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Dnyanesh
परम पूजनीय स्वामिश्री के जगद्गुरुत्वारोहण पर कुछ चिन्तन:–
मन्थानभैरवतन्त्र आदि के अनुसार निग्रह सम्प्रदाय के आद्याचार्य जगद्गुरुत्व से सुशोभित हैं। उनके परवर्ती आचार्यों के लिए भी अनेक पुराण, आगम में यह वर्णित है। शिवधर्मोत्तरपुराण में वर्णित जगद्गुरु शब्द की परिभाषा को वर्तमान निग्रहाचार्य अपने आचरण से चरितार्थ करते हैं। जिस प्रकार से जगद्गुरु शब्द का खिचड़ी के समान वितरण हो रहा है, उसे देखते हुये पू० श्री श्रीभागवतानन्द गुरु जी ने इस शब्द का अधिग्रहण अपने पूर्वाचार्यों के अनुसार अपने नाम के आगे किया है ताकि परिभाषा के अनुरूप व्यवहार करके इसकी साधुता रक्षित हो।
किसी को समस्या हो तो वह समझें, न हो तो भी वह समझें।
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यहां 20-25 K महीना कमा सके इतनी भी जिनकी बौद्धिक क्षमता नहीं, वो लोग भी प्रपंच करके कहीं न कहीं किसी न किसी मठ में चापलूसी कर के या किसी न किसी के कृपापत्र बनकर जगद्गुरु बनकर घूम रहे हैं और कोई कुछ कह नहीं रहा है।
एक से एक व्यभिचारी कुकर्मी, यहां तक कि तृतीय पंथी तक शंकराचार्य और जगद्गुरु बनकर घूम रहे हैं।
तो जब जगद्गुरु बनाने के लिए ये कुछ अर्हता देख ही नहीं रहे हैं, तो कम से कम जो शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार अर्हता धारण करते हैं उनको लगाने में क्या समस्या हो रही है!
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जो पूछते हैं कि पू० स्वामिश्री को किसने जगद्गुरु बनाया है उनको मै पूछना चाहता हूं कि कौन है जो जगद्गुरु बनाता है? और कैसी पद्धति से बनाये जा रहे हैं?
अभी तक जिन्होंने "जगद्गुरु" लगाया है उनको किसने बनाया? और किस योग्यता और अधिकार पर बनाया है?
खाली भंडारा करा करा के ???
जो पैदा हो रहा है वो जगद्गुरु ही बने जा रहा है!
श्री निग्रहाचार्य जी महाराज तो शास्त्रीय परिभाषा यथार्थ कर रहें हैं।
शास्त्र यह कहता है कि काम, मोह, मद में डूबे हुए राजाओं को अनुशासित करने वाला जगद्गुरु होता है।
तो जिस प्रकार निग्रहाचार्य अनुशासित करने के लिए बोलते हैं उस प्रकार से तो कोई बोलता हो नहीं। साहस ही नहीं इतना किसी का।
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एक बात यहां स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूं । 💪🏼💪
निग्रहाचार्य को न किसी के मंच पर जाना है न ही अपने मंच पर किसी को बुलाना है।
निग्रहाचार्य का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है।
निग्रहाचार्य की अपनी सत्ता है, अर्थात् अपनी लकीर – धर्म की।
उस लकीर में कोई फिट बैठता है तो ठीक । नहीं बैठता है तो मत आओ।
निग्रहाचार्य का अपना पथ है।
ऐसे भी निग्रहाचार्य के कार्य में किसी का प्रगल्भ सहयोग तो मिल नहीं रहा। कुछ एक दो का आंशिक छोड़ दे तो।
जब स्वयं के भरोसे ही बीड़ा उठाना है तो फिर निग्रहाचार्य विधिवत् ही उठायेंगे न!!
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एक जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का उदाहरण देखिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी कहते हैं"शूद्र के पास समय और धन नहीं था इसलिए वेद नहीं पढ़ा।"
ये है इनका जगद्गुरुत्व!
प्रमोद कृष्णम जगद्गुरु बनकर घूम रहा है जो कहता था, "नहीं है मोहम्मद का वो हमारा हो नहीं सकता"
साईं के सामने माथा टेकनेवाले कैलाशानंद, अवधेशानंद, रविन्द्र पुरी ये सब महामंडलेश्वर जगद्गुरु है।
ये सब कहने का कारण ये है कि निग्रहाचार्य को मान्यता देने की योग्यता ही किसी में नहीं है।
इसीलिए निग्रहाचार्य ने अपने जगद्गुरुत्वारोहण के उत्सव में किसी को आमन्त्रित नहीं किया।
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निग्रहाचार्य ने घोषणा की है कि निग्रहाचार्य जगद्गुरु हैं।
किसी को मानना है तो माने नहीं मानना है तो मत माने।
किन्तु आगे बात ये है की जो निग्रहाचार्य को नहीं मानेगा वो भी कहीं न कहीं भय के कारण या कहीं न कहीं लोभ के कारण उन सभी अयोग्य लोगों को जगद्गुरु बोलकर दंडवत तो करेगा ही।
तो निग्रहाचार्य को जो स्वसंप्रदाय उद्धार संस्थापना करनी है वो तो करेंगे ही। और अपनी शैली से करेंगे।
उसमें कोई आज माने या दस वर्ष बाद माने या उनके देहविसर्जन के सौ वर्ष पश्चात् माने।
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ये जितने बड़े बड़े सिंहासनासीन बैठे हैं, इनको यदि पूछा जाए कि सिंहासनाधिपति देवताओं का मंत्र क्या होता है?
सिंहासन के जो चार चरण आपने स्थापित किए हैं, उन चारों चरणों मे क्रमशः किन देवताओं की किस क्रम से प्रतिष्ठा होती है?
उन देवता से संबंधित मंत्र क्या हैं?
सिंहासन के षडेश्वरी के ६ ऐश्वर्यों के मंत्र कौन से होते हैं?धर्म, ज्ञान, वैराग्य इत्यादि की प्रतिष्ठा होती है, तो उनमें किन किन देवताओं की किस किस मंत्र से आप प्रतिष्ठा करते हैं?
संप्रदाय के भेद से उसमें क्या है? शाक्तों के लिए, शैव, वैष्णव, शांकरों के लिए?
इनमें से एक प्रश्न का भी उत्तर नहीं दे सकेंगे।
कोई कोई जगद्गुरु ने तो ये सब सुना ही पहली बार होगा।
केवल आकर्षक सजावटी और अलंकृत (Fashionable) सिंहासन पर बैठ गए और भंडारा करा के पांच दस लाख का चंदा अखाड़ों को दे दिए तो बन गए जगद्गुरु!
अच्छा ठीक है इसी पद्धति से ही बने जगद्गुरु तब भी बाद में तो काम करना चाहिए कि नहीं! उसके बाद तो धर्मानुसार जो कथन जिस प्रकार से प्रयुक्त होना चाहिए वो तो बताओ।
वो तो लक्षण दिखने चाहिए कि नहीं समाज में !
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किसी भी संप्रदाय के आचार्यगण जो सम्मान को प्राप्त हुए वो वैभव के कारण सम्मान को प्राप्त किए या अपने त्याग, संतोष और निर्भयता के कारण सम्मान को प्राप्त किए?
त्याग, संतोष और निर्भयता रहेगी।
वैभव तो आगे पीछे घटने बढ़ने वाला है।
व्यक्तित्व अक्षोभ्य होना चाहिए।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।।
माना कि उतना व्यवहार जगत में सम्भव नहीं, किन्तु अधिकाधिक प्रयास तो करें। अपनी निष्ठा से प्रयास तो करें।
अब स्वामी राघवाचार्य जगद्गुरु है। और धीरेंद्र, प्रदीप मिश्र, चिदानंद अरोड़ा के साथ एक ही प्लेट में खा रहे हैं।
ये कैसा व्यवहार है!!! ये सर्वथा अनुचित है।
इससे तो आचार्यत्व की हानि होगी।
किन्तु, है कोई माई का लाल जो कह दे कि राघवाचार्य जी जगद्गुरु नहीं है?
यहां तक कि जो शांकर कहते हैं कि शंकराचार्य ही एकमात्र जगद्गुरु होते हैं वो शांकर भी राघवाचार्य को जगद्गुरु मानते हैं।
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पूज्य स्वामिश्री निग्रहाचार्य जी महाराज ने जो प्रयाग में कहा था यथा नान्यो जगद्गुरुः।
"जो हैं वो बहुत अच्छे हैं। हम को और अच्छा करना है।
आप विद्वान हैं। हम को और अधिक अध्ययन करना है, और अधिक शास्त्रों में डूबना है।
आप अच्छे वक्ता हैं। हमको और अधिक मुखर होकर धर्म के लिए बोलना है।
आपमें जो सद्गुण हैं उनको अधिक से अधिक अपने चरित्र में बढ़ाकर अपनाना है।
यही प्रतियोगिता है सबसे।
आप में जो दुर्गुण है उनसे का कम से के कम प्रभावित होना है।
(अब दुर्गुण तो जान बूझकर नहीं लाना है किन्तु कलियुग में ऐसा प्रभाव तो पड़ता ही है। उसे कम से कम करना है ये कहने का तात्पर्य है।)
शिष्यसंख्या बढ़ाना और अर्थसंग्रह में प्रतियोगिता नहीं।
आपके सद्गुण हम अपने में कई गुणीत वृद्धि करके दिखायेंगे और आपके दुर्गुणों को कई अंश में कम कर के दिखायेंगे।
इस प्रकार की प्रतियोगिता है।
ये है निग्रहाचार्य की स्वस्थ विचारधारा।
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किन्तु इतने गंभीर और उच्चतम भाव को समझने की जिनमें क्षमता नहीं है उनको निग्रहाचार्य महत्वाकांक्षी, दुर्बुद्धि लगते हैं, स्वयंभू या और भी कितने ही आरोप लगते है।
जिसको आरोप लगाना ही है वो तो लगायेगा ही।
न देवताओं के प्रति सद्भाव ना ग्रंथों के प्रति सद्भाव!
जिसको जो समझ में आए वो उचित मानते है और नहीं तो प्रक्षिप्त घोषित कर देते हैं।
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ध्यातव्य:–
१) निग्रहाचार्य ने यह नहीं कहा है कि वे जगद्गुरु बन रहे हैं।
निग्रहाचार्य ने पूर्वाचार्यों द्वारा प्राप्त उस उपाधि का उद्घोष मात्र किया है।
बाकी शिवधर्मोत्तर पुराण की परिभाषा के अनुसार आचरण तो वे पहले से करते ही आ रहे हैं।
२) संज्ञात इतिहास में किसी भी संप्रदाय के किसी भी मान्य आचार्य ने जगद्गुरु शब्द का शास्त्रीय अर्थ व्यक्त नहीं किया है।
निग्रहाचार्य एकमात्र ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने यह व्यक्त किया है।
जगद्गुरु की शास्त्रीय अर्हता पर देखेंगे या किसी लौकिक– पुरी शंकराचार्य जी महाभाग के शब्दों में भय, प्रमाद, विप्रलिप्सा, कोरी भावुकता से ग्रस्त व्यक्ति के सर्टिफिकेट पर चलेंगे?
और यदि ऐसे सर्टिफिकेट पर ही चलना है तो रामपाल भी जगद्गुरु है। एक लाख अनुयायि है और किसी भी क्षण दस बीस करोड़ व्यय करने का सामर्थ्य है।
फिर रामपाल को जगद्गुरु मानने में क्या समस्या है?
अस्तु।
फिर भी किसी को आपत्ति हो तो जितने जगद्गुरु पहले बन चुके हैं उनके चरित्र को और निग्रहाचार्य के सिद्धान्त को आपस में तौल ले आपत्ति से पहले।
*** निग्रह प्रवेशिका में "निग्रहाणाम् जगद्गुरुत्वं" एक स्वतन्त्र प्रकरण के रूप में ही वर्णित है।
धर्म संरक्षणार्थायाधर्मसंहारहेतवे ।
निग्रहाणाञ्च धर्माज्ञा लोके लोके प्रवर्द्धताम् ।।
बाह्यान्तर कलामध्ये भाण्डब्रह्माण्ड चारिणीं ।
वेश्यदां त्रिगुणातीतां वन्दे निग्रहकारिणीं ।।
🌹🌹🌹🌹🌹
2 hours ago | [YT] | 56
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Dnyanesh
आज के स्वामिश्री के वक्तव्य पर सहज और सरल अंतःकरण के जगद्गुरु स्वामी विद्याभास्कर जी महाभाग इनकी टिप्पणी
7 hours ago | [YT] | 34
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Dnyanesh
पूज्यपाद जगद्गुरु महास्वामी जी के प्रिय तपस्या स्थलों में से एक।
इसमें अखण्ड दीप अगस्त तक का है।
श्रावण पूर्णिमा तक।
ईश्वर सबका मंगल करें।
1 day ago | [YT] | 145
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Dnyanesh
दुर्गे पाशेन्द्रियाणामतिमलिनगते दुस्तरेऽस्मिन् शरीरे
दुर्गे नाकारयंस्त्वां भ्रमति परगतः कर्मभिर्ब्रह्मघट्टः।
दुर्गे मोहे कजेन्मे न हि विहतमतिर्येन बोधागमेन
दुर्गे सा त्वं भव प्रान्निजकरकमलैर्दुर्गमज्ञानदा मे॥
हे दुर्गे ! पाशरूपी इन्द्रियों के, अत्यन्त मलिनता को प्राप्त इस दुस्तर कर्कश शरीर में आपको न पुकारता हुआ ब्रह्म का अंश जीव कर्मपरतन्त्र होकर भटकता रहता है। कठिन मोह में मेरी आकुल मति जिस बोध के कारण मदमत्त न हो, हे दुर्गे ! तुम अपने उठे हुए करकमलों से मुझे वह दुर्गम ज्ञान देने वाली बनो।
दुर्गे मारीभये या पुरजननगरान् रक्षतीर्म्मेभ्य आङ्गान्
दुर्गेऽमित्रप्रघाते नरपतिपृतनाभ्यो जयं या ददाति।
दुर्गे जिन्वत्यरण्ये निवसत इतरक्रान्तध्वस्तानसङ्गान्
दुर्गे सा त्वं भव प्रान्निजकरकमलैर्दुर्गमज्ञानदा मे॥
कठिन महामारियों के आने पर जो सुकुमार नागरिकों की विषाणुओं से रक्षा करती है, क्रूर शत्रुओं के आक्रमण करने पर राजाओं की सेना को जो विजय प्रदान करती है, जिन्होंने इधर उधर घूमना छोड़कर संसार की ओर से अपने मन को हटा लिया है, ऐसे दुर्गम वनों में रहने वाले तपस्वियों को जो सुखी रखती है, ऐसी हे दुर्गे ! तुम अपने उठे हुए करकमलों से मुझे दुर्गम ज्ञान देने वाली बनो।
दुर्गे सौरेर्निवासे गणगतिविधिभिस्ताडितैर्जीवसङ्घै -
र्दुर्गे देहप्रसूनां जठरजठरगै रठ्यते नाम यस्याः।
दुर्गेऽकल्कप्रकल्पे दहरहरगतैर्ध्यानगम्याकृतिर्या
दुर्गे सा त्वं भव प्रान्निजकरकमलैर्दुर्गमज्ञानदा मे॥
भयंकर नरक में यमदूतों को द्वारा मारे जा रहे एवं शरीर को जन्म देने वाली माता के क्लेशदायक गर्भ में स्थित जीवों के द्वारा जिसका नाम पुकारा जाता है, तेजोमय स्थान वाले दहराकाश में जिस आकृति का ध्यान किया जाता है, वैसी हे दुर्गे ! तुम अपने उठे हुए करकमलों से मुझे दुर्गम ज्ञान देने वाली बनो।
― श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानन्द गुरु जी के भाव
1 day ago | [YT] | 188
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Dnyanesh
1 day ago | [YT] | 131
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Dnyanesh
पुत्रों ! महाभारत के शान्तिपर्व में धर्मराज युधिष्ठिर को पितामह भीष्म महर्षि श्रीस्यूमरश्मि का सन्दर्भ देकर कहते हैं -
यः कश्चिन्न्याय्य आचारः सर्व शास्त्रमिति श्रुतिः।
यदन्याय्यमशास्त्रं तदित्येषा श्रूयते श्रुतिः॥
न प्रवृत्तिर्ऋते शास्त्रात् काचिदस्तीति निश्चय: ।
यदन्यद्वेदवादेभ्यस्तदशास्त्रमिति श्रुतिः॥
(महाभारते शान्तिपर्वणि श्रीस्यूमरश्मिः)
जो कोई भी न्यायोचित आचार है, वह सब शास्त्र है, ऐसा श्रुति का कथन है। जो अन्यायपूर्ण बर्ताव है, वह अशास्त्रीय है, ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है। शास्त्रके बिना अर्थात् शास्त्र की आज्ञाका उल्लंघन करके कोई प्रवृत्ति सफल नहीं हो सकती, यह विद्वानों का निश्चय है। जो वैदिक वचनों के विरुद्ध है, वह सब अशास्त्रीय है, ऐसा श्रुति का कथन है।
आगमो वेदवादास्तु तर्कशास्त्राणि चागमः।
यथाश्रममुपासीत आगमस्तत्र सिध्यति ।
सिद्धिः प्रत्यक्षरूपा च दृश्यत्यागमनिश्चयात्॥
(महाभारते शान्तिपर्वणि श्रीस्यूमरश्मिः)
वेदमत का अनुसरण करने वाले शास्त्र तो आगम हैं ही, तर्कशास्त्र (वेदोंके अर्थ का निर्णय करने वाले पूर्वोत्तर मीमांसा आदि) भी आगम हैं। जिस-जिस आश्रम में जो-जो धर्म विहित है, वहाँ-वहाँ उसी-उसी धर्म की उपासना करनी चाहिये। उस-उस स्थान पर उसी-उसी धर्म का आचरण करनेसे वहाँ आगम सफल होता है एवं शास्त्र के निश्चय से ही सिद्धि का प्रत्यक्ष दर्शन होता है।
अतः व्यक्ति को धर्म का सदैव अनुसरण करना चाहिए। सौ पुत्रों वाले धृतराष्ट्र के श्राद्ध तर्पण हेतु कोई पुत्र काम नहीं आ सके, उन्हीं युधिष्ठिर जी ने सब किया जिन्हें जीवन भर धार्तराष्ट्र कष्ट देते रहे किन्तु निःसन्तान भीष्म पितामह का तर्पण आजतक पूरा संसार करता है। धन, स्त्री, पति, सन्तान आदि स्वकर्म से अर्जित पुण्य-पाप के परिणामस्वरूप प्राप्त होकर जीव को वस्तुतः उसके ही प्रारब्ध का भोग कराते हैं अतः जीवमात्र को देहगेहासक्ति के स्थान पर कर्तव्यों का पालनमात्र करते हुए मोक्षोपाय हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए।
― प. पू. साध्वी अखण्ड सौभाग्यवती अनुपमाम्बा देवी
धर्मपत्नी, श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य जी महाराज
2 days ago (edited) | [YT] | 193
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Dnyanesh
"अवधेशानन्द, राजेन्द्रदास, गोविन्ददेव, कैलासानन्द, मोरारी, ऋतम्भरा, चिदम्बरानन्द, धीरेन्द्र जैसे सैकड़ों गुलाम सङ्घ ने हिन्दू धर्म में विकृति हेतु जन्म दे रखे हैं।"
जगद्गुरू निग्रहाचार्य स्वामी जी के लेटरपैड पर निर्गत वक्तव्य से नकल करके छापा लेकिन ये छोड़ दिया। क्योंकि नकलची नकलची ही होता है।
नकलचियों से धर्म नहीं बचता।
वैसे नाम देखिए इसका !
ये वही राजकुमार मिश्र है जिसने सन् 2024 के शारदीय नवरात्र में आधी रात बजे एक सन्दिध चरित्र वाली लड़की से श्री निग्रहाचार्य जी महाराज को फोन करवा के फंसाने का प्रयास किया था और असफल रहा।
3 days ago | [YT] | 82
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Dnyanesh
सनातन धर्म में भारत माता नाम की कोई देवी नहीं हैं। भारती नामक सरस्वती देवी और जन्मभूमि, राष्ट्रभक्ति हेतु पृथ्वी देवी हैं। इनकी शास्त्रीय पूजा ही फलित होती है। भारतमाता नामक काल्पनिक देवी इसीलिए लायी गयी ताकि वास्तविक देवता, मन्त्र और देवालय से दूर करके हिन्दुओं को भटकाया जा सकें। मदर रसिया, ब्रिटानिया, जर्मनिया आदि से प्रेरित भारत माता है जिसे कुटिलता से देवी दुर्गा से मिलता जुलता दिखाया ताकि हिन्दुओं की आस्था का दोहन हो। नरेन्द्र दत्त से लेकर नरेन्द्र मोदी तक "देवी देवताओं को भूल जाओ" वाला षड्यन्त्र चलता हुआ हिन्दूद्रोही संगठन "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" धीरे धीरे सनातन धर्म को खोखला कर रहा है।
पहले गुरुपरम्परा हटाकर झंडे के नाम पर मनमानी की, फिर वर्णाश्रम को हटाकर मुस्लिम और ईसाई को हिन्दुओं में घुसाया, फिर वास्तविक मन्दिरों पर कब्जा करके नकली धर्मगुरु खड़े किए, गोहत्यारों को भाई बताया, गोमांस खाना जीवनशैली बताया, विवाह की मर्यादा हटाकर समलैंगिकता और व्यभिचार का समर्थन किया, शास्त्रों को मिलावटी बताकर बदलने की बात कही, हिन्दूद्रोही अम्बेडकर, फुले, पेरियार आदि को महापुरुष बताया, इस्लाम के बिना हिन्दुत्व अधूरा, इस्लाम का विरोधी हिन्दू सोच का नहीं, कहकर हमारी हिन्दू पहचान पर आघात करना आदि अनन्त कुकर्म आरएसएस के हैं।
राष्ट्रीय मुस्लिम एवं ईसाई मञ्च चलाने वाले सङ्घी विधर्मियों के लिए देवताओं को गाली देने वाले अम्बेडकर और फुले को महापुरुष मानना हिन्दू सोच है, ब्राह्मणों को गाली देना भी हिन्दू सोच है और इस्लाम का विरोध करने वाला हिन्दू सोच का नहीं है। अब ये नकली मन्दिर और तीर्थ, नकली शक्तिपीठ बनवा रहे हैं। कभी ज्योतिर्लिंग में शास्त्रीय धारापात्र के स्थान पर मशीनी पाइप का शॉवर लगाना तो कभी अखण्ड ज्योति के नाम पर अयोध्या में चीनी मॉडल रख देना, ये सब इन नास्तिकों की अश्रद्धा के ही दुष्परिणाम हैं। अवधेशानन्द, राजेन्द्रदास, गोविन्ददेव, कैलासानन्द, मोरारी, ऋतम्भरा, धीरेन्द्र जैसे सैकड़ों गुलाम सङ्घ ने हिन्दू धर्म में विकृति हेतु जन्म दे रखे हैं। महर्षि वेदव्यास जी ने इन सब बातों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी ―
अदृष्ट्वा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते।
देवानां भेदनिन्दे च देवतावध उच्यते॥
आत्महत्या हि सा प्रोक्ता जाबाले नात्र संशयः॥
*****
शास्त्रार्थमन्यथा यस्तु व्याख्यायति सुमन्दधी:।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
यः पुराणेषु चार्थेषु स्वयं श्लोकादि कल्पयेत्।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
*****
कल्पयिष्यन्ति शास्त्राणि स्वबुध्या देवता अपि।
त्यक्ष्यन्ति धर्मशास्त्राणि निन्दयिष्यन्ति तान्यपि॥
*****
अन्तःशठा महाक्रूरा परद्रव्याभिलिप्सवः।
भ्रमन्ते वैष्णवैर्वेशधारयिष्यन्त्यसज्जनान्॥
पुराणार्थविदां साधुशीलानाञ्च द्विजन्मनाम्।
देवताद्वेषकास्ते वै द्वेषयिष्यन्ति सर्वदा॥
अन्यवर्णाश्रमश्चिह्नरन्येऽधिष्यन्ति लोभिन:।
(बृहद्धर्मपुराणे)
हे जाबाले ! जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसे पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए। देवताओं में भेद देखने वाले एवं उनकी निन्दा करने वाले को देवतावध का पाप लगता है, जो आत्महत्या के ही समान है "इसमें संशय नहीं है"। जो शास्त्रों का मनमाना अर्थ लगाता है, और जो मूर्ख ऐसा ही व्याख्यान देता है, उसे भी ब्रह्महत्या के समान पातकी जानना चाहिए। जो पुराणों के अर्थों में अपनी कल्पना से ही श्लोकों को बताता है, (अथवा श्लोकों को ही काल्पनिक बताता है) उसे भी ब्रह्महत्या का ही दोषी बताया गया है। कलियुग में लोग अपने मन से शास्त्रों एवं देवताओं की कल्पना करके व्याख्या करेंगे। मान्य धर्मशास्त्रों को छोड़कर, उनकी निन्दा भी करेंगे। अन्दर से शठबुद्धि वाले, अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाले, तथा दूसरे के धन के अपहरण की इच्छा रखने वाले लोग, केवल वैष्णव वेश धारण करके और अयोग्य लोगों को वैष्णव वेश धारण करा कर भ्रमण किया करेंगे। जो ब्राह्मण पुराणों के अर्थ को जानने वाले होंगे, अच्छा और शीलयुक्त आचरण करने वाले होंगे, उन लोगों से, तथा देवताओं से भी ये लोग द्वेष करेंगे। साथ ही, बिना शास्त्रोक्त अधिकार के ही अन्य वर्ण या आश्रम के चिह्न को (प्रतिष्ठा आदि के) लोभ से धारण कर लेंगे।
(बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड)
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श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य महामहिम विद्यामार्तण्ड श्री श्रीभागवतानन्द गुरु स्वामिनः
3 days ago | [YT] | 185
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Dnyanesh
3 days ago | [YT] | 131
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Dnyanesh
एक बार एक सज्जन मुझे कहे थे कि ये एक नटी है। बाद में पता चला कि ये बाबा बन गई। ( ज्योतिष्पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वतीजी का कोई वक्तव्य है इसके विषय में)
फिर पता चला कि बाबा से पुनः नटी बन गई।
अब देख रहा हूं कि पुनः बाबा बन गई । वो भी संन्यासी।
अब ये देवी जी पर प्रवचन भी करेगी। 😱😱😱
शिव शिव शिव शिव...
खैर मैं कलयुग का सम्मान करता हूं।
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कदाचित मेरी जानकारी ग़लत है कि यह नटी है, तब भी संयासिनी होना तो अशास्त्रीय सिद्ध है ही।
6 days ago | [YT] | 68
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