आर्य समाज भजन प्रवचन

Arya samaj parchar


आर्य समाज भजन प्रवचन

23 जनवरी 2025 को सुभाष चंद्र बोस की 128वीं जयंती है. देश की आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को 'पराक्रम दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है. ब्रिटिश शासन से देश की आजादी की लड़ाई के दौरान नेताजी के दिए नारों ने देशभक्ति की अलख जगा दी थी- तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें आजादी दूंगा, जय हिन्द, दिल्ली चलो. इसमें से तो 'जय हिंद' का नारा राष्ट्रीय नारा बन गया. 

1 year ago | [YT] | 91

आर्य समाज भजन प्रवचन

"पाँच हजार साल से सोने वालों जागो"

बिजनौर जनपद में साधारण से दिखने वाले निहाल सिंह सरकारी चौकीदार थे। आपकी अनेक स्थानों पर बदली होती रहती थी। एक बार एक बड़े कस्बे में आपका तबादला हुआ। रात को पहरा देते हुए आप कहते थे "पाँच हजार साल से सोने वालों जागो"। आपकी आवाज सुनकर लोग आश्चर्य में पड़ गए क्योंकि उन्हें जागते रहो की आवाज़ सुनने की आदत थी। एक दिन एक उच्च सरकारी अफसर ने निहाल सिंह को बुलाकर "पाँच हजार साल से सोने वालों जागो" का रहस्य पूछा। निहाल सिंह जी ने कहा हुजूर आप मुझे 2 रुपये दीजिये इसका रहस्य बतला दूंगा। अफसर ने अपनी जेब से निकाल कर 2 रुपये निहाल सिंह के हाथ पर रख दिए। निहाल सिंह जेब में रुपये रखकर यह कहकर चल दिए की 15 दिन के पश्चात आप इस रहस्य का अर्थ बताएंगे। आप विश्वास रखे। अफसर चौकीदार के इस व्यवहार से आश्चर्यचकित थे मगर इस रहस्य को जानने के इच्छुक थे। अत: वे कुछ न बोले। निहाल सिंह ने 2 रुपये वैदिक यंत्रालय भेजकर सत्यार्थ प्रकाश की एक प्रति मँगवाई और उसे 15 दिन पश्चात अफसर को पढ़ने के लिए दे दिया। कुछ महीनों पश्चात उस अफसर ने निहाल सिंह को बुलाकर कहा की आपका प्रचार करने का तरीका बेहद निराला हैं। "पाँच हजार साल से सोने वालों जागो" का रहस्य मुझे समझ में आ गया हैं। निश्चित रूप से यह हिन्दू जाति सत्य सनातन वैदिक धर्म को भूलकर पाँच हजार वर्षों से सो रही हैं। निहाल सिंह की प्रार्थना पर उस कस्बे में उक्त अफसर ने आर्यसमाज की स्थापना करी। इस प्रकार से बिजनौर जनपद में अनेक आर्यसमाजों की संस्थापना करने का श्रेय निहाल सिंह को जाता हैं।
अगर आप भी पाँच हजार साल से सो रहे है तो जागे। स्वामी दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर अपने जीवन में सत्य का प्रकाश कीजिये।

1 year ago | [YT] | 42

आर्य समाज भजन प्रवचन

मेरा जन्म मुंबई के इसाई परिवार में 8 मई 1964 में हुआ था मेरी माता जी का नाम श्रीमती रोजी डिसूज़ा और मेरे पिताजी का नाम श्री जॉन डिसूजा है । मेरा नाम माता-पिता ने माइकल जान डेसूजा रखा था । मैं अपने माता-पिता का जेष्ठ पुत्र हूं। मेरे अतिरिक्त मेरी एक बहन श्रीमती हिल्डा और एक भाई श्री हेनरी हैं। बचपन से मैं अपने परिवार के साथ हर रविवार को चर्च जाता था। चर्च के पादरी के उपदेश आदि सुनता था। बाइबल का उनके द्वारा निर्देशित स्वाध्याय भी करता था। एक सामान्य इसाई के समान मेरा जीवन था। 12वीं तक पढ़ाई करके मैंने दो वर्ष आईटीआई से तकनीकी शिक्षा ग्रहण की। इसाई त्योहारो आदि में मै सक्रिय रूप से भाग लेता था। पर धीरे-धीरे बाइबल पढ़कर मैं असंतुष्ट रहने लगा। बाइबल में दिए अनेक उपदेशों पर मुझे शंका होने लगी । मैंने अपने चर्च के पादरी से उन सब शंकाओं का समाधान करना चाहा पर वह मुझे संतुष्ट नहीं कर सके। उनकी सलाह से मैं स्थानीय पुस्तकालय से अन्य पुस्तकें लेकर पढ़ना आरंभ किया। इसी प्रक्रिया में मुझे भारत और यूरोप में चर्च के इतिहास की जानकारी मिली। मैं जब अनंत वायरल कर की गोवा इन्कुइसिशन नामक पुस्तक को पढ़ा कि कैसे पुर्तगाल से आकर गोवा में सेंट फ्रांसिस जेवियर ने स्थानीय हिंदुओं पर अनेक अत्याचार कर उन्हें जबरन इसाई बनाया तो मुझे इसाई होते हुए भी अच्छा नहीं लगा। जब मैंने पढ़ा कि वास्कोडिगामा ने व्यापार की आड़ में कैसे भीषण कत्लेआम किया था तो मुझे विदेशियों के व्यवहार पर शंका होने लगी कि क्या एक मानव को दूसरे मानव के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए ? छल , कपट से धर्म परिवर्तन करवाना मुझे महा पाप जैसा लगा । दक्षिण भारत में रॉबर्ट दी नोबेली ने पंचम वेद का स्वांग कर अपने आप को रोम से आया ब्राह्मण कहकर भोले भाले ग्रामीण लोगों को जिस प्रकार से इसाई बनाया। वह पढ़कर तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि क्या इसाइयत के सिद्धांत अंदर से इतने कमजोर हैं जो उसे सत्य मार्ग के स्थान पर छल, कपट, दबाव, हिंसा, झूठ, धोखा, ढोंग, धन प्रलोभन आदि का सहारा लेना पड़ता है? मेरा ऐसे इसाइयत से विश्वास उठने लगा। मैं सत्य अन्वेषी बनाकर गृह त्याग कर विभिन्न मतों में जाकर उनकी विचारधारा का विश्लेषण करने लगा पर मेरी मंजिल अभी दूर थी।
पवई, मुंबई में मेरे पड़ोस में आर्यवीर दल का एक कैंप लगा। उस कैंप में छोटे-छोटे बच्चों को वैदिक विचारधारा और शारीरिक श्रम करने की ट्रेनिंग दी जा रहे थी। मैं भी देखने चला गया। वहां मेरा परिचय शिक्षक ब्रह्मचारी सुरेंद्र जी तथा श्री ओम प्रकाश आर्य जी से हुआ। उनके साथ मैंने परस्पर संवाद कर अपनी अनेक संख्याओं का समाधान किया जिससे मुझे अपूर्व संतोष मिला। ऐसा लगा चिरकाल से बहती मेरी नाव को किनारा मिल गया। उनकी प्रेरणा से मैं विधिपूर्वक यज्ञोपवीत धारण किया और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया। उन्होंने मेरा नया नामकरण ब्रह्मचारी अरुण आर्यवीर के नाम से किया और मुझे स्वामी दयानंद लिखित सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने की प्रेरणा दी। सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर मुझे मेरे जीवन का उद्देश्य मिल गया। स्वामी दयानंद के ज्ञान रूपी सागर में डुबकी लगाकर में तृप्त हो गया। आर्य समाज के माध्यम से मेरा वैदिक धर्म में प्रवेश स्वेच्छा से हुआ। मैं जब वैदिक धर्म के सार्वभौमिक सिद्धांतों की तुलना ईसाई आदि मत मदांतर की मान्यताओं से की तो उन्हें सभी के लिए अनुकूल और ग्रहण करने योग्य पाया। हर मत-मतांतर की धर्म पुस्तक में आपको कुछ अच्छी बातें मिलती हैं। परंतु जो ज्ञान वैदिक धर्म की पुस्तकों में मिलता है, उसकी कोई तुलना नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के तेरहवें समुल्लास में ईसाई मत समीक्षा पढ़कर मेरे बाइबल संबंधित सभी संशयों की निवृत्ति हो गई।
इस पुस्तक के प्रशासन में डॉक्टर मदन मोहन जी, रिटायर प्रोफेसर फिजियोलॉजी, मेडिकल कॉलेज पांडिचेरी ने न केवल आर्थिक सहयोग प्रदान किया है अपितु पुस्तक के प्रूफ करने में भी यथोचित सहयोग दिया है। मैं उनका करबद्ध अभारी हूं ।
मैं इस कृपा के लिए सर्वप्रथम परमपिता परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहूंगा जिनकी मुझ पर यही बड़ी कृपा हुई। अन्यथा जाने कितने जन्मों तक अविद्या रूपी अंधकार में भटकता रहता। मैं भी संभवतः ईसाई पादरियों के समान भोले भाले लोगों को ईसा मसीह की भेड़ बनाने के कार्य में लगा रहता । मैंने इन वर्षों में अपने स्वाध्याय से जो बाइबिल का ज्ञान अर्जित किया था उसे निष्पक्ष पाठकों के लिए इस पुस्तक के माध्यम से मैं संकलित कर प्रस्तुत कर रहा हूं इस कार्य में मेरा सहयोग दिल्ली निवासी डॉक्टर विवेक आर्य ने दिया है जिनकी सहायता से यह कार्य मैं पूर्ण कर पाया। वर्तमान में मैं आर्य समाज का प्रचारक हूं और विभिन्न माध्यमों से वैदिक विचारधारा का प्रचार प्रसार करता हूं । इस पुस्तक को पढ़कर लोग इस ईसाईयत के जंजाल से मुक्त होकर वैदिक पथ के पथिक बने, यही ईश्वर से प्रार्थना है।

अरुण आर्यवीर ( पूर्व नाम माइकल जॉन डिसूजा)

1 year ago | [YT] | 82

आर्य समाज भजन प्रवचन

https://youtu.be/9TLJWL38fFk

हम 31 जुलाई को शहीद उधम सिंह का शहादत दिवस मना रहे हैं। यह जलियांवाला बाग हत्याकांड के इतिहास को याद करने का दिन है और इस घटना ने शहीद उधम सिंह के जीवन को कैसे बदल दिया। वह औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों से एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। जनरल डायर को भारतीय स्वतंत्रता समर्थक नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र हुई भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दिया गया था। शहीद उधम सिंह ने ओ'डायर की हत्या कर दी और उन्हें 1940 में हत्या के लिए फांसी पर लटका दिया गया। यह दिन हर साल बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता है।

1 year ago | [YT] | 86

आर्य समाज भजन प्रवचन

अग्रवाल समाज के बारे में इतिहास में यह लिखा है कि १८५७ की क्रांति बनियों की बेईमानी की वजह से असफल हुई थी. धूर्त इतिहासकार लिखते हैं कि बनियों ने राशन की जमाखोरी की इस वजह से १८५७ के संग्राम में क्रांतिकारियों को रसद नहीं मिल पाई . इस वजह से आन्दोलन असफल हुआ . लेकिन बनिया समाज में हुए क्रांतिकारियों का नाम सदा से छुपाया गया है . मै आनंद जाट, ऑफिसर एकेडमी हरदा से अग्रवाल समाज के एक महान क्रन्तिकारी की कहानी आपको बताने जा रहा हूँ . उनका नाम है "सेठ रामदास जी गुड़वाले"

इतिहास के पन्नों में कहाँ हैं ये नाम??

सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया।

सेठ रामदास जी गुडवाला दिल्ली के अरबपति सेठ और बेंकर थे. इनका जन्म दिल्ली में एक अग्रवाल परिवार में हुआ था. इनके परिवार ने दिल्ली में पहली कपड़े की मिल की स्थापना की थी।

उनकी अमीरी की एक कहावत थी “रामदास जी गुड़वाले के पास इतना सोना चांदी जवाहरात है की उनकी दीवारो से वो गंगा जी का पानी भी रोक सकते है”

जब 1857 में मेरठ से आरम्भ होकर क्रांति की चिंगारी जब दिल्ली पहुँची तो

दिल्ली से अंग्रेजों की हार के बाद अनेक रियासतों की भारतीय सेनाओं ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। उनके भोजन और वेतन की समस्या पैदा हो गई । रामजीदास गुड़वाले बादशाह के गहरे मित्र थे ।

रामदास जी को बादशाह की यह अवस्था देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति बादशाह के हवाले कर दी और कह दिया

"मातृभूमि की रक्षा होगी तो धन फिर कमा लिया जायेगा "

रामजीदास ने केवल धन ही नहीं दिया, सैनिकों को सत्तू, आटा, अनाज बैलों, ऊँटों व घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था तक की।

सेठ जी जिन्होंने अभी तक केवल व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी हैरान हो गए ।
सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया, अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया।

उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की कि इस संकट काल में सभी सँगठित हो और देश को स्वतंत्र करवाने में बहाद्दुर शाह जफ़र के नेतृत्व में चल रही क्रांति को सफल बनाएं .
रामदास जी की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत परेशान होने लगे।
कुछ कारणों से दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः कब्जा होने लगा। दुखी होकर, फिर एक दिन सेठ जी ने, चाँदनी चौक की दुकानों के आगे जगह-जगह ज़हर मिश्रित, शराब की बोतलों की पेटियाँ रखवा दीं, अंग्रेज सेना उनसे प्यास बुझाती और वही लेट जाती। अंग्रेजों को समझ आ गया कि भारत पे शासन करना है तो रामदास जी का अंत बहुत ज़रूरी है।
सेठ रामदास जी गुड़वाले को धोखे से पकड़ लिया गया और जिस तरह से मारा गया, वो तो क्रूरता की जीती जागती मिसाल है।
पहले उन्हें रस्सियों से खम्बे में बाँधा गया, फिर उन पर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी अधमरी अवस्था में दिल्ली के चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है -
"सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे।अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उनकी अमीरी की चर्चा होती थी"।
लेकिन भारत के इतिहास में उनका जो नाम है, वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है।
जिसे आज बहुत ही कम लोग जानते हैं! इतिहास के पन्नों में कहाँ हैं ये नाम?? सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया।

आजादी के बाद जब इतिहास लिखा गया तो अनेक लोगों के योगदान को भुलाया गया और अनेक समाजों को इतिहास में नकारात्मक दिखाया गया . लेकिन आप इन इतिहास में छुपे नामों को आगे लाने की जो मुहीम मैंने शुरू की है उसे आगे बढाने में मुझे सहयोग दें और इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें .

2 years ago | [YT] | 15

आर्य समाज भजन प्रवचन

https://youtu.be/lWWf0hoX9U0?si=7-dYi...
Om Bhajan Sangrah।। ओ३म् भजन संग्रह।।

Non Stop Bhajan।।

1.ओम् ओम् बोले रोम रोम बोले

2.ओम् ओम् तू गाये जा

3.जिसको तेरी ज्योति का

4.आ प्यारे आ प्रभु मन के द्वार

5.ओम् नाम मधुर नाम गायेजा रे

Copyright:- Arya samaj Bhajan Parvachan Channal Mumbai India🇮🇳🇮🇳🇮🇳

2 years ago | [YT] | 39