#baatbebat#thepoonambhatiashow#youtubelive बात-बेबात के The Poonam Bhatia Show के YouTube Live में डिजिटल मार्केटिंग की दुनिया के एक्सपर्ट अंकित श्रीवास्तव से जानें डिजिटल मार्केटिंग के फंडे |अगर आप online marketing या online business से जुड़े हैं. Digital marketing के बारे में जानना चाहते हैं, youtube के बिजनेस को समझना चाहते हैं. अपने youtube channel की कमाई को जानना और बढ़ाना चाहते हैं तो ये बातचीत शायद आपके लिए फायदेमंद हो सकती है अगर आपका कोई सवाल है तो कमेंट के जरिए पूछ सकते हैं ***** अंकित श्रीवास्तव का संक्षिप्त परिचय: अंकित श्रीवास्तव (Ankit Shrivastava) AdShot Media (एड शॉट मीडिया) के संस्थापक (Founder) और सीईओ हैं। वे एक अनुभवी डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ हैं, जो मुख्य रूप से Google Ads के माध्यम से व्यवसायों को बढ़ाने में मदद करते हैं। मुख्य जानकारी: AdShot Media: यह एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी है जो 'हाई-टिकट ब्रांड्स' (जैसे ट्रैवल, सोलर, SaaS, और लग्जरी सेवाएं) के लिए लीड जनरेशन और रेवेन्यू बढ़ाने का काम करती है। अनुभव: अंकित श्रीवास्तव को डिजिटल विज्ञापन और PPC (Pay-Per-Click) के क्षेत्र में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। विशेषज्ञता: वे प्रमाणित Google Ads सर्च एक्सपर्ट और PPC कोच हैं। स्थान: वे मूल रूप से जयपुर, राजस्थान से हैं और वर्तमान में AdShot Media LLC को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित करते हैं। संपर्क और सोशल मीडिया: LinkedIn: Ankit Shrivastava - AdShot Media वेबसाइट: adshotmedia.com WhatsApp: +91-9352192981 ईमेल: adshotmedia@gmail.com
पूनम भाटिया का संक्षिप्त परिचय: इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं.
प्रिय कवि पाश की कविता पंक्ति के साथ हमको, आपको, सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं- ***** "भारत मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द जहां कहीं भी प्रयोग किया जाय बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं" ****** 🌹🌹🌹🌹🌹🌹
#baatbebat#thepoonambhatiashow#youtubelive The Poonam Bhatia Show Live |चर्चित कवयित्री शालू शुक्ला के साथ बातचीत | जुड़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें 👇 youtube.com/live/Q6Jwpk2stPQ?si=2F4sJD_TCiFaUNjO ***** बात-बेबात के The Poonam Bhatia Show के YouTube Live में शनिवार 24 जनवरी को कवयित्री साहित्यकार शालू शुक्ला से सुनिए उनकी कविताएं और जानिए उनकी साहित्यिक यात्रा के बारे में. लखनऊ की रहने वाली शालू शुक्ला का जन्मस्थान चंद्रगढ़, मिर्ज़ापुर है. इनके लेखन की शुरुआत कहानी लेखन से हुई और लिफाफा, भरम, प्रतिस्थापन,अधूरी सुहागन,जैसी कई कहानियां प्रकाशित. आगे चलकर कविता के क्षेत्र में इन्होंने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. देश की शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं, वेब पोर्टल्स पर शालू शुक्ला की कविताएं और सांस्कृतिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं. 'तुम फिर आना वसंत' नाम से कविता संग्रह के अलावा कई काव्य संकलनों में भी स्वतंत्र कविताएं प्रकाशित हैं. इनकी कुछ कविताओं का अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ है. साहित्य के विभिन्न कार्यक्रमों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ. सम्मान/पुरस्कार: काव्य संग्रह 'तुम फिर आना वसंत' को शीला सिद्धान्तकर पुरस्कार
वहीं इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं. ***** शालू शुक्ला की तीन कविताएं *** 1- गाजा के एक बच्चे का संदेश इजराइल के लिए
तुम्हारे सब कुछ खत्म करने के बाद भी बचा रह जायेगा बहुत कुछ जैसे-वे सारे दृश्य जिन्हें देखने से पहले जंग का निवाला बन गए मासूम बच्चे
वही बच्चे रंग-बिरंगे फूल बनकर उग आयेंगे कब्र पर जिन पर मंडरायेंगी तितलियां,गायेंगे भौंरे इस तरह बचा रहेगा जीवन
वे स्त्रियाँ जिनकी देह पर लड़े गये युद्ध चिड़िया बनकर अपनी हौसलामन्द उड़ानों से दाखिल होंगी तुम्हारे शहर में
उनके शोकगीत पर व्याकुल हो रो उठेगा तुम्हारा शहर इस तरह बची रहेगी करुणा
वही चिड़िया अपने नाज़ुक किन्तु विश्वास भरे कदमों से कुचल देंगी तुम्हारी क्रूरता
इस तरह बचेगी मनुष्यता मारे गए तमाम बुज़ुर्गों के सपनों पर लहलहायेंगे संभावनाओं के पौधे फिर से शुरु होगा जीवन बचा रहेगा प्रेम। ***** 2-हाउस वाइफ औरतें
हम हाऊस वाइफ औरतें हैं हम कोई काम नहीं करतीं हमारा नाम आधार कार्ड के सिवा कहीं दर्ज नहीं है
हम सबसे बाद में सोने और सबसे पहले जागने वाली औरतें हैं
चूल्हे पर रींधते भात के साथ अपने सपनों को पकानेवालीं आटे की लोई में दुखों को छुपानेवालीं औरतें हैं पहली पंक्ति हमारी किस्मत में नहीं सबको खाना खिलाने के बाद अपने खाने के बीच से उठकर हम फिर से खाना बनानेवालीं औरतें हैं
आधी रात को बड़े बुजुर्गों को वाशरूम ले जानेलीं अल्लसुबह बच्चों को दूध पिलाने वाली औरतें हैं हम गानें के बीच रोने और रोने के बीच गाने वाली औरतें हैं हम हर एक के लिए हर समय उपस्थित रहनेवालीं खैरात में आई हुई औरतें हैं
हमारे हिस्से में कोई इतवार ई एल,सी एल, कोई मेडिकल नहीं हमारी किस्मतें जूतों की पालिश से चमकती हैं हम जेठ की दुपहरी में खसखस माघ की सर्द रात में अलाव - सी जलनेवालीं औरतें हैं हम गृहस्थी का वह नमक थीं जिसके बिना हर स्वाद फीका रहा फिर भी ख़ास मौकों पर एक कोने में गलनेवालीं औरतें हैं हम कविता लिखने के योग्य नहीं हमें पुरस्कार लेने का कोई हक़ नहीं
हमारा परिचय देते हुए शर्म आती है हमारे पतियों और बच्चों को हम हाऊस वाइफ औरतें हैं हम कुछ नहीं करतीं हमसे कुछ नहीं होता क्योंकि हम नकारा हैं हाउस वाइफ औरतें.... ***** 3- बैरंग चिट्ठियां
पीड़ाओं में डूबी हर दोपहरी ईश्वर का डाकिया डाल जाता है कुछ बैरंग चिट्ठियां होते है उनमें स्वर्ग नर्क के ब्योरे ज़ख्मों से भरी शामें भीगती हैं वे नमक में विरह भरी रातों में तकिये में सिमट आता समंदर हर सुबह झाड़ू से बुहारती हूं पिछले दिनों के दुःख घाव पर सरपट दौड़ते हैं सूर्य के घोड़े रोज लौट आता है दुःख रोज लौट आती है रात रोज लौट आती है सुबह रोज ही लौट आता है सूर्य
फिर कभी नहीं लौटे तुम एक बार जाने के बाद तुम्हारे प्रेम से वंचित मैं रह जाऊंगी मनुष्यता से एक कदम पीछे हमेशा के लिए। *****
#makarsankrantispecial#makarsankranti मकर संक्राति: त्यौहार एक, नाम अनेक, मनाने के तरीके भी अनेक (जानें कहां किस नाम रूप से जाना और मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्यौहार ) ***" भारतीय धर्म और संस्कृति में मकर संक्रांति लोक जीवन से जुड़ा बहुत बड़ा त्यौहार है. भारतीय लोक जीवन का यह ऐसा त्यौहार है, जो कमोबेश पूरे देश में मनाया जाता है. हालांकि कई जगह यह त्यौहार दूसरे नाम से भी जाना जाता है और इसे मनाने के तौर तरीके और विधान भी अलग हो जाते हैं. कभी कभी और कहीं कहीं इसे मनाने में एक दो दिन का अंतर भी हो जाता है. मसलन बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों समेत उत्तर भारत में यह मुख्य रूप से मकर संक्रांति के रूप में ही मनाया जाता है. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है. यहां इस दिन चिउड़ा दही और खिचड़ी खाने की परंपरा है. पंजाब और हरियाणा में इसे एक दिन पहिले लोहड़ी या माघी लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है. मकर संक्रांति असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में बिहू के रूप में जानी और मनाई जाती है. इनके अलावा हिमाचल प्रदेश में माघ साजी, गुजरात में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, केरल में विलक्कू, कर्नाटक में एलु-बिरोधु के नाम से मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है. इनके अलावा महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसरगढ़, उड़ीसा, झारखंड समेत भारत के तमाम राज्यों में भी मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है. कहीं इसी नाम रूप से तो कहीं किसी और नाम तथा विधान से. और ऐसा इसीलिए है कि मकर संक्रांति का यह त्यौहार भारत के उस पारंपरिक लोक जीवन और संस्कृति से जुड़ा है, जिसका मुख्य और पारंपरिक आधार कृषि रहा है. धार्मिक आस्था और ज्योतिषीय मान्यताओं से इतर मोटे तौर पर यह नवान्न ग्रहण का त्यौहार है. दरअसल भारतीय कृषि व्यवस्था में यह समय चावल, तिल, गन्ना आदि खरीफ की फसलों के तैयार होने और उन्हें खेतों से घर लाने का होता है. इसीलिए मकर संक्रांति के दिन तिल, चावल, गुड़, पोहा यानी चिउड़ा, खिचड़ी, तिलकुट आदि खाने की परंपरा है. और इसीलिए अपनी फसलों के हिसाब से विभिन्न क्षेत्रों में मकर संक्रांति के नाम रूपों में भी भिन्नता दिखाई देती है इसके मनाए जाने के तौर तरीकों में भी. बहरहाल अगर मकर संक्रांति के त्यौहार को लोक जीवन से जोड़कर देखें तो कह सकते हैं कि यह भारत के उस कृषक समाज का उत्सव है जो धार्मिक भी है और कर्मयोगी भी. जो प्रकृति से कुछ हासिल करता है तो उसका शुक्रिया करना नहीं भूलता. कुदरत के प्रति उसके इस शुकराने में श्रद्धा और आस्था का भी पावन संगम होता है. https://youtu.be/hP8bZyvO1VA *****
#पचकोस_मेला बक्सर का पचकोस मेला यानी स्थानीयता के लोकबोध का महा-उत्सव ***** माई बिसरी, बाबू बिसरी पचकोसवा के लिट्टी-चोखा नाही बिसरी।। (मां-बाप को भूला जा सकता है, लेकिन पंचकोश मेले के लिट्टी-चोखा को नहीं)
बक्सर के पचकोस या पंचकोश मेले को लेकर ये बहुत पुरानी कहावत है, लोगों के दिल में इसके महत्व को व्याख्यायित करती हुई और आज पचकोस ही है, बक्सर का पारंपरिक स्थानीय मेला. लिट्टी-चोखा मेला के रूप में भी मशहूर. पंचकोशी परिक्रमा में पांच दिन बक्सर के पांच अलग अलग स्थानों की परिक्रमा की जाती है और पांच प्रकार का भोजन किया जाता है. शुरुआत अहिरौली से होती है और पांचवें तथा आखिरी दिन बक्सर के चरित्रवन में मेले का समापन होता है. इस आखिरी दिन ही चरित्रवन में लिट्टी-चोखा बनाया खाया जाता है.
लिट्टी-चोखा बक्सर और बिहार ही नहीं यूपी के बलिया, गाजीपुर समेत पूरे पूर्वांचल का पारंपरिक, प्रिय और प्रसिद्ध भोजन है. लिहाजा पचकोश का लिट्टी-चोखा बक्सर ही नहीं पास पड़ोस के जिलों के साथ उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर के लोगों को भी खूब आकर्षित करता है, अपनी ओर खींचता है. झुंड के झुंड लोग, जिनमें महिलाएं अधिक होती हैं, सत्तू, आटा, बैंगन, टमाटर आदि की गठरी-मोटरी लिए चरित्रवन पहुंचते हैं. गोइंठा (उपला) जोड़कर अहरा बोझते-सुलगाते हैं (अहरा बोझना टिपिकल भोजपुरी शब्द है, इसे हिंदी में क्या कहेंगे पता नहीं. उपले को जोड़कर आग लगाई जाती है) और अहरा की आग पर लिट्टी-चोखा पकाया-लगाया जाता है.
पचकोस मेले की एक बड़ी खासियत है बाजार के प्रभाव से अछूता होना. वैसे अमूमन ऐसे स्थानीय मेले बाजार के प्रभाव से अछूते होते हैं, क्योंकि इनकी जड़ें अपनी मिट्टी में गहरे धंसी होती हैं. हालांकि बाजार ने पैठ बनाने की भरपूर कोशिश भी की है, कुछ प्रभावित भी किया है, लेकिन फिर भी पचकोस का देशज रंग धूमिल नहीं हुआ है. उम्मीद करें पचकोस का यह चटख रंग और स्वाद कभी फीका नहीं पड़े... शुभकामनाएं लोक मेला पचकोस की... https://youtu.be/Xr_RtXgFSVo #हैशटैग#hastag#buxar
का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्ही जी केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्ही जी अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्ही जी गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्ही जी
जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला लम्बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला एक्को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला
नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्ही जी हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्ही जी झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्ही जी खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ हौ कब्बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ दूसर के कब्जा में आपन पानी दाना अब्बौ हौ जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्ही जी माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्ही जी चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्ही जी ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्ही जी
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्कारी वाले देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले देहलैं खून पसीना देहलैं तब्बौ बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्ही जी ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्ही जी केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्ही जी कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी
जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्ही जी करिया अच्छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्ही जी एक समय क' बागड़ बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी #गांधी_जयंती
#baatbebat#thepoonambhatiashow#youtubelive बात-बेबात के The Poonam Bhatia Show के YouTube Live में इस मंगलवार (30 सितंबर) शाम 07:00 बजे शिक्षिका एवं साहित्यकार तथा शो की होस्ट पूनम भाटिया की नेचुरोपैथिस्ट, समाजसेवी एवं कवयित्री डॉ. दीपाली वार्ष्णेय अग्रवाल से नेचुरोपैथी और उनकी कविताओं पर चर्चा.
उल्लेखनीय है कि जयपुर, राजस्थान की रहने वाली डॉ. दीपाली की पारिवारिक पृष्ठभूमि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से काफी समृद्ध रही है. दीपाली के दादाजी स्व. श्री चंद्रगुप्त वार्ष्णेय स्वतंत्रता सेनानी और लेखक तथा वरिष्ठ पत्रकार थे तो पिता स्व. श्री अनिल वार्ष्णेय भी चर्चित लेखक और पत्रकार थे. इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने डॉ. दीपाली को बचपन से ही लेखन के प्रति आकृष्ट किया तो सामाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया. दीपाली बचपन में ही कविता-कहानी, गीत-ग़ज़ल आदि साहित्य की तमाम विधाओं में लिखने लगी थीं. इनकी रचनाओं को काफी प्रशंसा भी मिली है और अपनी रचनाओं और कार्यों को लेकर कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी हुई हैं. स्वास्थ्य के प्रति जन जागरुकता के उद्देश्य से ये समय समय पर प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद के मुफ्त शिविर भी लगाती रहती हैं. इनकी एक पहचान 'सुजोक थेरेपिस्ट' की भी है. बकौल डॉ. दीपाली 'अपने लेखन, समाज सेवा और चिकित्सा के कार्यों से समाज को कुछ लौटा सकूं इसी उद्देश को लेकर सदा तत्पर रहती हूं'. अभी हाल ही में इनकी कविताओं की किताब 'आईना ए अहसास' प्रकाशित हुई है.
वहीं इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं.
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अंकित श्रीवास्तव का संक्षिप्त परिचय:
अंकित श्रीवास्तव (Ankit Shrivastava) AdShot Media (एड शॉट मीडिया) के संस्थापक (Founder) और सीईओ हैं। वे एक अनुभवी डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ हैं, जो मुख्य रूप से Google Ads के माध्यम से व्यवसायों को बढ़ाने में मदद करते हैं।
मुख्य जानकारी:
AdShot Media: यह एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी है जो 'हाई-टिकट ब्रांड्स' (जैसे ट्रैवल, सोलर, SaaS, और लग्जरी सेवाएं) के लिए लीड जनरेशन और रेवेन्यू बढ़ाने का काम करती है।
अनुभव: अंकित श्रीवास्तव को डिजिटल विज्ञापन और PPC (Pay-Per-Click) के क्षेत्र में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
विशेषज्ञता: वे प्रमाणित Google Ads सर्च एक्सपर्ट और PPC कोच हैं।
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पूनम भाटिया का संक्षिप्त परिचय:
इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं.
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साहित्य के विभिन्न कार्यक्रमों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ.
सम्मान/पुरस्कार: काव्य संग्रह 'तुम फिर आना वसंत' को शीला सिद्धान्तकर पुरस्कार
वहीं इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं.
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शालू शुक्ला की तीन कविताएं
***
1- गाजा के एक बच्चे का संदेश इजराइल के लिए
तुम्हारे सब कुछ खत्म करने के बाद भी
बचा रह जायेगा बहुत कुछ
जैसे-वे सारे दृश्य
जिन्हें देखने से पहले
जंग का निवाला बन गए मासूम बच्चे
वही बच्चे रंग-बिरंगे फूल बनकर
उग आयेंगे कब्र पर
जिन पर मंडरायेंगी तितलियां,गायेंगे भौंरे
इस तरह बचा रहेगा जीवन
वे स्त्रियाँ जिनकी देह पर लड़े गये युद्ध
चिड़िया बनकर अपनी हौसलामन्द उड़ानों से
दाखिल होंगी तुम्हारे शहर में
उनके शोकगीत पर
व्याकुल हो रो उठेगा तुम्हारा शहर
इस तरह बची रहेगी करुणा
वही चिड़िया अपने नाज़ुक
किन्तु विश्वास भरे कदमों से
कुचल देंगी तुम्हारी क्रूरता
इस तरह बचेगी मनुष्यता
मारे गए तमाम बुज़ुर्गों के सपनों पर
लहलहायेंगे संभावनाओं के पौधे
फिर से शुरु होगा जीवन
बचा रहेगा प्रेम।
*****
2-हाउस वाइफ औरतें
हम हाऊस वाइफ औरतें हैं
हम कोई काम नहीं करतीं
हमारा नाम आधार कार्ड के सिवा
कहीं दर्ज नहीं है
हम सबसे बाद में सोने और सबसे पहले जागने वाली औरतें हैं
चूल्हे पर रींधते भात के साथ
अपने सपनों को पकानेवालीं
आटे की लोई में दुखों को छुपानेवालीं औरतें हैं
पहली पंक्ति हमारी किस्मत में नहीं
सबको खाना खिलाने के बाद
अपने खाने के बीच से उठकर हम
फिर से खाना बनानेवालीं औरतें हैं
आधी रात को बड़े बुजुर्गों को
वाशरूम ले जानेलीं
अल्लसुबह बच्चों को दूध पिलाने वाली औरतें हैं
हम गानें के बीच रोने और रोने के बीच गाने वाली औरतें हैं
हम हर एक के लिए हर समय उपस्थित रहनेवालीं
खैरात में आई हुई औरतें हैं
हमारे हिस्से में कोई इतवार
ई एल,सी एल, कोई मेडिकल नहीं
हमारी किस्मतें जूतों की पालिश से चमकती हैं
हम जेठ की दुपहरी में खसखस माघ की सर्द रात में अलाव - सी जलनेवालीं औरतें हैं
हम गृहस्थी का वह नमक थीं जिसके बिना हर स्वाद फीका रहा
फिर भी ख़ास मौकों पर एक कोने में गलनेवालीं औरतें हैं
हम कविता लिखने के योग्य नहीं
हमें पुरस्कार लेने का कोई हक़ नहीं
हमारा परिचय देते हुए शर्म आती है हमारे पतियों और बच्चों को
हम हाऊस वाइफ औरतें हैं
हम कुछ नहीं करतीं
हमसे कुछ नहीं होता
क्योंकि हम नकारा हैं
हाउस वाइफ औरतें....
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3- बैरंग चिट्ठियां
पीड़ाओं में डूबी हर दोपहरी
ईश्वर का डाकिया
डाल जाता है कुछ बैरंग चिट्ठियां
होते है उनमें स्वर्ग नर्क के ब्योरे
ज़ख्मों से भरी शामें
भीगती हैं वे नमक में
विरह भरी रातों में
तकिये में सिमट आता समंदर
हर सुबह झाड़ू से बुहारती हूं
पिछले दिनों के दुःख
घाव पर सरपट दौड़ते हैं सूर्य के घोड़े
रोज लौट आता है दुःख
रोज लौट आती है रात
रोज लौट आती है सुबह
रोज ही लौट आता है सूर्य
फिर कभी नहीं लौटे तुम
एक बार जाने के बाद
तुम्हारे प्रेम से वंचित मैं
रह जाऊंगी मनुष्यता से एक कदम पीछे हमेशा के लिए।
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
#makarsankrantispecial #makarsankranti
मकर संक्राति: त्यौहार एक, नाम अनेक, मनाने के तरीके भी अनेक
(जानें कहां किस नाम रूप से जाना और मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्यौहार )
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भारतीय धर्म और संस्कृति में मकर संक्रांति लोक जीवन से जुड़ा बहुत बड़ा त्यौहार है. भारतीय लोक जीवन का यह ऐसा त्यौहार है, जो कमोबेश पूरे देश में मनाया जाता है. हालांकि कई जगह यह त्यौहार दूसरे नाम से भी जाना जाता है और इसे मनाने के तौर तरीके और विधान भी अलग हो जाते हैं. कभी कभी और कहीं कहीं इसे मनाने में एक दो दिन का अंतर भी हो जाता है. मसलन बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों समेत उत्तर भारत में यह मुख्य रूप से मकर संक्रांति के रूप में ही मनाया जाता है. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है. यहां इस दिन चिउड़ा दही और खिचड़ी खाने की परंपरा है. पंजाब और हरियाणा में इसे एक दिन पहिले लोहड़ी या माघी लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है. मकर संक्रांति असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में बिहू के रूप में जानी और मनाई जाती है. इनके अलावा हिमाचल प्रदेश में माघ साजी, गुजरात में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल, केरल में विलक्कू, कर्नाटक में एलु-बिरोधु के नाम से मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है.
इनके अलावा महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसरगढ़, उड़ीसा, झारखंड समेत भारत के तमाम राज्यों में भी मकर संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है. कहीं इसी नाम रूप से तो कहीं किसी और नाम तथा विधान से. और ऐसा इसीलिए है कि मकर संक्रांति का यह त्यौहार भारत के उस पारंपरिक लोक जीवन और संस्कृति से जुड़ा है, जिसका मुख्य और पारंपरिक आधार कृषि रहा है. धार्मिक आस्था और ज्योतिषीय मान्यताओं से इतर मोटे तौर पर यह नवान्न ग्रहण का त्यौहार है.
दरअसल भारतीय कृषि व्यवस्था में यह समय चावल, तिल, गन्ना आदि खरीफ की फसलों के तैयार होने और उन्हें खेतों से घर लाने का होता है. इसीलिए मकर संक्रांति के दिन तिल, चावल, गुड़, पोहा यानी चिउड़ा, खिचड़ी, तिलकुट आदि खाने की परंपरा है. और इसीलिए अपनी फसलों के हिसाब से विभिन्न क्षेत्रों में मकर संक्रांति के नाम रूपों में भी भिन्नता दिखाई देती है इसके मनाए जाने के तौर तरीकों में भी. बहरहाल अगर मकर संक्रांति के त्यौहार को लोक जीवन से जोड़कर देखें तो कह सकते हैं कि यह भारत के उस कृषक समाज का उत्सव है जो धार्मिक भी है और कर्मयोगी भी. जो प्रकृति से कुछ हासिल करता है तो उसका शुक्रिया करना नहीं भूलता. कुदरत के प्रति उसके इस शुकराने में श्रद्धा और आस्था का भी पावन संगम होता है.
https://youtu.be/hP8bZyvO1VA
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#makarsankranti2026 #lohri #bihu #pongal #baatbebat #hashtags
3 weeks ago | [YT] | 1
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
#स्मृति #स्मरण #जयंती
बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले
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मकबूल और महबूब शायर कैफ़ी आज़मी की स्मृति को सलाम
https://youtu.be/q9bMqAllG5E
3 weeks ago | [YT] | 4
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
#पचकोस_मेला
बक्सर का पचकोस मेला यानी स्थानीयता के लोकबोध का महा-उत्सव
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माई बिसरी, बाबू बिसरी
पचकोसवा के लिट्टी-चोखा नाही बिसरी।।
(मां-बाप को भूला जा सकता है, लेकिन पंचकोश मेले के लिट्टी-चोखा को नहीं)
बक्सर के पचकोस या पंचकोश मेले को लेकर ये बहुत पुरानी कहावत है, लोगों के दिल में इसके महत्व को व्याख्यायित करती हुई और आज पचकोस ही है, बक्सर का पारंपरिक स्थानीय मेला. लिट्टी-चोखा मेला के रूप में भी मशहूर. पंचकोशी परिक्रमा में पांच दिन बक्सर के पांच अलग अलग स्थानों की परिक्रमा की जाती है और पांच प्रकार का भोजन किया जाता है. शुरुआत अहिरौली से होती है और पांचवें तथा आखिरी दिन बक्सर के चरित्रवन में मेले का समापन होता है. इस आखिरी दिन ही चरित्रवन में लिट्टी-चोखा बनाया खाया जाता है.
लिट्टी-चोखा बक्सर और बिहार ही नहीं यूपी के बलिया, गाजीपुर समेत पूरे पूर्वांचल का पारंपरिक, प्रिय और प्रसिद्ध भोजन है. लिहाजा पचकोश का लिट्टी-चोखा बक्सर ही नहीं पास पड़ोस के जिलों के साथ उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर के लोगों को भी खूब आकर्षित करता है, अपनी ओर खींचता है. झुंड के झुंड लोग, जिनमें महिलाएं अधिक होती हैं, सत्तू, आटा, बैंगन, टमाटर आदि की गठरी-मोटरी लिए चरित्रवन पहुंचते हैं. गोइंठा (उपला) जोड़कर अहरा बोझते-सुलगाते हैं (अहरा बोझना टिपिकल भोजपुरी शब्द है, इसे हिंदी में क्या कहेंगे पता नहीं. उपले को जोड़कर आग लगाई जाती है) और अहरा की आग पर लिट्टी-चोखा पकाया-लगाया जाता है.
पचकोस मेले की एक बड़ी खासियत है बाजार के प्रभाव से अछूता होना. वैसे अमूमन ऐसे स्थानीय मेले बाजार के प्रभाव से अछूते होते हैं, क्योंकि इनकी जड़ें अपनी मिट्टी में गहरे धंसी होती हैं. हालांकि बाजार ने पैठ बनाने की भरपूर कोशिश भी की है, कुछ प्रभावित भी किया है, लेकिन फिर भी पचकोस का देशज रंग धूमिल नहीं हुआ है. उम्मीद करें पचकोस का यह चटख रंग और स्वाद कभी फीका नहीं पड़े...
शुभकामनाएं लोक मेला पचकोस की...
https://youtu.be/Xr_RtXgFSVo
#हैशटैग #hastag #buxar
2 months ago | [YT] | 3
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शुभकामनाएं रौशनी के पर्व दीपावली की
3 months ago | [YT] | 0
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गान्ही जी: जनकवि कैलाश गौतम की मशहूर कविता
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सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्ही जी
तोहरे घर क' रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्ही जी
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै
भाय भतीया, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै
का बतलाई कहै सुनै मे सरम लगत हौ, गान्ही जी
केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्ही जी
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्ही जी
गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्ही जी
जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला
लम्बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला
चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला
एक्को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला
नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्ही जी
हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्ही जी
झगरा क' जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्ही जी
खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्ही जी
उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ हौ
कब्बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ
दूसर के कब्जा में आपन पानी दाना अब्बौ हौ
जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्बौ हौ
कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्ही जी
माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्ही जी
चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्ही जी
ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्ही जी
घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्कारी वाले
देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले
इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले
देहलैं खून पसीना देहलैं तब्बौ बहिन मतारी वाले
तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्ही जी
ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्ही जी
केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्ही जी
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी
जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी
आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्ही जी
करिया अच्छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्ही जी
एक समय क' बागड़ बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी
#गांधी_जयंती
4 months ago | [YT] | 3
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
#baatbebat #thepoonambhatiashow #youtubelive
बात-बेबात के The Poonam Bhatia Show के YouTube Live में इस मंगलवार (30 सितंबर) शाम 07:00 बजे शिक्षिका एवं साहित्यकार तथा शो की होस्ट पूनम भाटिया की नेचुरोपैथिस्ट, समाजसेवी एवं कवयित्री डॉ. दीपाली वार्ष्णेय अग्रवाल से नेचुरोपैथी और उनकी कविताओं पर चर्चा.
उल्लेखनीय है कि जयपुर, राजस्थान की रहने वाली डॉ. दीपाली की पारिवारिक पृष्ठभूमि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से काफी समृद्ध रही है. दीपाली के दादाजी स्व. श्री चंद्रगुप्त वार्ष्णेय स्वतंत्रता सेनानी और लेखक तथा वरिष्ठ पत्रकार थे तो पिता स्व. श्री अनिल वार्ष्णेय भी चर्चित लेखक और पत्रकार थे. इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने डॉ. दीपाली को बचपन से ही लेखन के प्रति आकृष्ट किया तो सामाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया. दीपाली बचपन में ही कविता-कहानी, गीत-ग़ज़ल आदि साहित्य की तमाम विधाओं में लिखने लगी थीं. इनकी रचनाओं को काफी प्रशंसा भी मिली है और अपनी रचनाओं और कार्यों को लेकर कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी हुई हैं. स्वास्थ्य के प्रति जन जागरुकता के उद्देश्य से ये समय समय पर प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद के मुफ्त शिविर भी लगाती रहती हैं. इनकी एक पहचान 'सुजोक थेरेपिस्ट' की भी है. बकौल डॉ. दीपाली 'अपने लेखन, समाज सेवा और चिकित्सा के कार्यों से समाज को कुछ लौटा सकूं इसी उद्देश को लेकर सदा तत्पर रहती हूं'. अभी हाल ही में इनकी कविताओं की किताब 'आईना ए अहसास' प्रकाशित हुई है.
वहीं इस शो की होस्ट पूनम भाटिया ढाई दशक से ज्यादा समय से राजस्थान की सेवा में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं. फिलहाल वे जयपुर के एक स्कूल में हेडमास्टर के पद पर आसीन हैं. दो कविता संग्रह के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि कुछ और किताबें जल्दी ही आने वाली हैं. पूनम भाटिया रांची से निकलने वाले अखबार 'श्रमिक बिंदु' की साहित्य संपादक तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'परिंदे' की सहायक संपादक भी हैं.
नोट: Live की नोटिफिकेशन पाने के लिए YouTube लिंक पर क्लिक करें और नोटिफिकेशन बटन दबा दें
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#hashtag
4 months ago | [YT] | 2
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