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आंवलखेड़ा में बसंत पंचमी का महापर्व: गायत्री महायज्ञ में दिखा श्रद्धा और आस्था का अभूतपूर्व दृश्य
आंवलखेड़ा।
बसंत पंचमी के पावन अवसर पर आंवलखेड़ा में आयोजित गायत्री महायज्ञ में श्रद्धा और आस्था का अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। प्रातःकाल से ही यज्ञ स्थल पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। वैदिक मंत्रोच्चार और हवन की पवित्र अग्नि के बीच पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठा।
कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय गायत्री परिवार एवं सहयोगी संस्थाओं द्वारा किया गया, जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों महिला-पुरुष, युवा एवं बुजुर्गों ने सहभागिता की। यज्ञ में शांति, सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण की भावना के साथ आहुतियाँ अर्पित की गईं।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने बसंत पंचमी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे ज्ञान, सद्भाव और नवचेतना का पर्व बताया। उन्होंने कहा कि गायत्री महायज्ञ व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और समाज को नैतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करता है।
यज्ञ के उपरांत प्रसाद वितरण किया गया तथा सामूहिक प्रार्थना के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय स्वयंसेवकों का विशेष योगदान रहा। श्रद्धालुओं ने ऐसे आयोजनों को समाज के लिए प्रेरणादायी बताते हुए भविष्य में भी इसी प्रकार के धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की।
3 days ago | [YT] | 10
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ekhabar
एक अखबार दूसरे अखबार की खबर क्यों नहीं छापता?
Why Newspapers Avoid Publishing News of Other Newspapers
पत्रकारिता (Journalism) को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका मूल उद्देश्य जनता तक सच, तथ्य और जनहित से जुड़ी जानकारी पहुंचाना होता है। किसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा (competition) को विकास के लिए जरूरी माना जाता है, लेकिन जब यही प्रतिस्पर्धा अस्वस्थ (unhealthy) हो जाए, तो वह पूरे पेशे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर देती है। आज की पत्रकारिता में एक बड़ा और अहम सवाल यह है कि आखिर एक अखबार दूसरे अखबार की खबर क्यों नहीं छापता, खासकर तब जब वह खबर आम जनता से सीधे जुड़ी हो।
मैं कई वर्षों से पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं और अपने अनुभवों के आधार पर यह साफ महसूस किया है कि अधिकांश अखबार किसी दूसरे अखबार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों, सामाजिक अभियानों, पत्रकारों के सम्मान या उपलब्धियों को जानबूझकर नजरअंदाज कर देते हैं। चाहे वह कार्यक्रम जनहित में हो, समाज के लिए उपयोगी हो या पत्रकारिता जगत के लिए गर्व का विषय क्यों न हो, फिर भी उसे कवरेज नहीं मिलती। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है।
जब इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत की जाती है, तो अक्सर यही जवाब मिलता है कि “यह सब अखबार मालिकों की नीति पर निर्भर करता है।” यानी संपादकीय स्वतंत्रता (editorial freedom) होने के बावजूद कई मामलों में निर्णय व्यावसायिक सोच (business mindset) से लिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी दूसरे अखबार की खबर छाप देने से किसी अखबार की प्रसार संख्या (circulation) सच में घट जाती है?
मेरे विचार से इसका उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है। अक्सर कहा जाता है कि अखबार और सिगरेट की स्थिति एक जैसी होती है। जिस पाठक को जिस अखबार की आदत लग जाती है, वह आसानी से उसे नहीं बदलता। जैसे कोई चारमीनार पीने वाला व्यक्ति अगर महंगी सिगरेट पी भी ले, तो अंत में वह वापस अपनी पसंद की सिगरेट पर ही लौटता है। ठीक वैसे ही, पाठक किसी एक अखबार से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है। वह एक-दो खबरें कहीं और पढ़ लेने से अपना पसंदीदा अखबार नहीं छोड़ देता।
ऐसे में अगर किसी अखबार में दूसरे अखबार द्वारा आयोजित किसी कार्यक्रम की खबर छप भी जाए, तो इससे पाठक भ्रमित नहीं होता और न ही अखबार बदलता है। जब बिना किसी व्यक्तिगत संबंध के लोगों की खबरें छापी जा सकती हैं, तो फिर अपनी ही बिरादरी यानी पत्रकारिता जगत से जुड़ी खबरों को छापने में हिचक क्यों?
यहां एक और अहम पहलू है, और वह है पत्रकारों का अपना व्यक्तिगत पूर्वाग्रह (personal bias)। कई बार बिना किसी स्पष्ट निर्देश के ही रिपोर्टर या डेस्क पर बैठे लोग ऐसी खबरों को स्वयं ही रोक देते हैं। उन्हें लगता है कि “यह हमारे प्रतिद्वंद्वी अखबार की खबर है, इसे क्यों छापें?” इस तरह की सोच पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह भी देखा गया है कि कोई भी अखबार अपने द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की खबर तो बड़े जोर-शोर से प्रकाशित करता है, लेकिन यदि वही खबर किसी प्रतिस्पर्धी अखबार में भी छप जाए, तो उसे गलत माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि किसी कार्यक्रम में सामाजिक सरोकार, जनहित या पत्रकारिता से जुड़ा कोई सकारात्मक संदेश है, तो उसका प्रसार अधिक से अधिक माध्यमों से होना चाहिए।
इस संदर्भ में एक उदाहरण उल्लेखनीय है। जब दैनिक नई दुनिया के प्रधान संपादक अभय छजलानी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया, तो यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि पूरी पत्रकारिता बिरादरी के लिए गर्व का क्षण था। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि अधिकांश अखबारों ने इस खबर को महत्व नहीं दिया। केवल पीपुल्स समाचार, भोपाल ऐसा अखबार था, जिसने इस उपलब्धि को पहले पन्ने पर स्थान दिया और इंटरव्यू प्रकाशित किया। यह एक सकारात्मक और सराहनीय पहल थी।
यह लेख किसी अखबार विशेष का पक्ष लेने के लिए नहीं है, बल्कि पत्रकारिता में आपसी सौहार्द (mutual respect) और स्वस्थ वातावरण (healthy ecosystem) की जरूरत को रेखांकित करने के लिए है। अगर अखबार मालिक और संपादक इस दिशा में पहल करें, तो न केवल पत्रकारों के बीच आपसी सम्मान बढ़ेगा, बल्कि पत्रकारिता की साख भी मजबूत होगी।
आज जरूरत है कि अखबार एक-दूसरे को दुश्मन नहीं, बल्कि एक साझा उद्देश्य के साथी के रूप में देखें। जनहित, सत्य और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तभी संभव है, जब पत्रकारिता आपसी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझे।
यह विषय निश्चित रूप से बहस योग्य है और इस पर पत्रकारिता जगत से जुड़े बुद्धिजीवियों, संपादकों और मीडिया विशेषज्ञों को खुलकर अपनी राय रखनी चाहिए। शायद इसी संवाद से पत्रकारिता का भविष्य और अधिक स्वस्थ, पारदर्शी और विश्वसनीय बन सके।
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2 weeks ago | [YT] | 4
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ekhabar
2026 का प्रिंट मीडिया परिदृश्य: विज्ञापन, लागत और डिजिटल युग की जंग
भारत में प्रिंट मीडिया की स्थिति वैश्विक ट्रेंड से थोड़ा अलग दिख रही है, जहां यह अभी भी स्थिरता और कुछ हद तक विकास की ओर अग्रसर है।
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2026 में प्रिंट मीडिया की स्थिति वैश्विक और घरेलू दोनों स्तरों पर परिवर्तनशील है।
2026 का प्रिंट मीडिया परिदृश्य: विज्ञापन, लागत और डिजिटल युग की जंग
भारत में प्रिंट मीडिया का परिदृश्य 2026 में एक जटिल लेकिन दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। जहां वैश्विक स्तर पर अखबारों और पत्रिकाओं का प्रभाव लगातार घट रहा है, वहीं भारत जैसे विकासशील देश में प्रिंट मीडिया अब भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। इसकी वजह साक्षरता में बढ़ोतरी, क्षेत्रीय भाषाओं की मजबूत पकड़ और ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाकों में डिजिटल सीमाएं हैं। हालांकि, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि प्रिंट मीडिया को अब अस्तित्व बनाए रखने के लिए कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ रहा है।
विज्ञापन बाजार में बदलाव
2026 में प्रिंट मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती विज्ञापन राजस्व को लेकर है। पहले जहां सरकारी विज्ञापन और बड़े कॉरपोरेट ब्रांड्स अखबारों की आय का मुख्य आधार हुआ करते थे, वहीं अब डिजिटल प्लेटफॉर्म इस हिस्से को तेजी से हथिया रहे हैं। सोशल मीडिया, सर्च इंजन और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स कम लागत में अधिक टार्गेटेड विज्ञापन उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे विज्ञापनदाता प्रिंट से दूरी बना रहे हैं।
इसके बावजूद भारत में प्रिंट मीडिया पूरी तरह विज्ञापन बाजार से बाहर नहीं हुआ है। सरकारी विज्ञापन, स्थानीय व्यापार, रियल एस्टेट, शिक्षा संस्थान और राजनीतिक प्रचार अब भी प्रिंट माध्यम को भरोसेमंद मानते हैं। खासकर चुनावी वर्षों में प्रिंट मीडिया की मांग में अस्थायी लेकिन स्पष्ट बढ़ोतरी देखने को मिलती है।
बढ़ती लागत और आर्थिक दबाव
2026 में प्रिंट मीडिया के सामने कागज, स्याही, छपाई और वितरण की लागत एक बड़ी समस्या बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूजप्रिंट की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अखबारों पर पड़ता है। ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण वितरण खर्च भी लगातार बढ़ रहा है, जिससे छोटे और मध्यम स्तर के अखबार सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
कई प्रकाशन संस्थान लागत घटाने के लिए पेज कम कर रहे हैं, कर्मचारियों की संख्या सीमित कर रहे हैं और कुछ मामलों में प्रिंट संस्करण की आवृत्ति घटाकर साप्ताहिक या पाक्षिक कर रहे हैं। यह स्थिति पत्रकारिता की गुणवत्ता और रोजगार दोनों पर असर डाल रही है।
डिजिटल युग से सीधी टक्कर
डिजिटल मीडिया 2026 में प्रिंट मीडिया का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन चुका है। मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट ने खबरों की खपत की आदत को पूरी तरह बदल दिया है। पाठक अब सुबह अखबार का इंतजार करने के बजाय तुरंत मोबाइल पर ब्रेकिंग न्यूज पढ़ना पसंद करते हैं।
इसके जवाब में कई प्रिंट मीडिया संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनाया है। ई-पेपर, वेबसाइट, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया चैनलों के जरिए पाठकों तक पहुंच बनाई जा रही है। हालांकि, डिजिटल से होने वाली आय अभी भी प्रिंट के मुकाबले काफी कम है, जिससे संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
क्षेत्रीय और स्थानीय अखबारों की मजबूती
2026 में यह साफ दिखाई देता है कि हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के अखबार राष्ट्रीय अंग्रेजी अखबारों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। स्थानीय खबरों, प्रशासनिक सूचनाओं और क्षेत्रीय मुद्दों के कारण पाठकों का भरोसा अब भी प्रिंट पर बना हुआ है। छोटे शहरों और गांवों में अखबार सामाजिक और राजनीतिक चेतना का अहम माध्यम बने हुए हैं।
भविष्य की राह
2026 का प्रिंट मीडिया न तो पूरी तरह खत्म हो रहा है और न ही पुराने वैभव में लौटने वाला है। इसका भविष्य नवाचार, विश्वसनीय पत्रकारिता और डिजिटल के साथ संतुलन बनाने पर निर्भर करेगा। जो संस्थान प्रिंट की विश्वसनीयता और डिजिटल की गति को साथ लेकर चल पाएंगे, वही आने वाले वर्षों में टिक पाएंगे।
कुल मिलाकर, 2026 में प्रिंट मीडिया एक संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहां चुनौतियां भी हैं और संभावनाएं भी। यह दौर प्रिंट मीडिया के लिए आत्ममंथन और पुनर्निर्माण का है, जिसमें सही रणनीति ही उसकी दिशा तय करेगी।
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2 weeks ago | [YT] | 3
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ekhabar
एनडीटीवी को मिला नया कप्तान: राहुल कंवल संभालेंगे कमान, अब खबरों की दिशा बदलने को तैयार चैनल
नई दिल्ली। देश के प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी में बड़ा बदलाव हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार राहुल कंवल को एनडीटीवी का नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रधान संपादक नियुक्त किया गया है। यह जिम्मेदारी वे 16 जून 2025 से सम्हाल चुके है ..
एनडीटीवी में नई दिशा और नई ऊर्जा
राहुल कंवल की नियुक्ति के साथ एनडीटीवी में नई ऊर्जा और सोच का दौर शुरू होने जा रहा है। प्रबंधन का मानना है कि उनके नेतृत्व में अब चैनल न केवल खबरों की गुणवत्ता बढ़ाएगा बल्कि डिजिटल विस्तार, दर्शक संपर्क और भरोसा पर भी विशेष ध्यान देगा।
सूत्रों के अनुसार, एनडीटीवी अब दर्शकों के विश्वास को फिर से मजबूत करने और पत्रकारिता के नए मानदंड तय करने की तैयारी में है।
25 साल का अनुभव और सशक्त पहचान
राहुल कंवल भारतीय पत्रकारिता के वह जाना-पहचाना नाम हैं जिन्होंने खबरों को निष्पक्षता और सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने लंबे समय तक इंडिया टुडे समूह के साथ काम किया, जहाँ वे आज तक और इंडिया टुडे टीवी के समाचार निदेशक रहे।
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कार्डिफ विश्वविद्यालय (ब्रिटेन) से अंतरराष्ट्रीय प्रसारण पत्रकारिता का विशेष पाठ्यक्रम पूरा किया।
उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रबंधन कार्यक्रम में भी भाग लिया। उन्हें चिवनिंग छात्रवृत्ति और रॉय पेक ट्रस्ट पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।
नई भूमिका में राहुल कंवल अब न केवल संपादकीय कार्य बल्कि संस्थान के संचालन और नीतिगत फैसलों की भी जिम्मेदारी संभालेंगे।
वे डिजिटल मंच, दर्शक संपर्क और संगठन के विकास पर विशेष ध्यान देंगे।
एनडीटीवी बोर्ड ने कहा है कि यह बदलाव चैनल को नई ऊर्जा देने और भविष्य की मीडिया चुनौतियों के अनुरूप ढालने की दिशा में अहम कदम है।
आज मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। मोबाइल समाचार, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के इस युग में राहुल कंवल का अनुभव एनडीटीवी के लिए वरदान साबित हो सकता है। उनके नेतृत्व में चैनल अपने ब्रांड पर जनता का भरोसा और मजबूत कर सकता है।
मीडिया क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। सैकड़ों चैनलों और समाचार वेबसाइटों के बीच दर्शकों का ध्यान बनाए रखना कठिन है। विज्ञापन से होने वाली आमदनी में गिरावट और झूठी खबरों की बढ़ती संख्या भी बड़ी चुनौती हैं। राहुल कंवल को इन सबके बीच एनडीटीवी की विश्वसनीयता, निष्पक्षता और गुणवत्ता बनाए रखनी होगी।
राहुल कंवल की नियुक्ति एनडीटीवी के इतिहास में एक अहम मोड़ मानी जा रही है।
यह सिर्फ पद परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्थान की सोच और कार्यशैली में बदलाव का संकेत है।
राहुल कंवल के अनुभव, दृष्टि और नेतृत्व क्षमता से एनडीटीवी को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। यदि यह प्रयास सफल रहा, तो चैनल भारतीय मीडिया जगत में फिर से नई पहचान बना सकता है, जो सत्य, निर्भीकता और भरोसे पर आधारित होगी।
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2 months ago | [YT] | 2
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ekhabar
विराट कोहली का अधूरा सपना: वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप ट्रॉफी अब नहीं होगी हासिल
नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट के चहेते और महान बल्लेबाज विराट कोहली 5 नवंबर को अपना 37वां जन्मदिन मना रहे हैं। बल्ले से दुनिया में तहलका मचाने वाले विराट कोहली का करियर रिकॉर्ड्स और ट्रॉफियों से भरा हुआ है। उन्होंने वनडे वर्ल्ड कप, टी20 वर्ल्ड कप, चैंपियंस ट्रॉफी और अंडर-19 वर्ल्ड कप समेत कुल 5 आईसीसी ट्रॉफी अपने नाम की हैं। इसके अलावा आईपीएल में भी आरसीबी की कप्तानी करते हुए 2025 में पहली बार ट्रॉफी अपने नाम की। लेकिन इतने शानदार करियर के बावजूद विराट का एक सपना अब अधूरा रह जाएगा।
विराट का अद्वितीय करियर
विराट कोहली भारतीय क्रिकेट के ऐसे इकलौते खिलाड़ी हैं जिनके नाम 5 आईसीसी ट्रॉफी और एक आईपीएल ट्रॉफी है। कप्तानी में उन्होंने बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी भी अपने नाम की। उनके फैंस हमेशा उनकी सफलता और लगन को सलाम करते आए हैं। लेकिन विराट की आंखों में अब भी एक ख्वाब अधूरा है।
कौन सा सपना अधूरा रह जाएगा
विराट कोहली का अधूरा सपना है वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) ट्रॉफी उठाना। कप्तान के रूप में विराट ने WTC फाइनल में भारत का नेतृत्व किया था, लेकिन यह ट्रॉफी हाथ नहीं लगी।
क्यों नहीं होगा सपना पूरा
विराट ने 12 मई 2025 को टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले लिया। अब जबकि वे इस फॉर्मेट में खेलना बंद कर चुके हैं, वे चाहकर भी WTC ट्रॉफी नहीं जीत सकते। यानि उनका यह ख्वाब अब सिर्फ यादों और रिकॉर्ड्स में ही सुरक्षित रहेगा।
विराट कोहली के प्रशंसक उन्हें हमेशा क्रिकेट के इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में याद रखेंगे। भले ही यह एक सपना अधूरा रह गया हो, उनके करियर की उपलब्धियां हमेशा प्रेरणा देंगी।
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2 months ago | [YT] | 1
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ekhabar
स्वच्छता पाठशाला: 23 हजार छात्रों ने बनाया स्वच्छ भारत का रिकॉर्ड, भोपाल में हुआ भव्य कार्यक्रम
30 सितंबर को आयोजित अभियान दर्ज हुआ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में, Hotel Fern ISBT भोपाल में आज हुआ सम्मान समारोह
भोपाल/बेतूल/टीकमगढ़। देश में स्वच्छता को लेकर चल रहे अभियान के तहत “स्वच्छता पाठशाला” कार्यक्रम ने एक नया इतिहास रच दिया। 30 सितंबर को देशभर के हजारों स्कूलों में एक साथ आयोजित इस अभियान में 23,000 से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया, जिसके बाद इसे India Book of Records में शामिल किया गया।
इस उपलब्धि को लेकर आज Hotel Fern ISBT भोपाल में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में अधिकारी, शिक्षक, छात्र और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। सभी ने एक साथ स्वच्छता के संकल्प को दोहराया और रिकॉर्ड बनाने में सहयोग करने वाले स्कूलों को सम्मानित किया गया।
India Book of Records के प्रतिनिधि ने ओमपाल भदौरिया को मिले अवॉर्ड के बारे में बताया कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों द्वारा एक साथ स्वच्छता सत्र में भाग लेना अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण है। ओमपाल भदौरिया वर्तमान में नगर पालिका अधिकारी, टीकमगढ़ में पदस्थ हैं और यह अवॉर्ड उन्हें बैतूल नगर पालिका में सेवा के लिए प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों और समाज में स्थायी स्वच्छता की आदत विकसित करना था। आयोजन के दौरान यह संदेश दिया गया कि स्वच्छता केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बननी चाहिए।
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3 months ago | [YT] | 5
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ekhabar
भोपाल में बैठकर संजय विश्वकर्मा कर रहे 3D ग्राफिक्स की दुनिया में बड़ा कमाल, युवाओं को भी दिखाया करियर का रास्ता
भोपाल | संवाददाता
भोपाल के दानिश कुंज क्षेत्र में रहने वाले संजय विश्वकर्मा, जिन्हें लोग 3D मास्टर के नाम से भी जानते हैं, ने ग्राफिक डिज़ाइन और एनीमेशन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। वे वरिष्ठ एनिमेटर, ग्राफिक डिज़ाइनर और मैक्स-माया जैसे प्रमुख 3D सॉफ्टवेयर के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने पिछले 25 वर्षों में इस क्षेत्र में निरंतर काम करते हुए खुद को इतना दक्ष बना लिया है कि आज वे किसी मल्टीनेशनल कंपनी के बड़े पद से भी ज्यादा आमदनी घर बैठे कर रहे हैं।
हाल ही में पत्रकार दामोदर सिंह राजावत से हुई मुलाकात के दौरान संजय विश्वकर्मा ने बताया कि उन्होंने शुरुआती दिनों में कड़ी मेहनत से इस क्षेत्र को सीखा और पिछले दो दशकों से लगातार 3D ग्राफिक्स पर कार्य कर रहे हैं। उनके अनुसार, मध्य प्रदेश में युवाओं के लिए 3D तकनीक सीखने और उसमें करियर बनाने की अपार संभावनाएं हैं।
संजय बताते हैं कि आज फ्रीलांसिंग से लेकर रेगुलर जॉब तक, इस क्षेत्र में कई अवसर मौजूद हैं। कोई भी इच्छुक विद्यार्थी या प्रोफेशनल ऑनलाइन माध्यम से उनसे क्लासेस ले सकता है और घर बैठे यह कला सीख सकता है। वे न सिर्फ 3D मॉडलिंग, टेक्स्चरिंग और रेंडरिंग जैसे क्षेत्रों में ट्रेनिंग देते हैं, बल्कि काम के लिए प्रोजेक्ट्स भी उपलब्ध कराते हैं।
उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति उनसे किसी तरह का 3D काम करवाना चाहता है, तो वह उन्हें प्रोफेशनल रूप से हायर भी कर सकता है। संजय विश्वकर्मा का कार्यक्षेत्र भले ही एक कमरे तक सीमित हो, लेकिन उनका विजन वैश्विक है। वे देश-विदेश से प्रोजेक्ट्स लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से काम करते हैं और मात्र चार से पांच घंटे रोज़ काम कर अच्छा जीवन यापन कर रहे हैं।
संजय की इस यात्रा से यह साफ है कि तकनीक के सही इस्तेमाल और लगन से कोई भी व्यक्ति छोटे शहर से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है। युवाओं के लिए संजय एक प्रेरणा हैं, जो यह दिखाते हैं कि अगर जुनून हो, तो सफलता की कोई सीमा नहीं होती।
स्थानीय संवाददाता ई खबर मीडिया की रिपोर्ट
7 months ago | [YT] | 3
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ekhabar
"हर गांव तालाब" अभियान में लखीमपुर खीरी ने रचा इतिहास
एक माह में सबसे ज़्यादा सामुदायिक तालाब बनाकर "इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड" में दर्ज हुआ जनपद का नाम
लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश का जनपद लखीमपुर खीरी एक बार फिर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया है। "हर गांव तालाब" अभियान के अंतर्गत एक महीने में सबसे अधिक सामुदायिक तालाबों के निर्माण कर जनपद ने इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लिया है।
यह ऐतिहासिक उपलब्धि जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल और मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार के कुशल मार्गदर्शन तथा डीसी मनरेगा डॉ. सुशांत सिंह के सशक्त नेतृत्व में संभव हो पाई। प्रशासनिक टीम की रणनीति, मेहनत और गांव-गांव तक पहुंची सहभागिता ने इस जनपद को एक नई पहचान दिलाई है।
इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड की टीम स्वयं लखीमपुर खीरी पहुंची और गांवों में बनाए गए तालाबों का स्थलीय निरीक्षण किया। टीम ने निर्माण की गुणवत्ता, प्रक्रिया और जनसहभागिता को नजदीक से परखा और उसकी रिपोर्ट के आधार पर लखीमपुर खीरी को देशभर में सबसे तेज़ और प्रभावी तालाब निर्माण करने वाला जनपद घोषित किया।
इस उपलब्धि पर इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड टीम ने जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल और मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार को विशेष प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मानित किया।
डीएम दुर्गा शक्ति नागपाल ने कहा कि “तालाब केवल जल संचयन का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का आधार हैं। इस रिकॉर्ड का श्रेय जनपद की पूरी टीम और उन ग्रामीणों को जाता है जिन्होंने इस अभियान को जनआंदोलन बनाया।”
मुख्य विकास अधिकारी अभिषेक कुमार ने इसे लखीमपुर के लिए गौरव की बात बताते हुए कहा कि “हर गांव तालाब अभियान के ज़रिए जल संकट से निपटने की दिशा में एक सार्थक पहल हुई है। अब हमारा लक्ष्य है कि इन तालाबों का बेहतर रख-रखाव कर इसे टिकाऊ मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाए।”
डीसी मनरेगा डॉ. सुशांत सिंह ने बताया कि अभियान के तहत एक तय समयसीमा में 300 से अधिक सामुदायिक तालाबों का निर्माण कराया गया। इसके लिए गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया, स्थानीय लोगों को जोड़ा गया और मनरेगा से वित्त पोषण कर हर स्तर पर पारदर्शिता बरती गई।
गौरतलब है कि "हर गांव तालाब" अभियान प्रदेश सरकार की प्राथमिकता योजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण को बढ़ावा देना और रोजगार सृजन को मजबूत करना है।
लखीमपुर खीरी की यह उपलब्धि न सिर्फ अन्य जनपदों के लिए प्रेरणा बनेगी, बल्कि यह साबित करती है कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनसहयोग एक साथ काम करें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।
लखीमपुर खीरी से ई-ख़बर के लिए मोहम्मद इलियास की रिपोर्ट
7 months ago | [YT] | 2
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ekhabar
অহা পঢ়ক, কেনেকৈ এজন ১২ বছৰীয়া ছোৱালী গোটেদিন নিখোজ হৈ থাকিল, কিন্তু সন্ধিয়া ঘূৰি আহিল সুৰক্ষিতভাৱে — পৰিয়ালে ল'লে হাঁফছাৰ
নগাঁও (অসম)।
এজন ১২ বছৰীয়া ছোৱালী মৰ্জিনা বেগম, যি নগাঁৱৰ কাকতিগাঁও থানা অঞ্চলৰ পোদুমণি গাঁৱৰ বাসিন্দা, সোমবাৰে পুৱা প্ৰায় ৭ বজাৰ সময়ত নিজৰ দাদালৈ যোৱা ঘৰখনৰ পৰা ঘূৰি আহি আছিল। মৰ্জিনা পোদুমণি এল.পি. স্কুল মাদ্ৰাসাৰ পঞ্চম শ্ৰেণীৰ ছাত্ৰী আৰু বিদ্যালয়ৰ অভিলেখ অনুসৰি তেওঁৰ জন্মতাৰিখ ১ মে’ ২০১৩ বুলি উল্লেখ আছে।
পৰিয়ালৰ মতে, মৰ্জিনা জুনাইদ (৮ বছৰ) আৰু দানাতুন (১৪ বছৰ) নামৰ অন্য দুজন শিশুৰ সৈতে দাদালৈ গল আছিল। তেওঁলোক তিনিও একে গাঁৱৰ। কিন্তু দিনৰ মাজত দুইটা শিশু ঘূৰি আহিল, যদিও মৰ্জিনা ঘূৰি নাহিল। তেতিয়াৰে পৰা পৰিয়ালত খংগামা পৰিল। শিশুজনী নিখোঁজ হোৱা খবৰটো গাঁও জুৰি বহল হৈ পৰিল।
শিশুজনীৰ দেউতাক আব্দুল খালিক আৰু তেওঁৰ মৃত দাদু আব্দুল মালিকৰ পৰিয়ালে মিডিয়া আৰু আৰক্ষীৰ সহায় বিচাৰিলে। স্থানীয় লোকেও অনুসন্ধানত আগবাঢ়ি আহিল।
প্ৰশাসন আৰু মিডিয়াৰ সক্ৰিয়তাই দিলে আশ্বাস
গোটেদিন ধৰি চলা সন্ধানৰ পিছত, সন্ধিয়া প্ৰায় ৮ বজাত মৰ্জিনা সুৰক্ষিতভাৱে ঘৰলৈ উভতি আহে। গোটেদিনৰ উদ্বেগৰ পাছত পৰিয়ালে হাঁফছাৰ ল'লে। স্থানীয় আৰক্ষী, গাঁৱলীয়া আৰু মিডিয়াৰ সহায়ত শিশুজনীৰ সুৰক্ষিত ঘূৰাই অনা সম্ভৱ হ'ল।
এই ঘটনাই প্ৰমাণ কৰিলে যে পৰিয়াল, সমাজ, প্ৰশাসন আৰু মিডিয়া একেলগে কাম কৰিলে সদায় ভাল ফল পোৱা যায়।
পৰিয়ালৰ আনন্দ আৰু আৱেগিক ক্ষণ
শিশুটি ঘৰ আহোঁতে মাক-দেউতাক আৰু আত্মীয়জনৰ চকুত আনন্দৰ চকুপানী দেখা গৈছিল। দেউতাক আব্দুল খালিকে ক’লে, "আমাৰ মনটো গলি গল আছিল... আল্লাৰ দয়া, আমাৰ ছোৱালীজনী সুৰক্ষিতভাৱে ঘূৰি আহিল।"
'ই-খবৰ'ৰ আবেদন:
এই ধৰণৰ ঘটনাই সমাজক সতৰ্ক কৰি তোলে যে শিশুবোৰৰ ওপৰত সদায় নজৰ ৰাখিবলৈ লাগিব আৰু যিকোনো সন্দেহজনক পৰিস্থিতিত পুলিচ আৰু প্ৰশাসনৰ সহায় বিচাৰিব লাগে।
'ই-খবৰ' এই দায়িত্বশীল পৰিয়াল, সতৰ্ক প্ৰশাসন আৰু সহযোগী সমাজক সেলাম জনায়, যিসকলৰ জাগ্ৰততাই এজন নিষ্পাপ ছোৱালীক সুৰক্ষিতভাৱে ঘৰলৈ উভতাই আনিবলৈ সক্ষম হ'ল।
7 months ago | [YT] | 4
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ekhabar
पढ़िए कैसे एक 12 साल की बच्ची दिनभर लापता रही, लेकिन शाम होते-होते सही-सलामत घर लौटी — परिवार ने ली राहत की सांस
नगांव (असम)।
एक 12 वर्षीय बच्ची मर्जीना बेगम, जो कि नगांव जिले के काकटीगांव थाना क्षेत्र के पोडुमनी गांव की रहने वाली है, सोमवार सुबह करीब 7 बजे अपने बड़े पापा के घर से लौट रही थी। मर्जीना पोडुमनी एल.पी. स्कूल मदरसा में कक्षा पांचवी की छात्रा है और उसकी जन्मतिथि स्कूल अभिलेख के अनुसार 1 मई 2013 दर्ज है।
परिवार के अनुसार, मर्जीना तीन बच्चों—जुनैद (8 वर्ष) और दानातून (14 वर्ष)—के साथ बड़े पापा के घर गई थी। ये तीनों बच्चे एक ही जगह के हैं। लेकिन जब दोपहर तक दो बच्चे लौट आए और मर्जीना नहीं आई, तो पूरे परिवार में हड़कंप मच गया। बच्ची के लापता होने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई।
बच्ची के स्वर्गीय दादा अब्दुल मालिक की पोती, पिता अब्दुल मालिक, जो पहले से ही परेशान थे, मीडिया और स्थानीय प्रशासन से मदद की गुहार लगाई। थाना क्षेत्र में बड़े पापा के घर के रिश्ते से जुड़ी इस बच्ची की तलाश में गांव के लोग भी जुड़ गए।
प्रशासन और मीडिया की सक्रियता ने दिलाई राहत
दिनभर चली खोजबीन के बाद, शाम को लगभग 8 बजे मर्जीना सकुशल घर पहुंची। पूरे दिन की बेचैनी और चिंता के बाद परिवार ने राहत की सांस ली। स्थानीय पुलिस, गांववालों और मीडिया की मदद से बच्ची की सही-सलामत वापसी संभव हो सकी।
इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि जब परिवार, समाज, प्रशासन और मीडिया एक साथ मिलकर कोई प्रयास करते हैं, तो उसका सकारात्मक परिणाम जरूर निकलता है।
परिवार की खुशी और भावुक क्षण
बच्ची के घर लौटने पर माता-पिता और रिश्तेदारों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। पिता अब्दुल खालिक ने कहा, "हमारा तो दिल बैठ गया था... अल्ला का शुक्र है, हमारी बच्ची सही-सलामत वापस आ गई।"
ई-ख़बर की अपील:
ऐसी घटनाएं समाज को सतर्क करती हैं कि बच्चों पर हमेशा नजर रखें और किसी भी असामान्य स्थिति में तत्काल पुलिस और प्रशासन से संपर्क करें।
ई-ख़बर इस जिम्मेदार परिवार, सतर्क प्रशासन और सहयोगी समाज को सलाम करता है, जिनकी सजगता से एक मासूम बच्ची सकुशल घर लौट पाई।
7 months ago | [YT] | 5
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