भूरिभारभराक्रान्त! तव स्कन्धो न बाधते? न तथा बाधते राजन्! यथा बाधति बाधते?
व्याख्या- मालव की राजधानी धारा नगरी के परमार वंशीय राजा भोज, जिनका शासन काल 1018 से 1060 ईस्वी तक रहा, जो संस्कृत के महान् विद्वान् थे, जिन्होंने संस्कृत भाषा में कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें – ‘राजमार्तण्ड’,, ‘सरस्वतीकण्टाभरण‘, ‘सरस्वतीकठाभरण‘, ‘श्रृंगारप्रकाश‘, ‘तत्त्वप्रकाश‘, ‘वृहद्राजमार्तण्ड‘, ‘राजमृगांक‘ आदि प्रमुख हैं । इनके शासन काल में संस्कृत भारत की जनभाषा हुआ करती थी, जिसका प्रमाण इस प्रसङ्ग से मिलता है –
एक बार राजा भोज अपने अपनी प्रजा की स्थिति को जानने के लिए सामान्य जन का वस्त्र पहन कर तथा अपना स्वरूप बदलकर राज्य में अकेले ही निकल पड़े। रास्ते में उनको एक लकड़हारा मिला जिसने अपने सिर पर लकड़ियों का भार रख रहा था। यह देखकर राजा भोज ने उस लकड़हारे से पूछा (क्योंकि उस समय संस्कृत ही सामान्य जनों की भी लोकभाषा थी, इसलिए राजा भोज ने संस्कृत में ही पूछा) – “किन्ते ‘बाधति’ भारम्?” (क्या यह भार तुमको कष्ट दे रहा है?)
वह लकड़हारा राजा भोज की बात को सुनकर उनसे कहता है – “भारन्न बाधते राजन्, यथा ‘बधति[1]’ बाधते[2]।” (अर्थात् हे राजन्! हे श्रीमन्! मुझे यह भार उतना कष्ट नहीं दे रहा है, जितना आपका यह “बाधति” (अशुद्ध भाषा प्रयोग) कष्ट दे रहा है (बाधते)। )
संस्कृत भाषा में – “बाध्” (कष्ट देना) धातु का प्रयोग नित्य आत्मनेपद में होता है, जिसके रूप “बाधते, बाधेते, बाधन्ते” के समान चलते हैं, लेकिन राजा भोज ने जो उस लकड़हारे से जो प्रश्न किया था उसमें उन्होंने “बाध्” धातु को परस्मैपदी रूप (बाधति बाधतः बाधन्ति) में अशुद्ध प्रयुक्त करते हुए पूछा था कि, “किन्न ते भारं ‘बाधति’ ?” इसी अशुद्ध भाषा प्रयोग के कारण वह सामान्य लकड़हारा, राजा से कहता है कि, “हे श्रीमान्! मुझे यह लकड़ी का भार उतना कष्ट नहीं दे रहा है जितना आपके द्वारा किया गया भाषा का अशुद्ध प्रयोग (बाधते को बाधति कहना) कष्ट दे रहा है।”
अर्थात् - अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है।
गीता जयंती!! मुझे लगता है आप किसी भी मानसिक अवसाद में हो उस समय केवल आप को उस विषम परिस्थिति से सही मार्ग तक अने के लिए भगवत गीता बहुत सहायक हो सकती है।
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Swadeshi Apnaao 2025 to @2047
3 months ago | [YT] | 1
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जगन्नाथ महाप्रभु रथयात्रा
6 months ago | [YT] | 18
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जय श्रीसीताराम।। सभी भारत वासियों को दीपोत्सव की हर्द्धिक शुभकामनाएं । जय श्रीराम।
1 year ago | [YT] | 8
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भूरिभारभराक्रान्त! तव स्कन्धो न बाधते?
न तथा बाधते राजन्! यथा बाधति बाधते?
व्याख्या- मालव की राजधानी धारा नगरी के परमार वंशीय राजा भोज, जिनका शासन काल 1018 से 1060 ईस्वी तक रहा, जो संस्कृत के महान् विद्वान् थे, जिन्होंने संस्कृत भाषा में कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें – ‘राजमार्तण्ड’,, ‘सरस्वतीकण्टाभरण‘, ‘सरस्वतीकठाभरण‘, ‘श्रृंगारप्रकाश‘, ‘तत्त्वप्रकाश‘, ‘वृहद्राजमार्तण्ड‘, ‘राजमृगांक‘ आदि प्रमुख हैं । इनके शासन काल में संस्कृत भारत की जनभाषा हुआ करती थी, जिसका प्रमाण इस प्रसङ्ग से मिलता है –
एक बार राजा भोज अपने अपनी प्रजा की स्थिति को जानने के लिए सामान्य जन का वस्त्र पहन कर तथा अपना स्वरूप बदलकर राज्य में अकेले ही निकल पड़े। रास्ते में उनको एक लकड़हारा मिला जिसने अपने सिर पर लकड़ियों का भार रख रहा था। यह देखकर राजा भोज ने उस लकड़हारे से पूछा (क्योंकि उस समय संस्कृत ही सामान्य जनों की भी लोकभाषा थी, इसलिए राजा भोज ने संस्कृत में ही पूछा) – “किन्ते ‘बाधति’ भारम्?” (क्या यह भार तुमको कष्ट दे रहा है?)
वह लकड़हारा राजा भोज की बात को सुनकर उनसे कहता है – “भारन्न बाधते राजन्, यथा ‘बधति[1]’ बाधते[2]।” (अर्थात् हे राजन्! हे श्रीमन्! मुझे यह भार उतना कष्ट नहीं दे रहा है, जितना आपका यह “बाधति” (अशुद्ध भाषा प्रयोग) कष्ट दे रहा है (बाधते)। )
संस्कृत भाषा में – “बाध्” (कष्ट देना) धातु का प्रयोग नित्य आत्मनेपद में होता है, जिसके रूप “बाधते, बाधेते, बाधन्ते” के समान चलते हैं, लेकिन राजा भोज ने जो उस लकड़हारे से जो प्रश्न किया था उसमें उन्होंने “बाध्” धातु को परस्मैपदी रूप (बाधति बाधतः बाधन्ति) में अशुद्ध प्रयुक्त करते हुए पूछा था कि, “किन्न ते भारं ‘बाधति’ ?” इसी अशुद्ध भाषा प्रयोग के कारण वह सामान्य लकड़हारा, राजा से कहता है कि, “हे श्रीमान्! मुझे यह लकड़ी का भार उतना कष्ट नहीं दे रहा है जितना आपके द्वारा किया गया भाषा का अशुद्ध प्रयोग (बाधते को बाधति कहना) कष्ट दे रहा है।”
1 year ago | [YT] | 14
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. ओम्
यदा विनियतं चित्त-
मात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो
युक्त इत्युच्यते तदा ॥। (श्रीमद्भगवद्गीता- ६.१८)
अर्थात् - अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है।
...... क्रमशः
🙏🌻💐मङ्गलं सुप्रभातम्💐🌻🙏
🙏🌻💐सादरं वन्दनम्💐🌻🙏
1 year ago (edited) | [YT] | 3
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गीता जयंती!! मुझे लगता है आप किसी भी मानसिक अवसाद में हो उस समय केवल आप को उस विषम परिस्थिति से सही मार्ग तक अने के लिए भगवत गीता बहुत सहायक हो सकती है।
2 years ago | [YT] | 17
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शुभम् करोति कल्याणम्,आरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुध्दि विनाशाय, दीप:ज्योति नमोस्तुते।*
🙏🪔🪔🪔🪔🪔🪔🙏
2 years ago | [YT] | 10
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जयतु भारतं जयतु संस्कृतं
2 years ago | [YT] | 5
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संस्कृत 73 code JRF cutoff Jun 2023 Result
2 years ago | [YT] | 10
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संस्कृत 25 code JRF Cutoff Jun 2023
2 years ago | [YT] | 4
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