🙏🙏🙏🙏श्री गणेश जी कहिन🙏🙏🙏🙏 ♥️♥️♥️♥️आज का राशिफल♥️♥️♥️♥️ 🌞🌞🌞🌞21/7/2024 रविवार🌞🌞🌞🌞 ✋✋✋✋स्वस्थ रहिए मस्त रहिए✋✋✋✋
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ) आज का दिन शुभफलदायक रहने वाला है। लेकिन दोपहर तक जिस भी कार्य को करेंगे उसका कोई निष्कर्ष नही मिलने पर कुछ समय के लिये असमंजस में पड़ेंगे। मध्यान बाद परिस्थिति में अकस्मात बदलाव आएगा। धन लाभ भी अचानक ही होगा। आज किसी व्यक्ति का ना चाहते हुए भी सहयोग अथवा कोई अप्रिय कार्य करना पडेगा। परिवार में आपसी मतभेद रहने से तालमेल नहीं बैठा पाएंगे। एकदम से ख़ुशी अगले ही पल दुःख वाली स्थिति दिन भर रहेगी। धन लाभ अवश्य होगा लेकिन मनोदशा में विकृत आ सकती है। खर्च करने में कृपणता दिखाएंगे। सेहत पर ध्यान दें।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो) आज भी दिन का अधिकांश समय शांति से व्यतीत होगा। थोड़ी आर्थिक परेशानियां रह सकती है परंतु आज आप मानसिक रूप से दृढ़ रहेंगे। जिस भी कार्य को करने की ठानेंगे उसे हानि-लाभ की परवाह किये बिना पूर्ण करके छोड़ेंगे। मध्यान के समय कार्य क्षेत्र पर अन्य व्यक्ति की दखलंदाजी से थोड़ी परेशानी एवं बहस हो सकती है। सामूहिक आयोजन में सम्मिलित होने का अवसर भी मिलेगा आपकी बुद्धि विवेक की प्रशंसा होगी फिर भी आज आप बाहर की अपेक्षा घर में समय बिताना पसंद करेंगे। घर का वातावरण भविष्य को लेकर थोड़ा चिंतित बनेगा संध्या के आसपास कोई शुभ समाचार मिल सकता है। आंख गले संबंधित समस्या होने की संभावना है।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा) आज भी दिन विपरीत फल देने वाला रहेगा। स्वयं अथवा किसी पारिवारिक सदस्य का स्वास्थ्य अचानक खराब होने के कारण व्यर्थ की चिंता रहेगी दवाओं पर खर्च बढ़ेगा। कार्य क्षेत्र पर परिश्रम के अनुसार ही लाभ मिलेगा कम समय दे पाने के कारण नए कार्य विस्तार के विचार को टालना पड सकता है। सरकारी कार्यो में भी धन खर्च होने से आर्थिक कारणों से चिंता रहेगी परन्तु मध्यान के आस-पास थोड़े धन की आमद होने से दैनिक कार्य चलते रहेंगे। मध्यान से संध्या के बीच कोई दुखद समाचार मिलने की संभावना है। आज परिस्थितियां विपरीत रहने पर भी परिवार में तालमेल बना रहेगा।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) आज दिन का अधिकांश भाग आशा से अधिक शुभ रहेगा। आज के दिन आकस्मिक घटनाएं अधिक घटित होंगी चाहे वो आर्थिक या पारिवारिक हों परिणाम लेदेकर आपके पक्ष में ही रहेगा। नौकरी पेशा जातको को भी आज मेहनत का फल मिलेगा सम्मान में वृद्धि के साथ आय के मार्ग खुलेंगे। बेरोजगारों को थोड़ा प्रयास करने पर रोजगार उपलब्ध हो सकता है। लेकिन आज आपका हाथ खुला रहने और खर्च भी अचानक होने से थोड़ी असहजता रहेगी परन्तु स्थिति पूर्ण रूप से आपके नियंत्रण में ही रहेगी। भाग्योन्नति के योग बनेगे। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। सेहत मे सुधार रहेगा।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे) आज आप सब सुविधा मिलने के बाद भी उदासीनता युक्त जीवन जीयेंगे। महात्त्वकांक्षाये आज अन्य दिनों की तुलना में बढ़ी हुई रहेंगी निनके पूर्ण ना होने पर अंदर से मन दुखी रहेगा फिर भी इसका प्रदर्शन नही करेंगे। मध्यान बाद पेट सम्बंधित शिकायत रहने एवं अन्य शारीरिक कष्ट के कारण शरीर शिथिल रहेगा। कार्य क्षेत्र पर मन के अनुसार कार्य नहीं होंगे। कार्यो में विलम्ब के कारण परेशानियां होंगी। सरकारी कार्यो में भी अल्प सफलता मिलेगी। आस पास का वातावरण भी विरोधाभासी रहने से मन में वैराग्य उत्पन्न होगा। आध्यत्म के प्रति अधिक रुचि दिखाएँगे। परिजनों से शिकायत रहेगी। धन प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो) आज के दिन धन की कमी रहने पर भी खुश रहने का सफल प्रयास करेंगे। संतोषी स्वभाव आज व्यर्थ के झंझट से बचाएगी लेकिन महिलाए एक बार जिद पकड़ लेंगी तो उसे पूरा कराकर ही मानेगी। घर मे बुजुर्ग परिजनों से भावनात्मक सम्बन्ध रहने से मन को शान्ति मिलेगी। परन्तु आज प्रेम प्रसंगों से दूरी बनाना ही बेहतर रहेगा अन्यथा धन और पारिवारिक मान हानि हो सकती है। किसी मांगलिक आयोजन में जाने के कारण अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा फिर भी आनंददायक वातावरण मिलने से खर्च व्यर्थ नहीं लगेगा। स्त्री पक्ष से विशेष निकटता रहेगी।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते) आज आपकी महात्त्वकांक्षाओ की पूर्ती में थोड़ा सा भी विलंब होने पर धैर्य ना रहने पर हताशा में उटपटांग बयानबाजी कर सकते है। आज के दिन परिश्रम के साथ धैर्य भी रखना पड़ेगा तभी दिन से सार्थक फल पा सकते है। कार्य क्षेत्र पर अधिकारी एवं सहकर्मी सहयोग करेंगे निश्चित समय से पहले कार्य पूर्ण कर घरेलु कार्यो के कारण कुछ समय के लिये असहजता बनेगी। मध्यान बाद से स्थिति लाभजनक बनने लगेंगी। धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रियता दिखाएँगे। आज आप किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्यो से खुद को दूर रखने का हर संभव प्रयास करेंगे जिससे सम्मान के पात्र बनेंगे। धन लाभ विलंब से ही सही लेकिन होह जरूर। सेहत गले छाती संबंधित समस्या हो सकती है।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू) आपका आज का दिन मिश्रित फलदायक रहेगा। कार्यो की असफलता अथवा किसी महत्त्वपूर्ण अनुबंध के निरस्त होने से स्वभाव में चिड़चिड़ा पन आ सकता है। मध्यान तक वाणी का रूखापन रहेगा जिससे कार्य क्षेत्र एवं घर का वातावरण बिगाड़ेगा। इसके बाद विवेक से कार्य करेगें धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने से मानसिक दृढ़ता बढ़ेगी। दोपहर के बाद किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से सहयोग मिलने की संभावना है। आज कोई नया कार्य अथवा संकलन में धन का निवेश करने से बचें धन नाश होने के प्रबल योग है इसका भी ध्यान रखे है। दोपहर के आस पास से स्वास्थ्य में भी उतार चढ़ाव बनेगा। घर के सदस्य आपसे किसी न किसी कारण से नाराज रहेंगे। सेहत में कोई नए छोटे मोटे विकार आ सकते है।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे) आज दिन का पूर्वार्ध नयी उलझने लाएगा। हठी प्रवृति रहने से व्यापार में हानि एवं प्रियजनों से दूरी बढ़ सकती है आज किसी भी बात की प्रतिक्रिया देने से पहले ठीक से सोचकर ही बोले अन्यथा मामूली बात का बतंगड़ बनते देर नही लगेगी। घरेलू अथवा कार्य क्षेत्र पर महत्त्वपूर्ण कार्य को अनुभवियों के परामर्श के बाद ही करें या थोड़े समय के लिए टाल दें। नौकरों के व्यवहार से भी परेशानी हो सकती है। दोपहर के बाद स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगेगी। आपके लिए निर्णय सफल होने से प्रातः जो आपसे विपरीत व्यवहार कर रहे थे वो भी स्वार्थ सिद्धि करने लगेंगे। आकस्मिक धन लाभ होने से राहत मिलेगी।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी) आज दिन का प्रारंभिक भाग आलस्य में खराब होगा इसके बाद का समय लापरवाह रहने के बाद भी सुख-शांति से बितायेंगे। कोई मनोकामना पूर्ति होने से मन खुश रहेगा आसपास का वातावरण भी हास्यमय बनाएंगे। मित्र प्रियजनों के साथ भविष्य की योजनाओं पर खुल कर विचार करेंगे। दोपहर के समय स्थिति कुछ समय के लिये परेशानी वाली बनेगी। किसी मनोकामना के अपूर्ण रहने से ठेस पहुंचेगी इससे उबरने में भी थोड़ा समय लगेगा। आज स्वभाव में ज्यादा खुलापन भी ना रखें मन का भेद अन्य को देने से हानि भी हो सकती है। परिजनों से लाभ होने की संभावना है। स्वास्थ्य संबंधित छोटी मोटी समस्या लगी रहेगी।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा) आज के दिन आपको प्रत्येक कार्य में सावधानी रखने की सलाह है। जल्दबाजी में लिए गए निर्णय के कारण धन के साथ सम्मान की भी हानि हो सकती है। कार्य क्षेत्र पर अप्रिय घटनाओं के कारण दुविधा की स्थिति बनेगी व्यवसायी वर्ग बना बनाया अनुबंध अचानक निरस्त होने से परेशान हो सकते है। आर्थिक दृष्टिकोण से दिन निराश करेगा आवश्यकता के समय उधार भी नही मिलेगा। घर मे भी किसी पारिवारिक सदस्य के गलत आचरण से मन दुखी रहेगा मन में गलत विचार की भरमार रहने से सेहत पर बुरा असर पड़ेगा। सर अथवा अन्य शारीरिक अंग निष्क्रिय होते अनुभव होंगे। धैर्य से दिन बिताएं।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची) आज भी परिस्थितियां आपके अनुकूल रहने से लाभ के कई अवसर मिलेंगे परन्तु अज्ञान की स्थिति अथवा गलत सलाह के कारण लाभ होना संदिग्ध ही रहेगा। के दिनों से टलरहा बहु प्रतीक्षित अति महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा होगा। धन लाभ रुक-रुक कर होने से संचय नही कर पाएंगे। घर में सुख के साधनों की वृद्धि होगी इस पर अधिक खर्च भी रहेगा। कार्य व्यवसाय में नए सम्बन्ध बनने से अतिरिक्त आय के मार्ग भी खुलेंगे। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति से आज पीछे नहीं हटेंगे। सेहत को लेकर कुछ समय के लिये भी की स्थिति बन सकती है। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
कोकिला व्रत 20 जुलाई विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिंदू धर्म में प्रत्येक माह आने वाले व्रत व त्योहार बहुत ही खास व महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आषाढ़ माह में चतुर्मास लगने के बाद भी कई ऐसे व्रत-उपवास आते हैं जो कि सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत ही फलदायी माने गए हैं। आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि के दिन कोकिला व्रत रखा जाता है और यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख-शांति व खुशहाली लेकर आता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शादीशुदा महिलाएं कोकिला व्रत रखकर भगवान शिव व माता सती का पूजन करती हैं।
कोकिला व्रत तिथि एवं समय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि के दिन कोकिला व्रत रखा जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल आषाढ़ पूर्णिमा तिथि 20 जुलाई को शाम 5 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 21 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह व्रत भगवान शिव व माता सती को समर्पित है और व्रत में पूजा शाम के समय की जाती है इसलिए कोकिला व्रत 20 जुलाई 2024 को रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 19 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।
सुहागिनें क्यों रखती हैं कोकिला व्रत? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कोकिला व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। इसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं। यदि किसी कन्या के विवाह में अड़चनें आ रही हैं तो कोकिला व्रत रखने से अड़चनें दूर होती हैं। सुहागिन महिलाएं दांपत्य जीवन में खुशहाली और सुख-शांति की कामना से कोकिला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि माता पार्वती अपने जन्म से पहले एक श्राप की वजह से हजारों वर्षों तक कोयल बनकर नंदनवन में भटकी थीं। श्राप मुक्त होने के लिए के लिए उन्होंने भगवान शिव की अराधना की थी इसलिए इस व्रत को कोकिला व्रत कहते हैं।
कोकिला व्रत पूजन विधि एवं नियम 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कोकिला व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें फिर भगवान भोलेनाथ को पंचामृत का अभिषेक करें और गंगाजल अर्पित करें। भगवान शिव को सफेद और माता पार्वती को लाल रंग के पुष्प, बेलपत्र, गंध और धूप आदि का उपयोग करें. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और दिन भर निराहार व्रत करें। सूर्यास्त के बाद पूजा करें और फिर फलाहार लें इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता अगले दिन व्रत का पारण करने के पश्चात ही अन्न ग्रहण किया जाता है।
कोकिला व्रत कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कोकिला व्रत से जुड़ी कथा का संबंध भगवान शिव एवं माता सती से जुड़ा है। माता सती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए लम्बे समय तक कठोर तपस्या को करके उन्हें पाया था। कोकिला व्रत कथा का वर्णन शिव पुराण में मिलता है। इस कथा के अनुसार देवी सती ने भगवान को अपने जीवन साथी के रुप में पाया। इस व्रत का प्रारम्भ माता पार्वती के पूर्व जन्म अर्थात सती रुप से है।देवी सती का जन्म राजा दक्ष की बेटी के रुप में होता है। राजा दक्ष को भगवान शिव अत्यधिक अप्रिय थे। राजा दक्ष एक बार यज्ञ का आयोजन करते हैं। इस यज्ञ में वह सभी लोगों को आमंत्रित करते हैं ब्रह्मा, विष्णु व सभी देवी देवताओं को आमंत्रण मिलता है किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया जाता है।
ऐसे में जब देवी सती को इस बात का पता चलता है कि उनके पिता दक्ष ने सभी को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री को नहीं। तब सती से यह बात सहन न हो पाई। सती ने शिव से आज्ञा मांगी कि वे भी अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहतीं हैं। शिव ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं होगा, फिर चाहें वह उनके पिता का घर ही क्यों न हो। सती शिव की बात से सहमत नहीं होती हैं और जिद्द करके अपने पिता के यज्ञ में चली जाती हैं।
वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ पर जाकर पाती हैं, कि उनके पिता ने उन्हें पूर्ण रुप से तिरस्कृत किया है। दक्ष केवल सती का ही नही अपितु भगवान शिव का भी अनादर करते हैं उन्हें अपशब्द कहते हैं। सती अपने पति के इस अपमान को सह नही पाती हैं और उसी यज्ञ की अग्नि में कूद जाती हैं। सती अपनी देह का त्याग कर देती हैं।
भगवान शिव को जब सती के बारे में पता चलता है तो वह यज्ञ को नष्ट कर, दक्ष के अहंकार का नाश करते हैं। सती की जिद्द के कारण प्रजापति के यज्ञ में शामिल होने तथा उनकी आज्ञा न मानने के कारण वह देवी सती को भी श्राप देते हैं, कि हजारों सालों तक कोयल बनकर नंदन वन में घूमती रहें।
इस कारण से इस व्रत को कोकिला व्रत का नाम दिया गया क्योंकि देवी सती ने कोयल बनकर हजारों वर्षों तक वहाँ तप किया। फिर पार्वती के रूप में उत्पन्न हुई और ऋषियों की आज्ञानुसार आषाढ़ के एक माह से दूसरे माह व्रत रखकर शिवजी का पूजन किया। जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने पार्वती के साथ विवाह कर लिया। अतः यह व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ पति प्राप्त करने वाला माना जाने लगा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गुप्त नवरात्री विशेष 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ महाकाली की उत्पत्ति कथा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्रीमार्कण्डेय पुराण एवं श्रीदुर्गा सप्तशती के अनुसार काली मां की उत्पत्ति जगत जननी मां अम्बा के ललाट से हुई थी। Ks bhakti sansar कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के आतंक का प्रकोप इस कदर बढ़ चुका था कि उन्होंने अपने बल,छल एवं महाबली असुरों द्वारा देवराज इन्द्र सहित अन्य समस्त देवतागणों को निष्कासित कर स्वयं उनके स्थान पर आकर उन्हें प्राणरक्षा हेतु भटकने के लिए छोड़ दिया।
दैत्यों द्वारा आतंकित देवों को ध्यान आया कि महिषासुर के इन्द्रपुरी पर अधिकार कर लिया है,तब दुर्गा ने ही उनकी मदद की थी।
तब वे सभी दुर्गा का आह्वान करने लगे। उनके इस प्रकार आह्वान से देवी प्रकट हुईं एवं शुम्भ-निशुम्भ के अति शक्तिशाली असुर चंड तथा मुंड दोनों का एक घमासान युद्ध में नाश कर दिया। चंड-मुंड के इस प्रकार मारे जाने एवं अपनी बहुत सारी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यराज शुम्भ ने अत्यधिक क्रोधित होकर अपनी संपूर्ण सेना को युद्ध में जाने की आज्ञा दी तथा कहा कि आज छियासी उदायुद्ध नामक दैत्य सेनापति एवं कम्बु दैत्य के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे युद्ध के लिए प्रस्थान करें।
कोटिवीर्य कुल के पचास,धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति मेरे आदेश पर सेना एवं कालक,दौर्हृद,मौर्य व कालकेय असुरों सहित युद्ध के लिए कूच करें।
अत्यंत क्रूर दुष्टाचारी असुर राज शुंभ अपने साथ सहस्र असुरों वाली महासेना लेकर चल पड़ा।
उसकी भयानक दैत्यसेना को युद्धस्थल में आता देखकर देवी ने अपने धनुष से ऐसी टंकार दी कि उसकी आवाज से आकाश व समस्त पृथ्वी गूंज उठी। पहाड़ों में दरारें पड़ गईं।
देवी के सिंह ने भी दहाड़ना प्रारंभ किया,फिर जगदम्बिका ने घंटे के स्वर से उस आवाज को दुगना बढ़ा दिया।
धनुष,सिंह एवं घंटे की ध्वनि से समस्त दिशाएं गूंज उठीं।
भयंकर नाद को सुनकर असुर सेना ने देवी के सिंह को और मां काली को चारों ओर से घेर लिया।
तदनंतर असुरों के संहार एवं देवगणों के कष्ट निवारण हेतु परमपिता ब्रह्माजी, विष्णु, महेश, कार्तिकेय, इन्द्रादि देवों की शक्तियों ने रूप धारण कर लिए एवं समस्त देवों के शरीर से अनंत शक्तियां निकलकर अपने पराक्रम एवं बल के साथ मां दुर्गा के पास पहुंचीं।
तत्पश्चात समस्त शक्तियों से घिरे शिवजी ने देवी जगदम्बा से कहा- ‘मेरी प्रसन्नता हेतु तुम इस समस्त दानव दलों का सर्वनाश करो।’
तब देवी जगदम्बा के शरीर से भयानक उग्र रूप धारण किए चंडिका देवी शक्ति रूप में प्रकट हुईं।
उनके स्वर में सैकड़ों गीदड़ों की भांति आवाज आती थी।
असुरराज शुम्भ-निशुम्भ क्रोध से भर उठे।
वे देवी कात्यायनी की ओर युद्ध हेतु बढ़े। अत्यंत क्रोध में चूर उन्होंने देवी पर बाण,शक्ति,शूल,फरसा,ऋषि आदि अस्त्रों-शस्त्रों द्वारा प्रहार प्रारंभ किया।
देवी ने अपने धनुष से टंकार की एवं अपने बाणों द्वारा उनके समस्त अस्त्रों-शस्त्रों को काट डाला,जो उनकी ओर बढ़ रहे थे।
मां काली फिर उनके आगे-आगे शत्रुओं को अपने शूलादि के प्रहार द्वारा विदीर्ण करती हुई व खट्वांग से कुचलती हुईं समस्त युद्धभूमि में विचरने लगीं।
सभी राक्षसों चंड मुंडादि को मारने के बाद उसने रक्तबीज को भी मार दिया।
शक्ति का यह अवतार एक रक्तबीज नामक राक्षस को मारने के लिए हुआ था।
फिर शुम्भ-निशुंभ का वध करने के बाद बाद भी जब काली मां का गुस्सा शांत नहीं हुआ, तब उनके गुस्से को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्ते में लेट गए और काली मां का पैर उनके सीने पर पड़ गया। शिव पर पैर रखते ही माता का क्रोध शांत होने लगा।
शवारुढा महाभीमां घोरद्रंष्टां हसन्मुखीम । चतुर्भुजां खडगमुण्डवराभय करां शिवाम।। मुण्डमालाधरां देवीं ललजिह्वां दिगम्बराम। एवं संचिन्तयेत कालीं श्मशानालयवासिनी म ।।
अर्थात “महाकाली शव पर बैठी है,शरीर की आकृति डरावनी है,देवी के दांत तीखे और महाभयावह है,ऎसे में महाभयानक रुप वाली,हंसती हुई मुद्रा में है.उनकी चार भुजाएं है. एक हाथ में खडग,एक में वर,एक अभयमुद्रा मेम है,गले में मुण्डवाला है,जिह्वा बाहर निकली है,वह सर्वथा नग्न है,वह श्मशान वासिनी हैं.श्मशान ही उनकी आवासभूमि है ।
उनकी उपासना में सम्प्रदायगत भेद हैं,श्मशानकाली की उपासना दीक्षागम्य है, जो किसी अनुभवी गुरु से दीक्षा लेकर करनी चाहिए। देवी कि साधना दुर्लभ है।
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः या न जीर्यति जीर्यतः। योऽसौ प्राणान्तिको रोगः तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
(महाभारत, वन पर्व - २/३६)
अर्थात् 👉 खोटी बुद्धिवाले मनुष्यों के लिए जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, जो शरीर के जरा-शीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जिसे प्राण-नाशक रोग बताया गया है, उस तृष्णा को जो त्याग देता है, उसी को सुख मिलता है।
हस्त नक्षत्र प्रारम्भ👉 जून 15, को प्रातः 08:14 बजे से। हस्त नक्षत्र समाप्त - जून 16, को दिन 11:12 बजे पर।
वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिये इस दिन को हिन्दू धर्म मे माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है।
स्कन्द पुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष रूप से करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्ध्य (पूजादिक) एवम् तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें। ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष, दशमी को गंगावतरण का दिन मन्दिरों एवं सरोवरों में स्नान कर पवित्रता के साथ मनाया जाता है।
गंगा स्नान का महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य गंगा दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा स्तोत्र को पढ़ता है, चाहे वो दरिद्र हो, असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर पूर्ण फल को पाता है। यदि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मंगलवार हो तथा हस्त नक्षत्र तिथि हो तो यह सब पापों को हरने वाली होती है। वराह पुराण में लिखा है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बुधवार में हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी स्वर्ग से अवतीर्ण हुई थी। वह दस पापों को नष्ट करती है। इस कारण उस तिथि को दशहरा कहते हैं।
दशहरे के कुछ प्रमुख योग 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ यह दिन संवत्सर का मुख माना गया है। इसलिए गंगा स्नान करके दूध, बताशा, जल, रोली, नारियल, धूप, दीप से पूजन करके दान देना चाहिए। इस दिन गंगा, शिव, ब्रह्मा, सूर्य देवता, भागीरथी तथा हिमालय की प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप, उपासना और उपवास किया जाता है। जिस भी वस्तु का दान करे उनकी संख्या 10 ही होनी शुभ मानी गयी है। इससे दस प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन नीचे दिये गये दस योग हो तो यह अपूर्व योग है और महाफलदायक होता है। यदि ज्येष्ठ अधिकमास हो तो स्नान, दान, तप, व्रतादि मलमास में करने से ही अधिक फल प्राप्त होता है। इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है।
दस योग 〰️〰️〰️ ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर करण, आनंद योग व्यतिपात, कन्या का चंद्र, वृषभ का सूर्य आदि।
गंगा दशहरा पर दान का महत्त्व एवं पूजा विधि 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है। यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकते है। गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-
“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:”
इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए. इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए. गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए. यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए. दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए. जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए।
यह मौसम भरपूर गर्मी का होता है, अत: छतरी, वस्त्र, जूते-चप्पल आदि दान में दिए जाते हैं। पूजन के लिये यदि गंगाजी अथवा अन्य किसी पवित्र नदी पर सपरिवार स्नान हेतु जाया जा सके तब तो सर्वश्रेष्ठ है, यदि संभव न हो तब घर पर ही गंगाजली को सम्मुख रखकर गंगाजी की पूजा-अराधना कर ली जाती है। इस दिन जप-तप, दान, व्रत, उपवास और गंगाजी की पूजा करने पर सभी पाप जड़ से कट जाते हैं- ऐसी मान्यता है। अनेक परिवारों में दरवाज़े पर पाँच पत्थर रखकर पाँच पीर पूजे जाते हैं। इसी प्रकार परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सवा सेर चूरमा बनाकर साधुओं, फ़कीरों और ब्राह्मणों में बांटने का भी रिवाज है। ब्राह्मणों को बड़ी मात्रा में अनाज को दान के रूप में आज के दिन दिया जाता है। आज ही के दिन आम खाने और आम दान करने को भी विशिष्ट महत्त्व दिया जाता है। दशहरा के दिन दशाश्वमेध संभव ना हो तो किसी भी गंगा घाट में दस बार स्नान करके शिवलिंग का दस संख्या के गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन करके रात्रि को जागरण करने से अनंत फल प्राप्त होता है। विधि-विधान से गंगाजी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूँ दस ब्राह्मणों को दान दें। परदारा और परद्रव्यादि से दूर रहें तथा ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ करके दशमी तक एकोत्तर-वृद्धि से दशहरा स्तोत्र का पाठ करें। इससे सब प्रकार के पापों का समूल नाश हो जाता है और दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त होती है।
गंगा दशहरे का फल 〰️〰️🌸🌸〰️〰️ ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। जैसे कि
👉 बिना आज्ञा या जबरन किसी की वस्तु लेना
👉 हिंसा
👉 पराई स्त्री के साथ समागम
👉 कटुवचन का प्रयोग
👉 असत्य वचन बोलना
👉 किसी की शिकायत करना
👉 असंबद्ध प्रलाप
👉 दूसरें की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा
👉 दूसरें को हानि पहुँचाना या ऐसे इच्छा रखना
👉 व्यर्थ बातो पर परिचर्चा
कहने का तात्पर्य है जिस किसी ने भी उपरोक्त पापकर्म किये हैं और जिसे अपने किये का पश्चाताप है और इससे मुक्ति पाना चाहता है तो उसे सच्चे मन से मां गंगा में डूबकी अवश्य लगानी चाहिये। यदि आप मां गंगा तक नहीं जा सकते हैं तो स्वच्छ जल में थोड़ा गंगा जल मिलाकर मां गंगा का स्मरण कर उससे भी स्नान कर सकते हैं। इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।
माँ गंगा जी की आरती 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता। कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता। यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता। सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥
गंगा अवतरण की कथा 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ ब्रह्मा से अत्रि, अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबली और विक्रमशाली पुत्र हुए।
अत्रि से उत्पन्न चंद्रवंशियों में पुरुरवा-ऐल के बाद सबसे चर्चित कहानी ययाति और उसने पुत्रों की है, ययाति के 5 पुत्र थे-! पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुह्मु, उनके इन पांचों पुत्रों और उनके कुल के लोगों ने मिलकर लगभग संपूर्ण एशिया पर राज किया था, ऋग्वेद में इसका उल्लेख मिलता है।
ययाति बहुत ही भोग-विलासी राजा था, जब भी उसको यमराज लेने आते तो वह कह देता नहीं अभी तो बहुत काम बचे हैं, अभी तो कुछ देखा ही नहीं।
गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के मध्य प्रतिष्ठा की लड़ाई चलती रहती थी, इस लड़ाई के चलते ही ५ हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के पूर्व एक और महासंग्राम हुआ था जिसे 'दशराज युद्ध' के नाम से जाना जाता हैं इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है, यह रामायण काल की बात है।
महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दशराज युद्ध हुआ था इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान है, ऋग्वेद के ७ वें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है।
इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी, इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था।
ब्रह्मा से भृगु, भृगु से वारिणी भृगु, वारिणी भृगु से बाधृश्य, शुनक, शुक्राचार्य (उशना या काव्या), बाधूल, सांनग और च्यवन का जन्म हुआ, शुनक से शौनक, शुक्राचार्य से त्वष्टा का जन्म हुआ, त्वष्टा से विश्वरूप और विश्वकर्मा, विश्वकर्मा से मनु, मय, त्वष्टा, शिल्लपी और देवज्ञ का जन्म हुआ, दशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे।
इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर भगीरथ और श्रीराम के पूर्वज हैं। राजा सगर की २ रानियां थीं- केशिनी और सुमति, जब दीर्घकाल तक दोनों पत्नियों को कोई संतान नहीं हुई तो राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे।
तब ब्रह्मा के पुत्र महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को ६० हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथाहोगेतथा दूसरी से एक वंशधर पुत्र होगा, वंशधर अर्थात जिससे आगे वंश चलेगा।
बाद में रानी सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया, वह सिर्फ एक बेजान पिंड था, राजा सगर निराश होकर उसे फेंकने लगे, तभी आकाशवाणी हुई- 'सावधान राजा! इस तूंबी में ६० हजार बीज हैं, घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में ६० हजार पुत्र प्राप्त होंगे।'
राजा सगर ने इस आकाशवाणी को सुनकर इसे विधाता का विधान मानकर वैसा ही सुरक्षित रख लिया, जैसा कहा गया था, समय आने पर उन मटकों से ६० हजार पुत्र उत्पन्न हुए, जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने ६० हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।
देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया, राजा सगर के ६० हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है।
यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया, ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, राजा सगर के ६० हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए, भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के ६० हजार पुत्र कपिल मुनि के तेज से भस्म हो जाने के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे।
अपने पूर्वजों की शांति के लिए ही भगीरथ ने घोर तप किया और गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल हुए, पूर्वजों की भस्म के गंगा के पवित्र जल में डूबते ही वे सब शांति को प्राप्त हुए।
राजा भगीरथ के कठिन प्रयासों और तपस्या से ही गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी, इसे ही 'गंगावतरण' की कथा कहते हैं। सगर और भगीरथ से जुड़ी अनेक और भी कथाएं है।
K S Bhakti Sansar
आप सभी को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 🎉🎉🎉 जय श्री बाला जी महाराज जय श्री राम 🙏🙏
2 weeks ago | [YT] | 98
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K S Bhakti Sansar
2026 होली में पड़ेंगे ग्रहण देखे लाइव वीडियो KS Bhakti Sansar पर आचार्य श्री कृष्ण शास्त्री 🙏 किसको मिलेगा फल किसे मिलेगा दुःख।
1 month ago | [YT] | 25
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K S Bhakti Sansar
जय मां लक्ष्मी 🙏🙏🙏🙏
1 month ago | [YT] | 19
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K S Bhakti Sansar
महाकालेश्वर भगवान जी के दर्शन प्राप्त करने से जीवन धन्य हो जाएगा
1 month ago | [YT] | 16
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K S Bhakti Sansar
🙏🙏🙏🙏श्री गणेश जी कहिन🙏🙏🙏🙏
♥️♥️♥️♥️आज का राशिफल♥️♥️♥️♥️
🌞🌞🌞🌞21/7/2024 रविवार🌞🌞🌞🌞
✋✋✋✋स्वस्थ रहिए मस्त रहिए✋✋✋✋
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज का दिन शुभफलदायक रहने वाला है। लेकिन दोपहर तक जिस भी कार्य को करेंगे उसका कोई निष्कर्ष नही मिलने पर कुछ समय के लिये असमंजस में पड़ेंगे। मध्यान बाद परिस्थिति में अकस्मात बदलाव आएगा। धन लाभ भी अचानक ही होगा। आज किसी व्यक्ति का ना चाहते हुए भी सहयोग अथवा कोई अप्रिय कार्य करना पडेगा। परिवार में आपसी मतभेद रहने से तालमेल नहीं बैठा पाएंगे। एकदम से ख़ुशी अगले ही पल दुःख वाली स्थिति दिन भर रहेगी। धन लाभ अवश्य होगा लेकिन मनोदशा में विकृत आ सकती है। खर्च करने में कृपणता दिखाएंगे। सेहत पर ध्यान दें।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज भी दिन का अधिकांश समय शांति से व्यतीत होगा। थोड़ी आर्थिक परेशानियां रह सकती है परंतु आज आप मानसिक रूप से दृढ़ रहेंगे। जिस भी कार्य को करने की ठानेंगे उसे हानि-लाभ की परवाह किये बिना पूर्ण करके छोड़ेंगे। मध्यान के समय कार्य क्षेत्र पर अन्य व्यक्ति की दखलंदाजी से थोड़ी परेशानी एवं बहस हो सकती है। सामूहिक आयोजन में सम्मिलित होने का अवसर भी मिलेगा आपकी बुद्धि विवेक की प्रशंसा होगी फिर भी आज आप बाहर की अपेक्षा घर में समय बिताना पसंद करेंगे। घर का वातावरण भविष्य को लेकर थोड़ा चिंतित बनेगा संध्या के आसपास कोई शुभ समाचार मिल सकता है। आंख गले संबंधित समस्या होने की संभावना है।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज भी दिन विपरीत फल देने वाला रहेगा। स्वयं अथवा किसी पारिवारिक सदस्य का स्वास्थ्य अचानक खराब होने के कारण व्यर्थ की चिंता रहेगी दवाओं पर खर्च बढ़ेगा। कार्य क्षेत्र पर परिश्रम के अनुसार ही लाभ मिलेगा कम समय दे पाने के कारण नए कार्य विस्तार के विचार को टालना पड सकता है। सरकारी कार्यो में भी धन खर्च होने से आर्थिक कारणों से चिंता रहेगी परन्तु मध्यान के आस-पास थोड़े धन की आमद होने से दैनिक कार्य चलते रहेंगे। मध्यान से संध्या के बीच कोई दुखद समाचार मिलने की संभावना है। आज परिस्थितियां विपरीत रहने पर भी परिवार में तालमेल बना रहेगा।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आज दिन का अधिकांश भाग आशा से अधिक शुभ रहेगा। आज के दिन आकस्मिक घटनाएं अधिक घटित होंगी चाहे वो आर्थिक या पारिवारिक हों परिणाम लेदेकर आपके पक्ष में ही रहेगा। नौकरी पेशा जातको को भी आज मेहनत का फल मिलेगा सम्मान में वृद्धि के साथ आय के मार्ग खुलेंगे। बेरोजगारों को थोड़ा प्रयास करने पर रोजगार उपलब्ध हो सकता है। लेकिन आज आपका हाथ खुला रहने और खर्च भी अचानक होने से थोड़ी असहजता रहेगी परन्तु स्थिति पूर्ण रूप से आपके नियंत्रण में ही रहेगी। भाग्योन्नति के योग बनेगे। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। सेहत मे सुधार रहेगा।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज आप सब सुविधा मिलने के बाद भी उदासीनता युक्त जीवन जीयेंगे। महात्त्वकांक्षाये आज अन्य दिनों की तुलना में बढ़ी हुई रहेंगी निनके पूर्ण ना होने पर अंदर से मन दुखी रहेगा फिर भी इसका प्रदर्शन नही करेंगे। मध्यान बाद पेट सम्बंधित शिकायत रहने एवं अन्य शारीरिक कष्ट के कारण शरीर शिथिल रहेगा। कार्य क्षेत्र पर मन के अनुसार कार्य नहीं होंगे। कार्यो में विलम्ब के कारण परेशानियां होंगी। सरकारी कार्यो में भी अल्प सफलता मिलेगी। आस पास का वातावरण भी विरोधाभासी रहने से मन में वैराग्य उत्पन्न होगा। आध्यत्म के प्रति अधिक रुचि दिखाएँगे। परिजनों से शिकायत रहेगी। धन प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज के दिन धन की कमी रहने पर भी खुश रहने का सफल प्रयास करेंगे। संतोषी स्वभाव आज व्यर्थ के झंझट से बचाएगी लेकिन महिलाए एक बार जिद पकड़ लेंगी तो उसे पूरा कराकर ही मानेगी। घर मे बुजुर्ग परिजनों से भावनात्मक सम्बन्ध रहने से मन को शान्ति मिलेगी। परन्तु आज प्रेम प्रसंगों से दूरी बनाना ही बेहतर रहेगा अन्यथा धन और पारिवारिक मान हानि हो सकती है। किसी मांगलिक आयोजन में जाने के कारण अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा फिर भी आनंददायक वातावरण मिलने से खर्च व्यर्थ नहीं लगेगा। स्त्री पक्ष से विशेष निकटता रहेगी।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज आपकी महात्त्वकांक्षाओ की पूर्ती में थोड़ा सा भी विलंब होने पर धैर्य ना रहने पर हताशा में उटपटांग बयानबाजी कर सकते है। आज के दिन परिश्रम के साथ धैर्य भी रखना पड़ेगा तभी दिन से सार्थक फल पा सकते है। कार्य क्षेत्र पर अधिकारी एवं सहकर्मी सहयोग करेंगे निश्चित समय से पहले कार्य पूर्ण कर घरेलु कार्यो के कारण कुछ समय के लिये असहजता बनेगी। मध्यान बाद से स्थिति लाभजनक बनने लगेंगी। धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रियता दिखाएँगे। आज आप किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्यो से खुद को दूर रखने का हर संभव प्रयास करेंगे जिससे सम्मान के पात्र बनेंगे। धन लाभ विलंब से ही सही लेकिन होह जरूर। सेहत गले छाती संबंधित समस्या हो सकती है।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आपका आज का दिन मिश्रित फलदायक रहेगा। कार्यो की असफलता अथवा किसी महत्त्वपूर्ण अनुबंध के निरस्त होने से स्वभाव में चिड़चिड़ा पन आ सकता है। मध्यान तक वाणी का रूखापन रहेगा जिससे कार्य क्षेत्र एवं घर का वातावरण बिगाड़ेगा। इसके बाद विवेक से कार्य करेगें धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने से मानसिक दृढ़ता बढ़ेगी। दोपहर के बाद किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से सहयोग मिलने की संभावना है। आज कोई नया कार्य अथवा संकलन में धन का निवेश करने से बचें धन नाश होने के प्रबल योग है इसका भी ध्यान रखे है। दोपहर के आस पास से स्वास्थ्य में भी उतार चढ़ाव बनेगा। घर के सदस्य आपसे किसी न किसी कारण से नाराज रहेंगे। सेहत में कोई नए छोटे मोटे विकार आ सकते है।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज दिन का पूर्वार्ध नयी उलझने लाएगा। हठी प्रवृति रहने से व्यापार में हानि एवं प्रियजनों से दूरी बढ़ सकती है आज किसी भी बात की प्रतिक्रिया देने से पहले ठीक से सोचकर ही बोले अन्यथा मामूली बात का बतंगड़ बनते देर नही लगेगी। घरेलू अथवा कार्य क्षेत्र पर महत्त्वपूर्ण कार्य को अनुभवियों के परामर्श के बाद ही करें या थोड़े समय के लिए टाल दें। नौकरों के व्यवहार से भी परेशानी हो सकती है। दोपहर के बाद स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगेगी। आपके लिए निर्णय सफल होने से प्रातः जो आपसे विपरीत व्यवहार कर रहे थे वो भी स्वार्थ सिद्धि करने लगेंगे। आकस्मिक धन लाभ होने से राहत मिलेगी।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज दिन का प्रारंभिक भाग आलस्य में खराब होगा इसके बाद का समय लापरवाह रहने के बाद भी सुख-शांति से बितायेंगे। कोई मनोकामना पूर्ति होने से मन खुश रहेगा आसपास का वातावरण भी हास्यमय बनाएंगे। मित्र प्रियजनों के साथ भविष्य की योजनाओं पर खुल कर विचार करेंगे। दोपहर के समय स्थिति कुछ समय के लिये परेशानी वाली बनेगी। किसी मनोकामना के अपूर्ण रहने से ठेस पहुंचेगी इससे उबरने में भी थोड़ा समय लगेगा। आज स्वभाव में ज्यादा खुलापन भी ना रखें मन का भेद अन्य को देने से हानि भी हो सकती है। परिजनों से लाभ होने की संभावना है। स्वास्थ्य संबंधित छोटी मोटी समस्या लगी रहेगी।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन आपको प्रत्येक कार्य में सावधानी रखने की सलाह है। जल्दबाजी में लिए गए निर्णय के कारण धन के साथ सम्मान की भी हानि हो सकती है। कार्य क्षेत्र पर अप्रिय घटनाओं के कारण दुविधा की स्थिति बनेगी व्यवसायी वर्ग बना बनाया अनुबंध अचानक निरस्त होने से परेशान हो सकते है। आर्थिक दृष्टिकोण से दिन निराश करेगा आवश्यकता के समय उधार भी नही मिलेगा। घर मे भी किसी पारिवारिक सदस्य के गलत आचरण से मन दुखी रहेगा मन में गलत विचार की भरमार रहने से सेहत पर बुरा असर पड़ेगा। सर अथवा अन्य शारीरिक अंग निष्क्रिय होते अनुभव होंगे। धैर्य से दिन बिताएं।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज भी परिस्थितियां आपके अनुकूल रहने से लाभ के कई अवसर मिलेंगे परन्तु अज्ञान की स्थिति अथवा गलत सलाह के कारण लाभ होना संदिग्ध ही रहेगा। के दिनों से टलरहा बहु प्रतीक्षित अति महत्त्वपूर्ण कार्य पूरा होगा। धन लाभ रुक-रुक कर होने से संचय नही कर पाएंगे। घर में सुख के साधनों की वृद्धि होगी इस पर अधिक खर्च भी रहेगा। कार्य व्यवसाय में नए सम्बन्ध बनने से अतिरिक्त आय के मार्ग भी खुलेंगे। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति से आज पीछे नहीं हटेंगे। सेहत को लेकर कुछ समय के लिये भी की स्थिति बन सकती है।
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1 year ago | [YT] | 21
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K S Bhakti Sansar
कोकिला व्रत 20 जुलाई विशेष
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हिंदू धर्म में प्रत्येक माह आने वाले व्रत व त्योहार बहुत ही खास व महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आषाढ़ माह में चतुर्मास लगने के बाद भी कई ऐसे व्रत-उपवास आते हैं जो कि सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत ही फलदायी माने गए हैं। आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि के दिन कोकिला व्रत रखा जाता है और यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख-शांति व खुशहाली लेकर आता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शादीशुदा महिलाएं कोकिला व्रत रखकर भगवान शिव व माता सती का पूजन करती हैं।
कोकिला व्रत तिथि एवं समय
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प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि के दिन कोकिला व्रत रखा जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल आषाढ़ पूर्णिमा तिथि 20 जुलाई को शाम 5 बजकर 59 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 21 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह व्रत भगवान शिव व माता सती को समर्पित है और व्रत में पूजा शाम के समय की जाती है इसलिए कोकिला व्रत 20 जुलाई 2024 को रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 19 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।
सुहागिनें क्यों रखती हैं कोकिला व्रत?
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कोकिला व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है। इसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं। यदि किसी कन्या के विवाह में अड़चनें आ रही हैं तो कोकिला व्रत रखने से अड़चनें दूर होती हैं। सुहागिन महिलाएं दांपत्य जीवन में खुशहाली और सुख-शांति की कामना से कोकिला व्रत रखती हैं। कहते हैं कि माता पार्वती अपने जन्म से पहले एक श्राप की वजह से हजारों वर्षों तक कोयल बनकर नंदनवन में भटकी थीं। श्राप मुक्त होने के लिए के लिए उन्होंने भगवान शिव की अराधना की थी इसलिए इस व्रत को कोकिला व्रत कहते हैं।
कोकिला व्रत पूजन विधि एवं नियम
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कोकिला व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें फिर भगवान भोलेनाथ को पंचामृत का अभिषेक करें और गंगाजल अर्पित करें। भगवान शिव को सफेद और माता पार्वती को लाल रंग के पुष्प, बेलपत्र, गंध और धूप आदि का उपयोग करें. इसके बाद घी का दीपक जलाएं और दिन भर निराहार व्रत करें। सूर्यास्त के बाद पूजा करें और फिर फलाहार लें इस व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता अगले दिन व्रत का पारण करने के पश्चात ही अन्न ग्रहण किया जाता है।
कोकिला व्रत कथा
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कोकिला व्रत से जुड़ी कथा का संबंध भगवान शिव एवं माता सती से जुड़ा है। माता सती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए लम्बे समय तक कठोर तपस्या को करके उन्हें पाया था। कोकिला व्रत कथा का वर्णन शिव पुराण में मिलता है। इस कथा के अनुसार देवी सती ने भगवान को अपने जीवन साथी के रुप में पाया। इस व्रत का प्रारम्भ माता पार्वती के पूर्व जन्म अर्थात सती रुप से है।देवी सती का जन्म राजा दक्ष की बेटी के रुप में होता है। राजा दक्ष को भगवान शिव अत्यधिक अप्रिय थे। राजा दक्ष एक बार यज्ञ का आयोजन करते हैं। इस यज्ञ में वह सभी लोगों को आमंत्रित करते हैं ब्रह्मा, विष्णु व सभी देवी देवताओं को आमंत्रण मिलता है किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया जाता है।
ऐसे में जब देवी सती को इस बात का पता चलता है कि उनके पिता दक्ष ने सभी को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री को नहीं। तब सती से यह बात सहन न हो पाई। सती ने शिव से आज्ञा मांगी कि वे भी अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहतीं हैं। शिव ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं होगा, फिर चाहें वह उनके पिता का घर ही क्यों न हो। सती शिव की बात से सहमत नहीं होती हैं और जिद्द करके अपने पिता के यज्ञ में चली जाती हैं।
वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ पर जाकर पाती हैं, कि उनके पिता ने उन्हें पूर्ण रुप से तिरस्कृत किया है। दक्ष केवल सती का ही नही अपितु भगवान शिव का भी अनादर करते हैं उन्हें अपशब्द कहते हैं। सती अपने पति के इस अपमान को सह नही पाती हैं और उसी यज्ञ की अग्नि में कूद जाती हैं। सती अपनी देह का त्याग कर देती हैं।
भगवान शिव को जब सती के बारे में पता चलता है तो वह यज्ञ को नष्ट कर, दक्ष के अहंकार का नाश करते हैं। सती की जिद्द के कारण प्रजापति के यज्ञ में शामिल होने तथा उनकी आज्ञा न मानने के कारण वह देवी सती को भी श्राप देते हैं, कि हजारों सालों तक कोयल बनकर नंदन वन में घूमती रहें।
इस कारण से इस व्रत को कोकिला व्रत का नाम दिया गया क्योंकि देवी सती ने कोयल बनकर हजारों वर्षों तक वहाँ तप किया। फिर पार्वती के रूप में उत्पन्न हुई और ऋषियों की आज्ञानुसार आषाढ़ के एक माह से दूसरे माह व्रत रखकर शिवजी का पूजन किया। जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने पार्वती के साथ विवाह कर लिया। अतः यह व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ पति प्राप्त करने वाला माना जाने लगा।
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1 year ago | [YT] | 19
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K S Bhakti Sansar
गुप्त नवरात्री विशेष
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महाकाली की उत्पत्ति कथा
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श्रीमार्कण्डेय पुराण एवं श्रीदुर्गा सप्तशती के अनुसार काली मां की उत्पत्ति जगत
जननी मां अम्बा के ललाट से हुई थी।
Ks bhakti sansar
कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के आतंक का प्रकोप इस कदर बढ़ चुका था कि उन्होंने अपने बल,छल एवं महाबली असुरों द्वारा देवराज इन्द्र सहित अन्य समस्त
देवतागणों को निष्कासित कर स्वयं उनके स्थान पर आकर उन्हें प्राणरक्षा हेतु भटकने
के लिए छोड़ दिया।
दैत्यों द्वारा आतंकित देवों को ध्यान आया कि महिषासुर के इन्द्रपुरी पर अधिकार
कर लिया है,तब दुर्गा ने ही उनकी मदद की थी।
तब वे सभी दुर्गा का आह्वान करने लगे।
उनके इस प्रकार आह्वान से देवी प्रकट हुईं एवं शुम्भ-निशुम्भ के अति शक्तिशाली
असुर चंड तथा मुंड दोनों का एक घमासान युद्ध में नाश कर दिया।
चंड-मुंड के इस प्रकार मारे जाने एवं अपनी बहुत सारी सेना का संहार हो जाने पर
दैत्यराज शुम्भ ने अत्यधिक क्रोधित होकर अपनी संपूर्ण सेना को युद्ध में जाने की
आज्ञा दी तथा कहा कि आज छियासी उदायुद्ध नामक दैत्य सेनापति एवं कम्बु दैत्य
के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे युद्ध के लिए प्रस्थान करें।
कोटिवीर्य कुल के पचास,धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति मेरे आदेश पर सेना एवं
कालक,दौर्हृद,मौर्य व कालकेय असुरों सहित युद्ध के लिए कूच करें।
अत्यंत क्रूर दुष्टाचारी असुर राज शुंभ अपने साथ सहस्र असुरों वाली महासेना लेकर
चल पड़ा।
उसकी भयानक दैत्यसेना को युद्धस्थल में आता देखकर देवी ने अपने धनुष से ऐसी
टंकार दी कि उसकी आवाज से आकाश व समस्त पृथ्वी गूंज उठी।
पहाड़ों में दरारें पड़ गईं।
देवी के सिंह ने भी दहाड़ना प्रारंभ किया,फिर जगदम्बिका ने घंटे के स्वर से उस आवाज
को दुगना बढ़ा दिया।
धनुष,सिंह एवं घंटे की ध्वनि से समस्त दिशाएं गूंज उठीं।
भयंकर नाद को सुनकर असुर सेना ने देवी के सिंह को और मां काली को चारों ओर
से घेर लिया।
तदनंतर असुरों के संहार एवं देवगणों के कष्ट निवारण हेतु परमपिता ब्रह्माजी,
विष्णु, महेश, कार्तिकेय, इन्द्रादि देवों की शक्तियों ने रूप धारण कर लिए एवं
समस्त देवों के शरीर से अनंत शक्तियां निकलकर अपने पराक्रम एवं बल के साथ
मां दुर्गा के पास पहुंचीं।
तत्पश्चात समस्त शक्तियों से घिरे शिवजी ने देवी जगदम्बा से कहा-
‘मेरी प्रसन्नता हेतु तुम इस समस्त दानव दलों का सर्वनाश करो।’
तब देवी जगदम्बा के शरीर से भयानक उग्र रूप धारण किए चंडिका देवी शक्ति रूप
में प्रकट हुईं।
उनके स्वर में सैकड़ों गीदड़ों की भांति आवाज आती थी।
असुरराज शुम्भ-निशुम्भ क्रोध से भर उठे।
वे देवी कात्यायनी की ओर युद्ध हेतु बढ़े।
अत्यंत क्रोध में चूर उन्होंने देवी पर बाण,शक्ति,शूल,फरसा,ऋषि आदि अस्त्रों-शस्त्रों
द्वारा प्रहार प्रारंभ किया।
देवी ने अपने धनुष से टंकार की एवं अपने बाणों द्वारा उनके समस्त अस्त्रों-शस्त्रों को
काट डाला,जो उनकी ओर बढ़ रहे थे।
मां काली फिर उनके आगे-आगे शत्रुओं को अपने शूलादि के प्रहार द्वारा विदीर्ण करती
हुई व खट्वांग से कुचलती हुईं समस्त युद्धभूमि में विचरने लगीं।
सभी राक्षसों चंड मुंडादि को मारने के बाद उसने रक्तबीज को भी मार दिया।
शक्ति का यह अवतार एक रक्तबीज नामक राक्षस को मारने के लिए हुआ था।
फिर शुम्भ-निशुंभ का वध करने के बाद बाद भी जब काली मां का गुस्सा शांत नहीं हुआ,
तब उनके गुस्से को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्ते में लेट गए और काली
मां का पैर उनके सीने पर पड़ गया।
शिव पर पैर रखते ही माता का क्रोध शांत होने लगा।
शवारुढा महाभीमां घोरद्रंष्टां हसन्मुखीम ।
चतुर्भुजां खडगमुण्डवराभय करां शिवाम।।
मुण्डमालाधरां देवीं ललजिह्वां दिगम्बराम।
एवं संचिन्तयेत कालीं श्मशानालयवासिनी
म ।।
अर्थात “महाकाली शव पर बैठी है,शरीर की आकृति डरावनी है,देवी के दांत तीखे और
महाभयावह है,ऎसे में महाभयानक रुप वाली,हंसती हुई मुद्रा में है.उनकी चार भुजाएं है.
एक हाथ में खडग,एक में वर,एक अभयमुद्रा मेम है,गले में मुण्डवाला है,जिह्वा बाहर
निकली है,वह सर्वथा नग्न है,वह श्मशान वासिनी हैं.श्मशान ही उनकी आवासभूमि है ।
उनकी उपासना में सम्प्रदायगत भेद हैं,श्मशानकाली की उपासना दीक्षागम्य है,
जो किसी अनुभवी गुरु से दीक्षा लेकर करनी चाहिए। देवी कि साधना दुर्लभ है।
!जय माँ आदिशक्ति काली माँ!
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1 year ago | [YT] | 19
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K S Bhakti Sansar
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः
या न जीर्यति जीर्यतः।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगः
तां तृष्णां त्यजतः सुखम्।।
(महाभारत, वन पर्व - २/३६)
अर्थात् 👉 खोटी बुद्धिवाले मनुष्यों के लिए जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, जो शरीर के जरा-शीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जिसे प्राण-नाशक रोग बताया गया है, उस तृष्णा को जो त्याग देता है, उसी को सुख मिलता है।
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
1 year ago | [YT] | 15
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K S Bhakti Sansar
60 वर्ष की आयु में पैर पर गोली लगने के बावजूद अकबर की सेना का संहार करने वाले वीरवर जयमल जी राठौड़ का जागीरी किला - बदनोर दुर्ग
1 year ago | [YT] | 9
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K S Bhakti Sansar
गंगा दशहरा जून 16, 2024 विशेष
गंगा पूजन एवं अवतरण की कथा
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दशमी तिथि प्रारंभ👉 15 जून 2024 रात्रि 02 बजकर 31 मिनट से।
दशमी तिथि समाप्त👉 16 जून अंतरात्रि 04 बजकर 25 मिनट पर।
हस्त नक्षत्र प्रारम्भ👉 जून 15, को प्रातः 08:14 बजे से।
हस्त नक्षत्र समाप्त - जून 16, को दिन 11:12 बजे पर।
वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिये इस दिन को हिन्दू धर्म मे माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है।
स्कन्द पुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष रूप से करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्ध्य (पूजादिक) एवम् तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें। ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष, दशमी को गंगावतरण का दिन मन्दिरों एवं सरोवरों में स्नान कर पवित्रता के साथ मनाया जाता है।
गंगा स्नान का महत्त्व
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भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य गंगा दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा स्तोत्र को पढ़ता है, चाहे वो दरिद्र हो, असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर पूर्ण फल को पाता है। यदि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मंगलवार हो तथा हस्त नक्षत्र तिथि हो तो यह सब पापों को हरने वाली होती है। वराह पुराण में लिखा है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बुधवार में हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी स्वर्ग से अवतीर्ण हुई थी। वह दस पापों को नष्ट करती है। इस कारण उस तिथि को दशहरा कहते हैं।
दशहरे के कुछ प्रमुख योग
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यह दिन संवत्सर का मुख माना गया है। इसलिए गंगा स्नान करके दूध, बताशा, जल, रोली, नारियल, धूप, दीप से पूजन करके दान देना चाहिए। इस दिन गंगा, शिव, ब्रह्मा, सूर्य देवता, भागीरथी तथा हिमालय की प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप, उपासना और उपवास किया जाता है। जिस भी वस्तु का दान करे उनकी संख्या 10 ही होनी शुभ मानी गयी है। इससे दस प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन नीचे दिये गये दस योग हो तो यह अपूर्व योग है और महाफलदायक होता है। यदि ज्येष्ठ अधिकमास हो तो स्नान, दान, तप, व्रतादि मलमास में करने से ही अधिक फल प्राप्त होता है। इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है।
दस योग
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ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर करण, आनंद योग व्यतिपात, कन्या का चंद्र, वृषभ का सूर्य आदि।
गंगा दशहरा पर दान का महत्त्व एवं पूजा विधि
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इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है। यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकते है। गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :-
“ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:”
इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए. इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए. गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए.
यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए. दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए. जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए।
यह मौसम भरपूर गर्मी का होता है, अत: छतरी, वस्त्र, जूते-चप्पल आदि दान में दिए जाते हैं। पूजन के लिये यदि गंगाजी अथवा अन्य किसी पवित्र नदी पर सपरिवार स्नान हेतु जाया जा सके तब तो सर्वश्रेष्ठ है, यदि संभव न हो तब घर पर ही गंगाजली को सम्मुख रखकर गंगाजी की पूजा-अराधना कर ली जाती है। इस दिन जप-तप, दान, व्रत, उपवास और गंगाजी की पूजा करने पर सभी पाप जड़ से कट जाते हैं- ऐसी मान्यता है। अनेक परिवारों में दरवाज़े पर पाँच पत्थर रखकर पाँच पीर पूजे जाते हैं। इसी प्रकार परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सवा सेर चूरमा बनाकर साधुओं, फ़कीरों और ब्राह्मणों में बांटने का भी रिवाज है। ब्राह्मणों को बड़ी मात्रा में अनाज को दान के रूप में आज के दिन दिया जाता है। आज ही के दिन आम खाने और आम दान करने को भी विशिष्ट महत्त्व दिया जाता है। दशहरा के दिन दशाश्वमेध संभव ना हो तो किसी भी गंगा घाट में दस बार स्नान करके शिवलिंग का दस संख्या के गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन करके रात्रि को जागरण करने से अनंत फल प्राप्त होता है। विधि-विधान से गंगाजी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूँ दस ब्राह्मणों को दान दें। परदारा और परद्रव्यादि से दूर रहें तथा ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ करके दशमी तक एकोत्तर-वृद्धि से दशहरा स्तोत्र का पाठ करें। इससे सब प्रकार के पापों का समूल नाश हो जाता है और दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त होती है।
गंगा दशहरे का फल
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ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। जैसे कि
👉 बिना आज्ञा या जबरन किसी की वस्तु लेना
👉 हिंसा
👉 पराई स्त्री के साथ समागम
👉 कटुवचन का प्रयोग
👉 असत्य वचन बोलना
👉 किसी की शिकायत करना
👉 असंबद्ध प्रलाप
👉 दूसरें की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा
👉 दूसरें को हानि पहुँचाना या ऐसे इच्छा रखना
👉 व्यर्थ बातो पर परिचर्चा
कहने का तात्पर्य है जिस किसी ने भी उपरोक्त पापकर्म किये हैं और जिसे अपने किये का पश्चाताप है और इससे मुक्ति पाना चाहता है तो उसे सच्चे मन से मां गंगा में डूबकी अवश्य लगानी चाहिये। यदि आप मां गंगा तक नहीं जा सकते हैं तो स्वच्छ जल में थोड़ा गंगा जल मिलाकर मां गंगा का स्मरण कर उससे भी स्नान कर सकते हैं। इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।
माँ गंगा जी की आरती
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ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता।
यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥
ॐ जय गंगे माता॥
गंगा अवतरण की कथा
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ब्रह्मा से अत्रि, अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबली और विक्रमशाली पुत्र हुए।
अत्रि से उत्पन्न चंद्रवंशियों में पुरुरवा-ऐल के बाद सबसे चर्चित कहानी ययाति और उसने पुत्रों की है, ययाति के 5 पुत्र थे-! पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुह्मु, उनके इन पांचों पुत्रों और उनके कुल के लोगों ने मिलकर लगभग संपूर्ण एशिया पर राज किया था, ऋग्वेद में इसका उल्लेख मिलता है।
ययाति बहुत ही भोग-विलासी राजा था, जब भी उसको यमराज लेने आते तो वह कह देता नहीं अभी तो बहुत काम बचे हैं, अभी तो कुछ देखा ही नहीं।
गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के मध्य प्रतिष्ठा की लड़ाई चलती रहती थी, इस लड़ाई के चलते ही ५ हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के पूर्व एक और महासंग्राम हुआ था जिसे 'दशराज युद्ध' के नाम से जाना जाता हैं इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है, यह रामायण काल की बात है।
महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दशराज युद्ध हुआ था इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान है, ऋग्वेद के ७ वें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है।
इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी, इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था।
ब्रह्मा से भृगु, भृगु से वारिणी भृगु, वारिणी भृगु से बाधृश्य, शुनक, शुक्राचार्य (उशना या काव्या), बाधूल, सांनग और च्यवन का जन्म हुआ, शुनक से शौनक, शुक्राचार्य से त्वष्टा का जन्म हुआ, त्वष्टा से विश्वरूप और विश्वकर्मा, विश्वकर्मा से मनु, मय, त्वष्टा, शिल्लपी और देवज्ञ का जन्म हुआ, दशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे।
इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर भगीरथ और श्रीराम के पूर्वज हैं। राजा सगर की २ रानियां थीं- केशिनी और सुमति, जब दीर्घकाल तक दोनों पत्नियों को कोई संतान नहीं हुई तो राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे।
तब ब्रह्मा के पुत्र महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को ६० हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथाहोगेतथा दूसरी से एक
वंशधर पुत्र होगा, वंशधर अर्थात जिससे आगे वंश चलेगा।
बाद में रानी सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया, वह सिर्फ एक बेजान पिंड था, राजा सगर निराश होकर उसे फेंकने लगे, तभी आकाशवाणी हुई- 'सावधान राजा! इस तूंबी में ६० हजार बीज हैं, घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में ६० हजार पुत्र प्राप्त होंगे।'
राजा सगर ने इस आकाशवाणी को सुनकर इसे विधाता का विधान मानकर वैसा ही सुरक्षित रख लिया, जैसा कहा गया था, समय आने पर उन मटकों से ६० हजार पुत्र उत्पन्न हुए, जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने ६० हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।
देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया, राजा सगर के ६० हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है।
यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया, ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, राजा सगर के ६० हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए, भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के ६० हजार पुत्र कपिल मुनि के तेज से भस्म हो जाने के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे।
अपने पूर्वजों की शांति के लिए ही भगीरथ ने घोर तप किया और गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल हुए, पूर्वजों की भस्म के गंगा के पवित्र जल में डूबते ही वे सब शांति को प्राप्त हुए।
राजा भगीरथ के कठिन प्रयासों और तपस्या से ही गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी, इसे ही 'गंगावतरण' की कथा कहते हैं। सगर और भगीरथ से जुड़ी अनेक और भी कथाएं है।
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1 year ago | [YT] | 18
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