श्री आनंदपुर परमहंस



श्री आनंदपुर परमहंस

गंगा का पृथ्वी पर अवतरण

प्राचीन भारत की एक महान गाथा है, जो राजा भगीरथ के अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और असाधारण तपस्या की कहानी कहती है। यह कहानी है स्वर्ग में बहने वाली पवित्र नदी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की, एक ऐसी यात्रा जो मानवीय इच्छाशक्ति और दृढ़ता की विजय का प्रतीक है।

यह कथा अयोध्या के प्रतापी राजा सगर से आरंभ होती है। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन देवराज इंद्र ने ईर्ष्यावश यज्ञ के घोड़े को चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में छिपा दिया। जब राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को खोजते हुए आश्रम में पहुँचे, तो उन्होंने कपिल मुनि को ही चोर समझ लिया और उनका अपमान कर दिया। अपनी तपस्या में विघ्न पड़ने से क्रोधित होकर, कपिल मुनि ने अपने नेत्रों की अग्नि से उन सभी को भस्म कर दिया।

अपने पूर्वजों की आत्माओं की शांति और मोक्ष के लिए, राजा सगर के वंशजों ने घोर तपस्या की, लेकिन कोई भी गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हो सका। कई पीढ़ियों के बाद, इसी वंश में राजा भगीरथ का जन्म हुआ। अपने पूर्वजों की मुक्ति का भार अपने कंधों पर लेकर, भगीरथ ने सब कुछ त्याग दिया और हिमालय की गोद में कठोर तपस्या करने चले गए।

भगीरथ की तपस्या साधारण नहीं थी। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर, केवल वायु का सेवन करते हुए, एक पैर पर खड़े होकर भगवान ब्रह्मा की आराधना की। उनकी तपस्या की अग्नि से ब्रह्मांड कांप उठा। अंततः, उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प के आगे भगवान ब्रह्मा को झुकना पड़ा। वे प्रकट हुए और भगीरथ को वरदान मांगने को कहा। भगीरथ ने विनम्रतापूर्वक अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर भेजने की प्रार्थना की।

भगवान ब्रह्मा ने भगीरथ की इच्छा पूरी की, लेकिन उन्होंने एक गंभीर समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया। गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि यदि वे सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरतीं, तो पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाती। इस विनाश को रोकने का सामर्थ्य केवल भगवान शिव में था।

अब भगीरथ के सामने एक और बड़ी चुनौती थी – भगवान शिव को प्रसन्न करना। उन्होंने एक बार फिर अपनी तपस्या आरंभ की, इस बार भगवान शिव के लिए। उनकी भक्ति और दृढ़ता से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने का वचन दिया।

वह क्षण आ ही गया, जब गंगा पूरे वेग से स्वर्ग से उतरीं। भगवान शिव ने अपनी विशाल जटाओं को फैला दिया और गंगा के प्रचंड प्रवाह को उनमें समाहित कर लिया। कई वर्षों तक गंगा शिव की जटाओं में ही भ्रमण करती रहीं, जिससे उनका अहंकार शांत हुआ और वेग नियंत्रित हो गया।

अंत में, भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गंगा की एक छोटी-सी धारा पृथ्वी की ओर प्रवाहित की। भगीरथ अपने दिव्य रथ पर सवार होकर आगे-आगे चले और गंगा उनके पीछे-पीछे। मार्ग में गंगा ने देव, यक्ष, और मनुष्यों का उद्धार किया और अंततः उस स्थान पर पहुँचीं, जहाँ राजा सगर के पुत्रों की राख पड़ी थी। गंगा के पवित्र जल के स्पर्श मात्र से उन सभी साठ हजार आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हुआ।

3 months ago | [YT] | 2

श्री आनंदपुर परमहंस

मैं आपको भगवान राम की एक बात सुनाता हूँ…

अयोध्या में राज्याभिषेक की तैयारी थी।
उसी दिन आदेश आया—“राम, वन जाना होगा।”

दरबार सन्न रह गया।
माँ की आँखें भर आईं, लक्ष्मण तड़प उठे, लोग रो पड़े।

पर भगवान राम —शांत।

राम ने बस इतना कहा:
“पिता का वचन मेरे लिए सबसे बड़ा है।”

और फिर उन्होंने वही किया—
सिंहासन छोड़ दिया, महल छोड़ दिया, वन चल पड़े।

अंत में बस इतना—
गुरुजी की आज्ञा है: वचन निभाएँ, मर्यादा रखें, धर्म को सबसे ऊपर रखें।

6 months ago (edited) | [YT] | 1

श्री आनंदपुर परमहंस

एक बार की बात है। काशी में कबीर साहेब करघे पर बैठे थे। पास ही एक पंडित आया और बोला—
“कबीर! तू न मंदिर जाता, न शास्त्र पढ़ता… फिर भी लोग तुझे संत क्यों मानते हैं? ईश्वर तो केवल पूजा-पाठ से मिलता है।”

कबीर साहेब मुस्कुराए। उन्होंने करघे का सूत रोक दिया और धीरे से बोले—
“पंडित जी, बताओ… दीपक जलाने के लिए क्या चाहिए?”

पंडित बोला—“तेल, बाती और आग।”

कबीर साहेब बोले—
“और अगर हाथ में तेल-बाती हो, पर आग न लगे… तो दीपक जलेगा?”

पंडित चुप हो गया।

कबीर साहेब ने कहा—
“बस यही बात है।
शास्त्र तेल हैं, विधि-विधान बाती हैं—पर ‘नाम’ की आग न लगे तो भीतर का दीपक नहीं जलता।
और जब भीतर दीपक जलता है, तो मंदिर भी भीतर ही दिखता है।”

पंडित ने फिर तर्क किया—“पर ईश्वर तो मूर्ति में है।”

कबीर साहेब ने पास रखे घड़े की ओर इशारा किया और बोले—
“घड़े में पानी भर दो… तो क्या पानी ‘घड़ा’ हो जाता है?
पानी तो पानी ही रहता है।
वैसे ही प्रभु मूर्ति में सीमित नहीं—वह तो हर श्वास में, हर प्राणी में, हर कण में है।
मूर्ति सहारा है—पर मंज़िल नहीं।”

पंडित की आँखें नम हो गईं। उसने कबीर के चरण छुए और बोला—
“आज समझ आया… मैं बाहर खोजता रहा, और भीतर का दीपक बुझा ही रहा।”

कबीर साहेब ने बस इतना कहा—
“बाहर की पूजा ठीक है, पर साथ में भीतर का नाम भी जगा लो।
जहाँ नाम जगा—वहीं राम मिला।”

6 months ago | [YT] | 1

श्री आनंदपुर परमहंस

सुशील–दुर्जन और भोला बैल
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किसी वन में केसरी सिंह नाम का राजा रहता था। उसके पास दो सियार मंत्री थे—सुशील और दुर्जन। सुशील बुद्धिमान और हितैषी था, पर दुर्जन ईर्ष्यालु और कपटी।

एक दिन वन में एक सीधा-सादा बैल आया, जिसका नाम था भोला बैल। वह बलवान था और काम में निपुण। राजा केसरी ने उसे अपने पास रख लिया। कुछ ही दिनों में भोला बैल राजा का प्रिय बन गया। राजा उसे आदर देता, और कई काम उसी की सलाह से करता।

यह देखकर दुर्जन के मन में जलन हुई। उसने सोचा—“अब राजा मेरी बात कम सुनेगा।”

दुर्जन ने चाल चली।
पहले वह राजा के पास गया और बोला, “महाराज! भोला बैल बहुत ताकतवर है। वह धीरे-धीरे घमंड में आ रहा है। कहीं वह बगावत न कर दे।”
फिर वह भोला बैल के पास पहुँचा और बोला, “भोले! राजा तुमसे डरने लगा है। आज रात वह तुम्हें मारने की सोच रहा है। बचना हो तो सावधान रहना।”

अब क्या था—राजा के मन में शक, और भोला बैल के मन में डर बैठ गया।
रात को भोला बैल डरते-डरते दरबार में आया। राजा भी उसे कठोर नजर से देखने लगा। दोनों के बीच बात बंद थी, बस मन में खटक थी।

उसी समय सुशील वहाँ आ पहुँचा। उसने देखा कि आग लगने ही वाली है। वह तुरंत बोला,
“महाराज! शंका की दवा प्रश्न है। कृपा करके भोला बैल से सीधे पूछिए।”

राजा ने पूछा, “भोले! क्या तूने कभी मेरे विरुद्ध सोचा है?”
भोला बैल हाथ जोड़कर बोला, “महाराज! मैंने तो केवल सेवा की है। पर मुझे कहा गया कि आप मुझे मारना चाहते हैं, इसलिए मैं भयभीत हो गया।”

राजा समझ गया कि दोनों के बीच विष बोया गया है। उसने दुर्जन को बुलाया। दुर्जन बहाने बनाने लगा, पर उसका झूठ प्रकट हो गया। राजा ने उसे दंड दिया और भोला बैल को आश्वासन दिया।

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जो बात कानों में फुसफुसाकर रिश्ते तोड़े, वह मित्र नहीं—दुर्जन है।
और सुनी-सुनाई बात पर नहीं, सीधे पूछकर निर्णय करना चाहिए।
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6 months ago | [YT] | 1

श्री आनंदपुर परमहंस

बोलो जयकारा! और बताइए—सतगुरु के अनुसार,

भक्ति से मन के तीन गुणों (रज, तम, सत्त्व) में सबसे पहले कौन टूटता है?

6 months ago | [YT] | 0