♥️ प्रेम के अप्रतिम नायक दशरथ मांझी की आज पुण्यतिथि है. दशरथ मांझी की कहानी सिर्फ प्यार में ज़िद, जुनून और समर्पण की ही कथा नहीं है, बल्कि प्रेम के एक से विस्तारित होकर सबके लिए पसर जाने जाने की महागाथा है.
दशरथ मांझी मेरे प्रिय नायकों में रहे हैं. मोहब्बत के इस मसीहा के निधन के पश्चात 2008 में उन्हें याद करते हुए 'मैत्री-शांति' के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक आलेख लिखा था. उसी आलेख का एक हिस्सा यहां उनकी पुण्यतिथि पर संलग्न कर रहा हूं.
बाद में बात-बेबात के लिए इस आलेख अंश का वीडियो रुपांतरण भी किया जिसमें आवाज़ कौशिक की है. आप चाहें तो वीडियो भी देख सकते हैं.
📍 आलेख अंश पढ़ें 👇
ताज के देश में मांझी की मोहब्बत के मायने ***** ताजमहल! मोहब्बत का बेहद खूबसूरत, बेहद भव्य प्रतीक. इसका संगमरमरी जिस्म हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के आशिकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
लेकिन एक हकीकत यह भी है कि ताज की तामीर सबके वश की बात नहीं. यह किसी बादशाह या धनकुबेर की ही ख्वाहिशों में पल सकता है, अपना वजूद पा सकता है.
शायद इसीलिए दशकों पहले साहिर लुधियानवी ने ताजमहल पर तंज कसते हुए लिखा- 'एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक'.
लेकिन तब न साहिर और न ही दुनिया को पता था कि आनेवाले वक्त में इसी हिंदुस्तान की सरजमीं पर एक गरीब की मोहब्बत की ऐसी निशानी देखने को मिलेगी, जो ताजमहल जैसी भव्य तो नहीं होगी, लेकिन मोहब्बत के असल मायने और मकाम जो होने चाहिए, वह जरूर बताएगी.
यह गरीब कोई और नहीं, प्रेम को असीमित विस्तार और अतल गहराई देनेवाले दशरथ मांझी हैं, जिन्होंने पहाड़ों का सीना चीरकर इश्क की नई राह भी बनाई और इश्क को नई राह भी दिखाई, जो ताजमहल ही नहीं, मोहब्बत की तमाम कहानियों और निशानियों से अलहदा है.
दरअसल ताज के इस देश में दशरथ माझी द्वारा निर्मित पहाड़ी रास्ता प्रेम के नये अर्थ खोलता है. गौरतलब है कि दोनों ही प्रेम के प्रतीक हैं. दोनों के निर्माण में तकरीबन बराबर का समय लगा है, किन्तु दोनों की अभिव्यक्तियां भिन्न है. एक शहंशाह के वैभव की गाथा को बयान करता है तो एक आम आदमी के श्रम की संस्कृति में प्रेम की परिभाषा लिखता है.
ताजमहल प्रेम का बेहद खूबसूरत और भव्य प्रतीक है, किन्तु इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह दौलत और राज सत्ता के बल पर ही खड़ा हुआ था. शायद यह एक शंहशाह की शेखी का प्रतीक भी है. संभवतः इसकी तामीर में शाहजहां ने अपने हाथों एक ईंट भी इसमें न लगायी हो.
फिर ताजमहल के निर्माण का सरोकार एक बादशाह से था. शाहजहां ने इसका निर्माण इसीलिए कराया था ताकि इससे उसके दिल को सुकून पहुंचे और इस बहाने वह मुमताज की स्मृतियों को जिन्दा रख सके.
इसके उलट दशरथ मांझी ने पहाड़ में रास्ता इसलिए तलाशा ताकि लोगों की परेशानी कम हो सके. यह एक बादशाह और गरीब की मुहब्बत का भी फर्क है.
एक बादशाह प्रेम में पड़कर अपने लिए ताजमहल बनवाता है, जबकि एक गरीब का प्रेम सबके लिए एक नये रास्ते की खोज करता है.
संभव है कि जब आप ताज के संगमरमरी जिस्म पर हाथ फिराये तो आपको उसमें शाहजहां के हाथों की हरारत न महसूस हो, किन्तु जब भी आप दशरथ मांझी के बनाये पहाड़ी रास्ते पर चलेंगे, तो यकीनन आप उनकी खुरदरी हथेलियों की तपिश महसूस करेंगे ही.
पुण्यतिथि पर मोहब्बत के मसीहा मांझी की स्मृति को सलाम.. ▶️ वीडियो देखने के लिए Link पर Click करें 👇 https://youtu.be/I9XHrbU4lNI
सिनेमा का जयहिंद बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि इसका देशभक्ति से पुराना और गहरा नाता रहा है. देशप्रेम जगाने के नाम पार्टी विशेष की तरफदारी करती फिल्मों के अलावा रीयल राष्ट्र नायकों पर भी कई फिल्में बनीं.
गुलामी के दौर में बैन की आशंका के चलते इशारों में देशप्रेम की बात करती फिल्में आजादी के बाद खुलकर देशभक्ति का जज़्बा और जोश दिखाने लगीं.
आजादी की सालगिरह पर जानिए बॉलीवुड में देशभक्ति फिल्मों का इतिहास.
आज भोजपुरी गायकी के शिखर पुरुष भरत शर्मा 'व्यास' जी का जन्मदिन है. उनके गीतों को सुनते हुए हमने किशोरवय से युवावस्था की तरफ कदम रखा था. उस दौर की हमारी स्मृतियां भरत शर्मा जी के अनगिनत गीतों के बगैर पूरी नहीं होंगी. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
कुछ साल पहले बात-बेबात के लिए भरत शर्मा जी के साथ भोजपुरी के एक और दिग्गज गायक गोपाल राय तथा साहित्य, समाज और इतिहास के अध्येता डॉ. दीपक राय ने बातचीत की थी. यह तस्वीर उसी बातचीत के वीडियो का स्क्रीन शॉट हैं.
इस बातचीत की एक खासियत यह थी कि गोपाल राय जी इसमें सूत्रधार की भूमिका में थे तो दीपक राय जी ने भोजपुरी संगीत को सामाजिक और सामयिक सरोकारों से जोड़ने वाले प्रश्र उठाए.
तकरीबन एक घंटे की इस बातचीत में भरत शर्मा जी के गायकी सफ़र, उनके संघर्ष से लेकर भोजपुरी संगीत की वर्तमान दशा दिशा समेत कई मुद्दों पर बेबाक और बिंदास बातचीत हुई. इस बातचीत को रिकॉर्ड और एडिट विकास राय ने किया था.
भोजपुरी संगीत को चाहने वालों को यह बातचीत अच्छी लगेगी. अगर आपने यह बातचीत नहीं सुनी तो बात-बेबात के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. भोजपुरी संगीत के नवांकुरों को भी यह बातचीत सुननी चाहिए. बहुत कुछ जानने समझने को मिलेगा. भरत शर्मा जी को एक बार फिर जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. ▶️ वीडियो देखें 👇 https://youtu.be/s3Xvlo0cQGo
1934 में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और संस्कृति के घालमेल को उजागर करते हुए सांप्रदायिकता और संस्कृति के नाम से ही एक आलेख लिखा था.
सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को उजागर करनेवाला यह आलेख तब तो काफी चर्चित हुआ ही था आज भी यह कम सामयिक और प्रासंगिक नहीं है, बल्कि कहें तो आज सांप्रदायिक कट्टरता और बढ़ी है साथ ही इसके खतरे भी बढ़े हैं. ऐसे में यह आलेख और मौजूं हो जाता है.
इस आलेख और इसकी प्रासंगिकता के बारे में बता रहे हैं समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं, बल्कि समाज, मनुष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना भी है. उनके विचार, उनका लिखा चाहे वह कहानी, उपन्यास हो या आलेख आज भी प्रासंगिक है.
यह बातचीत प्रेमचंद के साहित्य, उनके समय, उनकी वैचारिकी और आज के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित है.
हालांकि YouTube Live की यह बातचीत कुछ साल पहले हुई थी, लेकिन इस चर्चा के अधिकांश प्रश्न आज भी उतने ही जीवंत और विचारोत्तेजक हैं.
यदि आप हिंदी साहित्य, प्रेमचंद और समकालीन विमर्श में रुचि रखते हैं, तो उम्मीद है कि यह बातचीत, यह संवाद आपके लिए उपयोगी होगा.
Script Writing Terms Hindi Part 2 पटकथा लेखन की शब्दावलियां यानी स्क्रिप्ट राइटिंग टर्म्स के पहले पार्ट में शीर्षक या टाइटल, सब टाइटल, राइटर नेम, ब्रैकेट और स्लग लाइन या सीन हेडिंग, जिसमें- लोकेशन, उसका विवरण और टाइम के बारे में जानकारी दी गई थी. Script Writing की इस श्रृंखला के दूसरे भाग में भी पटकथा लेखन की कुछ और महत्वपूर्ण शब्दावलियों को सरल हिंदी में समझाया गया है.
दरअसल पहले भाग में वो टर्म्स शामिल थे, जिनसे किसी स्क्रिप्ट की नींव पड़ती है, जबकि दूसरे यानी इस पार्ट में उन टर्म्स के बारे में बताया गया है, जिसके सहारे कोई स्क्रिप्ट लिखी जाती है. वीडियो लिंक 👇 https://youtu.be/mH6YrwmHSbY
📚 इस वीडियो में शामिल Terms:
• Scene Description • Character Name • Dialog • Parenthetical • Narration • Voice Over (VO) • Cut-To अगर आपने पहला पार्ट नहीं देखा है तो उसे भी जरूर देखें. Script Writing Terms के बारे में बतानेवाली यह सीरीज पटकथा लेखन के प्रशिक्षुओं और विद्यार्थियों, मीडिया स्टूडेंट्स, फिल्म, टीवी, वेब सीरीज़ और शॉर्ट फिल्म में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है. पहले पार्ट का लिंक 👇 https://youtu.be/7DocIbOQXo0
🎓 Series: Terms of Script Writing 📖 Part: 2 🎬 Media Classes | Episode __
अगर वीडियो पसंद आए तो Like करें, Share करें और चैनल Subscribe करें।
🎬 Media Classes की नई सीरीज़ की शुरुआत! Terms of Script Writing | Part 1 अब YouTube पर उपलब्ध है। अगर आप Script Writing, फिल्म, वेब सीरीज़, टीवी या मीडिया की पढ़ाई में रुचि रखते हैं, तो इस वीडियो में पटकथा लेखन की महत्वपूर्ण शब्दावलियों को आसान हिंदी में समझाया गया है। इस भाग में: ✔ Title ✔ Subtitle ✔ Script Writer Name ✔ Scene Number ✔ Slug Line / Scene Heading ✔ EXT / INT ✔ Time ✔ Bracket 📺 वीडियो देखें: 🔗 https://youtu.be/7DocIbOQXo0
शिवनाथ सिंह: द लास्ट ओलंपियन ऑफ बिहार (संजो कर रखना था जिसे, हमने उसे भुला दिया)
तीन पग में त्रिलोक नापने वाले भगवान वामन की अवतरण भूमि बक्सर की धरती से तकरीबन पांच दशक पहले निकले एक युवक ने भी अपने तेज कदमों से दुनिया की पैमाइश कर डाली. अपने मजबूत कदमों और दृढ़ इरादों से इस नौजवान ने दौड़ की दुनिया में एक नायाब मुकाम हासिल किया. ऐसा मुकाम जिस तक पहुंचना आज भी हिंदुस्तान के हर धावक का सपना है.
यह युवक कोई और नहीं बक्सर के लाल और बिहार के गौरव शिवनाथ सिंह थे. ओलंपियन शिवनाथ सिंह, रिकॉर्ड होल्डर शिवनाथ सिंह. अर्जुन अवार्डी लीजेंड धावक शिवनाथ सिंह, जिनका मैराथन का राष्ट्रीय रिकॉर्ड चार दशक बाद भी अभी हाल तक बरकरार था.
बक्सर के एक गांव मझरिया के एक मझोले किसान परिवार में 11 जुलाई 1946 को पैदा हुए शिवनाथ सिंह की कहानी जिद, जुनून और जीत की कहानी है... अभावों के बीच पाले गए सपने को साकार करने का अफसाना है. गांव की गलियों से निकलकर देश-दुनिया के मानचित्र पर छा जाने की महागाथा है. अपनी राह खुद बनाने और उस राह से चलकर मंजिल तक पहुंचने वाले अनथक योद्धा की अनथक यात्रा है.
शिवनाथ सिंह ने दौड़ के दम पर 1963 में महज 17 साल की उम्र में भारतीय सेना की नौकरी हासिल की और यहीं से शुरू हुआ उनकी सफलता का सफर और शिखर छूने की यात्रा. 1974 में तेहरान में हुए एशियाड में शिवनाथ सिंह ने नए एशियन रिकॉर्ड के साथ पांच हजार मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक और 10 हजार मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया.
अगले ही साल यानी 1976 में वह मौका आया, जिसे पाना हर खिलाड़ी का सपना होता है. ओलंपिक में जाने का, ओलंपियन कहाने का. शिवनाथ सिंह के हिस्से में गौरव का यह क्षण दो बार आया. 1976 के मांट्रियल और 1980 के मास्को ओलंपिक में. 1976 में मांट्रियल में आयोजित ओलंपिक के मैराथन दौड़ की प्रतिस्पर्धा में उन्होंने दुनिया भर के धावकों के बीच 11वां स्थान हासिल किया था. इस दौड़ में शामिल एशियाई धावकों में वे पहले नंबर पर थे.
शिवनाथ सिंह के ओलंपियन बनने की उपलब्धि इसलिए भी खास है कि उनके बाद अभी तक बिहार का कोई खिलाड़ी ओलंपिक में नहीं पहुंच पाया है.
1978... यह वो साल था, जिसने शिवनाथ सिंह के हिस्से में एक ऐसा रिकॉर्ड दे दिया, जिसके पार कोई नहीं जा पाया. उनके जाने के बाद भी, आज तक.
1978 में जालंधर में हुई अखिल भारतीय मैराथन दौड़ में शिवनाथ सिंह ने रिकॉर्ड 2 घंटे 12 मिनट में दौड़ पूरी करके पहला स्थान हासिल किया था. इस साल के पहले तक कोई भारतीय धावक इस रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया था. शिवनाथ सिंह का यह रिकॉर्ड हालांकि अब टूट गया है, लेकिन लंबे समय तक यह रिकॉर्ड कायम रहा, दौड़ की दुनिया में मील का पत्थर बने हुए.
शिवनाथ सिंह लंबी दूरी के चैंपियन धावक थे... उनका कैरियर भी लंबा ही रहा. 1970 से 1982 के बीच तकरीबन 12 साल के अपने कैरियर में शिवनाथ सिंह ने कई उपलब्धियां हासिल की तो कई रिकॉर्ड भी बनाए. वे 1970 के दशक के बेजोड़ एथलीट थे. इसमें भी 1973 से 1978 तक का समय उनका स्वर्णिम काल था. दौड़ की दुनिया में इसे शिवनाथ युग भी कह सकते हैं..
शिवनाथ ने उम्र लंबी नहीं पाई, लेकिन ज़िंदगी बड़ी जी. 06 जून 2003 को महज 57 साल की उम्र में हेपिटाइटिस बी के चलते जब उनका निधन हो गया. और अफसोस ये कि निधन के साथ ही इस महान धावक को भुला दिया गया. शिवनाथ सिंह के संघर्ष और सफलता के किस्से रोमांचित भी करते हैं और प्रेरित भी, लेकिन उतनी ही उदास करती है उनकी उपेक्षा, उनकी स्मृतियों की अनदेखी. जिसे थाती समझ संभालकर रखना था उसे हमने बिसरा दिया है.
यह दुख तब और गहरा हो जाता है जब पता चलता है कि शिवनाथ सिंह ने अपने देश अपनी माटी से मोहब्बत के चलते विदेशी नागरिकता का ऑफर ठुकरा दिया था. निधन के बाद शिवनाथ सिंह की स्मृतियों को जिंदा रखने और सहेजने की कोई कोशिश नहीं हुई.
शिवनाथ सिंह के परिजनों और उन्हें चाहनेवाले की काफी अर्से से ख्वाहिश/मांग है कि बक्सर का किला मैदान, जो स्थानीय खेल मैदान भी है, उसका नाम बिहार के आखिरी ओलंपियन शिवनाथ सिंह के नाम पर कर दिया जाय. ये मांग अनुचित भी नहीं है. बक्सर के जनप्रतिनिधियों, स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार को इस मांग पर विचार करना चाहिए.
हो सकता है कल अपने इस पुरखे खेल नायक की स्मृतियों से प्रेरणा लेकर बक्सर का कोई खिलाड़ी निकले और खेल की दुनिया में छा जाए. आखिर यह प्रतिरोधी चेतना वाले बक्सर की धरती है, जो इतिहास लिखती नहीं इतिहास बनाती है. और देती है इतिहास रचनेवाले नायक- विश्वामित्र से लेकर शिवनाथ सिंह तक.
शिवनाथ सिंह की स्मृति को सलाम #राम_मुरारी ******* नोट- यह आलेख शिवनाथ सिंह के गांव-परिवार के लोगों से बातचीत और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है, जिसे कुछ साल पहले कलेक्ट किया गया था. तब बात बेबात ने शिवनाथ सिंह पर एक शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री (बॉयोग्राफी) भी बनाई थी. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं. https://youtu.be/sWg3bQt0MWA
भिखारी ठाकुर: भोजपुरांचल में सांस्कृतिक प्रतिरोध के महानायक
बीसवीं सदी की शुरूआत में जब अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए भारतीय जनमानस राजनैतिक अंगड़ाई ले रहा था, उसी समय भोजपुरांचल में सामाजिक जकड़बंदी और जड़ता के खिलाफ जन-जागृति की नई जमीन भी तैयार हो रही थी. जिसकी अगुवाई कर रहे थे भिखारी ठाकुर.
भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन समय की लोकप्रिय किंतु समाज में तिरष्कृत विधा नाच और नाटक के जरिए पुरूष प्रधान समाज में स्त्री की दयनीय अवस्था और वर्ण व्यवस्था के चलते उत्पन्न सामाजिक रूढियों-कुरीतियों के खिलाफ प्रतिरोध की वो अलख जगाई कि सारण के एक अनजाने से गांव कुतुबपुर दियरा के नाई भिखारी से वे पूरे भोजपुरांचल के सांस्कृतिक और सामाजिक नायक भिखारी ठाकुर बन गए. भोजपुरी के शेक्सपीयर.
भोजपुरिया समाज के इस महानायक के नाटकों ने तब समाज के कर्णधारों और व्यवस्था नियंत्रकों को खीझ, बेचैनी और नपुंसक क्रोध से भरा तो समाज के वंचित और उपेक्षित तबके (समाज की पिछड़ी एवं निम्नवर्गीय जातियां और महिलाएं) के भीतर बेहतरी की उम्मीद जगा दी. समाज के निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान देने और सबसे ज्यादा श्रम करनेवाले इस तबके को पहली बार लगा कि कोई उनकी भी आवाज उठा सकता है. कोई उनके पक्ष में भी खड़ा हो सकता है. सारण के भिखारी ठाकुर आरा, बलिया, छपरा, बक्सर, गाजीपुर, बनारस सहित तमाम भोजपुरांचल के दबे कुचले वर्ग की आवाज बन गए.
अपने जीवन काल में ही महानता का शिखर छू लेनेवाले भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा वस्तुत: भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा है फर्श से अर्श तक पहुंचने की गाथा है. अपने होने को साबित करने का संघर्ष है. और सबसे बढ़कर सामाजिक व्यवस्था के निचले पायदान पर खड़े एक व्यक्ति के मनुष्यता के चरम तक पहुंचने की कथा है.
भिखारी ठाकुर बीसवीं सदी के कबीर थे, जड़ता के खिलाफ बदलाव की आकांक्षा रखनेवाले. वे चाहते तो तुलसी हो सकते थे. अपने नट जीवन के आरंभ में उन्होंने तुलसी बनना भी चाहा, किंतु उनकी संवेदना ने उन्हें अपने समय का कबीर बना दिया. यह भिखारी की संवेदना ही थी, जिसने उन्हें सामाजिक कुरीतियों और अमनावीय व्यवस्थाओं के खिलाफ अस्वीकार का साहस प्रदान किया.
दरअसल यह संवेदना ही वह मूल चीज होती है, जो किसी व्यक्ति को महानता के शिखर पर पहुंचाती है. संवेदना की इसी थाती ने धर्म के ठेकेदारों द्वारा तिरष्कृत एक जुलाहे को संत कबीर या गोरों द्वारा उपेक्षित मोहनदास करमचंद को महात्मा गांधी बना दिया और संवेदना की इस थाती ने ही सामंती व्यवस्था के कर्णधारों द्वारा शोषित और अपमानित नाई भिखारी को आधुनिक भोजपुरी नाटक का सूत्रधार भिखारी ठाकुर बना दिया.
भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी नाच और नाटकों को एक विस्तृत आकाश दिया. उसे समाज से जोड़ा और एक सम्मानित मुकाम पर पहुंचाया. विडंबना यह कि बाद में भोजपुरी क्षेत्र इस सांस्कृतिक महानायक की थाती को संभाल नहीं पाया. ये पूरे भोजपुरांचल के लिए दुखद और अफसोसजनक है.
आज भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है. भोजपुरी के इस सांस्कृतिक पुरखे की स्मृति को नमन
#राम_मुरारी ******* नोट- बात-बेबात पर इस आलेख को आधार बनाकर एक वीडियो (शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री) भी उपलब्ध है. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं. वीडियो लिंक 👇 https://youtu.be/6x2qRiDY5_c
BAAT-BEBAT बात-बेबात
♥️ प्रेम के अप्रतिम नायक दशरथ मांझी की आज पुण्यतिथि है. दशरथ मांझी की कहानी सिर्फ प्यार में ज़िद, जुनून और समर्पण की ही कथा नहीं है, बल्कि प्रेम के एक से विस्तारित होकर सबके लिए पसर जाने जाने की महागाथा है.
दशरथ मांझी मेरे प्रिय नायकों में रहे हैं. मोहब्बत के इस मसीहा के निधन के पश्चात 2008 में उन्हें याद करते हुए 'मैत्री-शांति' के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक आलेख लिखा था. उसी आलेख का एक हिस्सा यहां उनकी पुण्यतिथि पर संलग्न कर रहा हूं.
बाद में बात-बेबात के लिए इस आलेख अंश का वीडियो रुपांतरण भी किया जिसमें आवाज़ कौशिक की है.
आप चाहें तो वीडियो भी देख सकते हैं.
📍 आलेख अंश पढ़ें 👇
ताज के देश में मांझी की मोहब्बत के मायने
*****
ताजमहल! मोहब्बत का बेहद खूबसूरत, बेहद भव्य प्रतीक. इसका संगमरमरी जिस्म हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के आशिकों को अपनी ओर आकर्षित करता है.
लेकिन एक हकीकत यह भी है कि ताज की तामीर सबके वश की बात नहीं. यह किसी बादशाह या धनकुबेर की ही ख्वाहिशों में पल सकता है, अपना वजूद पा सकता है.
शायद इसीलिए दशकों पहले साहिर लुधियानवी ने ताजमहल पर तंज कसते हुए लिखा- 'एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक'.
लेकिन तब न साहिर और न ही दुनिया को पता था कि आनेवाले वक्त में इसी हिंदुस्तान की सरजमीं पर एक गरीब की मोहब्बत की ऐसी निशानी देखने को मिलेगी, जो ताजमहल जैसी भव्य तो नहीं होगी, लेकिन मोहब्बत के असल मायने और मकाम जो होने चाहिए, वह जरूर बताएगी.
यह गरीब कोई और नहीं, प्रेम को असीमित विस्तार और अतल गहराई देनेवाले दशरथ मांझी हैं, जिन्होंने पहाड़ों का सीना चीरकर इश्क की नई राह भी बनाई और इश्क को नई राह भी दिखाई, जो ताजमहल ही नहीं, मोहब्बत की तमाम कहानियों और निशानियों से अलहदा है.
दरअसल ताज के इस देश में दशरथ माझी द्वारा निर्मित पहाड़ी रास्ता प्रेम के नये अर्थ खोलता है. गौरतलब है कि दोनों ही प्रेम के प्रतीक हैं. दोनों के निर्माण में तकरीबन बराबर का समय लगा है, किन्तु दोनों की अभिव्यक्तियां भिन्न है. एक शहंशाह के वैभव की गाथा को बयान करता है तो एक आम आदमी के श्रम की संस्कृति में प्रेम की परिभाषा लिखता है.
ताजमहल प्रेम का बेहद खूबसूरत और भव्य प्रतीक है, किन्तु इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह दौलत और राज सत्ता के बल पर ही खड़ा हुआ था. शायद यह एक शंहशाह की शेखी का प्रतीक भी है. संभवतः इसकी तामीर में शाहजहां ने अपने हाथों एक ईंट भी इसमें न लगायी हो.
फिर ताजमहल के निर्माण का सरोकार एक बादशाह से था. शाहजहां ने इसका निर्माण इसीलिए कराया था ताकि इससे उसके दिल को सुकून पहुंचे और इस बहाने वह मुमताज की स्मृतियों को जिन्दा रख सके.
इसके उलट दशरथ मांझी ने पहाड़ में रास्ता इसलिए तलाशा ताकि लोगों की परेशानी कम हो सके. यह एक बादशाह और गरीब की मुहब्बत का भी फर्क है.
एक बादशाह प्रेम में पड़कर अपने लिए ताजमहल बनवाता है, जबकि एक गरीब का प्रेम सबके लिए एक नये रास्ते की खोज करता है.
संभव है कि जब आप ताज के संगमरमरी जिस्म पर हाथ फिराये तो आपको उसमें शाहजहां के हाथों की हरारत न महसूस हो, किन्तु जब भी आप दशरथ मांझी के बनाये पहाड़ी रास्ते पर चलेंगे, तो यकीनन आप उनकी खुरदरी हथेलियों की तपिश महसूस करेंगे ही.
पुण्यतिथि पर मोहब्बत के मसीहा मांझी की स्मृति को सलाम..
▶️ वीडियो देखने के लिए Link पर Click करें 👇
https://youtu.be/I9XHrbU4lNI
4 days ago | [YT] | 6
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
सिनेमा का जयहिंद
बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि इसका देशभक्ति से पुराना और गहरा नाता रहा है. देशप्रेम जगाने के नाम पार्टी विशेष की तरफदारी करती फिल्मों के अलावा रीयल राष्ट्र नायकों पर भी कई फिल्में बनीं.
गुलामी के दौर में बैन की आशंका के चलते इशारों में देशप्रेम की बात करती फिल्में आजादी के बाद खुलकर देशभक्ति का जज़्बा और जोश दिखाने लगीं.
आजादी की सालगिरह पर जानिए बॉलीवुड में देशभक्ति फिल्मों का इतिहास.
▶️ वीडियो लिंक👇
https://youtu.be/bMr6VKuIlwA
#indipendenceday #15august #PatrioticMovies #bollywoodpatrioticmovies
6 days ago | [YT] | 0
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शुभकामनाओं के साथ पढ़ते हैं बृज नारायण चकबस्त की नज़्म- 'हमारा वतन दिल से प्यारा वतन'
ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन
मोहब्बत की आँखों का तारा वतन
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ
वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
हवा में दरख़्तों का वो झूमना
वो पत्तों का फूलों का मुँह चूमना
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो सावन में काली घटा की बहार
वो बरसात की हल्की हल्की फुवार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
वो बाग़ों में कोयल वो जंगल के मोर
वो गंगा की लहरें वो जमुना का ज़ोर
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
इसी से है इस ज़िंदगी की बहार
वतन की मोहब्बत हो या माँ का प्यार
हमारा वतन दिल से प्यारा वतन
****
ज़श्ने आज़ादी मुबारक
#15august #indipendenceday
6 days ago | [YT] | 1
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
आज भोजपुरी गायकी के शिखर पुरुष भरत शर्मा 'व्यास' जी का जन्मदिन है. उनके गीतों को सुनते हुए हमने किशोरवय से युवावस्था की तरफ कदम रखा था. उस दौर की हमारी स्मृतियां भरत शर्मा जी के अनगिनत गीतों के बगैर पूरी नहीं होंगी. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
कुछ साल पहले बात-बेबात के लिए भरत शर्मा जी के साथ भोजपुरी के एक और दिग्गज गायक गोपाल राय तथा साहित्य, समाज और इतिहास के अध्येता डॉ. दीपक राय ने बातचीत की थी. यह तस्वीर उसी बातचीत के वीडियो का स्क्रीन शॉट हैं.
इस बातचीत की एक खासियत यह थी कि गोपाल राय जी इसमें सूत्रधार की भूमिका में थे तो दीपक राय जी ने भोजपुरी संगीत को सामाजिक और सामयिक सरोकारों से जोड़ने वाले प्रश्र उठाए.
तकरीबन एक घंटे की इस बातचीत में भरत शर्मा जी के गायकी सफ़र, उनके संघर्ष से लेकर भोजपुरी संगीत की वर्तमान दशा दिशा समेत कई मुद्दों पर बेबाक और बिंदास बातचीत हुई. इस बातचीत को रिकॉर्ड और एडिट विकास राय ने किया था.
भोजपुरी संगीत को चाहने वालों को यह बातचीत अच्छी लगेगी. अगर आपने यह बातचीत नहीं सुनी तो बात-बेबात के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. भोजपुरी संगीत के नवांकुरों को भी यह बातचीत सुननी चाहिए. बहुत कुछ जानने समझने को मिलेगा.
भरत शर्मा जी को एक बार फिर जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
▶️ वीडियो देखें 👇
https://youtu.be/s3Xvlo0cQGo
2 weeks ago | [YT] | 4
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
सांप्रदायिकता और संस्कृति: प्रेमचंद का कालजई आलेख
1934 में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता और संस्कृति के घालमेल को उजागर करते हुए सांप्रदायिकता और संस्कृति के नाम से ही एक आलेख लिखा था.
सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को उजागर करनेवाला यह आलेख तब तो काफी चर्चित हुआ ही था आज भी यह कम सामयिक और प्रासंगिक नहीं है, बल्कि कहें तो आज सांप्रदायिक कट्टरता और बढ़ी है साथ ही इसके खतरे भी बढ़े हैं. ऐसे में यह आलेख और मौजूं हो जाता है.
इस आलेख और इसकी प्रासंगिकता के बारे में बता रहे हैं समाज विज्ञानी डॉ. दीपक कुमार राय
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/-m5uRvvjCGs
#premchand #hashtags
3 weeks ago | [YT] | 2
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
प्रेमचंद जयंती पर विशेष परिचर्चा।
प्रेमचंद को पढ़ना केवल साहित्य पढ़ना नहीं, बल्कि समाज, मनुष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना भी है. उनके विचार, उनका लिखा चाहे वह कहानी, उपन्यास हो या आलेख आज भी प्रासंगिक है.
यह बातचीत प्रेमचंद के साहित्य, उनके समय, उनकी वैचारिकी और आज के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित है.
हालांकि YouTube Live की यह बातचीत कुछ साल पहले हुई थी, लेकिन इस चर्चा के अधिकांश प्रश्न आज भी उतने ही जीवंत और विचारोत्तेजक हैं.
यदि आप हिंदी साहित्य, प्रेमचंद और समकालीन विमर्श में रुचि रखते हैं, तो उम्मीद है कि यह बातचीत,
यह संवाद आपके लिए उपयोगी होगा.
पुरखे साहित्यकार प्रेमचंद की स्मृति को नमन
वीडियो लिंक 👇
youtube.com/live/6RvqWQPDcEg?feature=share
#Premchand #PremchandJayanti
#HindiLiterature #MunshiPremchand #DeepakKumarRai #HindiSahitya #Literature #Hindi
3 weeks ago | [YT] | 3
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
Script Writing Terms Hindi Part 2
पटकथा लेखन की शब्दावलियां यानी स्क्रिप्ट राइटिंग टर्म्स के पहले पार्ट में शीर्षक या टाइटल, सब टाइटल, राइटर नेम, ब्रैकेट और स्लग लाइन या सीन हेडिंग, जिसमें- लोकेशन, उसका विवरण और टाइम के बारे में जानकारी दी गई थी.
Script Writing की इस श्रृंखला के दूसरे भाग में भी पटकथा लेखन की कुछ और महत्वपूर्ण शब्दावलियों को सरल हिंदी में समझाया गया है.
दरअसल पहले भाग में वो टर्म्स शामिल थे, जिनसे किसी स्क्रिप्ट की नींव पड़ती है, जबकि दूसरे यानी इस पार्ट में उन टर्म्स के बारे में बताया गया है, जिसके सहारे कोई स्क्रिप्ट लिखी जाती है.
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/mH6YrwmHSbY
📚 इस वीडियो में शामिल Terms:
• Scene Description
• Character Name
• Dialog
• Parenthetical
• Narration
• Voice Over (VO)
• Cut-To
अगर आपने पहला पार्ट नहीं देखा है तो उसे भी जरूर देखें. Script Writing Terms के बारे में बतानेवाली यह सीरीज पटकथा लेखन के प्रशिक्षुओं और विद्यार्थियों, मीडिया स्टूडेंट्स, फिल्म, टीवी, वेब सीरीज़ और शॉर्ट फिल्म में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है. पहले पार्ट का लिंक 👇
https://youtu.be/7DocIbOQXo0
🎓 Series: Terms of Script Writing
📖 Part: 2
🎬 Media Classes | Episode __
अगर वीडियो पसंद आए तो Like करें, Share करें और चैनल Subscribe करें।
#ScriptWriting #Screenplay #MediaClasses #PatkathaLekhan #Hindi
1 month ago (edited) | [YT] | 4
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
🎬 Media Classes की नई सीरीज़ की शुरुआत!
Terms of Script Writing | Part 1 अब YouTube पर उपलब्ध है।
अगर आप Script Writing, फिल्म, वेब सीरीज़, टीवी या मीडिया की पढ़ाई में रुचि रखते हैं, तो इस वीडियो में पटकथा लेखन की महत्वपूर्ण शब्दावलियों को आसान हिंदी में समझाया गया है।
इस भाग में: ✔ Title ✔ Subtitle ✔ Script Writer Name ✔ Scene Number ✔ Slug Line / Scene Heading ✔ EXT / INT ✔ Time ✔ Bracket
📺 वीडियो देखें: 🔗
https://youtu.be/7DocIbOQXo0
आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का स्वागत है। 🙏
#ScriptWriting #MediaClasses #Screenplay #पटकथालेखन #Hindi
1 month ago | [YT] | 5
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
शिवनाथ सिंह: द लास्ट ओलंपियन ऑफ बिहार
(संजो कर रखना था जिसे, हमने उसे भुला दिया)
तीन पग में त्रिलोक नापने वाले भगवान वामन की अवतरण भूमि बक्सर की धरती से तकरीबन पांच दशक पहले निकले एक युवक ने भी अपने तेज कदमों से दुनिया की पैमाइश कर डाली. अपने मजबूत कदमों और दृढ़ इरादों से इस नौजवान ने दौड़ की दुनिया में एक नायाब मुकाम हासिल किया. ऐसा मुकाम जिस तक पहुंचना आज भी हिंदुस्तान के हर धावक का सपना है.
यह युवक कोई और नहीं बक्सर के लाल और बिहार के गौरव शिवनाथ सिंह थे. ओलंपियन शिवनाथ सिंह, रिकॉर्ड होल्डर शिवनाथ सिंह. अर्जुन अवार्डी लीजेंड धावक शिवनाथ सिंह, जिनका मैराथन का राष्ट्रीय रिकॉर्ड चार दशक बाद भी अभी हाल तक बरकरार था.
बक्सर के एक गांव मझरिया के एक मझोले किसान परिवार में 11 जुलाई 1946 को पैदा हुए शिवनाथ सिंह की कहानी जिद, जुनून और जीत की कहानी है... अभावों के बीच पाले गए सपने को साकार करने का अफसाना है. गांव की गलियों से निकलकर देश-दुनिया के मानचित्र पर छा जाने की महागाथा है. अपनी राह खुद बनाने और उस राह से चलकर मंजिल तक पहुंचने वाले अनथक योद्धा की अनथक यात्रा है.
शिवनाथ सिंह ने दौड़ के दम पर 1963 में महज 17 साल की उम्र में भारतीय सेना की नौकरी हासिल की और यहीं से शुरू हुआ उनकी सफलता का सफर और शिखर छूने की यात्रा. 1974 में तेहरान में हुए एशियाड में शिवनाथ सिंह ने नए एशियन रिकॉर्ड के साथ पांच हजार मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक और 10 हजार मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया.
अगले ही साल यानी 1976 में वह मौका आया, जिसे पाना हर खिलाड़ी का सपना होता है. ओलंपिक में जाने का, ओलंपियन कहाने का. शिवनाथ सिंह के हिस्से में गौरव का यह क्षण दो बार आया. 1976 के मांट्रियल और 1980 के मास्को ओलंपिक में. 1976 में मांट्रियल में आयोजित ओलंपिक के मैराथन दौड़ की प्रतिस्पर्धा में उन्होंने दुनिया भर के धावकों के बीच 11वां स्थान हासिल किया था. इस दौड़ में शामिल एशियाई धावकों में वे पहले नंबर पर थे.
शिवनाथ सिंह के ओलंपियन बनने की उपलब्धि इसलिए भी खास है कि उनके बाद अभी तक बिहार का कोई खिलाड़ी ओलंपिक में नहीं पहुंच पाया है.
1978... यह वो साल था, जिसने शिवनाथ सिंह के हिस्से में एक ऐसा रिकॉर्ड दे दिया, जिसके पार कोई नहीं जा पाया. उनके जाने के बाद भी, आज तक.
1978 में जालंधर में हुई अखिल भारतीय मैराथन दौड़ में शिवनाथ सिंह ने रिकॉर्ड 2 घंटे 12 मिनट में दौड़ पूरी करके पहला स्थान हासिल किया था. इस साल के पहले तक कोई भारतीय धावक इस रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया था. शिवनाथ सिंह का यह रिकॉर्ड हालांकि अब टूट गया है, लेकिन लंबे समय तक यह रिकॉर्ड कायम रहा, दौड़ की दुनिया में मील का पत्थर बने हुए.
शिवनाथ सिंह लंबी दूरी के चैंपियन धावक थे... उनका कैरियर भी लंबा ही रहा. 1970 से 1982 के बीच तकरीबन 12 साल के अपने कैरियर में शिवनाथ सिंह ने कई उपलब्धियां हासिल की तो कई रिकॉर्ड भी बनाए. वे 1970 के दशक के बेजोड़ एथलीट थे. इसमें भी 1973 से 1978 तक का समय उनका स्वर्णिम काल था. दौड़ की दुनिया में इसे शिवनाथ युग भी कह सकते हैं..
शिवनाथ ने उम्र लंबी नहीं पाई, लेकिन ज़िंदगी बड़ी जी. 06 जून 2003 को महज 57 साल की उम्र में हेपिटाइटिस बी के चलते जब उनका निधन हो गया. और अफसोस ये कि निधन के साथ ही इस महान धावक को भुला दिया गया. शिवनाथ सिंह के संघर्ष और सफलता के किस्से रोमांचित भी करते हैं और प्रेरित भी, लेकिन उतनी ही उदास करती है उनकी उपेक्षा, उनकी स्मृतियों की अनदेखी. जिसे थाती समझ संभालकर रखना था उसे हमने बिसरा दिया है.
यह दुख तब और गहरा हो जाता है जब पता चलता है कि शिवनाथ सिंह ने अपने देश अपनी माटी से मोहब्बत के चलते विदेशी नागरिकता का ऑफर ठुकरा दिया था.
निधन के बाद शिवनाथ सिंह की स्मृतियों को जिंदा रखने और सहेजने की कोई कोशिश नहीं हुई.
शिवनाथ सिंह के परिजनों और उन्हें चाहनेवाले की काफी अर्से से ख्वाहिश/मांग है कि बक्सर का किला मैदान, जो स्थानीय खेल मैदान भी है, उसका नाम बिहार के आखिरी ओलंपियन शिवनाथ सिंह के नाम पर कर दिया जाय. ये मांग अनुचित भी नहीं है. बक्सर के जनप्रतिनिधियों, स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार को इस मांग पर विचार करना चाहिए.
हो सकता है कल अपने इस पुरखे खेल नायक की स्मृतियों से प्रेरणा लेकर बक्सर का कोई खिलाड़ी निकले और खेल की दुनिया में छा जाए. आखिर यह प्रतिरोधी चेतना वाले बक्सर की धरती है, जो इतिहास लिखती नहीं इतिहास बनाती है. और देती है इतिहास रचनेवाले नायक- विश्वामित्र से लेकर शिवनाथ सिंह तक.
शिवनाथ सिंह की स्मृति को सलाम
#राम_मुरारी
*******
नोट- यह आलेख शिवनाथ सिंह के गांव-परिवार के लोगों से बातचीत और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है, जिसे कुछ साल पहले कलेक्ट किया गया था. तब बात बेबात ने शिवनाथ सिंह पर एक शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री (बॉयोग्राफी) भी बनाई थी. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं.
https://youtu.be/sWg3bQt0MWA
1 month ago (edited) | [YT] | 2
View 0 replies
BAAT-BEBAT बात-बेबात
भिखारी ठाकुर: भोजपुरांचल में सांस्कृतिक प्रतिरोध के महानायक
बीसवीं सदी की शुरूआत में जब अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए भारतीय जनमानस राजनैतिक अंगड़ाई ले रहा था, उसी समय भोजपुरांचल में सामाजिक जकड़बंदी और जड़ता के खिलाफ जन-जागृति की नई जमीन भी तैयार हो रही थी. जिसकी अगुवाई कर रहे थे भिखारी ठाकुर.
भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन समय की लोकप्रिय किंतु समाज में तिरष्कृत विधा नाच और नाटक के जरिए पुरूष प्रधान समाज में स्त्री की दयनीय अवस्था और वर्ण व्यवस्था के चलते उत्पन्न सामाजिक रूढियों-कुरीतियों के खिलाफ प्रतिरोध की वो अलख जगाई कि सारण के एक अनजाने से गांव कुतुबपुर दियरा के नाई भिखारी से वे पूरे भोजपुरांचल के सांस्कृतिक और सामाजिक नायक भिखारी ठाकुर बन गए. भोजपुरी के शेक्सपीयर.
भोजपुरिया समाज के इस महानायक के नाटकों ने तब समाज के कर्णधारों और व्यवस्था नियंत्रकों को खीझ, बेचैनी और नपुंसक क्रोध से भरा तो समाज के वंचित और उपेक्षित तबके (समाज की पिछड़ी एवं निम्नवर्गीय जातियां और महिलाएं) के भीतर बेहतरी की उम्मीद जगा दी. समाज के निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान देने और सबसे ज्यादा श्रम करनेवाले इस तबके को पहली बार लगा कि कोई उनकी भी आवाज उठा सकता है. कोई उनके पक्ष में भी खड़ा हो सकता है. सारण के भिखारी ठाकुर आरा, बलिया, छपरा, बक्सर, गाजीपुर, बनारस सहित तमाम भोजपुरांचल के दबे कुचले वर्ग की आवाज बन गए.
अपने जीवन काल में ही महानता का शिखर छू लेनेवाले भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा वस्तुत: भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा है फर्श से अर्श तक पहुंचने की गाथा है. अपने होने को साबित करने का संघर्ष है. और सबसे बढ़कर सामाजिक व्यवस्था के निचले पायदान पर खड़े एक व्यक्ति के मनुष्यता के चरम तक पहुंचने की कथा है.
भिखारी ठाकुर बीसवीं सदी के कबीर थे, जड़ता के खिलाफ बदलाव की आकांक्षा रखनेवाले. वे चाहते तो तुलसी हो सकते थे. अपने नट जीवन के आरंभ में उन्होंने तुलसी बनना भी चाहा, किंतु उनकी संवेदना ने उन्हें अपने समय का कबीर बना दिया. यह भिखारी की संवेदना ही थी, जिसने उन्हें सामाजिक कुरीतियों और अमनावीय व्यवस्थाओं के खिलाफ अस्वीकार का साहस प्रदान किया.
दरअसल यह संवेदना ही वह मूल चीज होती है, जो किसी व्यक्ति को महानता के शिखर पर पहुंचाती है. संवेदना की इसी थाती ने धर्म के ठेकेदारों द्वारा तिरष्कृत एक जुलाहे को संत कबीर या गोरों द्वारा उपेक्षित मोहनदास करमचंद को महात्मा गांधी बना दिया और संवेदना की इस थाती ने ही सामंती व्यवस्था के कर्णधारों द्वारा शोषित और अपमानित नाई भिखारी को आधुनिक भोजपुरी नाटक का सूत्रधार भिखारी ठाकुर बना दिया.
भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी नाच और नाटकों को एक विस्तृत आकाश दिया. उसे समाज से जोड़ा और एक सम्मानित मुकाम पर पहुंचाया. विडंबना यह कि बाद में भोजपुरी क्षेत्र इस सांस्कृतिक महानायक की थाती को संभाल नहीं पाया. ये पूरे भोजपुरांचल के लिए दुखद और अफसोसजनक है.
आज भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है. भोजपुरी के इस सांस्कृतिक पुरखे की स्मृति को नमन
#राम_मुरारी
*******
नोट- बात-बेबात पर इस आलेख को आधार बनाकर एक वीडियो (शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री) भी उपलब्ध है. चाहें तो उसे भी देख सकते हैं.
वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/6x2qRiDY5_c
1 month ago | [YT] | 3
View 0 replies
Load more