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SAHITY SAGAR 2.0
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3 weeks ago | [YT] | 5
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Mppsc assistant professor exam 2025 ke एडमिट कार्ड जारी हो चुके है
1 month ago | [YT] | 10
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मध्य प्रदेश सहायक प्राध्यापक परीक्षा 2025 परीक्षा तिथि जारी
2 months ago | [YT] | 12
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भारतरत्न से सम्मानित राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन एक सच्चे राष्ट्रभक्त, स्वतंत्रता संग्राम के नायक और हिन्दी भाषा के प्रखर पक्षधर थे। उन्होंने न सिर्फ आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई, बल्कि हिन्दी को राष्ट्र की पहचान बनाने के लिए अथक प्रयास भी किए। उनके विचार, पत्रकारिता, और समाज सुधार के कार्य आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि
2 months ago | [YT] | 7
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बघेली कवि स्व. सैफुद्दीन सिद्दीकी 'सैफू' के जन्मदिन पर....
" लोक संवेदनाओं के कवि: सैफुद्दीन सिद्दीकी 'सैफू' "
- प्रियांशु 'प्रिय'
भारत विविधताओं का देश है। यहाँ की मिट्टी ने न केवल अनेक धर्म, जातियाँ और संस्कृतियों को जन्म दिया है अपितु सैकड़ों बोलियाँ और भाषाएँ भी अपनत्व को दर्शाती रही हैं। यही भाषाई विविधता भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है जो उसे विश्व के अन्य देशों से अलग करती हैं। हिंदी, तमिल, बंगला, मराठी जैसी प्रमुख भाषाओं के साथ-साथ भारत के हर क्षेत्र में लोक जीवन से जुड़ी लोकभाषाएँ भी हैं। जो अपने भीतर उक्त भूमि की आत्मा और जनता की संवेदना को समेटे हुए हैं।
इन्हीं लोकभाषाओं में एक हैं ‘बघेली’। जो पूर्वी हिंदी के अंतर्गत आने वाली तीन बोलियों या उपभाषाओं (अवधी,बघेली,छत्तीसगढ़ी) में से एक है। बघेली केवल एक लोकभाषा नहीं बल्कि एक जीवंत संस्कृति का प्रतीक है। इसमें लोकगीत, लोककथाएँ, लोकनाट्य, मुहावरे, कहानियाँ आदि समाहित हैं। जो इसकी संस्कृति का परिचय देती हैं।
बघेली साहित्य में अनेक कवियों ने अपने शब्दों से लोकभावनाओं को स्वर दिया है। इसी कड़ी में प्रमुख नाम है कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी ‘सैफू’। सैफू जी ने अपनी रचनाओं से न केवल बघेली की लोकधारा को साहित्यिक रूप प्रदान किया बल्कि उसमें सामाजिक चेतना, मानवता और समरसता के भावों को भी गहराई से अभिव्यक्त किया। सैफू पर बात करना इसलिए भी बेहद ज़रूरी है क्योंकि ये बघेली के उन चुनिंदा कवियों में हैं जिन्होंने बघेली के साहित्य में नींव का काम किया है। बघेली साहित्य की बात हो और बैजू, सैफू,शंभू, रामदास पयासी का नाम न लिया जाए यह बात संभव नहीं प्रतीत होती। इस लेख को लिखने का एक उद्देश्य यह भी है कि जिस कवि ने अपने रचनात्मक साहित्य में विभिन्न विधाओं की ओर अपनी सशक्त लेखनी चलाई उसके बावजूद इन्हें सिर्फ किताब के पन्नों तक ही सीमित रखा गया है। बघेली के अनेक कार्यक्रम होते हैं पर शायद ही उनकी याद में कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया हो। आश्चर्य है कि जो कवि साहित्य की विभिन्न विधाओं – प्रबंध काव्य, कहानी, कविता आदि – में अपनी पैनी दृष्टि रखता हो और जिसकी बघेली की पहली काव्य कृति सर्जनात्मक धरातल पर लिखा गया पहला काव्य संग्रह हो न सिर्फ प्रकाशन की दृष्टि से बल्कि रचनाओं की मारक क्षमता की दृष्टि से भी। उसको इस तरह हाशिए में रख देना, गहरे सवाल पैदा करता है। अ.प्र.सि.वि.वि. पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ भगवती प्रसाद शुक्ल कहते है कि ‘सैफू के पूर्व भी बघेलखंड में साहित्य रचा गया है किंतु उसे बघेली का शुद्ध मूल साहित्य नहीं कहा जा सकता। शुद्ध बघेली को साहित्यिक विधा के हर क्षेत्र में सैफू ने ही भरा है। सैफू की यही विशेषता है।‘ बघेली साहित्य के इन वट वृक्षों को किसी पाठ्यक्रम में शामिल भर कर लेने से उनकी प्रासंगिकता नहीं तय होती है। हमें उनकी रचनाओं को आज की नई पीढ़ी तक भी पहुंचाना होगा। समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक भी इन कवियों की रचनाओं की गूंज जानी चाहिए जिनके लिए यह साहित्य रचा गया है। समस्या ये है कि नया रचनाकार सैफू को पढ़ता या जानता नहीं है और जो सैफू के समय के साहित्यकार हैं उन्हें अपने रचे हुए साहित्य की प्रशंसा और वाहवाही से फुर्सत नहीं है। मेरे पास सैफू की कुछ कृतियां रखी हुई हैं। मैंने जब जैसा समय मिला उनका अध्ययन किया है। कुछ जानकारी अपने पिताजी से इकट्ठा की है और कुछ विभिन्न विद्वानों के लेखादि से। जिन्हें मैं संदर्भ में प्रस्तुत करूंगा।
सैफू का जीवन परिचय –
कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी सैफू का जन्म सतना जिले के अमरपाटन तहसील अंतर्गत ग्राम रामनगर में 1 जुलाई सन् 1932 को हुआ। बाणसागर योजना के कारण ग्राम रामनगर का कुछ क्षेत्र अधिक प्रभावित हुआ इसी कारणवश सन् 1983 में शासन द्वारा मुआवजा प्राप्त कर सैफू ने अपना निवास स्थान सतना शहर में सिविल लाइन के पास गढ़िया टोला, बगहा में बना लिया। इनके पुत्र जमीलुद्दीन सिदृीकी - जो स्वयं भी कवि हैं - आज भी वहाँ निवास कर रहे हैं। सैफू को साहित्य के प्रति लगाव विरासत में मिला। आपके पिता मुंशी नजीरूद्दीन सिद्दीकी ‘उपमा’ हिंदी, उर्दू और बघेली के एक प्रतिभा संपन्न कवि थे। जीविकोपार्जन के लिए सैफू राजस्व निरीक्षक के पद पर कार्यरत रहे एवं सेवानिवृत्ति के उपरांत कुछ समय तक आयुर्वेद चिकित्सा विशारद की परीक्षा पास करके एक सफल वैद्य के रूप में जनता की सेवा करते रहे लेकिन समयाभाव के कारण वे वैद्यक से दूर होकर लोक साहित्य के अध्ययन और रचनात्मक लेखन में ही संलग्न रहे और अपनी मातृभाषा के प्रति गहरा लगाव होने के कारण उन्होंने ‘हिंदी साहित्य रत्न’ की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। कवि सैफू की रचनाएँ उन दिनों की लोकप्रिय पत्रिकाओं और समाचार पत्रों - प्रकाश,भास्कर, बान्धवीय, दैनिक जागरण, मित्र दीपिका, आर्थिक घोष तथा प्राणलोक आदि - में प्रकाशित होती रहीं। इसके साथ साथ आकाशवाणी रीवा से भी सैफू की कुण्डलियाँ, बघेली कविताएँ, बघेली गीत, कहानियाँ आदि प्रसारित होती रही हैं। सैफू की रचनाएँ बांधवीय महाराज श्री गुलाब सिंह जू देव रीवा नरेश द्वारा पुरस्कृत हैं। सेवानिवृत्ति के थोड़े समय बाद ही मधुमेह की लंबी बीमारी के चलते सन् 1987 को रीवा अस्पताल में सैफू का निधन हो गया।
सैफू की प्रकाशित कृतियाँ –
शीर्षस्थ बघेली कवि सैफुद्दीन सिद्दीकी आज उनके जन्मदिन पर सादर प्रणाम।
‘दिया बरी भा अंजोर दूरिन दूरी’
देख परै खाले अंधियारिन दूरी।
पोत लीप भितियन का,
अउर परमिटियन का।
अंगना का फरिका का,
गोरूआ के खरका का।
टीक दिहिन पूज दिहिन,
गघरी औ मड़का का।
जुरिके परसाद दिहिन,
भाई औ लड़का का ।
चारौ न डारिन अउँघाय भंइस भूरी।
दिया बरी भा अंजोर दूरिन दूरी।
( कवि सैफू )
- प्रियांशु प्रिय
2 months ago | [YT] | 12
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2 months ago | [YT] | 2
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3 months ago | [YT] | 2
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Mppsc assistant professor 2024 interview date announced
4 months ago (edited) | [YT] | 6
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4 months ago | [YT] | 2
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bhavaniprasad mishr ke kavysangrah
5 months ago (edited) | [YT] | 1
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