BAAT-BEBAT बात-बेबात

News, Media & Entertainment
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
समय, समाज, सिनेमा और सरोकारों को समर्पित.


BAAT-BEBAT बात-बेबात

Script Writing Terms Hindi Part 2
पटकथा लेखन की शब्दावलियां यानी स्क्रिप्ट राइटिंग टर्म्स के पहले पार्ट में शीर्षक या टाइटल, सब टाइटल, राइटर नेम, ब्रैकेट और स्लग लाइन या सीन हेडिंग, जिसमें- लोकेशन, उसका विवरण और टाइम के बारे में जानकारी दी गई थी.
Script Writing की इस श्रृंखला के दूसरे भाग में भी पटकथा लेखन की कुछ और महत्वपूर्ण शब्दावलियों को सरल हिंदी में समझाया गया है.

दरअसल पहले भाग में वो टर्म्स शामिल थे, जिनसे किसी स्क्रिप्ट की नींव पड़ती है, जबकि दूसरे यानी इस पार्ट में उन टर्म्स के बारे में बताया गया है, जिसके सहारे कोई स्क्रिप्ट लिखी जाती है.
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/mH6YrwmHSbY

📚 इस वीडियो में शामिल Terms:

• Scene Description
• Character Name
• Dialog
• Parenthetical
• Narration
• Voice Over (VO)
• Cut-To
अगर आपने पहला पार्ट नहीं देखा है तो उसे भी जरूर देखें. Script Writing Terms के बारे में बतानेवाली यह सीरीज पटकथा लेखन के प्रशिक्षुओं और विद्यार्थियों, मीडिया स्टूडेंट्स, फिल्म, टीवी, वेब सीरीज़ और शॉर्ट फिल्म में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है. पहले पार्ट का लिंक 👇
https://youtu.be/7DocIbOQXo0

🎓 Series: Terms of Script Writing
📖 Part: 2
🎬 Media Classes | Episode __

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#ScriptWriting #Screenplay #MediaClasses #PatkathaLekhan #Hindi

4 days ago (edited) | [YT] | 3

BAAT-BEBAT बात-बेबात

🎬 Media Classes की नई सीरीज़ की शुरुआत!
Terms of Script Writing | Part 1 अब YouTube पर उपलब्ध है।
अगर आप Script Writing, फिल्म, वेब सीरीज़, टीवी या मीडिया की पढ़ाई में रुचि रखते हैं, तो इस वीडियो में पटकथा लेखन की महत्वपूर्ण शब्दावलियों को आसान हिंदी में समझाया गया है।
इस भाग में: ✔ Title ✔ Subtitle ✔ Script Writer Name ✔ Scene Number ✔ Slug Line / Scene Heading ✔ EXT / INT ✔ Time ✔ Bracket
📺 वीडियो देखें: 🔗
https://youtu.be/7DocIbOQXo0

आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का स्वागत है। 🙏
#ScriptWriting #MediaClasses #Screenplay #पटकथालेखन #Hindi

6 days ago | [YT] | 4

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शिवनाथ सिंह: द लास्ट ओलंपियन ऑफ बिहार
(संजो कर रखना था जिसे, हमने उसे भुला दिया)

तीन पग में त्रिलोक नापने वाले भगवान वामन की अवतरण भूमि बक्सर की धरती से तकरीबन पांच दशक पहले निकले एक युवक ने भी अपने तेज कदमों से दुनिया की पैमाइश कर डाली. अपने मजबूत कदमों और दृढ़ इरादों से इस नौजवान ने दौड़ की दुनिया में एक नायाब मुकाम हासिल किया. ऐसा मुकाम जिस तक पहुंचना आज भी हिंदुस्तान के हर धावक का सपना है.

यह युवक कोई और नहीं बक्सर के लाल और बिहार के गौरव शिवनाथ सिंह थे. ओलंपियन शिवनाथ सिंह, रिकॉर्ड होल्डर शिवनाथ सिंह. अर्जुन अवार्डी लीजेंड धावक शिवनाथ सिंह, जिनका मैराथन का राष्ट्रीय रिकॉर्ड चार दशक बाद भी अभी हाल तक बरकरार था.

बक्सर के एक गांव मझरिया के एक मझोले किसान परिवार में 11 जुलाई 1946 को पैदा हुए शिवनाथ सिंह की कहानी जिद, जुनून और जीत की कहानी है... अभावों के बीच पाले गए सपने को साकार करने का अफसाना है. गांव की गलियों से निकलकर देश-दुनिया के मानचित्र पर छा जाने की महागाथा है. अपनी राह खुद बनाने और उस राह से चलकर मंजिल तक पहुंचने वाले अनथक योद्धा की अनथक यात्रा है.

शिवनाथ सिंह ने दौड़ के दम पर 1963 में महज 17 साल की उम्र में भारतीय सेना की नौकरी हासिल की और यहीं से शुरू हुआ  उनकी सफलता का सफर और शिखर छूने की यात्रा. 1974 में  तेहरान में हुए एशियाड में शिवनाथ सिंह ने नए एशियन रिकॉर्ड के साथ पांच हजार मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक और 10 हजार मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया.

अगले ही साल यानी 1976 में वह मौका आया, जिसे पाना हर खिलाड़ी का सपना होता है. ओलंपिक में जाने का, ओलंपियन कहाने का. शिवनाथ सिंह के हिस्से में गौरव का यह क्षण दो बार आया. 1976 के मांट्रियल और 1980 के मास्को ओलंपिक में. 1976 में मांट्रियल में आयोजित ओलंपिक के मैराथन दौड़ की प्रतिस्पर्धा में उन्होंने दुनिया भर के धावकों के बीच 11वां स्थान हासिल किया था. इस दौड़ में शामिल एशियाई धावकों में वे पहले नंबर पर थे.

शिवनाथ सिंह के ओलंपियन बनने की उपलब्धि इसलिए भी खास है कि उनके बाद अभी तक बिहार का कोई खिलाड़ी ओलंपिक में नहीं पहुंच पाया है.

1978... यह वो साल था, जिसने शिवनाथ सिंह के हिस्से में एक ऐसा रिकॉर्ड दे दिया, जिसके पार कोई नहीं जा पाया. उनके जाने के बाद भी, आज तक.

1978 में जालंधर में हुई अखिल भारतीय मैराथन दौड़ में शिवनाथ सिंह ने रिकॉर्ड 2 घंटे 12 मिनट में दौड़ पूरी करके पहला स्थान हासिल किया था. इस साल के पहले तक कोई भारतीय धावक इस रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया था. शिवनाथ सिंह का यह रिकॉर्ड हालांकि अब टूट गया है, लेकिन लंबे समय तक यह रिकॉर्ड कायम रहा, दौड़ की दुनिया में मील का पत्थर बने हुए.
    
शिवनाथ सिंह लंबी दूरी के चैंपियन धावक थे... उनका कैरियर भी लंबा ही रहा. 1970 से 1982 के बीच तकरीबन 12 साल के अपने कैरियर में शिवनाथ सिंह ने कई उपलब्धियां हासिल की तो कई रिकॉर्ड भी बनाए. वे 1970 के दशक के बेजोड़ एथलीट थे. इसमें भी 1973 से 1978 तक का समय उनका स्वर्णिम काल था. दौड़ की दुनिया में इसे शिवनाथ युग भी कह सकते हैं..


शिवनाथ ने उम्र लंबी नहीं पाई, लेकिन ज़िंदगी बड़ी जी. 06 जून 2003 को महज 57 साल की उम्र में हेपिटाइटिस बी के चलते जब उनका निधन हो गया. और अफसोस ये कि निधन के साथ ही इस महान धावक को भुला दिया गया. शिवनाथ सिंह के संघर्ष और सफलता के किस्से रोमांचित भी करते हैं और प्रेरित भी, लेकिन उतनी ही उदास करती है उनकी उपेक्षा, उनकी स्मृतियों की अनदेखी. जिसे थाती समझ संभालकर रखना था उसे हमने बिसरा दिया है.

यह दुख तब और गहरा हो जाता है जब पता चलता है कि शिवनाथ सिंह ने अपने देश अपनी माटी से मोहब्बत के चलते विदेशी नागरिकता का ऑफर ठुकरा दिया था.
निधन के बाद शिवनाथ सिंह की स्मृतियों को जिंदा रखने और सहेजने की कोई कोशिश नहीं हुई.

शिवनाथ सिंह के परिजनों और उन्हें चाहनेवाले की काफी अर्से से ख्वाहिश/मांग है कि बक्सर का किला मैदान, जो स्थानीय खेल मैदान भी है, उसका नाम बिहार के आखिरी ओलंपियन शिवनाथ सिंह के नाम पर कर दिया जाय. ये मांग अनुचित भी नहीं है. बक्सर के जनप्रतिनिधियों, स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार को इस मांग पर विचार करना चाहिए.

हो सकता है कल अपने इस पुरखे खेल नायक की स्मृतियों से प्रेरणा लेकर बक्सर का कोई खिलाड़ी निकले और खेल की दुनिया में छा जाए. आखिर यह प्रतिरोधी चेतना वाले बक्सर की धरती है, जो इतिहास लिखती नहीं इतिहास बनाती है. और देती है इतिहास रचनेवाले नायक- विश्वामित्र से लेकर शिवनाथ सिंह तक.

शिवनाथ सिंह की स्मृति को सलाम
#राम_मुरारी
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नोट- यह आलेख शिवनाथ सिंह के गांव-परिवार के लोगों से बातचीत और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है, जिसे कुछ साल पहले कलेक्ट किया गया था. तब बात बेबात ने शिवनाथ सिंह पर एक शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री (बॉयोग्राफी) भी बनाई थी. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं.
https://youtu.be/sWg3bQt0MWA

1 week ago (edited) | [YT] | 1

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भिखारी ठाकुर: भोजपुरांचल में सांस्कृतिक प्रतिरोध के महानायक

बीसवीं सदी की शुरूआत में जब अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए भारतीय जनमानस राजनैतिक अंगड़ाई ले रहा था, उसी समय भोजपुरांचल में सामाजिक जकड़बंदी और जड़ता के खिलाफ जन-जागृति की नई जमीन भी तैयार हो रही थी. जिसकी अगुवाई कर रहे थे भिखारी ठाकुर.

भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन समय की लोकप्रिय किंतु समाज में तिरष्कृत विधा नाच और नाटक के जरिए पुरूष प्रधान समाज में स्त्री की दयनीय अवस्था और वर्ण व्यवस्था के चलते उत्पन्न सामाजिक रूढियों-कुरीतियों के खिलाफ प्रतिरोध की वो अलख जगाई कि सारण के एक अनजाने से गांव कुतुबपुर दियरा के नाई भिखारी से वे पूरे भोजपुरांचल के सांस्कृतिक और सामाजिक नायक भिखारी ठाकुर बन गए. भोजपुरी के शेक्सपीयर.

भोजपुरिया समाज के इस महानायक के नाटकों ने तब समाज के कर्णधारों और व्यवस्था नियंत्रकों को खीझ, बेचैनी और नपुंसक क्रोध से भरा तो समाज के वंचित और उपेक्षित तबके (समाज की पिछड़ी एवं निम्नवर्गीय जातियां और महिलाएं) के भीतर बेहतरी की उम्मीद जगा दी. समाज के निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान देने और सबसे ज्यादा श्रम करनेवाले इस तबके को पहली बार लगा कि कोई उनकी भी आवाज उठा सकता है. कोई उनके पक्ष में भी खड़ा हो सकता है. सारण के भिखारी ठाकुर आरा, बलिया, छपरा, बक्सर, गाजीपुर, बनारस सहित तमाम भोजपुरांचल के दबे कुचले वर्ग की आवाज बन गए.

अपने जीवन काल में ही महानता का शिखर छू लेनेवाले भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा वस्तुत: भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा है फर्श से अर्श तक पहुंचने की गाथा है. अपने होने को साबित करने का संघर्ष है. और सबसे बढ़कर सामाजिक व्यवस्था के निचले पायदान पर खड़े एक व्यक्ति के मनुष्यता के चरम तक पहुंचने की कथा है.


भिखारी ठाकुर बीसवीं सदी के कबीर थे, जड़ता के खिलाफ बदलाव की आकांक्षा रखनेवाले. वे चाहते तो तुलसी हो सकते थे. अपने नट जीवन के आरंभ में उन्होंने तुलसी बनना भी चाहा, किंतु उनकी संवेदना ने उन्हें अपने समय का कबीर बना दिया. यह भिखारी की संवेदना ही थी, जिसने उन्हें सामाजिक कुरीतियों और अमनावीय व्यवस्थाओं के खिलाफ अस्वीकार का साहस प्रदान किया.

दरअसल यह संवेदना ही वह मूल चीज होती है, जो किसी व्यक्ति को महानता के शिखर पर पहुंचाती है. संवेदना की इसी थाती ने धर्म के ठेकेदारों द्वारा तिरष्कृत एक जुलाहे को संत कबीर या गोरों द्वारा उपेक्षित मोहनदास करमचंद को महात्मा गांधी बना दिया और संवेदना की इस थाती ने ही सामंती व्यवस्था के कर्णधारों द्वारा शोषित और अपमानित नाई भिखारी को आधुनिक भोजपुरी नाटक का सूत्रधार भिखारी ठाकुर बना दिया.


भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी नाच और नाटकों को एक विस्तृत आकाश दिया. उसे समाज से जोड़ा और एक सम्मानित मुकाम पर पहुंचाया. विडंबना यह कि बाद में भोजपुरी क्षेत्र इस सांस्कृतिक महानायक की थाती को संभाल नहीं पाया. ये पूरे भोजपुरांचल के लिए दुखद और अफसोसजनक है.

आज भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है. भोजपुरी के इस सांस्कृतिक पुरखे की स्मृति को नमन

#राम_मुरारी
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नोट- बात-बेबात पर इस आलेख को आधार बनाकर एक वीडियो (शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री) भी उपलब्ध है. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं.
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/6x2qRiDY5_c

1 week ago | [YT] | 2

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जहां कोई कबीर ज़िंदा है
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आज कबीर जयंती है. तो आइए कुछ बातें घृणा और वैमनस्य के विरुद्ध 'प्रेम के ढाई आखर' का संदेश देने वाले कबीर के बारे में.

कबीर मेरे चुनिंदा सर्वाधिक प्रिय शख्सियत और नायकों में हैं. वैसे तो भारतीय संस्कृति और समाज में कई शख्सियतें और चरित्र ऐसे हैं जो हमें बेहतर होने और बेहतर बनने की राह सुझाते हैं, लेकिन कबीर उनमें अलहदा हैं. एक संत के तौर पर भी और सामाजिक क्रांति के अग्रदूत के रूप में भी.

कबीर ने मुझे सबसे पहले प्रभावित किया 1992 में कॉलेज लाइफ के दौरान, जब हिंदी के विद्यार्थी के तौर पर उन्हें और उनकी रचनाओं को पढ़ा. दिलो दिमाग पर कबीर ने तभी से असर दिखाना शुरू कर दिया. कबीर तभी से मेरे फेवरेट हो गए.

लेकिन कबीर के बारे में मैं और समृद्ध हुआ और उन्हें बेहतर ढंग से जाना 2007 में जब कबीर के घर और उनकी कर्मस्थली बनारस के कबीर चौरा मठ में कबीर जयंती का आयोजन हुआ था. उस मौके पर कबीर चौरा मठ पर केंद्रित एक स्मारिका के प्रकाशन के साथ एक डॉक्यूमेंट्री भी रिलीज की गई थी.

सौभाग्य से मैं स्मारिका और डॉक्युमेंट्री दोनों के ही निर्माण और प्रकाशन से जुड़ा था. इस सिलसिले में कई बार कबीर चौरा मठ जाना भी हुआ और कबीर के बारे में बहुत कुछ जानने पढ़ने को भी, जिसने कबीर को लेकर मेरी समझ को और पुख्ता तथा समृद्ध किया.

मेरी समझ से मध्यकाल ही नहीं अगर पूरी भारतीय परंपरा को देखें तो कबीर की जोड़ का कोई संत, कोई नायक नजर नहीं आता. उन्होंने वर्चस्व के हर मोर्चे के खिलाफ लड़ाई छेड़ी; न सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी.

कबीर ने उस दौर में चेतना और जागरूकता की लौ जलाई थी, जब साधु-संत या तो साधना के नाम पर पलायनवादी  बने थे या फिर राज्याश्रय  पाकर चारण.

संतत्व की परजीवी परंपरा के बीच कबीर ने श्रमजीवी संत परंपरा की नींव रखी थी और अन्याय और गलत परंपराओं या रूढ़ियों के विरुद्ध ऐसी पुरजोर आवाज उठाई की वो आजतक प्रासंगिक है.

कबीर की जनवादी चेतना समय की सीमाओं का अतिक्रमण कर तकरीबन 600 साल बाद आज भी गलत को गलत कहने का हौसला सिखाती है.

इस दौर में जब सांप्रदायिक विभाजन और नफरत बढ़ती जा रही है. निरंकुश सत्ता मदहोश है. धर्म धंधा बन गया है. कबीर को जानने, समझने और गुनने की बहुत जरूरत है.

कबीर आज भी न सिर्फ हमें और हमारे भीतर की मनुष्यता को बचाए रख सकते हैं, बल्कि किसी भी तरह के शोषण, अन्याय, धार्मिक-सामाजिक रुढ़िवादिता और निरंकुशता के खिलाफ तन कर खड़े होने का हौसला दे सकते हैं.

#कुमार_नयन का शेर है-

ख़ून से तर शरीर ज़िंदा है
मेरा ज़ख़्मी ज़मीर ज़िंदा है
वहां पाखंड चल नहीं सकता
जहां कोई कबीर जिंदा है।।

-कबीर जयंती की शुभकामनाएं
#राम_मुरारी
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बात-बेबात पर कबीर और उनके घर यानी काशी के कबीर चौरा मठ से जुड़े कई वीडियो मौजूद हैं. उनमें से कुछ के लिंक 👇
https://youtu.be/ueeOQPv4JuU

https://youtu.be/jBL4MdzU8Uk

https://youtu.be/70XBJFXptDo

https://youtu.be/Z2XgxPW76Kg

2 weeks ago | [YT] | 2

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उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
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#bashirbadar #bashirbadrshayari #baatbebat
बशीर बद्र साहब के इंतकाल के बाद सोशल मीडिया पर जिस शिद्दत से उन्हें याद किया गया और श्रद्धांजलि दी गई; उनके शेर कोट किए गए, इसके वे हकदार भी थे, बल्कि कहें तो इससे ज्यादा के हकदार थे.

कम से कम तीन पीढ़ियों को जिस शख्स के शेरों ने इज़हार ए मोहब्बत का शऊर दिया, मोहब्बत और ज़िंदगी के मानी समझाए, जिनके अनगिनत शेर मुहावरों में ढल गए, उन्हें जितना भी याद करें कम है.

लेकिन इसी सोशल मीडिया पर उनके जनाजे में सिर्फ 20 लोगों के शामिल होने की खबर भी चली. हालांकि बाद में पता चल गया कि ये झूठ है, लेकिन इस बहाने शायरों, अदीबों और साहित्यकारों की समाज में हैसियत और सम्मान को लेकर भी खूब चर्चा चली.

यहां यह भी कि बशीर बद्र साहब के स्टैंड और उनकी राजनैतिक वैचारिक-पक्षधरता को लेकर भी सोशल मीडिया दो खेमों में बंटा दिखाई दिया.


इसमें कौन सही और कौन गलत है, मैं इसमें नहीं जाना चाहता और अब जब बशीर बद्र साहब हमारे बीच नहीं हैं तो जाने की जरूरत भी नहीं है. मेरे लिए तो उनकी शायरी मायने रखती है और शायद उनपर उठने वाले सवालों का जवाब भी.

उनकी एक ही ग़ज़ल के दो शेरों में कई सारे सवालों के जवाब हैं भी-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में


फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है उस के आशियाने में

हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के बाहर कई सारे मुशायरों में उन्होंने यह ग़ज़ल पढ़ी और उन्हें खूब दाद भी मिली. ऐसे ही एक मुशायरे का ये ऑडियो है.

सुनिए, गुनिए और समझिए बशीर बद्र साहब को
youtube.com/shorts/gsz2rTR4Xi...

#hashtag
#bashirbadr

#urdushayari

1 month ago (edited) | [YT] | 5

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#स्मृति_शेष
बशीर बद्र साहब नहीं रहे. लेखन की दुनिया से लेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनके अनगिनत शेरों ने राह दिखाई, राह आसान की. कभी मुहावरे की तरह तो कभी समय संदर्भ में सटीक टिप्पणी और नसीहत की तरह उनके शेर याद आ जाते थे/ याद आ जाते हैं.

किसी अपने से 'उजाले अपनी यादों के साथ रहने दो' की गुजारिश करने वाले बशीर साहब लंबे समय से अपनी ही यादाश्त से जूझ रहे थे, लेकिन बशीर साहब आप अपनी शायरी के जरिए हमेशा हमारी यादों में रहेंगे.

बशीर बद्र साहब उम्र के जिस पड़ाव पर थे और जैसी आजकल उनकी सेहत थी उसमें उनके निधन की खबर को शॉकिंग तो नहीं कहेंगे, लेकिन दुखद तो है ही. उर्दू अदब की दुनिया का एक मशहूर और मकबूल नाम का हमारे बीच अब न होना अफसोसनाक है.

बशीर बद्र साहब के निधन की खबर सुनने के बाद से उनके अनगिनत शेर दिल दिमाग पर छाए हुए हैं. फिलहाल उनके ही एक शेर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि

मैं ये मानता हूँ मिरे दिए तिरी आँधियों ने बुझा दिए
मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है

अलविदा बशीर बद्र साहब. इस अंधेरे समय में आपके शेर हमारे लिए जुगनूओं की जमात है, जो हमारी राह भी आसान करेगी और भटकने से भी बचाएगी. आख़िरी सलाम

1 month ago | [YT] | 4

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#मंटो #जयंती #स्मरण
अपने दौर के सबसे लोकप्रिय, सबसे बदनाम लेखक मंटो
: राम मुरारी
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हिंद-पाक के साझा और बेहद लोकप्रिय, लेकिन उतने ही  विवादास्पद अफसानानिगार रहे सआदत हसन मंटो की आज जयंती है. 11 मई, 1912 को अविभाजित हिंदुस्तान में मंटो का जन्म हुआ था.

मंटो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए, लेकिन दिल से उन्होंने कभी भी ये बंटवारा स्वीकार नहीं किया. और न उनके पाठकों और चाहनेवालों ने कभी उन्हें हिंदुस्तान-पाकिस्तान की सीमाओं में बांधा. वे हिंद-पाक के मकबूल लेखक थे, हैं और रहेंगे.

मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह बंटवारे पर आधारित सबसे चर्चित कहानियों में एक है. और इस कहानी के जरिए मंटो ने भी अपने दिल की बात बयां कर दी थी कि वे इस बंटवारे के पक्ष में नहीं थे.

सआदत हसन मंटों अपने दौर के सबसे चर्चित लेकिन सबसे बदनाम कहानीकार थे. बदनाम इसलिए कि सभ्य समाज की काली सचाइयों को अपनी कहानियों के जरिए नंगा करते रहे. समाज के ठेकेदारों को उनकी ये हरकत चुभती थी, उनकी भाषा चुभती थी. लिहाजा उनपर अश्लीलता फैलाने के आरोप भी लगे.

मंटो की की कई कहानियों पर अश्लीलता फैलाने के आरोप में मुकदमें भी दर्ज हुए. ठंडा गोश्त, खोल दो, काली सलवार जैसी उनकी कई कहानियों पर मुकदमे दर्ज हुए. लेकिन मंटों कभी विचलित नहीं हुए. वे लेखक कम वैसे डॉक्टर ज्यादा थे, जो समाज की गंदी मानसिकता का अपनी कहानी के जरिए आपरेशन करते थे.

मंटो समाज के निचले और उपेक्षित तबके के लोगों के लेखक थे. उनके लेखक थे जिनके हिस्से में सिविल सोसायटी ने बेबसी और बदनामी लिख रखी थी. मंटो ने अपनी कहानियों के जरिए इस सिविल सोसायटी के चेहरे पर पड़े शराफ़त और सभ्य होने के नकाब को नोच कर फेंक दिया था. उन्होंने उन सवालों को उठाया जिनसे सभ्य समाज हमेशा नजरें चुराता रहा है और सियासत भी.

सआदत हसन मंटो जैसे लेखक की आज के समय में और भी जरूरत है, क्योंकि हम और हमारा समाज, हमारी सियासत समय के साथ बेहतर होने की बजाय और स्वार्थी, और सांप्रदायिक, और दकियानूस, और बंद दिमाग हुई है.

मंटो मेरे प्रिय कथाकार रहे हैं. उनकी लगभग तमाम कहानियां मुझे पसंद हैं, लेकिन टोबा टेक सिंह मेरी सर्वाधिक प्रिय कहानियों में शुमार है. विभाजन की त्रासदी पर मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह के अलावा मोहन राकेश की कहानी मलबे का मालिक भी है, जो मुझे बहुत पसंद है.

जयंती पर प्रिय लेखक मंटो की स्मृति को जोरदार सलाम
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नोट: 2018 में नंदिता दास ने जब मंटो पर फिल्म बनाई थी तो उस फिल्म के बहाने बात-बेबात (तब फिल्मी फिल्मी) के लिए मंटो पर हमने भी एक वीडियो बनाया था. वीडियो में आवाज बड़े भाई दीपक राय जी की है.
आप चाहें तो उस वीडियो को देख सकते हैं 👇
https://youtu.be/QVCcac5AN_8

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2 months ago | [YT] | 3

BAAT-BEBAT बात-बेबात

अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस पर पर भारतीय पत्रकारिता के रसातल का सफर मुबारक हो दोस्तों
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प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 की जारी सूची में 180 देशों के बीच हम 157वें स्थान पर हैं यानी आखिरी पायदान से महज 23 सीढ़ी ऊपर. यहां तक कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी मीडिया की हालत हमसे बेहतर है और वह 153वें नंबर पर है. भारतीय पत्रकारिता की साख को इस तरह गर्त में ढकेलने के लिए सत्ता, सियासत और सोसायटी की जो जिम्मेदारी बनती है वह तो अपनी जगह है ही, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे मीडिया संस्थान और पत्रकार हैं जो सत्ता की गोद में बैठने के हुनर को अपनी काबिलियत समझ बैठे हैं और जनता के सरोकारों से दूर होकर दलाली को पत्रकारिता, जिसका खामियाजा उन पत्रकारों को भुगतना पड़ता है जो सच में पत्रकारिता करते हैं/ करना चाहते हैं. जनसरोकारों से जुड़े ऐसे सच्चे पत्रकारों को इसकी महंगी कीमत चुकानी पड़ती है, कभी कभी जान देकर भी.
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नोट: भारतीय खासकर हिंदी पत्रकारिता की दशा दिशा पर कुछ साल पहले Baat-Bebat / बात-बेबात के लिए एक वीडियो बनाया था. चाहें तो उसे देख सकते हैं 👇
https://youtu.be/-bbQCRVuM-E

#WorldPressFreedomDay
#hashtag

2 months ago | [YT] | 3

BAAT-BEBAT बात-बेबात

#स्मरण #बलराज_साहनी
सिनेमाई दुनिया में वाम वैचारिकी के प्रमुख हस्ताक्षर थे बलराज साहनी
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भारतीय सिनेमा के सर्वकालिक महानतम अभिनेताओं में शुमार बलराज साहनी की आज जयंती है. भारतीय सिनेमा में जब भी सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध कलाकारों को याद किया जायेगा, बलराज साहनी का नाम प्रमुखता से लिया जायेगा. वाम विचारधारा में यकीन रखनेवाले बलराज साहनी ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने सिनेमा की नितांत व्यावसायिक दुनिया में रहते हुए भी अपने सरोकारों से मुंह नहीं मोड़ा.

करीब 25 साल के अपने सिनेमाई करियर में बलराज साहनी ने कई तरह की भूमिकाओं को परदे पर जीवंत किया, किंतु उनकी पहचान मुख्यतः सिनेमा में आम आदमी की ही रही. वो परदे पर आम आदमी को ही जीते रहे. दरअसल पढ़े-लिखे और मध्यवर्गीय व्यापारी घराने से संबंध रखने वाले विलायत रिटर्न बलराज साहनी परदे पर उस हिंदुस्तानी अवाम के प्रतिनिधि बन गए थे जो अनपढ़, गरीब, मजलूम और शोषित थी.

01 मई 1913 को अविभाज्य भारत के रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में जन्में बलराज साहनी ऐसे अभिनेता थे, जो रंगमंच और सिनेमा दोनों से गहरा लगाव रखते थे. अपने अभिनय करियर की शुरूआत उन्होंने कम्युनिष्ट विचारधारा वाले नाट्य संगठन इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोशिएशन यानी इप्टा के साथ की. बाद में भी जब उन्होंने फिल्मों का रूख किया तो रंगमंच को छोड़कर नहीं. वो इप्टा से हमेशा जुड़े रहे. उनके लिए दोनों ही अभिव्यक्ति की दो विधाएं थी. न कोई बड़ी, न कोई छोटी. बलराज साहनी के लिए विधा नहीं कार्य (अभिनय) महत्वपूर्ण था- वो कार्य जो समाज की बेहतरी के लिए था.

बात अगर बलराज साहनी के अभिनय की की जाय तो वो किरदार में उतर जाने वाले कलाकार थे. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती थी कि वो जिस किरदार को निभा रहे हैं वो जीवंत बन जाए. इसके लिए वो अपने तईं पूरी मेहनत भी करते थे.

बलराज साहनी के फिल्मों में अभिनय की शुरूआत 1946 में आई इंसाफ में छोटी सी भूमिका निभाने के साथ हुई थी. 1946 में ही ख्वाजा अहमद अब्बास की धरती के लाल में पहली बार बड़ी भूमिका निभाने को मिली, लेकिन इनके करियर में मील का पत्थर बनी 1952 में आई बिमल रॉय की दो बीघा जमीन. छोटी बहन, काबुलीवाला, भाभी की चुड़ियां, पवित्र पापी, वक्त, गुड़िया, हमलोग, गरम कोट सहित करीब 80 फिल्मों में बलराज साहनी ने अभिनय किया था.

विभाजन की त्रासदी पर आधाारित 1973 में आई राजेंद्र सिंह बेदी की गर्म हवा में इनका अभिनय शबाब पर था. दुर्भाग्य यह कि बलराज साहनी अपनी इस फिल्म को रिलीज होते नहीं देख पाये. डबिंग खत्म होने के अगले ही दिन 13 अप्रैल 1973 को इनका निधन हो गया. इत्तफेाक यह कि गर्म हवा की डबिंग में इनका आखिरी डॉयलाग था, ‘इंसान कब तक अकेला जी सकता है’.

अभिनय के अलावा बलराज साहनी ने 1957 में आई लाल बत्ती का निर्देशन भी किया था. जबकि गुरुदत्त की बाजी सहित कुछ फिल्मों की पटकथाएं भी लिखी थीं.

जन सरोकारी चेतना से लैस वाम वैचारिकी के प्रतिबद्ध कलाकार और बेहतरीन इंसान बलराज साहनी की जयंती पर उनकी स्मृति को सलाम
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नोट: Baat-Bebat / बात-बेबात के YouTube channel का पहला वीडियो 2018 में (तब #filmivilmi) लीजेंड अभिनेता बलराज साहनी पर ही था. खास ये भी कि वह साल यानी 2018 इप्टा की हीरक जयंती का भी वर्ष था. बलराज साहनी इप्टा से बहुत गहरे तक जुड़े हुए थे. यह स्क्रिप्ट उसी वीडियो का हिस्सा है.
वीडियो लिंक 👇
lnkd.in/gEk_dRzi
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2 months ago | [YT] | 0