🔆 संत भगतराज रूहानी मिशन 🔆
संत भगत राज जी द्वारा सतगुरु कबीर साहिब एवं अन्य पूर्ण पुरुषों (गुरु नानक, दादू दयाल, रविदास, पलटूदास, मलूकदास, तुलसी साहिब) की वाणी पर आधारित आध्यात्मिक सत्संग होते हैं। हमारा मिशन जीवों को सुरत शब्द योग, जो सभी योगों में सर्वोच्च है, की शिक्षा देकर आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग दिखाना है।
हमारे उद्देश्य:
- आत्मा और परमात्मा के बीच सीधा संबंध स्थापित करना।
- ध्यान, भक्ति और साधना से जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाना।
- संतमत की शुद्ध शिक्षाओं का प्रचार और आत्मज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करना।
सुरत शब्द योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का शुद्ध और सहज मार्ग है, जो आंतरिक नाद और ज्योति के अनुभव से मोक्ष की ओर ले जाता है।
📌 हमारे सत्संग, ध्यान, प्रवचन, भजन और आत्मज्ञान की शिक्षाओं से लाभ उठाएं।
📌 सत्य, प्रेम और भक्ति से अपने जीवन को प्रकाशित करें।
📌 हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें और आध्यात्मिक जागृति की ओर कदम बढ़ाएं।
Official Website:
santbhagatraj.org
Contact Details - 8168826682
संत भगतराज रूहानी मिशन
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5 months ago | [YT] | 1
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संत भगतराज रूहानी मिशन
संत भगत राज रुहानी मिशन प्रेम, सत्संग और आत्मिक अभ्यास का संदेश
संत- इस संसार में प्रेम और करुणा का अमर संदेश लेकर अवतरित होते हैं। परमात्मा के रंग में रंगे और असीम आनंद में लीन, वे जीवन की सच्चाई और हकीकत का राज खोलने के लिए यहाँ आते हैं। जो जीव उनके पवित्र संग में आते हैं, वे उस अद्वितीय आनंद का स्पर्श अनुभव करते हैं, जो आत्मा को परम सुख और शांति से भर देता है।
संत भगत राज रुहानी मिशन इसी पवित्र उद्देश्य का प्रतीक है, जो प्रेम, सत्संग और आत्मिक अभ्यास के माध्यम से मानवता को परम सत्य की ओर ले जाता है।
परम आनंद का रहस्य
साधारण मनुष्य बाँसुरी की मधुर धुन सुनकर उसकी मस्ती में झूम सकता है, पर वह बाँसुरी वादक नहीं बन सकता। ठीक उसी प्रकार, पुस्तकों में दर्ज संतों के उपदेशों को पढ़,सुनकर मन प्रफुल्लित तो हो सकता है, किंतु सच्चे आनंद का रस तो केवल आत्मिक अभ्यास और कमाई से ही प्राप्त होता है।
रूहानियत: अभ्यास और अनुभव का मार्ग
रूहानियत कोई सैद्धांतिक विषय नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव और कमाई का मार्ग है। बिना अभ्यास के ज्ञान अधूरा है। चाहे कोई कितना ही विद्वान क्यों न हो, यदि उसने आत्मिक अभ्यास नहीं किया, तो उसकी आत्मा की गुप्त शक्तियाँ कभी जाग्रत नहीं हो सकतीं। संत भगत राज रुहानी मिशन इस सत्य को रेखांकित करता है कि आत्मिक चेतना को जाग्रत करने का एकमात्र मार्ग अभ्यास और साधना है। यह मिशन हर साधक को आत्म-जागृति के लिए प्रेरित करता है, ताकि वे स्वयं उस परम आनंद का अनुभव करें।
सत्संग: सत्य की खोज का आधार
संतों ने जहाँ आत्मिक अभ्यास पर बल दिया है, वहीं सिद्धांतों को समझने के लिए सत्संग को अनिवार्य बताया है। सत्संग वह पवित्र मंच है, जहाँ सत्य के खोजी आत्मिक सिद्धांतों को समझते हैं और अभ्यास की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। संत भगत राज रुहानी मिशन सत्संग को भजन और साधना की बाड़ मानता है, जो साधक को भटकने से बचाती है और सत्य के मार्ग पर अग्रसर करती है। मिशन के सत्संगों में हर साधक को नियमित रूप से शामिल होने की प्रेरणा दी जाती है, ताकि वे आत्मिक ज्ञान और अभ्यास के सामंजस्य से परम सत्य तक पहुँच सकें।
संत भगत राज रुहानी मिशन का संदेश
संत भगत राज रुहानी मिशन प्रेम, सत्संग और आत्मिक अभ्यास के माध्यम से हर जीव को परमात्मा के साथ एकाकार होने का मार्ग दिखाता है। यह मिशन सिखाता है कि सच्चा सुख और आनंद बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में छिपा है। सत्संग में प्राप्त ज्ञान और अभ्यास की कमाई से ही यह आनंद अनुभव किया जा सकता है। मिशन हर साधक को प्रेरित करता है कि वे नियमित सत्संग में भाग लें, आत्मिक अभ्यास करें और प्रेम व करुणा के साथ जीवन जिएँ।
🌹 आह्वान 🌹
आइए, संत भगत राज रुहानी मिशन के पवित्र मार्ग पर चलें, सत्संग की शरण लें और आत्मिक अभ्यास के द्वारा उस परम आनंद को प्राप्त करें, जो संतों का सच्चा संदेश है। यह मिशन हमें सिखाता है कि रूहानियत केवल पढ़ने या सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीने और अनुभव करने की कला है।
सत्संग में अनेक प्रकार के धार्मिक विचारों के हर पहलू की प्रेमपूर्वक
छानबीन या व्याख्या की जाती है, जिसके फलस्वरूप जिज्ञासु ग्रन्थों-पोथियों
में इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया जाता है कि इल्म या सिद्धान्त के ज्ञान की
अपेक्षा उस सिद्धान्त का निजी अनुभव कहीं अधिक उत्तम और गुणकारी है,क्योंकि रूहानियत इल्मे-सीना (परा विद्या) है। यह बिना किसी गुरु से सीखे और बिनाअमल किये प्राप्त नहीं होती।इसमें कोई सन्देह नहीं कि ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारी मिल जाती है, पर उस जानकारी से तब तक पूर्ण लाभ नहीं होता जब तक अभ्यास द्वारा हमेंअपने अन्तर में उसका निजी अनुभव नहीं हो जाता। स्वामी जी कहते हैं:
यह करनी का भेद है, नाहीं बुद्धि विचार।
बुद्धि छोड़ करनी करो, तो पावो कुछ सार ॥
सार बचन छन्द-बन्द, 24:1:148
सच्ची रूहानियत
रूहानियत इल्मे-सीना और आन्तरिक अनुभव का रास्ता है। बीन, सितार,बाँसुरी आदि के बारे में पुस्तकें मौजूद हैं,पर इनको सीखने के लिए ऐसे
उस्ताद की ज़रूरत है जो खुद इन्हें बजाने में निपुण हो केवल पुस्तकों के पढ़ने से कोई भी इन साज़ों को बजाने में निपुण नहीं हो सकता। इसी प्रकार
आध्यात्मिक विद्या भी बिना किसी जीवित गुरु से सीखे और बिना कमाई किये प्राप्त नहीं हो सकती। धर्म-पुस्तकों या अन्य आध्यात्मिक पुस्तकों को पढ़ने से हमें कुछ न कुछ बौद्धिक जानकारी तो ज़रूर हो जायेगी, पर हम रूहानियत के निजी अनुभव के लाभ से वंचित रह जायेंगे।जिस व्यक्ति ने स्वयं अग्नि को नहीं देखा, उसको अग्नि के विषय में
पढ़ने से यह बौद्धिक ज्ञान तो हो जायेगा कि अग्नि में प्रकाश और गर्मी है,पर वह प्रकाश कैसा है,अग्नि से अन्धकार में प्रकाश कैसे होता है, उसकी
गर्मी से सर्दी कैसे दूर होती है, इन बातों से वह बिल्कुल अनजान रह जायेगा।
8 months ago | [YT] | 0
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संत भगतराज रूहानी मिशन
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1 year ago | [YT] | 3
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संत भगतराज रूहानी मिशन
Aap kaunse topic par agla video dekhna pasand karenge?
1 year ago | [YT] | 3
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संत भगतराज रूहानी मिशन
Aapko SantBhagatraj Ruhani Mission k videos kaise lag rahe hain
1 year ago | [YT] | 4
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संत भगतराज रूहानी मिशन
🌹🌹 *संत- संदेश* 🌹🌹
*प्रश्न:-परमात्मा को पाने के लिए व्यक्ति को क्या घर परिवार का त्याग करना जरूरी है*
*उत्तर:- जी नहीं*
*कबीर साहिब ओर पूर्ण संतो ( संतमत ) की शिक्षा में कठोर संयम और घर परिवार छोडने, यानि संन्यास की शिक्षा नहीं है*
*कबीर साहिब और पूर्ण संतों का मार्ग विरह और प्रेम से होकर जाता है*
*घर परिवार का त्याग कठोर संयम यह स्थूल शरीर का विषय है*
*यह स्थूल शरीर आत्मा का घर है आत्मा इसकी निवासी है आत्मा शरीर नहीं है*
*आइए देखते हैं कठोर संयम और सन्यास के विषय मैं कबीर साहिब की वाणी क्या कहती है*।
( 1 ) *घर को तज बन में गए*
*बन तज बस्ती माही*
( 2 ) *बांबी कूटे बावरे, साँप ना मारा जाये*।
*मूर्ख बांबी ना डसै, साँप सभी को खाए*
( 3 ) *संन्यास के विषय मे*
*जोगी जंगम सेवड़ा सन्यासी दरवेश*।
*बिना प्रेम पहुंचे नहीं दुर्लभ सतगुरु देश*।
*कबीर साहिब व संतमत का मार्ग सीधा सतलोक पहुंचता है जिस मार्ग पर मनुष्य की आत्मा को सफर करना होता है*
*आइए अब देखते हैं कबीर साहिब बिरह और प्रेम के विषय में क्या फरमाते हैं*
(1 ) *विरह* :- *बिरहन दे संदेसरा सुनो हमारे पीव*।
*जल बिन मछली क्यों जीये पानी में का जीव*।
*अखियां तो झाँई परी, पंथ निहार निहार*।
*जिभ्या तो छाला पड़ा, नाम पुकार पुकार*
( 2) *प्रेम*:- *प्रेम के विषय में कबीर साहेब फरमाते हैं*
*यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाही*।
*सीस उतारे भुई धरे तब बैठे घर माही*।
*शीश उतारे भूई धरे,ता पर राखे पाँऊ*।
*साहब कबीर जी यूँ कहे ऐसा होय तो आव*
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
सतगुरु कबीर रूहानी मिशन
सुरत - शब्द योग अभ्यासी
संत भगत राज साहिब
मो० नंबर 816 88 26 682
2 years ago | [YT] | 4
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संत भगतराज रूहानी मिशन
🌹🌹 *सतनाम* 🌹🌹
*अंध सो दर्पन वेद पुराना*।
*दरबी कहा महारस जाना*।
*जस खर चंदन लादेउ भारा*।
*परिमल बास न जान गवाँरा*।।
*कहहिं कबीर खोजै असमाना*।
*सो न मिला जो जाय अभिमाना*।।
*वाणी:- कबीर साहिब* *बीजक पृष्ठ-14*
कबीर साहिब या किसी भी पूर्ण संत ने अपनी वाणी में धर्म ग्रंथों के पठन-पाठन से इनकार नहीं किया है।
इसलिए मेरा सभी जिज्ञासुओं से अनुरोध है कि आप केवल धर्म ग्रंथों के पठन पाठन तक ही सीमित मत रहो बल्कि जो उसमें लिखा है उस पर अमल करो,और यह तभी हो सकता है जब हम चार बातों पर विशेष ध्यान देगें।
संसार में दो किस्म की विद्या मौजूद है एक है अपरा विद्या, दूसरी परा विद्या।
*अपरा विद्या संसार की विद्या है*
जिसमें चार वेद छह शास्त्र 18 पुराण 9 व्याकरण वगैरा-वगैरा है
*परा विद्या रूहानियत की विद्या है* मनुष्य शरीर के अंतर मे मौजूद गुप्त आत्मा ओर परमात्मा कि विद्या।
दोनों मे से किसी भी विद्या को जानने के लिए जब तक हम चार बातों का ध्यान नहीं रखेगा तब तक हम किसी भी विद्या में सफल नहीं हो सकते।
वह चार बाते निम्नलिखित हैं।
*न० 1:- श्रवण ज्ञान*
*न० 2 :- मनन ज्ञान*
*न० 3 :- निदिध्यासन या अभ्यास*
*न० 4 :-अनुभव कहो या परिणाम*
*न० 1 श्रवण ज्ञान* :- श्रवण ज्ञान वह ज्ञान कहलाता है जो ज्ञान सुनकर या पढ़ कर होता है।
*न० 2 :- मनन ज्ञान* :- जो हमने पढ़ा या सुना है, जब उस पर हम विचार करते हैं की यह बात सही है या गलत मेरे हित की है, या अहित की, तो वह मनन ज्ञान कहलाता है।
*न० 3 निदिध्यासन ज्ञान* :- जब हम विचार करके उस पर चलने लगते हैं अभ्यास करने लगते हैं तो वह निदिदध्यासन ज्ञान कहलाता है।
*न० 4 अनुभव ज्ञान* :- अभ्यास करते करते जब हम अपने लक्ष्य पर पहुंच जाते हैं तो उसे अनुभव ज्ञान कहते हैं।
केवल धर्मग्रंथो के पठन-पाठन से कोई भी मनुष्य आत्मिक अनुभव (आत्मा को जानना) प्राप्त नहीं कर सकता जो मनुष्य बिना आत्मिक अनुभव के ज्ञानी होने का दंभ भरते हैं उनके लिए धर्मग्रंथों का ज्ञान ऐसे हैं।
जैसे, *अंधें आदमी के लिये दर्पण का कोई महत्व नहीं क्योंकि वह अपना चेहरा नहीं देख सकता*।
*भोजन के पात्र में मौजूद कड़छी भोजन का कोई स्वाद नहीं ले सकती*।
*अगर गधे के ऊपर चंदन (जो बहुत ही कीमती होता है उसमें से हर वक्त खुशबू निकलती रहती है) रख दिया जाए तो वह उसकी खुशबू का कोई आनंद नहीं लेता* बल्कि उल्टा उसके लिए भार ही होता है।
*कबीर साहिब फरमाते हैं*
*धर्म ग्रंथों का पठन-पाठन करने वाले जिज्ञासुओं अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारा धर्म ग्रंथों का पठन-पाठन सार्थक हो जाए, तो तुम्हें किसी पूर्ण संत सतगुरु की कृपा का पात्र बनकर अपने अंतर में स्थित, गगन मंडल में मौजूद उस सर्वोपरि सत्ता ( परमात्मा ) को खोज ले जिसके मिलने के बाद तेरा अभिमान हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जायेगा और तुम काल जाल से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त हो जावोगें*।
*संत भगत राज साहेब*
2 years ago | [YT] | 4
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संत भगतराज रूहानी मिशन
🌹🌹 सतसंग 🌹🌹
विषय :- पूर्ण संत किसे कहते है।
सतसंग का शेष भाग न०,2
पिछले सतसंग मे बताया गया था।
वैसे ही संत या साधु पद किसी भी मनुष्य के अंतर की आध्यात्मिक उपलब्धियों के सूचक है।
🌹🌹 इसके आगे 🌹🌹
संतों के अनुसार उनकी शिक्षा के दर्जे बदर्जे पांच पद है।
( 1 ) :- सत्संगी
( 2 ) :- शिष्य
( 3 ) :- ज्ञानी
( 4 ) :- साध
( 5 ) :- संत
( 1 ) :- *सतसंगी * संतमत में सत्संगी वह व्यक्ति है जो कि अभी-अभी गुरु से दीक्षित होकर संतमत के नियमों का भली-भांति पालन करते हुए गुरु की शिक्षा के अनुसार अपने अंतर मे परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का रात दिन प्रयास कर रहा है।
( 2 ) :- * शिष्य * मुरीद कहो या उसे चेला कहो वह व्यक्ति जो आध्यात्मिक मार्ग की पहली मंजिल पर पहुंच कर ज्योति के दर्शन करता है।
जिस समय गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की, तो एक जीज्ञासु ने उनसे पूछा, कि हजूर महाराज जी, खालसा किसको कहते हैं।
गुरु साहेब ने जवाब दिया,जो मनुष्य अपने अंतर मे जाकर ज्योति के दर्शन करता है वह खालसा है।
पूर्ण ज्योत जगे घट में, तब खालस ताहि नखालस जानै।
( 3 ) :- * ज्ञानी * उस व्यक्ति को कहा जाता है,जिसने अपने अंतर में ब्रह्म तक की गति को प्राप्त कर लिया है।
ब्रह्म पद :- इस पद के अंदर से पांच तत्व और तीन गुणों की उत्पत्ति हुई है।
दुनिया के योगी ओर ज्ञानीयों की यह अंतिम मंजिल है, ज्यादातर योगी और ज्ञानी इस ब्रह्म पद को ही सबसे ऊंचा मानते हैं।
कबीर साहिब ने भी अपनी रूहानी शिक्षा मे पहले तो आत्मा को ब्रह्म के इस पद को प्राप्त करने का निर्देश दिया।
ओंकार कहता सब कोई ,
जिन यह लखा सो बिरले होई।।
( कबीर बीजक, राग चौतिसा)
और जब आत्मा ने अपने रूहानी सफर मे यह पद प्राप्त कर लिया फिर इसको छोड़कर आगे बढ़ने का उपदेश दिया है।
ओंकार ईश्वरी माया कर्ता कर जिन पूजा।
कहे कबीर सुनो भाई संतो,उपजे खपे सो दूजा।।
ब्रह्म जगत का बीज है,
जो नहीं ताको त्याग।
( कबीर साहब )
यह सारा संसार ( पांच तत्व, 3 गुण से बना है ) प्रलय के बाद बीज रूप में ब्रह्म पद में जाकर समा जाता है।
( 4 ) :- * साध * जो आत्मा अपने रूहानी सफर के चौथे मुकाम * पारब्रह्म * के मंडल पर पहुंचती है , तो उसे कबीर साहब ने * साध *कहा है।
साध सोई जिन यह गढ लीन्हा,
नो दरवाजे प्रगट चिन्हा।
दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा,
जहाँ कुलफ रहा मारा है।।
आत्मा के रूहानी सफर मे जब कोई भी रूह इस मंडल में पहुंचती है ,तो उसके ऊपर से पांच,तत्व ,तीन गुण, स्थूल, सूक्ष्म और कारण के पर्दे उतर चुके होते हैं,ओर आत्मा को देहधारी गुरु के दर्शन , *सतगुरु * के रूप में होते हैं ।
सतगुरु, साहिब, संत सभी, दंडवते, प्रणाम ।
आगे,पीछे ,मध्य हुए,
तिनकूं जां कुर्बान।।
( कबीर साहेब )
साहिब से सतगुरु भये,
सतगुरु से भये साध।
यह तीनों अंग एक है,
गति कुछ अगम अगाध।।
वाणी :- गरीब दास जी महाराज
जो इंसान संतो ( गुरु ) की शरणागत होकर ( गुरु के कहै अनुसार भजन सिमरन करके )अपने शरीर में मौजूद नो दरवाजों ( दो आँख के सुराख, दो कान ,दो नाक,एक मुह, दो नीचे इन्द्रियों के सुराख ) से ऊपर आकर गगन मंडल में मौजूद दसवें दरवाजे मे लगे ताले को जीते जी (अपने जीवित रहते हुए, मृत्यु के बाद नही ) वर्तमान,(आज जो समय चल रहा है ) समय मे मौजूद ( एक बात हमेशा याद रखो ,किसी गुजरे हुए संत के नाम लेने से हमारा काज सिद्ध नहीं होगा ,) किसी पूर्ण गुरू की मदद से खोलता है ।
कबीर साहिब ने अपनी वाणी मे उसे साध कहा है,जिसने अपने शरीर के गढ़ ( किले )को जीत लिया है।
( 5 ) संत :- आध्यात्मिकता के सफर में आत्मा की यह ऊंची अवस्था है ।
कबीर साहिब और पूर्ण संतो की तालीम मे आत्मा का परमात्मा में अभेद ( एकमएक,यानि आपस मिल जाना जैसे दूध ओर पानी का मिलन ) हो जाने का नाम संत है।
कबीर साहेब की यह वाणी
समुद्र समाना बूंद में,
यह जाने सब कोय।
बूंद समानी समुद्र में,
जाने बिरला कोय।।
आत्मा के इस मुकाम पर पहुचने के बाद सच साबित होती है।
ऐसे संतों के लिए ही कबीर साहिब ने अपनी वाणी में लिखा है।
सिंहों के लहँडे नहीं,
हंसों की नहीं पाँत।
लालो की नहीं बोरियां,
साधू ना चलें जमात।।
शेरों के झुंड के झूंढ नहीं होते,
हंसो ( एक पक्षी होता है,जो दूध मे मिले पानी को अलग करने की सामर्थ रखता है ) की लाईन नहीं लगी होती और हीरे जवाहरात की बोरियां नहीं भरी होती।
इसी तरह से साधुओं ( संसार मे साधु भी कोई,कोई होता है, ) की भी जमात नहीं होती वह भी कोई ,कोई होता हैं।
आग लगी आकाश मे,
झर झर पडे अंगार।
संत ना होते जगत मे,
जल मरता संसार।।
( कबीर साहब )
ऐसा संत हर समय मौजूद रहता है, कभी भी यह पृथ्वी संतो से खाली नहीं होती है।
जिस दिन ऐसे संत संसार मे नही रहेंगे उसी दिन संसार खत्म हो जायेगा।
शंका होती है, की कया सारे संसार को खत्म होने से संत बचा सकता है।
जवाब है, जी हाँ।
अगर एक ही सूरज सारे संसार को रोशन करने के लिए काफी है, तो एक ही पूर्ण संत भी सारे संसार को खतम होने से कयूँ नहीं बचा सकता, जरूर बचा सकता है।
धर्मदास साहेब कबीर साहिब के मिलने से पहले खाने की वस्तुओं का व्यापार करते थे दान पुन्य , तीरथ, व्रत,करना का उनका शौक था, उनके इस शौक ने जब सतोगुण की पराकाष्ठा को पार करा तो,उनको कबीर साहिब जैसी हस्ती से मिलना हुआ।
भाग जाके संत पाहुना आया।
( संत वचन )
उनके मिलन की दास्तान लंबी है डिटेल में तो मैं नहीं जाऊंगा, हां इतना जरूर कहूंगा कि जब कबीर साहिब से उन्होंने जीते जी रूहानियत की तालीम ली ओर उसमे वह परफेक्ट हो गए,तब उनसे किसी जिज्ञासु ने पूछा कि धर्मदास जी साहिब आप किस वस्तु का व्यापार करते हैं।
आप ने उत्तर दिया।
कोई लादे कांसा पीतल,
कोई लोंग सुपारी।
हम तो लादें नाम धनी का,
पूर्ण खेप हमारी, हम सतनाम के व्यापारी।
पलटू साहिब भी संत के विषय मे अपनी वाणी में लिखते है।
पलटू घर मे राम के,
ओर ना कर्ता कोय।
संत करें सोई होये,
ओर करे ना कोय।।
कबीर साहेब कहते है,
ए जिज्ञासु जब तक तूझें ऐसा कोई जोहरी संत दूसरे शब्दों मे उसे पारखी संत ( जिसकी नजर पंचभौतिक शरीर के अंदर मौजूद आत्मा पर होती है ) भी कह सकते है ,नही मिलेगा तब तक तेरे दुखों का अंत नहीं हो सकता।
सतगुरु ऐसे जोहरी संत के विषय मे ही लिखते है।
सुख देवे दुखः को हरे,
दूर करे अपराध।
कहै कबीर वह कब मिले परम सनेही साध।।
मुक्ति की राह मे भटकने वाले जिज्ञासुओं को कबीर साहेब का आदेश है।
सतगुरु खोजो संत,
जीव काज जो चाहो।
मेटो भव के अंक,
आवागमन निवारहूँ।।
( कबीर साहब )
कबीर साहेब की चेतावनी :- ए जिज्ञासुओं भेषधारी संतो से बचो, शब्द भेदी संत की खोज करो।
आज का सतसंग यही तक।
आगे सत्संग में बताया जाएगा ऐसे संतों की शिक्षा क्या है किस कार्य हेतु संत इस धरा धाम पर अवतरित होते हैं।--- इत्यादि
🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹
सतगुरु कबीर रूहानी मिशन 🌹🌹संत भगत राज 🌹🌹
3 years ago | [YT] | 5
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संत भगतराज रूहानी मिशन
सतगुरु कबीर रूहानी मिशन एक आध्यात्मिक मिशन है। आध्यात्मिकता के विषय में रुचि रखने वाले महापुरुषों को आमंत्रित करता है और ग्रुप को ज्वाइन करने वाले महापुरुषों से निवेदन करता है ग्रुप को ज्वाइन करते समय अपना पूरा पता साथ में भेजें
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3 years ago | [YT] | 3
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संत भगतराज रूहानी मिशन
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3 years ago | [YT] | 4
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