सूचना Baat-Bebat/बात-बेबात के YouTube Live के इस प्रस्तावित कार्यक्रम ''क्या इतिहास नफ़रत सिखाता है: डॉ. राम पुनियानी से डॉ. दीपक राय की बातचीत" को राम पुनियानी जी की अस्वस्थता और सेहत संबंधी समस्याओं के चलते आज स्थगित करना पड़ रहा है, इसका हमें खेद है।
लेकिन यह स्थगन अस्थाई है और जैसे ही पुनियानी सर स्वस्थ होंगे, यह कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा। कार्यक्रम कब होगा इसकी सूचना बहुत जल्द दी जाएगी।
राम पुनियानी सर को शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाएं।
इतिहास सिर्फ अतीत की घटनाओं का सिलसिला है या वर्तमान को समझने और गढ़ने का भी एक माध्यम? क्या इतिहास की व्याख्याएं समाज में नफ़रत और विभाजन को बढ़ा सकती हैं? वर्तमान दौर में जब सांप्रदायिकता बढ़ी है; धर्म, राजनीति और इतिहास के बीच के रिश्ते को किस तरह देखा जाना चाहिए?
इन्हीं सवालों और संदर्भों के साथ बात-बेबात के YouTube Live में डॉ. दीपक कुमार राय की बातचीत होगी जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राम पुनियानी से।
समय 👇 🗓️ रविवार, 20 सितंबर ⏰ सुबह 11 बजे
🎙️ डॉ. राम पुनियानी डॉ. राम पुनियानी लेखक और पूर्व प्रोफेसर हैं। वे IIT Bombay में लंबे समय तक कार्यरत रहे और सामाजिक, मानवाधिकार तथा धर्मनिरपेक्षता से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहे हैं। वे Centre for Study of Society and Secularism (CSSS) के Executive Council के अध्यक्ष हैं।
सांप्रदायिकता, धर्म, राजनीति, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र जैसे विषय राम पुनियानी के लेखन और सार्वजनिक व्याख्यानों के प्रमुख विषय रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनके नियमित कॉलम भी प्रकाशित होते रहते हैं।
डॉ. राम पुनियानी की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें कम्यूनल पोलिटिक्स : फैक्ट्स वर्सस मिथ्स, द फासिज्म ऑफ़ संघ परिवार, द अदर चीक : माइनोरीतीज अंडर थ्रीट, कम्यूनल पोलिटिक्स : एन इलसट्रेतेद प्राइमर, धार्मिक राष्ट्रवाद, सामाजिक धारणा और हिंसा, जाति और की सांप्रदायिकता, सांप्रदायिक राजनीति: तथ्य बनाम मिथक, आतंकवादी हिंसा का खंडन , भारतीय राष्ट्रवाद बनाम हिंदू राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता की व्याख्या के अलावा Communalism Explained, Religion, Power and Violence, Terrorism: Facts versus Myths, Indian Nationalism versus Hindu Nationalism जैसी पुस्तकें शामिल हैं।
डॉ. पुनियानी को कई सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं, जिनमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता एवार्ड (2006), राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार (2007), मुकुंदन सी. मेनन पुरस्कार (2015) आदि उल्लेखनीय है।
🎙️ डॉ. दीपक कुमार राय साहित्य, इतिहास, सिनेमा, राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ रखने वाले डॉ. दीपक कुमार राय अपनी जनपक्षीय वैचारिकी और बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा, अध्यापन और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव रहा है। पिछले ढाई दशक से हिंदी के विभिन्न महत्वपूर्ण अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रही हैं।
डॉ. दीपक राय की इतिहास, राजनीति और सामाजिक विषयों पर उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्राचीन भारत का सामाजिक आर्थिक इतिहास, प्राचीन भारत का राजनीतिक चिंतन, पत्थर समय में प्रतिरोध, 1857 का प्रथम मुक्ति संग्राम, शाहाबाद का इतिहास (दो खंड) और भूमंडलीकरण: विविध आयाम आदि प्रमुख हैं। उनकी हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘उर्फ सिनेमा’ है। डॉ. राय बात-बेबात के मेंटोर और सलाहकार संपादक भी हैं।
हमारे सबसे प्रिय कवियों में शुमार अवतार सिंह संधू यानी पाश की आज जयंती है. पाश को पढ़ते हुए मुझे हमेशा अपने प्रिय नायक भगतसिंह की याद आती है. पाश रचना, विचार और व्यक्तित्व तीनों स्तर पर क्रांतिकारी थे. उनकी स्मृति को जोरदार सलाम
मूलतः पंजाबी के कवि पाश की कविताओं का हिंदी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. सत्ता का प्रतिपक्ष रचती उनकी कविताएं हाशिए पर पड़े उपेक्षित और शोषित वर्ग की आवाज हैं.
पाश की हर कविता क्रांति का गीत है. 'सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' पाश की सबसे चर्चित कविताओं में से एक है.
पिछले कुछ समय में नई पीढ़ी ने अपनी समझ और अपने विचारों से राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों को चौंकाया है।
बात चाहे जंतर-मंतर समेत Gen Z के विभिन्न छात्र आंदोलनों की हो या फिर सरकारी स्कूलों की शिक्षा और व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए Gen Alpha के किए जाने वाले प्रदर्शनों की, अपने मुद्दों और अधिकारों को लेकर नई पीढ़ी की इस सजगता और सक्रियता ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है।
इस दौरान मीडिया के साथ उनके व्यवहार और मीडिया के इस्तेमाल के तरीके को लेकर भी चर्चा खूब हुई है।
सवाल है कि क्या भारत में नई पीढ़ी की राजनीतिक समझ और सामाजिक चेतना बदल रही है? और बदल रही है तो किस तरह से?
राजनीति और मीडिया को लेकर Gen Z और Gen Alpha की सोच क्या पिछली पीढ़ियों से अलग है?
सोशल मीडिया ने उनकी राजनीतिक चेतना और विचार बनाने की प्रक्रिया को कितना प्रभावित किया है? और मुख्यधारा का मीडिया उनके लिए कितना प्रासंगिक रह गया है?
बात बेबात का यूट्यूब लाइव इन्हीं सब सवालों पर केंद्रित है, जिसका केंद्रीय विषय है-
राजनीति, मीडिया और नई पीढ़ी | Gen Z & Gen Alpha के बदलते सवाल
इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार संग चर्चा करेंगे समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
इस महत्वपूर्ण और Live चर्चा से आप भी जुड़ें, देखें, सुनें और अपनी राय साझा करें.
समय- रविवार, 06 सितंबर | शाम 05 बजे बात-बेबात YouTube पर
♥️ प्रेम के अप्रतिम नायक दशरथ मांझी की आज पुण्यतिथि है. दशरथ मांझी की कहानी सिर्फ प्यार में ज़िद, जुनून और समर्पण की ही कथा नहीं है, बल्कि प्रेम के एक से विस्तारित होकर सबके लिए पसर जाने जाने की महागाथा है.
दशरथ मांझी मेरे प्रिय नायकों में रहे हैं. मोहब्बत के इस मसीहा के निधन के पश्चात 2008 में उन्हें याद करते हुए 'मैत्री-शांति' के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक आलेख लिखा था. उसी आलेख का एक हिस्सा यहां उनकी पुण्यतिथि पर संलग्न कर रहा हूं.
बाद में बात-बेबात के लिए इस आलेख अंश का वीडियो रुपांतरण भी किया जिसमें आवाज़ कौशिक की है. आप चाहें तो वीडियो भी देख सकते हैं.
📍 आलेख अंश पढ़ें 👇
ताज के देश में मांझी की मोहब्बत के मायने ***** ताजमहल! मोहब्बत का बेहद खूबसूरत, बेहद भव्य प्रतीक. इसका संगमरमरी जिस्म हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के आशिकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
लेकिन एक हकीकत यह भी है कि ताज की तामीर सबके वश की बात नहीं. यह किसी बादशाह या धनकुबेर की ही ख्वाहिशों में पल सकता है, अपना वजूद पा सकता है.
शायद इसीलिए दशकों पहले साहिर लुधियानवी ने ताजमहल पर तंज कसते हुए लिखा- 'एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक'.
लेकिन तब न साहिर और न ही दुनिया को पता था कि आनेवाले वक्त में इसी हिंदुस्तान की सरजमीं पर एक गरीब की मोहब्बत की ऐसी निशानी देखने को मिलेगी, जो ताजमहल जैसी भव्य तो नहीं होगी, लेकिन मोहब्बत के असल मायने और मकाम जो होने चाहिए, वह जरूर बताएगी.
यह गरीब कोई और नहीं, प्रेम को असीमित विस्तार और अतल गहराई देनेवाले दशरथ मांझी हैं, जिन्होंने पहाड़ों का सीना चीरकर इश्क की नई राह भी बनाई और इश्क को नई राह भी दिखाई, जो ताजमहल ही नहीं, मोहब्बत की तमाम कहानियों और निशानियों से अलहदा है.
दरअसल ताज के इस देश में दशरथ माझी द्वारा निर्मित पहाड़ी रास्ता प्रेम के नये अर्थ खोलता है. गौरतलब है कि दोनों ही प्रेम के प्रतीक हैं. दोनों के निर्माण में तकरीबन बराबर का समय लगा है, किन्तु दोनों की अभिव्यक्तियां भिन्न है. एक शहंशाह के वैभव की गाथा को बयान करता है तो एक आम आदमी के श्रम की संस्कृति में प्रेम की परिभाषा लिखता है.
ताजमहल प्रेम का बेहद खूबसूरत और भव्य प्रतीक है, किन्तु इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह दौलत और राज सत्ता के बल पर ही खड़ा हुआ था. शायद यह एक शंहशाह की शेखी का प्रतीक भी है. संभवतः इसकी तामीर में शाहजहां ने अपने हाथों एक ईंट भी इसमें न लगायी हो.
फिर ताजमहल के निर्माण का सरोकार एक बादशाह से था. शाहजहां ने इसका निर्माण इसीलिए कराया था ताकि इससे उसके दिल को सुकून पहुंचे और इस बहाने वह मुमताज की स्मृतियों को जिन्दा रख सके.
इसके उलट दशरथ मांझी ने पहाड़ में रास्ता इसलिए तलाशा ताकि लोगों की परेशानी कम हो सके. यह एक बादशाह और गरीब की मुहब्बत का भी फर्क है.
एक बादशाह प्रेम में पड़कर अपने लिए ताजमहल बनवाता है, जबकि एक गरीब का प्रेम सबके लिए एक नये रास्ते की खोज करता है.
संभव है कि जब आप ताज के संगमरमरी जिस्म पर हाथ फिराये तो आपको उसमें शाहजहां के हाथों की हरारत न महसूस हो, किन्तु जब भी आप दशरथ मांझी के बनाये पहाड़ी रास्ते पर चलेंगे, तो यकीनन आप उनकी खुरदरी हथेलियों की तपिश महसूस करेंगे ही.
पुण्यतिथि पर मोहब्बत के मसीहा मांझी की स्मृति को सलाम.. ▶️ वीडियो देखने के लिए Link पर Click करें 👇 https://youtu.be/I9XHrbU4lNI
सिनेमा का जयहिंद बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि इसका देशभक्ति से पुराना और गहरा नाता रहा है. देशप्रेम जगाने के नाम पार्टी विशेष की तरफदारी करती फिल्मों के अलावा रीयल राष्ट्र नायकों पर भी कई फिल्में बनीं.
गुलामी के दौर में बैन की आशंका के चलते इशारों में देशप्रेम की बात करती फिल्में आजादी के बाद खुलकर देशभक्ति का जज़्बा और जोश दिखाने लगीं.
आजादी की सालगिरह पर जानिए बॉलीवुड में देशभक्ति फिल्मों का इतिहास.
आज भोजपुरी गायकी के शिखर पुरुष भरत शर्मा 'व्यास' जी का जन्मदिन है. उनके गीतों को सुनते हुए हमने किशोरवय से युवावस्था की तरफ कदम रखा था. उस दौर की हमारी स्मृतियां भरत शर्मा जी के अनगिनत गीतों के बगैर पूरी नहीं होंगी. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
कुछ साल पहले बात-बेबात के लिए भरत शर्मा जी के साथ भोजपुरी के एक और दिग्गज गायक गोपाल राय तथा साहित्य, समाज और इतिहास के अध्येता डॉ. दीपक राय ने बातचीत की थी. यह तस्वीर उसी बातचीत के वीडियो का स्क्रीन शॉट हैं.
इस बातचीत की एक खासियत यह थी कि गोपाल राय जी इसमें सूत्रधार की भूमिका में थे तो दीपक राय जी ने भोजपुरी संगीत को सामाजिक और सामयिक सरोकारों से जोड़ने वाले प्रश्र उठाए.
तकरीबन एक घंटे की इस बातचीत में भरत शर्मा जी के गायकी सफ़र, उनके संघर्ष से लेकर भोजपुरी संगीत की वर्तमान दशा दिशा समेत कई मुद्दों पर बेबाक और बिंदास बातचीत हुई. इस बातचीत को रिकॉर्ड और एडिट विकास राय ने किया था.
भोजपुरी संगीत को चाहने वालों को यह बातचीत अच्छी लगेगी. अगर आपने यह बातचीत नहीं सुनी तो बात-बेबात के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. भोजपुरी संगीत के नवांकुरों को भी यह बातचीत सुननी चाहिए. बहुत कुछ जानने समझने को मिलेगा. भरत शर्मा जी को एक बार फिर जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. ▶️ वीडियो देखें 👇 https://youtu.be/s3Xvlo0cQGo
1934 में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और संस्कृति के घालमेल को उजागर करते हुए सांप्रदायिकता और संस्कृति के नाम से ही एक आलेख लिखा था.
सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को उजागर करनेवाला यह आलेख तब तो काफी चर्चित हुआ ही था आज भी यह कम सामयिक और प्रासंगिक नहीं है, बल्कि कहें तो आज सांप्रदायिक कट्टरता और बढ़ी है साथ ही इसके खतरे भी बढ़े हैं. ऐसे में यह आलेख और मौजूं हो जाता है.
इस आलेख और इसकी प्रासंगिकता के बारे में बता रहे हैं समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं, बल्कि समाज, मनुष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना भी है. उनके विचार, उनका लिखा चाहे वह कहानी, उपन्यास हो या आलेख आज भी प्रासंगिक है.
यह बातचीत प्रेमचंद के साहित्य, उनके समय, उनकी वैचारिकी और आज के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित है.
हालांकि YouTube Live की यह बातचीत कुछ साल पहले हुई थी, लेकिन इस चर्चा के अधिकांश प्रश्न आज भी उतने ही जीवंत और विचारोत्तेजक हैं.
यदि आप हिंदी साहित्य, प्रेमचंद और समकालीन विमर्श में रुचि रखते हैं, तो उम्मीद है कि यह बातचीत, यह संवाद आपके लिए उपयोगी होगा.
BAAT-BEBAT बात-बेबात
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Baat-Bebat/बात-बेबात के YouTube Live के इस प्रस्तावित कार्यक्रम ''क्या इतिहास नफ़रत सिखाता है: डॉ. राम पुनियानी से डॉ. दीपक राय की बातचीत" को राम पुनियानी जी की अस्वस्थता और सेहत संबंधी समस्याओं के चलते आज स्थगित करना पड़ रहा है, इसका हमें खेद है।
लेकिन यह स्थगन अस्थाई है और जैसे ही पुनियानी सर स्वस्थ होंगे, यह कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा। कार्यक्रम कब होगा इसकी सूचना बहुत जल्द दी जाएगी।
राम पुनियानी सर को शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाएं।
बात-बेबात
15 hours ago | [YT] | 0
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
क्या इतिहास नफ़रत सिखाता है?
इतिहास सिर्फ अतीत की घटनाओं का सिलसिला है या वर्तमान को समझने और गढ़ने का भी एक माध्यम?
क्या इतिहास की व्याख्याएं समाज में नफ़रत और विभाजन को बढ़ा सकती हैं? वर्तमान दौर में जब सांप्रदायिकता बढ़ी है; धर्म, राजनीति और इतिहास के बीच के रिश्ते को किस तरह देखा जाना चाहिए?
इन्हीं सवालों और संदर्भों के साथ बात-बेबात के YouTube Live में डॉ. दीपक कुमार राय की बातचीत होगी जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राम पुनियानी से।
समय 👇
🗓️ रविवार, 20 सितंबर
⏰ सुबह 11 बजे
🎙️ डॉ. राम पुनियानी
डॉ. राम पुनियानी लेखक और पूर्व प्रोफेसर हैं। वे IIT Bombay में लंबे समय तक कार्यरत रहे और सामाजिक, मानवाधिकार तथा धर्मनिरपेक्षता से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहे हैं। वे Centre for Study of Society and Secularism (CSSS) के Executive Council के अध्यक्ष हैं।
सांप्रदायिकता, धर्म, राजनीति, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र जैसे विषय राम पुनियानी के लेखन और सार्वजनिक व्याख्यानों के प्रमुख विषय रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनके नियमित कॉलम भी प्रकाशित होते रहते हैं।
डॉ. राम पुनियानी की कई पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें कम्यूनल पोलिटिक्स : फैक्ट्स वर्सस मिथ्स, द फासिज्म ऑफ़ संघ परिवार, द अदर चीक : माइनोरीतीज अंडर थ्रीट, कम्यूनल पोलिटिक्स : एन इलसट्रेतेद प्राइमर, धार्मिक राष्ट्रवाद, सामाजिक धारणा और हिंसा, जाति और की सांप्रदायिकता, सांप्रदायिक राजनीति: तथ्य बनाम मिथक, आतंकवादी हिंसा का खंडन , भारतीय राष्ट्रवाद बनाम हिंदू राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता की व्याख्या के अलावा Communalism Explained, Religion, Power and Violence, Terrorism: Facts versus Myths, Indian Nationalism versus Hindu Nationalism जैसी पुस्तकें शामिल हैं।
डॉ. पुनियानी को कई सम्मान और पुरस्कार भी मिले हैं, जिनमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता एवार्ड (2006), राष्ट्रीय सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार (2007), मुकुंदन सी. मेनन पुरस्कार (2015) आदि उल्लेखनीय है।
🎙️ डॉ. दीपक कुमार राय
साहित्य, इतिहास, सिनेमा, राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ रखने वाले डॉ. दीपक कुमार राय अपनी जनपक्षीय वैचारिकी और बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा, अध्यापन और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका लंबा अनुभव रहा है। पिछले ढाई दशक से हिंदी के विभिन्न महत्वपूर्ण अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रही हैं।
डॉ. दीपक राय की इतिहास, राजनीति और सामाजिक विषयों पर उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें प्राचीन भारत का सामाजिक आर्थिक इतिहास, प्राचीन भारत का राजनीतिक चिंतन, पत्थर समय में प्रतिरोध, 1857 का प्रथम मुक्ति संग्राम, शाहाबाद का इतिहास (दो खंड) और भूमंडलीकरण: विविध आयाम आदि प्रमुख हैं। उनकी हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘उर्फ सिनेमा’ है। डॉ. राय बात-बेबात के मेंटोर और सलाहकार संपादक भी हैं।
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
हमारे सबसे प्रिय कवियों में शुमार अवतार सिंह संधू यानी पाश की आज जयंती है. पाश को पढ़ते हुए मुझे हमेशा अपने प्रिय नायक भगतसिंह की याद आती है. पाश रचना, विचार और व्यक्तित्व तीनों स्तर पर क्रांतिकारी थे.
उनकी स्मृति को जोरदार सलाम
मूलतः पंजाबी के कवि पाश की कविताओं का हिंदी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. सत्ता का प्रतिपक्ष रचती उनकी कविताएं हाशिए पर पड़े उपेक्षित और शोषित वर्ग की आवाज हैं.
पाश की हर कविता क्रांति का गीत है. 'सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' पाश की सबसे चर्चित कविताओं में से एक है.
इस कविता को सुनने/देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें 👇🏿
https://youtu.be/VE1ht6PqsZo
#पाश #जयंती #स्मरण
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
पिछले कुछ समय में नई पीढ़ी ने अपनी समझ और अपने विचारों से राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों को चौंकाया है।
बात चाहे जंतर-मंतर समेत Gen Z के विभिन्न छात्र आंदोलनों की हो या फिर सरकारी स्कूलों की शिक्षा और व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए Gen Alpha के किए जाने वाले प्रदर्शनों की, अपने मुद्दों और अधिकारों को लेकर नई पीढ़ी की इस सजगता और सक्रियता ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है।
इस दौरान मीडिया के साथ उनके व्यवहार और मीडिया के इस्तेमाल के तरीके को लेकर भी चर्चा खूब हुई है।
सवाल है कि क्या भारत में नई पीढ़ी की राजनीतिक समझ और सामाजिक चेतना बदल रही है? और बदल रही है तो किस तरह से?
राजनीति और मीडिया को लेकर Gen Z और Gen Alpha की सोच क्या पिछली पीढ़ियों से अलग है?
सोशल मीडिया ने उनकी राजनीतिक चेतना और विचार बनाने की प्रक्रिया को कितना प्रभावित किया है? और मुख्यधारा का मीडिया उनके लिए कितना प्रासंगिक रह गया है?
बात बेबात का यूट्यूब लाइव इन्हीं सब सवालों पर केंद्रित है, जिसका केंद्रीय विषय है-
राजनीति, मीडिया और नई पीढ़ी | Gen Z & Gen Alpha के बदलते सवाल
इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार संग चर्चा करेंगे समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
इस महत्वपूर्ण और Live चर्चा से आप भी जुड़ें, देखें, सुनें और अपनी राय साझा करें.
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रविवार, 06 सितंबर | शाम 05 बजे
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♥️ प्रेम के अप्रतिम नायक दशरथ मांझी की आज पुण्यतिथि है. दशरथ मांझी की कहानी सिर्फ प्यार में ज़िद, जुनून और समर्पण की ही कथा नहीं है, बल्कि प्रेम के एक से विस्तारित होकर सबके लिए पसर जाने जाने की महागाथा है.
दशरथ मांझी मेरे प्रिय नायकों में रहे हैं. मोहब्बत के इस मसीहा के निधन के पश्चात 2008 में उन्हें याद करते हुए 'मैत्री-शांति' के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक आलेख लिखा था. उसी आलेख का एक हिस्सा यहां उनकी पुण्यतिथि पर संलग्न कर रहा हूं.
बाद में बात-बेबात के लिए इस आलेख अंश का वीडियो रुपांतरण भी किया जिसमें आवाज़ कौशिक की है.
आप चाहें तो वीडियो भी देख सकते हैं.
📍 आलेख अंश पढ़ें 👇
ताज के देश में मांझी की मोहब्बत के मायने
*****
ताजमहल! मोहब्बत का बेहद खूबसूरत, बेहद भव्य प्रतीक. इसका संगमरमरी जिस्म हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के आशिकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
लेकिन एक हकीकत यह भी है कि ताज की तामीर सबके वश की बात नहीं. यह किसी बादशाह या धनकुबेर की ही ख्वाहिशों में पल सकता है, अपना वजूद पा सकता है.
शायद इसीलिए दशकों पहले साहिर लुधियानवी ने ताजमहल पर तंज कसते हुए लिखा- 'एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक'.
लेकिन तब न साहिर और न ही दुनिया को पता था कि आनेवाले वक्त में इसी हिंदुस्तान की सरजमीं पर एक गरीब की मोहब्बत की ऐसी निशानी देखने को मिलेगी, जो ताजमहल जैसी भव्य तो नहीं होगी, लेकिन मोहब्बत के असल मायने और मकाम जो होने चाहिए, वह जरूर बताएगी.
यह गरीब कोई और नहीं, प्रेम को असीमित विस्तार और अतल गहराई देनेवाले दशरथ मांझी हैं, जिन्होंने पहाड़ों का सीना चीरकर इश्क की नई राह भी बनाई और इश्क को नई राह भी दिखाई, जो ताजमहल ही नहीं, मोहब्बत की तमाम कहानियों और निशानियों से अलहदा है.
दरअसल ताज के इस देश में दशरथ माझी द्वारा निर्मित पहाड़ी रास्ता प्रेम के नये अर्थ खोलता है. गौरतलब है कि दोनों ही प्रेम के प्रतीक हैं. दोनों के निर्माण में तकरीबन बराबर का समय लगा है, किन्तु दोनों की अभिव्यक्तियां भिन्न है. एक शहंशाह के वैभव की गाथा को बयान करता है तो एक आम आदमी के श्रम की संस्कृति में प्रेम की परिभाषा लिखता है.
ताजमहल प्रेम का बेहद खूबसूरत और भव्य प्रतीक है, किन्तु इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह दौलत और राज सत्ता के बल पर ही खड़ा हुआ था. शायद यह एक शंहशाह की शेखी का प्रतीक भी है. संभवतः इसकी तामीर में शाहजहां ने अपने हाथों एक ईंट भी इसमें न लगायी हो.
फिर ताजमहल के निर्माण का सरोकार एक बादशाह से था. शाहजहां ने इसका निर्माण इसीलिए कराया था ताकि इससे उसके दिल को सुकून पहुंचे और इस बहाने वह मुमताज की स्मृतियों को जिन्दा रख सके.
इसके उलट दशरथ मांझी ने पहाड़ में रास्ता इसलिए तलाशा ताकि लोगों की परेशानी कम हो सके. यह एक बादशाह और गरीब की मुहब्बत का भी फर्क है.
एक बादशाह प्रेम में पड़कर अपने लिए ताजमहल बनवाता है, जबकि एक गरीब का प्रेम सबके लिए एक नये रास्ते की खोज करता है.
संभव है कि जब आप ताज के संगमरमरी जिस्म पर हाथ फिराये तो आपको उसमें शाहजहां के हाथों की हरारत न महसूस हो, किन्तु जब भी आप दशरथ मांझी के बनाये पहाड़ी रास्ते पर चलेंगे, तो यकीनन आप उनकी खुरदरी हथेलियों की तपिश महसूस करेंगे ही.
पुण्यतिथि पर मोहब्बत के मसीहा मांझी की स्मृति को सलाम..
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https://youtu.be/I9XHrbU4lNI
1 month ago | [YT] | 6
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
सिनेमा का जयहिंद
बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि इसका देशभक्ति से पुराना और गहरा नाता रहा है. देशप्रेम जगाने के नाम पार्टी विशेष की तरफदारी करती फिल्मों के अलावा रीयल राष्ट्र नायकों पर भी कई फिल्में बनीं.
गुलामी के दौर में बैन की आशंका के चलते इशारों में देशप्रेम की बात करती फिल्में आजादी के बाद खुलकर देशभक्ति का जज़्बा और जोश दिखाने लगीं.
आजादी की सालगिरह पर जानिए बॉलीवुड में देशभक्ति फिल्मों का इतिहास.
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https://youtu.be/bMr6VKuIlwA
#indipendenceday #15august #PatrioticMovies #bollywoodpatrioticmovies
1 month ago | [YT] | 0
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शुभकामनाओं के साथ पढ़ते हैं बृज नारायण चकबस्त की नज़्म- 'हमारा वतन दिल से प्यारा वतन'
ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन
मोहब्बत की आँखों का तारा वतन
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ
वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
हवा में दरख़्तों का वो झूमना
वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो सावन में काली घटा की बहार
वो बरसात की हल्की हल्की फुवार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर
वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
इसी से है इस ज़िंदगी की बहार
वतन की मोहब्बत हो या माँ का प्यार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
****
ज़श्ने आज़ादी मुबारक
#15august #indipendenceday
1 month ago | [YT] | 0
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
आज भोजपुरी गायकी के शिखर पुरुष भरत शर्मा 'व्यास' जी का जन्मदिन है. उनके गीतों को सुनते हुए हमने किशोरवय से युवावस्था की तरफ कदम रखा था. उस दौर की हमारी स्मृतियां भरत शर्मा जी के अनगिनत गीतों के बगैर पूरी नहीं होंगी. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
कुछ साल पहले बात-बेबात के लिए भरत शर्मा जी के साथ भोजपुरी के एक और दिग्गज गायक गोपाल राय तथा साहित्य, समाज और इतिहास के अध्येता डॉ. दीपक राय ने बातचीत की थी. यह तस्वीर उसी बातचीत के वीडियो का स्क्रीन शॉट हैं.
इस बातचीत की एक खासियत यह थी कि गोपाल राय जी इसमें सूत्रधार की भूमिका में थे तो दीपक राय जी ने भोजपुरी संगीत को सामाजिक और सामयिक सरोकारों से जोड़ने वाले प्रश्र उठाए.
तकरीबन एक घंटे की इस बातचीत में भरत शर्मा जी के गायकी सफ़र, उनके संघर्ष से लेकर भोजपुरी संगीत की वर्तमान दशा दिशा समेत कई मुद्दों पर बेबाक और बिंदास बातचीत हुई. इस बातचीत को रिकॉर्ड और एडिट विकास राय ने किया था.
भोजपुरी संगीत को चाहने वालों को यह बातचीत अच्छी लगेगी. अगर आपने यह बातचीत नहीं सुनी तो बात-बेबात के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. भोजपुरी संगीत के नवांकुरों को भी यह बातचीत सुननी चाहिए. बहुत कुछ जानने समझने को मिलेगा.
भरत शर्मा जी को एक बार फिर जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
▶️ वीडियो देखें 👇
https://youtu.be/s3Xvlo0cQGo
1 month ago | [YT] | 4
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
सांप्रदायिकता और संस्कृति: प्रेमचंद का कालजई आलेख
1934 में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और संस्कृति के घालमेल को उजागर करते हुए सांप्रदायिकता और संस्कृति के नाम से ही एक आलेख लिखा था.
सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को उजागर करनेवाला यह आलेख तब तो काफी चर्चित हुआ ही था आज भी यह कम सामयिक और प्रासंगिक नहीं है, बल्कि कहें तो आज सांप्रदायिक कट्टरता और बढ़ी है साथ ही इसके खतरे भी बढ़े हैं. ऐसे में यह आलेख और मौजूं हो जाता है.
इस आलेख और इसकी प्रासंगिकता के बारे में बता रहे हैं समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/-m5uRvvjCGs
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1 month ago | [YT] | 2
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BAAT-BEBAT बात-बेबात
प्रेमचंद जयंती पर विशेष परिचर्चा।
प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं, बल्कि समाज, मनुष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना भी है. उनके विचार, उनका लिखा चाहे वह कहानी, उपन्यास हो या आलेख आज भी प्रासंगिक है.
यह बातचीत प्रेमचंद के साहित्य, उनके समय, उनकी वैचारिकी और आज के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित है.
हालांकि YouTube Live की यह बातचीत कुछ साल पहले हुई थी, लेकिन इस चर्चा के अधिकांश प्रश्न आज भी उतने ही जीवंत और विचारोत्तेजक हैं.
यदि आप हिंदी साहित्य, प्रेमचंद और समकालीन विमर्श में रुचि रखते हैं, तो उम्मीद है कि यह बातचीत,
यह संवाद आपके लिए उपयोगी होगा.
पुरखे साहित्यकार प्रेमचंद की स्मृति को नमन
वीडियो लिंक 👇
youtube.com/live/6RvqWQPDcEg?feature=share
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#HindiLiterature #MunshiPremchand #DeepakKumarRai #HindiSahitya #Literature #Hindi
1 month ago | [YT] | 3
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