कह भी रहा है या नहीं ये देखना तक नहीं है।
एकबार सोमानी ने बोल दिया कि अर्थवाद है तो उतने सारे ग्रन्थ सीधे सीधे अर्थवाद हो गए!!
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हरिश्चंद्र महाराज जब नरमेध करने बैठे थे तो प्रत्यक्ष नर आलभन के बिना उसे कैसे पूर्ण मान लिया वरुण देव ने?
उपरिचर वसु जब प्रत्यक्ष पशु आलभन का ही निर्णय दिया तो उनको क्यों रसातल जाना पड़ा ? ऋषियों के शाप के कारण ?
कुल मिलाकर केवल प्रत्यक्ष पशु आलभन की ही बात होती तो न तो उपरिचर वसु को पाताल जाना पड़ता और न ही राजा हरिश्चंद्र का यज्ञ पूरा माना जाता। लेकिन इतिहास के दोनों ऐसे उदाहरण हैं जिनको लिखित शास्त्रवाक्य भी समर्थन देते है।
पिष्टपशु का भी अथवा सांकल्पिक पशु का भी वर्णन मिलता है। उसका आचरण किया जाता है। उसका फल भी प्राप्त होता है। वह निष्फल नहीं होता है। वैसा ही फल प्राप्त होता जैसा शास्त्र में वर्णित है।
हमें मीमांसा से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मीमांसा की एक वाक्य की पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष सिद्ध इतिहास और शास्त्रवाक्यों उपेक्षा करना बुद्धिमानी है ऐसा भी नहीं हो सकता।
और जो ऐसा मानता हैं वो इन शास्त्र वाक्यों को स्वयं प्रामाणिक नहीं मानते तो वह किसी भी प्रमाण पर कैसे चर्चा करने के अधिकारी हो सकते है कि क्या प्रमाण है और क्या नहीं है!!
5 days ago | [YT] | 96
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