संसारी माता पिताओं की अपेक्षा लाखों गुना अधिक वात्सल्य भगवान अपने भक्त पर सदा करते हैं। पंडित गयाप्रसाद जी के उपदेश संख्या ४७९ में भजन के चार विघ्नों का उल्लेख है-
१.-सुकृत, २. दुष्कृत, ३. अपराध, ४.-अपनी भक्ति ज्ञान का अहंकार।
अपना मन जिसे पाप माने उसका त्याग करना चाहिए, जिसे पुण्य माने उसका अनुष्ठान करना चाहिए। कर्म को करने के बाद यदि ग्लानि हो तो वह पाप है, यदि प्रसन्नता हो तो वह पुण्य है।
संत विभीषण का रावण ने अपमान किया। श्रीविदुर जी संत थे उनका दुर्योधन ने तिरस्कार किया तो प्रभु ने रावण और दुर्योधन का नाश कर दिया। द्वार पर आए भिक्षुक का और गाय का सत्कार करना चाहिए। अपने पास कुछ न हो तो हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। गाली दे कर भगाना नहीं चाहिए। घर में तुलसी का वृक्ष लगाकर सींचना, प्रणाम, परिक्रमा करना चाहिए।
सभी उपनिषद गौ स्वरूप हैं, श्रीकृष्ण उनके ग्वाले हैं, पार्थ (अर्जुनरूपी) संत उसका पान करने वाले गोवत्स हैं एवं श्री भगवद् गीता दूध रूपी अमृत है। (गीता माहात्म्य)
सभी आस्तिक जनों को श्रीमद् भगवद्गीता जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं। जय गोमाता जय गोपाल।।
मन में भक्तमाल के छप्पयों का, भक्त चरित्र का गान होने पर भगवान वहाँ उपस्थित होकर सुनते हैं। यही कारण है कि मानसिक कीर्तन, सेवा आदि की महिमा अनन्त हो जाती है। मन से जब कुछ किया जाता है तब मन का संग्रह अधिक रहता है। मन के इतस्ततः जाने पर मानसिक भजन-साधन बनेगा ही नहीं। वाणी शरीर आदि के द्वारा हुए आचरण में दम्भ दिखावा का लेश हो सकता है पर मन से मन में होने वाले साधन में दम्भ आदि का लेश नहीं रहता है। इन्हीं कारणों से मानसी साधन-भजन कठिन तो अवश्य है साथ ही उसका लाभ विशेष है।
श्रीनाभा जी ने भी सर्वत्र से संग्रह करके भक्तमाल की रचना की। भक्तमाल के सिद्धाँतों का समर्थन सर्वत्र मिलता है। भक्तमाल का वेद-पुराण-शास्त्रों से विरोध नहीं है। "काढ्यों गाभा वेद को।" श्रीनाभा जी ब्रह्मा जी के अवतार हैं अतः भक्तमाल वेद का अंकुर है। इसके पढ़ने से वेदादि इतिहास का पाठ हो जाता है। श्रवण करने से सबके श्रवण का फल प्राप्त होता है।
प्रभु श्रीकृष्ण का नाम पुण्डरीकाक्ष है। पुण्डरीक-कमल के समान नेत्र हैं। उन नेत्रों में जो अपने नेत्रों को मिलाते हैं तो मन श्रीभगवान के मन से मिल जाता है। अनन्यता एकाग्रता हो जाने के कारण भक्त पवित्र हो जाता है। भगवान श्रीशंकराचार्य का मत है कि पुण्डरीक हृदयकमल को परमात्मा सर्वदा देखा करते हैं। जीव के एक एक भाव को प्रभु जानते हैं इस बात को जानकर सभी को अपने हृदय में दुर्भाव न रखकर सद्भाव को ही रखना चाहिए। यही जीव को पवित्र करने वाला है। भगवत स्मरण, समर्पण से जीव पवित्र हो जाते हैं। भक्तमाल का आरम्भ भक्त शब्द से होता है और अंत में दास शब्द पर पूर्ति हो जाती है। भक्त दास का तात्पर्य है कि इस पूरे ग्रंथ का तात्पर्य यह है कि भक्तों के दास बनकर जीवन बिताओ। दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है। अर्थात् आदि से अंत तक भक्त का परत्व ही इस ग्रंथ में वर्णित है। भक्त दास कैसे होते हैं, इसका वर्णन भक्तमाल में किया गया है। विना भक्तमाल के भक्ति का स्वरूप समझना और पाना कठिन है अतः भक्तमाल का आश्रय मुख्य रूप से लेना चाहिए।
पूज्य गुरुदेव श्री राजेंद्र दास जी महाराज सूर श्याम गौशाला परासोली, गोवर्धन, 9720992400, 9720995600, 972
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संसारी माता पिताओं की अपेक्षा लाखों गुना अधिक वात्सल्य भगवान अपने भक्त पर सदा करते हैं। पंडित गयाप्रसाद जी के उपदेश संख्या ४७९ में भजन के चार विघ्नों का उल्लेख है-
१.-सुकृत, २. दुष्कृत, ३. अपराध, ४.-अपनी भक्ति ज्ञान का अहंकार।
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अपना मन जिसे पाप माने उसका त्याग करना चाहिए, जिसे पुण्य माने उसका अनुष्ठान करना चाहिए। कर्म को करने के बाद यदि ग्लानि हो तो वह पाप है, यदि प्रसन्नता हो तो वह पुण्य है।
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संत विभीषण का रावण ने अपमान किया। श्रीविदुर जी संत थे उनका दुर्योधन ने तिरस्कार किया तो प्रभु ने रावण और दुर्योधन का नाश कर दिया। द्वार पर आए भिक्षुक का और गाय का सत्कार करना चाहिए। अपने पास कुछ न हो तो हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। गाली दे कर भगाना नहीं चाहिए। घर में तुलसी का वृक्ष लगाकर सींचना, प्रणाम, परिक्रमा करना चाहिए।
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सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत।।
सभी उपनिषद गौ स्वरूप हैं, श्रीकृष्ण उनके ग्वाले हैं, पार्थ (अर्जुनरूपी) संत उसका पान करने वाले गोवत्स हैं एवं श्री भगवद् गीता दूध रूपी अमृत है।
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जय गोमाता जय गोपाल।।
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मन में भक्तमाल के छप्पयों का, भक्त चरित्र का गान होने पर भगवान वहाँ उपस्थित होकर सुनते हैं। यही कारण है कि मानसिक कीर्तन, सेवा आदि की महिमा अनन्त हो जाती है। मन से जब कुछ किया जाता है तब मन का संग्रह अधिक रहता है। मन के इतस्ततः जाने पर मानसिक भजन-साधन बनेगा ही नहीं। वाणी शरीर आदि के द्वारा हुए आचरण में दम्भ दिखावा का लेश हो सकता है पर मन से मन में होने वाले साधन में दम्भ आदि का लेश नहीं रहता है। इन्हीं कारणों से मानसी साधन-भजन कठिन तो अवश्य है साथ ही उसका लाभ विशेष है।
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नित्य नवीन दुलहा- दुलहिन सरकार, श्री सीताराम जी के विवाह महोत्सव की सभी वैष्णवों को मंगल बधाई।
अद्य मे सफलं जन्म राम त्वां सह सीतया।
एकासनस्थं पश्यामि भ्राजमानं रविं यथा॥
हे राम! आज मेरा जन्म सफल हो गया, जो मैं सूर्य के समान देदिप्यमान एवं श्रीसीता के साथ विराजमान एक आसन पर आपको देख रहा हूँ।(राजा जनक, अध्यात्मरामायणम्)
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श्रीनाभा जी ने भी सर्वत्र से संग्रह करके भक्तमाल की रचना की। भक्तमाल के सिद्धाँतों का समर्थन सर्वत्र मिलता है। भक्तमाल का वेद-पुराण-शास्त्रों से विरोध नहीं है। "काढ्यों गाभा वेद को।" श्रीनाभा जी ब्रह्मा जी के अवतार हैं अतः भक्तमाल वेद का अंकुर है। इसके पढ़ने से वेदादि इतिहास का पाठ हो जाता है। श्रवण करने से सबके श्रवण का फल प्राप्त होता है।
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3 months ago | [YT] | 2
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प्रभु श्रीकृष्ण का नाम पुण्डरीकाक्ष है। पुण्डरीक-कमल के समान नेत्र हैं। उन नेत्रों में जो अपने नेत्रों को मिलाते हैं तो मन श्रीभगवान के मन से मिल जाता है। अनन्यता एकाग्रता हो जाने के कारण भक्त पवित्र हो जाता है। भगवान श्रीशंकराचार्य का मत है कि पुण्डरीक हृदयकमल को परमात्मा सर्वदा देखा करते हैं। जीव के एक एक भाव को प्रभु जानते हैं इस बात को जानकर सभी को अपने हृदय में दुर्भाव न रखकर सद्भाव को ही रखना चाहिए। यही जीव को पवित्र करने वाला है। भगवत स्मरण, समर्पण से जीव पवित्र हो जाते हैं। भक्तमाल का आरम्भ भक्त शब्द से होता है और अंत में दास शब्द पर पूर्ति हो जाती है। भक्त दास का तात्पर्य है कि इस पूरे ग्रंथ का तात्पर्य यह है कि भक्तों के दास बनकर जीवन बिताओ। दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है। अर्थात् आदि से अंत तक भक्त का परत्व ही इस ग्रंथ में वर्णित है। भक्त दास कैसे होते हैं, इसका वर्णन भक्तमाल में किया गया है। विना भक्तमाल के भक्ति का स्वरूप समझना और पाना कठिन है अतः भक्तमाल का आश्रय मुख्य रूप से लेना चाहिए।
पूज्य गुरुदेव श्री राजेंद्र दास जी महाराज
सूर श्याम गौशाला
परासोली, गोवर्धन,
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