It is a platform, where we try to provide references for all Jain religious activities that are performing in our home town. So that anybody can take ideas from these activities.. they can perform like so beautifully.. :-) This Channel is managed by Roopal Jain from Bhilwara Rajasthan..:-)
Jain Dharm Activity.(RJ)
*जैन साधु कितने प्रकार के होते हैं*
*तथा किन-किन कारणों से आहार-चर्या में अन्तराय माना जाता है*
जैन दर्शन में साधु-साध्वी की चर्या अत्यंत अनुशासित और सूक्ष्म नियमों से बंधी हुई है। विशेष रूप से आहार-चर्या में अन्तराय का सिद्धांत आत्मसंयम और अहिंसा का चरम उदाहरण है।
🔷 जैन साधु-साध्वियों के प्रमुख प्रकार (दिगम्बर परंपरा)
दिगम्बर जैन परंपरा में साधु-साध्वियों को उनके तप, दीक्षा और संयम के स्तर के अनुसार मुख्यतः पाँच वर्गों में बाँटा गया है—
1️⃣ मुनि
सर्वोच्च श्रेणी के साधु
नग्न अवस्था में रहते हैं
दिन में केवल एक बार खड़े होकर आहार
जल भी आहार के साथ ही
आहार-चर्या में सर्वाधिक कठोर नियम
अन्तराय आने पर उसी क्षण आहार त्याग
2️⃣ आर्यिका माताजी
दिगम्बर साध्वियाँ
वस्त्रधारी होती हैं
बैठकर आहार करती हैं
एक बार आहार, एक बार जल
अन्तराय का पालन मुनि समान कठोर
3️⃣ ऐलक
एक वस्त्रधारी
कठोर संयम का पालन
खड़े या बैठकर आहार
अन्तराय के नियम लागू
4️⃣ छुल्लक
दो वस्त्रधारी
संयमित जीवन
अन्तराय का पालन अनिवार्य
5️⃣ छुल्लिका / छुल्लकनी माताजी
स्त्री साधिका वर्ग
सीमित आवश्यक वस्त्र
आहार-चर्या में शुद्धता और अन्तराय पालन
🔷 *आहार-चर्या में अन्तराय किसे कहते हैं?*
आहार ग्रहण के समय यदि अहिंसा, शुद्धता या मर्यादा का उल्लंघन हो जाए, तो उसे अन्तराय कहा जाता है।
अन्तराय आने पर साधु तत्काल आहार त्याग देते हैं—चाहे भूख हो या प्यास।
🔴 *किन-किन कारणों से आहार में अन्तराय माना जाता है*
🍚 1. आहार में अशुद्ध वस्तु का आ जाना
बाल (केश)
मरा हुआ जीव
कीड़ा, मक्खी, चींटी
धूल-मिट्टी, राख
जली हुई या सड़ी वस्तु
🍞 2. जीव-हिंसा की आशंका
कच्चे अन्न में जीव होना
बिना छना जल
रात्रि में बनाया गया भोजन
फ्रिज या लंबे समय रखा भोजन
🧂 3. नियमविरुद्ध भोजन
रसोई में स्वयं मुनि का प्रवेश
हाथ से नीचे गिरा भोजन
एक बार छोड़ा हुआ ग्रास पुनः लेना
किसी ने टोक दिया या बात कर दी
🚫 4. भाव-दोष से उत्पन्न अन्तराय
दाता का अहंकार
क्रोध, लोभ या दिखावा
आहार देते समय अशुद्ध भाव
आहार देते समय मुनि से वार्तालाप
⏰ 5. समय-विधि का उल्लंघन
सूर्यास्त के बाद दिया गया आहार
निर्धारित समय के बाहर जल ग्रहण
क्रम भंग होना
🖐️ 6. हाथ के ग्रास में दोष
ग्रास लेते समय कुछ गिर जाना
ग्रास में मिला अपवित्र अंश
➡️ ऐसे में पूरा आहार तत्काल त्याग
🔷 अन्तराय में क्या नियम होते हैं?
आहार तुरंत बंद
जल का भी त्याग
केवल मुख-शुद्धि
उसी दिन पुनः आहार नहीं
अगला आहार अगले दिन ही
🔷 विशेष ध्यान देने योग्य तथ्य
अन्तराय छोटा या बड़ा नहीं होता
पूर्ण आहार हो या अल्प—नियम समान
लगातार कई दिनों तक अन्तराय आ सकता है
साधु उसे तप मानकर स्वीकार करते हैं
🔷 निष्कर्ष
जैन साधुओं की आहार-चर्या केवल भोजन का नियम नहीं, बल्कि
अहिंसा, आत्मसंयम और वैराग्य का साक्षात साधन है।
जिस कठोरता से वे अन्तराय का पालन करते हैं,
वह आज के भोगवादी युग में
त्याग और तपस्या की अमूल्य शिक्षा देता है।
जिन शासन जयवंत हो।
2 days ago | [YT] | 0
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
#तीर्थ_क्षेत्र
#बिहार
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१. आरा अतिशय क्षेत्र
२. चम्पापुर सिद्ध क्षेत्र
३. गुणावजी सिद्ध क्षेत्र
४. कमलदहजी सिद्ध क्षेत्र
५. कुंडलपुर कल्याणक क्षेत्र
६. मंदारगिरि सिद्ध क्षेत्र
७. पावापुरी सिद्ध क्षेत्र
८. राजगृही सिद्ध क्षेत्र
#गुजरात
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
९. घोघा अतिशय क्षेत्र
१०. गिरनार सिद्ध क्षेत्र
११. महुआ पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१२. पावागढ़ सिद्ध क्षेत्र
१३. शत्रुंजय (पालीताणा) सिद्ध क्षेत्र
१४. तारंगाजी सिद्ध क्षेत्र
१५. उमता अतिशय क्षेत्र
#हरियाणा
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१६. हाँसी पुण्योदय तीर्थ अतिशय क्षेत्र
१७. कासनगाँव अतिशय क्षेत्र
१८. रानीला (आदिनाथपुरम्) अतिशय क्षेत्र
#झारखंड
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१९. कोल्हुआ पहाड़ सिद्ध क्षेत्र
२०. सम्मेदशिखरजी सिद्ध क्षेत्र
* सम्मेद शिखर जी सिद्धक्षेत्र से 20 तीर्थंकर मोक्ष गये है
#कर्नाटक
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
२१. बीजापुर अतिशय क्षेत्र
२२. धर्मस्थल कला क्षेत्र
२३. हूमंचा अतिशय क्षेत्र
२४. कमठाण अतिशय क्षेत्र
२५. कारकल अतिशय क्षेत्र
२६. कोथली अन्य क्षेत्र
२७. मूडबिद्री अतिशय क्षेत्र
२८. शंखबसदी कला क्षेत्र
२९. श्रवणबेलगोला अतिशय क्षेत्र
३०. स्तवनिधि अतिशय क्षेत्र
३१. वेणूर कला क्षेत्र
#मध्यप्रदेश
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
३२. आहूजी अतिशय क्षेत्र
३३. अहारजी सिद्ध क्षेत्र
३४. अजयगढ़ अतिशय क्षेत्र
३५. बड़ोह कला क्षेत्र
३६. बही पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
३७. बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र
३८. बजरंगगढ़ अतिशय क्षेत्र
३९. बंधाजी अतिशय क्षेत्र
४०. बनेड़ियाजी अतिशय क्षेत्र
४१. बरेला अतिशय क्षेत्र
४२. बरही अतिशय क्षेत्र
४३. बावनगजा (चूलगिरी) सिद्ध क्षेत्र
४४. भोजपुर अतिशय क्षेत्र
४५. भौंरासा अतिशय क्षेत्र
४६. बिजौरी अतिशय क्षेत्र
४७. बीनाजी (बारहा) अतिशय क्षेत्र
४८. चंदेरी अतिशय क्षेत्र
४९. द्रोणगिरि सिद्ध क्षेत्र
५०. ईथुरवारा अतिशय क्षेत्र
५१. गोलाकोट अतिशय क्षेत्र(जिला-शिवपुरी एम.पी.)
५२. गोपाचल पर्वत सिद्ध क्षेत्र
५३. गोम्मटगिरि (इंदौर) अतिशय क्षेत्र
५४. गूडर अतिशय क्षेत्र(जिला-शिवपुरी एम. पी.)
५५. ग्यारसपुर अतिशय क्षेत्र
५६. जामनेर अतिशय क्षेत्र
५७. जयसिहंपुरा (उज्जौन) अतिशय क्षेत्र
५८. खजुराहो अतिशय क्षेत्र
५९. खन्दारगिरि अतिशय क्षेत्र
६०. कुंडलगिरि (कोनीजी) अतिशय क्षेत्र
६१. कुंडलपुर सिद्ध क्षेत्र
६२. लखनादौन अतिशय क्षेत्र
६३. मक्सी पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
६४. मंगलगिरि (सागर) अतिशय क्षेत्र
६५. मनहरदेव अतिशय क्षेत्र
६६. मानतुंगगिरि (धार) अतिशय क्षेत्र
६७. मुक्तागिरि (मेंढ़ागिरि) सिद्ध क्षेत्र
६८. नैनागिरि (रेशंदीगिरि) सिद्ध क्षेत्र
६९. नेमावर (सिद्धोदय) सिद्ध क्षेत्र
७०. निसईजी (मल्हारगढ़) अन्य क्षेत्र
७१. निसईजी सूखा (पथरिया) अतिशय क्षेत्र
७२. नोहटा (आदीश्वरगिरि) अतिशय क्षेत्र
७३. पचराई अतिशय क्षेत्र(जिला-शिवपुरी एम.पी.)
७४. पजनारी अतिशय क्षेत्र
७५. पनागर अतिशय क्षेत्र
७६. पानीगाँव कला क्षेत्र
७७. पपौराजी अतिशय क्षेत्र
७८. पार्श्वगिरि (बड़वानी) अतिशय क्षेत्र
७९. पटेरिया (गढ़ोकोटा) अतिशय क्षेत्र
८०. पटनागंज (रहली) अतिशय क्षेत्र
८१. पावई रत्नागिरि अतिशय क्षेत्र
८२. पिडरूवा अतिशय क्षेत्र
८३. पिसनहारी (मढ़ियाजी) अतिशय क्षेत्र
८४. पुष्पगिरि अतिशय क्षेत्र
८५. पुष्पावती बिलहरी अतिशय क्षेत्र
८६. सेमरखेड़ी (निसईजी) अतिशय क्षेत्र
८७. सिद्धवरकूट सिद्ध क्षेत्र
८८. सिहोंनियाँजी अतिशय क्षेत्र
८९. सिरोंज अतिशय क्षेत्र
९०. सोनागिरिजी सिद्ध क्षेत्र
९१. तालनपुर अतिशय क्षेत्र
९२. तेजगढ़ अतिशय क्षेत्र
९३. थुबोनजी अतिशय क्षेत्र
९४. ऊन (पावागिरि) सिद्ध क्षेत्र
९५. उरवाहा अतिशय क्षेत्र
९६. वरासोंजी अतिशय क्षेत्र
#महाराष्ट्र
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
९७. आसेगाँव अतिशय क्षेत्र
९८. आष्टा (कासार) अतिशय क्षेत्र
९९. अंतरिक्ष पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१००. भातकुली जैन अतिशय क्षेत्र
१०१. चैतन्यवन, सोनगीर कला क्षेत्र
१०२. दहिगाँव अतिशय क्षेत्र
१०३. एलोरा (वेरूल) अतिशय क्षेत्र
१०४. गजपंथा सिद्ध क्षेत्र
१०५. जटवाड़ा अतिशय क्षेत्र
१०६. कचनेर अतिशय क्षेत्र
१०७. कारंजा (लाड़) अतिशय क्षेत्र
१०८. कौडण्यपुर अतिशय क्षेत्र
१०९. कुंभोज बाहुबली अतिशय क्षेत्र
११०. कुंडल सिद्ध क्षेत्र
१११. कुंथलगिरि सिद्ध क्षेत्र
११२. मांडल अतिशय क्षेत्र
११३. मांगीतुंगी सिद्ध क्षेत्र
११४. नवागढ़ (उखलद) अतिशय क्षेत्र
११५. नेमागिरि, जिंतूर अतिशय क्षेत्र
११६. पैठण अतिशय क्षेत्र
११७. पोदनपुर (बोरीवली) अतिशय क्षेत्र
११८. रामटेक अतिशय क्षेत्र
११९. सावरगाँव (काटी) अतिशय क्षेत्र
१२०. शिरड (शहापुर) अतिशय क्षेत्र
१२१. तेर अतिशय क्षेत्र
१२२. विजयगोपाल अतिशय क्षेत्र
# उड़ीसा
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१२३. खंडगिरि उदयागिरि सिद्ध क्षेत्र
#राजस्थान
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१२४. अड़िंदा अतिशय क्षेत्र
१२५. अन्देश्वर पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१२६. अरथूना नसियाजी अतिशय क्षेत्र
१२७. बिजौलिया पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१२८. चमत्कारजी (सवाईमाधोपुर) अतिशय क्षेत्र
१२९. चाँदखेड़ी अतिशय क्षेत्र
१३०. चंद्रागिरि बैनाड़ अतिशय क्षेत्र
१३१. चंवलेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१३२. चूलगिरि (खानियाजी) अतिशय क्षेत्र
१३३. देबारी अतिशय क्षेत्र
१३४. देहरा तिजारा अतिशय क्षेत्र
१३५. केशवराय पाटन अतिशय क्षेत्र
१३६. खेरवाड़ा अतिशय क्षेत्र
१३७. खंडारजी अतिशय क्षेत्र
१३८. खूणादरी अतिशय क्षेत्र
१३९. नागफणी पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१४०. नौगामा नसियाजी कला क्षेत्र
१४१. ऋषभदेव (केशरियाजी) अतिशय क्षेत्र
१४२. संघीजी (सांगानेर) अतिशय क्षेत्र
१४३. शांतिनाथ बमोतर अतिशय क्षेत्र
१४४. श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र
१४५. श्री पद्मपुरा (बाड़ा) अतिशय क्षेत्र
१४६. वागोल पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१.ज्ञानोदय तीर्थ , नारेली, अजमेर
२.जिला- टोंक
३.गुणोदय अतिशय क्षेत्र, गुलगांव, केकड़ी
४.नसीराबाद आचार्य ज्ञानसागर निर्माण स्थली
५.छोटा गिरनार, पदमपुरा के पास
६.चम्बलेशवर पार्श्वनाथ
#तमिलनाडु
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१४७. पोन्नूरमलै अतिशय क्षेत्र
१४८. तिरूमलै अतिशय क्षेत्र
#उत्तरांचल
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१४९. अष्टापद बद्रीनाथ सिद्ध क्षेत्र
#उत्तरप्रदेश
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१५०. अहिच्छत्र पार्श्वनाथ अतिशय क्षेत्र
१५१. अयोध्या कल्याणक क्षेत्र
१५२. बड़ागाँव अतिशय क्षेत्र
१५३. बहसूमा अतिशय क्षेत्र
१५४. बानपुर अतिशय क्षेत्र
१५५. भदैनीजी – वाराणसी कल्याणक क्षेत्र
१५६. भेलूपुर – वाराणसी कल्याणक क्षेत्र
१५७. चंद्रावतीजी कल्याणक क्षेत्र
१५८. देवगढ़जी अतिशय क्षेत्र
१५९. गिरारगिरिजी अतिशय क्षेत्र
१६०. हस्तिनापुर कल्याणक क्षेत्र
१६१. हुसैनपुर कलाँ अतिशय क्षेत्र
१६२. जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर कल्याणक क्षेत्र
१६३. कहाऊँ कल्याणक क्षेत्र
१६४. काकन्दी कल्याणक क्षेत्र
१६५. कम्पिलजी कल्याणक क्षेत्र
१६६. करगुवाँजी अतिशय क्षेत्र
१६७. कारीटोरन अतिशय क्षेत्र
१६८. कौशांबी कल्याणक क्षेत्र
१६९. मरसलगंज अतिशय क्षेत्र
१७०. मथुरा चौरासी सिद्ध क्षेत्र
१७१. पावागिर सिद्ध क्षेत्र
१७२. पावानगर सिद्ध क्षेत्र
१७३. प्रभासगिरि (पभौसा) कल्याणक क्षेत्र
१७४. प्रयाग कल्याणक क्षेत्र
१७५. प्रयाग (तपस्थली) कल्याणक क्षेत्र
१७६. राजमल (फिरोजाबाद) अतिशय क्षेत्र
१७७. रतनपुरी कल्याणक क्षेत्र
१७८. रत्नत्रय मंदिर नसियाजी अतिशय क्षेत्र
१७९. ऋषभांचल अतिशय क्षेत्र
१८०. सेरोनजी अतिशय क्षेत्र
१८१. सीरोनजी (मडावरा) अतिशय क्षेत्र
१८२. शांतिगिरि (मदनपुर) अतिशय क्षेत्र
१८३. शौरीपुर (बटेश्वर) कल्याणक क्षेत्र
१८४. श्रावस्ती कल्याणक क्षेत्र
१८५. सिंहपुरी (सारनाथ) कल्याणक क्षेत्र
१८६. त्रिलोकपुर अतिशय क्षेत्र
१८७. त्रिमूर्ति मंदिर – एत्मादपुर अतिशय क्षेत्र
१८८. वहलना अतिशय क्षेत्र
#नेपाल
आप देश-विदेश हिल स्टेशन प्रसिद्ध स्थान पर घूमने जाते हैं क्या आपको मालूम है
*हमारे जैन तीर्थ क्षेत्र सौंदर्य (हिल) पहाड़ी स्टेशनों व प्राकृतिक सौंदर्य मनभावन योग सिद्धि मंत्र कार्य सिद्धि मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले तीर्थ क्षेत्र*
जीवन में एक बार जरूर यात्राएं करें
क्रमांक- तीर्थ क्षेत्र का नाम- क्षेत्र
१८९. मिथिलापुरी कल्याणक क्षेत्र
जैनम् जयतु शासनम्🎉🙏🎉
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
प्रात: कालीन वंदना
• सिद्ध शिला पर विराजमान अनंतान्त सिद्ध परमेष्ठी भगवानों को मेरा नमस्कार है |
• ऋषभ आदि महावीर पर्यन्त, उँगलियों के 24 पोरों पर विराजमान 24 तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार है |
• सीमंधर आदि विद्यमान 20 तीर्थंकरों को मेरा नमस्कार है |
• सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र को बारम्बार मेरा नमस्कार है |
• चारों दिशाओं, विदिशाओं में जिनते अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधू, जिन-धर्म, जिन-आगम, व जितने भी कृत्रिम व् अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालय हैं, उपको मन-वच-काय से बारम्बार मेरा नमस्कार है |
• 5 भरत, 5 ऐरावत, 10 क्षेत्र सम्बन्धी, 30 चौबीसी के 720 जिनवरों बारम्बार मेरा नमस्कार है |
• हे भगवन! तीन लोक सम्बन्धी 8 करोड़ 56 लाख 97 हजार 481 अकृत्रिम जिन चैत्यालयों को मेरा नमन है | उन चैत्यालयों में स्थित 925 करोड़ 53 लाख 27 हजार 948 जिन प्रतिमाओं की वन्दना करता हूँ |
• हे भगवन! मैं यह भावना भाता हूँ कि मेरा आज का दिन अत्यंत मंगलमय हो | अगर आज मेरी मृत्यु भी आती है, तो मैं तनिक भी न घबराऊँ| मेरा अत्यंत शांतिपूर्ण, समाधिपूर्वक मरण हो| जगत की जितने भी जीव हैं, वे सभी सुखी हों, उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट, दुःख, रोगादि न सताए और सभी जीव मुझे क्षमा करें, तथा सभी जीवों पर मेरे क्षमा भाव रहें |
• मेरे समस्त कर्मों का क्षय हो, समस्त दुःख दूर हों, रत्नत्रय धर्म की प्राप्ति हो | जब तक मैं मोक्ष को न प्राप्त क्र लूं तब तक आपके चरण कमल मेरे हृदय में विराजमान रहें और मेरा हृदय आपके चरणों में रहे |
• मैं सम्यक्त्व धारण करूं, रत्नत्रय पालन करूं, मुनिव्रत धारण करूं, समाधिपूर्वक मरण करूं |
• हे भगवन! आज के लिए मैं यह नियम लेता हूँ की मुझे जो भी खाने में, लेने में, देने में, चलने आदि में आएगा, उन सब की मुझे छूट है, बाकि सब का त्याग है |
• जिस दिशा में रहूँ, आऊं, जाऊं, उस दिशा की मुझे छूट है | बाकि सब दिशाओं में आवागमन का मेरा त्याग है | अगर कोई गलती होवे तो मिथ्या होवे |
• जिस दिशा में रहूँ, उस दिशा में कोई पाप हो तो मैं उस का भागी न बनूँ | अगर किसी प्रकार के रोगवश, या अडचनवश प्रभु-दर्शन न कर सकूँ, तो उसके लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ | मन्दिर जी में, पूजन के समय मेरे शरीर में जो भी परिग्रह हैं, जो भी मन्दिर जी में प्रयोग में आये, उन को छोड़ कर अन्य सभी परिग्रहों को मुझे त्याग है | अगर इस बीच मेरी मृत्यु हो जाय तो मेरे शरीर का जो भी परिग्रह है, उसका मेरा त्याग हो रहेगा |
अच्चेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमस्सामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खो,
बहिलाओं, सुगईगमणं, समाहिमरणं, जिनगुण सम्पत्ति होऊ मज्झं |
||पंच परमेष्ठी भगवान की जय||
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
प्राथमिक प्रश्नोत्तर
1.प्रश्न- अरिहन्त कौन हैं?
उत्तर- चार घनघाति कर्मों को नष्ट करने वाले परम वीतराग, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी।
2.प्रश्न- सिद्ध कौन हैं?
उत्तर- जिनके समस्त प्रयोजन सिद्ध हो चुके हों, ऐसे मोक्ष प्राप्त परमेश्वर।
3.प्रश्न- वीतराग कौन हैं?
उत्तर- जिनके राग-द्वेष नष्ट हो चुके।
4.प्रश्न- भगवंत कौन हैं?
उत्तर- समग्र ऐश्वर्य आदि छः गुणों से युक्त आत्मा को भगवंत कहते हैं।
5.प्रश्न- शूरवीर कौन हैं?
उत्तर- जो उत्पन्न परीषह (उपद्रव, विपत्ति) को सहन करे।
6.प्रश्न- श्रमण कौन हैं?
उत्तर- जो मुनि संयम और तप में⁶ श्रम करे, विषय- वासना का शमन करे और समभाव युक्त रहे !
7.प्रश्न- निग्रंथ कौन हैं?
उत्तर- कनक और कामिनी के तथा बाह्य एवं आभ्यन्तर परिग्रह के त्यागी।
8.प्रश्न- भिक्षु कौन हैं?
उत्तर- निर्दोष भिक्षा लेने वाले।
9.प्रश्न-अनगार कौन हैं?
उत्तर- जिन्होंने अपने घर का त्याग कर दिया हो।
10.प्रश्न- यति कौन हैं?
उत्तर- इंद्रियों को वश में रखने वाले।
11.प्रश्न- मुनि कौन हैं?
उत्तर- अधर्म के कार्यों में मौन रहने वाले।
12.प्रश्न- पंडित कौन हैं?
उत्तर- सत् (सही) और असत् (गलत) का भेद समझने वाली बुद्धि 'पण्डा' कहलाती है, उससे जो युक्त है उसे पंडित कहते हैं।
13.प्रश्न - ऋषीश्वर कौन हैं?
उत्तर-समस्त जीवों के रक्षक ।
14.प्रश्न-योगीश्वर कौन हैं?
उत्तर-जो मन, वचन और काया के योगों को वश में रखे।
15.प्रश्न-दयालु कौन हैं?
उत्तर-जो दुःखी जीवों पर दया करे।
16.प्रश्न-दानेश्वर कौन हैं?
उत्तर- अभय और सुपात्र दान देने में उदार हदय वाले।
17.प्रश्न-ब्रह्मचारी कौन हैं?
उत्तर- जो नववाड़ युक्त ब्रह्मचर्य पाले।
18.प्रश्न-साधु कौन हैं?
उत्तर-जो आत्महित की साधना करे।
19.प्रश्न-स्थविर कौन हैं?
उत्तर- जो स्व-पर को धर्म में स्थिर करे।
20.प्रश्न- गणधर कौन हैं?
उत्तर- जो गण एवं गुणों को धारण करे।
21. प्रश्न-सुपुत्र कौन हैं?
उत्तर-जो माता-पिता का आज्ञाकारी हो।
22. प्रश्न- शिष्य कौन हैं?
उत्तर-जिसे शिक्षा दी जाए अथवा जो शिक्षा देने के योग्य है।
23. प्रश्न- भार्या कौन हैं?
उत्तर- जो गृह व्यवस्था के भार को वहन करे।
24. प्रश्न- मित्र कौन हैं?
उत्तर- दुःख-सुख में पूर्ण रूप से साथ देने वाला।
25.प्रश्न- तपस्वी कौन हैं?
उत्तर-आत्मा में लगे कर्मों की निर्जरा के लिए तप करने वाला।
26. प्रश्न- जैनी कौन हैं?
उत्तर- जिनेश्वर भगवंत का उपासक।
27.प्रश्न- श्रावक कौन हैं?
उत्तर- जिनवाणी सुनने का रसिक।
28.प्रश्न- श्रमणोपासक कौन हैं?
उत्तर- निग्रंथ-श्रमणों की उपासना करने वाला।
29.प्रश्न- व्रती कौन हैं?
उत्तर- पापों का त्याग करने वाला।
30.प्रश्न- माहन कौन हैं?
उत्तर- 'मा हन' अर्थात् 'मत मारों' का उपदेश करने वाला।
1 week ago | [YT] | 1
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
जय जिनेन्द्र
👉*व्यसन और मिथ्यात्व* में कौन बडा़ ⁉️
💥सात व्यसनों के सेवन का फल *नरक*
♻कुगुरू,कुदेव,कुशास्त्र के सेवन का फल _*निगोद*_
💥नरक में जीव पंचेद्रिय सन्नी रहता है ।
♻निगोद में एकेन्द्रिय होता है ।
💥नरक में सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है,क्योंकि वहाँ मन है जिससे हित-अहितका विचार है।
♻निगोद में तो जन्म-मरण से फुर्सत ही नही है सम्यग्दर्शन तो बहुत दूर की बात है ।
💥नरक में अधिक से अधिक आयु तैंतीस सागर प्रमाण है । फिर वहाँ से निकल जाता है ।
♻निगोद में तो अंनतकाल तक एक श्वास में साढ़े सत्रह बार जन्म-मरण होता है वहाँ से तो निकलने का कोई अवसर सुलभ ही नहीं है ।
💥व्यसनों के सेवन से तो एक ही भव खराब होता है ।
♻कुगुरू, कुदेव, कुशास्त्र के सेवन से तो अंनत भव खराब होते हैं ।
☝🏻भाई....
*सर्प* द्वारा तो एक बार ही मरण होता है लेकिन
*कुगुरू* ....के द्वारा तो अंनत बार मरण होता है ।
--------------------------------------
सर्प को देखकर कोई भागे तो, लोग अच्छा मानते है ,
और कुगुरू सर्प को कोई छोडे़ तो मूर्ख लोग उसे दुष्ट कहते हैं ।
लेकिन भाई
💥 *सर्प* का ग्रहण भला ♻ *कुगुरू* का बुरा....
💥 *इन्द्रिय* विषयों की तीव्रता में तो व्यसनों का सेवन होता है ।
♻ *मिथ्यात्व* की तीव्रता में कुगुरू, कुदेव, कुशास्त्र का सेवन होता है ।
💯 सौ बातों की एक बात 💯
_*कुगुरू, कुदेव, कुशास्त्र तो अनंत दुखों की मूर्ति है*_
*सावधान* :-
जिनवाणी का कोई भी उपदेश गिरने के लिये नहीं बल्कि ऊपर उठने के लिये होता है , यहाँ *मिथ्यात्व* छुड़ाने का उपदेश है, *व्यसन* की ओर ले जाने का नहीं .....
ये बात हमेशा याद रखना कि खोट हमारी बुद्धि में है , *जिनवाणी* में नही ....
जिनमार्ग में पहले बड़ा पाप छुडाया जाता है फिर छोटा और व्यसनो से बड़ा पाप है.... ♻ *_मिथ्यात्व_* ♻
*इस भव तरू का मूल एक जानो मिथ्या भाव*
☝🏻बन्ध का सबसे बड़ा कारण *मिथ्यात्व*
☝🏻पाँच आस्रवो मे सबसे पहला *मिथ्यात्व*
☝🏻चौबीस परिग्रहों मे सबसे पहला *मिथ्यात्व*
☝🏻चौदह गुणस्थान में सबसे पहला *मिथ्यात्व*
और सुनो
☝🏻सारी अविद्याओं का एक मूल *मिथ्यात्व*
*{ भाई मिथ्यात्व बैरी का तो सूक्ष्म अंश भी बुरा है }
https://chat.whatsapp.com/HuTdoAofXz4AxlKjoo58n6
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
1 month ago | [YT] | 0
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
कर्म - प्रकृर्तियाँ
प्रकृति याने स्वभाव ...
कर्मों के घातिया और अघातिया रूप से 2 भेद हैं, जिनकी दोनों की 4-4 कुल 8 प्रकृतियाँ हैं और प्रकृति के अपेक्षा से कर्म के इन आठ मूल भेद के उत्तरोत्तर 148 भेद हैं और इन्ही प्रकृतियों पर निर्भर करती है किसी कर्म की फलदान शक्ति, कुछ प्रकृतियाँ पुण्य रूपी हैं और कुछ पाप रूपी l
1 - ज्ञानावरणीय कर्म-
जिस कर्म के उदय से आत्मा के ज्ञान पर आवरण पड़ जाता है, उसे ज्ञानावरणीय कर्म कहते हैं !
केवल पर्दा पड़ता है, आत्मा का ज्ञान नष्ट नहीं होता है l इस कर्म का क्षय कर लेने पर आत्मा अनंतज्ञान को पा लेती है l
उदाहरण :-
जैसे मूर्ति के ऊपर कपडा ड़ाल दिया, तो वह मूर्ति दिखलायी नहीं देती l
एक लड़का दिन रात पढ़ाई करता है, किन्तु उसे कुछ भी याद नहीं होता, सो उसके ज्ञानावरणीय कर्म का उदय है l
ज्ञानावरणीय कर्म बंध के कारण :-
किसी के पढ़ने में विघ्न करना, पुस्तकें फाड़ देना, गुरु की निंदा करना, ज्ञानी से ईर्ष्या करना, ज्ञान के प्रचार-प्रसार में बाधा डालना इत्यादि से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है l
प्रकृतियाँ:- ज्ञानावरणीय कर्म की 5 प्रकृतियाँ होती हैं --
-श्रेणी :- घातिया कर्म l
-प्रभाव :- आत्मा के सम्यक ज्ञान पर पर्दा l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनंत ज्ञान l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त
2 - दर्शनावरणीय कर्म--
जिस कर्म के उदय से आत्मा के यथार्थ अवलोकन/दर्शन पर आवरण पड़ जाता है, उसे दर्शनावरणीय कर्म कहते हैं l केवल पर्दा पड़ता है, आत्मा का दर्शन गुण नष्ट नहीं होता है l इस कर्म का क्षय कर लेने पर आत्मा अनंत दर्शन गुण को पा लेती है l
उदाहरण :-
जैसे किसी बड़े आदमी से मिलने जाना है, किन्तु उसका चौकीदार/दरबान उससे मिलने की अनुमति नहीं देता और दरवाज़े पर ही रोक देता
है l
हम घर से मंदिर जी गए बड़े भाव बना कर,किन्तु देखा तो मंदिरजी के द्वार पर ताला जड़ा हुआ है l सो ये हमारे दर्शनावरणीय कर्म का उदय है l
दर्शनावरणीय कर्म बंध के कारण :-
किसी के देखने में विघ्न करना, अपनी वस्तु किसी को न दिखाना, अपनी दृष्टि पर गर्व करना, किसी को मंदिर जाने से रोकना, किसी की आँखों को कष्ट पहुचाने इत्यादि से दर्शनावरणीय कर्म का बंध होता है l
-प्रकृतियाँ:- दर्शनावरणीय कर्म की 9 प्रकृतियाँ होती हैं l
-श्रेणी :- घातिया कर्म l
-प्रभाव :- आत्मा के निर्मल दर्शन पर पर्दा l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनंत दर्शन l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त l
3 - वेदनीय कर्म-
जिस कर्म के उदय से हम वेदना अर्थात सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं l
इस कर्म से आत्मा के अव्याबाध गुण अर्थात आकुलता रहित सुख (undisturbed mental peace) का घात होता है l इस कर्म का क्षय कर लेने पर आत्मा अनंत सुख को पा लेती है l
उदाहरण :-
इसका स्वभाव शहद में लिपटी हुई तलवार जैसा
है l शहद लगी तलवार की धार को चाटने से सुख का अनुभव तो होता है, किन्तु आगे जीभ कट जाने पर दुःख का अनुभव भी होता है l
वेदनीय बंध के कारण :-
साता वेदनीय :- जीवों पर दया करना, दान करना, संयम पालना, लोभ नहीं करना, वात्सल्य रखना, वैय्यावृत्ति करना, व्रत पालना, क्षमा भाव रखना आदि शुभ क्रियाओं से l
असाता वेदनीय :- शोक करना, पश्चाताप करना, रोना, मारना, वध करना आदि अशुभ कार्यों से l
-प्रकृतियाँ:- वेदनीय कर्म की 2 प्रकृतियाँ होती हैं, साता वेदनीय और असाता वेदनीय l
-श्रेणी :- अघातिया कर्म l
-प्रभाव :- सुख-दुःख का अनुभव l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अव्याबाध गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 12 मुहुर्त l
4 - मोहनीय कर्म-
जिस कर्म के उदय से हम मोह, राग, द्वेष आदि विकार भावों का अनुभव करते हैं, उसे मोहनीय कर्म कहते हैं l अर्थात, जो कर्म आत्मा के सम्यक्त्व व चारित्र गुणों का घात करता है वो मोहनीय कर्म है l
मोहनीय कर्म का स्वभाव नशीले पदार्थ के सेवन की तरह है, इसके उदय से यह जीव अपना विवेक खो देता है, उसे हित-अहित का होश नहीं रहता l
काम-क्रोध-माया-लोभ आदि भी मोहनीय कर्म के उदय से ही होते हैं l इसी कर्म के उदय के कारण श्रीराम जैसे महापुरुष भी लक्ष्मण के मृत शरीर को छह महीने तक अपने कन्धों पर लेकर घूमते रहे l
यह कर्मों का राजा है ! जैसे राजा के न होने पर उसकी प्रजा असमर्थ याने बेकार हो जाती है, उसी प्रकार मोहनीय कर्म के अभाव में बाकी सारे कर्म अपने कार्य में असमर्थ हो जाते हैं l
मोहनीय कर्म बंध के कारण :-
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को दोष लगाने, मिथ्या देव-शास्त्र-गुरु की प्रशंसा करने, आगम विरुद्ध कार्य करने, क्रोध, लोभ, हिंसा, आदि करने से मोहनीय कर्म का बंध होता है l
सबसे पहले इस मोहनीय कर्म का ही क्षय होता है, उसके बाद बाकी के घातिया और अघातिया कर्मों का क्षय होता है l
-प्रकृतियाँ:- मोहनीय कर्म की 28 प्रकृतियाँ होती हैं l
-श्रेणी :- घातिया कर्म l
-प्रभाव :- हित-अहित का विवेक नहीं रहता l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- क्षायिक सम्यक्त्व l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :-
70 कोड़ा कोड़ी सागर (दर्शन मोहनीय),
40 कोड़ा कोड़ी सागर (चारित्र मोहनीय)
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त
5 - आयु कर्म-
जिस कर्म के उदय से जीव किसी एक शरीर में निश्चित समय तक रुका रहता है, उसे आयु कर्म कहते हैं l अर्थात, किसी शरीर में रुके रहने की अवधि/समय का नाम आयु कर्म है l
उदाहरण :-
जैसे किसी घोड़े को लोहे कि बेड़ियों से जकड दिया, बाँध दिया , तो वह वहाँ से कहीं जा नहीं सकता, उस तरह से आयु कर्म इस जीव को एक पर्याय/शरीर में बाँध के रखता है l
जैसे हम मनुष्य पर्याय में रुके हुए हैं, आयु कर्म के क्षय होने के बाद हमारी आत्मा इस मनुष्य देह को छोड़ कर अन्य शरीर में चला जायेगा l
किस गति का क्या कारण :-
1 - नरकगति - बहुत ज्यादा आरम्भ(आलोचना पाठ वाला आरम्भ) और बहुत परिग्रह करने से l
2 - त्रियंचगति - मायाचारी से l
3 - देवगति - स्वभाव की कोमलता, बाल-तप और धर्म करने से l
4 - मनुष्यगति - थोडा आरम्भ और थोडा परिग्रह करने से l
-प्रकृतियाँ:- आयु कर्म की 4 प्रकृतियाँ होती हैं l (देवायु, मनुष्यायु, नरकायु और त्रियंचायु कर्म)
-श्रेणी :- अघातिया कर्म l
-प्रभाव :- मनुष्य-देव-नारकी-त्रियंच आदि भव धारण करना l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अवगाहनत्व गुण l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 33 सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त l
6 - नाम कर्म
- जिस कर्म के उदय से अलग-अलग प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं, हमे देखते हैं कि कोई इतना सुंदर है, कोई कम सुंदर, कोई बलशाली, कोई कमज़ोर शरीर के अंग-उपांग, सुंदरता-कुरूपता देने में जो कर्म फलदायी है उसे नाम कर्म कहते हैं !
उदाहरण :-
यह कर्म एक चित्रकार (painter) के जैसे स्वभाव वाला है, जिस तरह एक चित्रकार अपने मन के मुताबिक अलग अलग चित्र बनता है और उसके द्वारा बनाया हुआ कोई चित्र तो बहुत सुंदर बनता है और कोई चित्र नहीं उसी तरह नाम कर्म का स्वभाव है l
बंध के कारण :-
मन-वचन-काय को सरल रखना, शुभ भावनाएं भाना आदि से शुभ नाम कर्म प्रकृतियों का बंध होता है, और मन-वचन-काय को कुटिल रखना, दुसरो को नीचा दिखाना, उनकी हंसी उड़ाना, नक़ल करना, आपस में लड़ाने से अशुभ नाम कर्म प्रकृतियों का बंध होता है l
कोई अत्यंत सुंदर है, तो वो उसके शुभ नाम कर्म का उदय है , किसी की आवाज़ बहुत मीठी है तो वो उसके सुस्वर नाम कर्म के उदय के कारण है l
-प्रकृतियाँ:- नाम कर्म की सबसे ज्यादा 93 प्रकृतियाँ होती हैं l
-श्रेणी :- अघातिया कर्म l
-प्रभाव :- शरीरों कि रचना l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- सूक्ष्मत्व गुण l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- २० कोड़ा-कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 8 मुहूर्त l
7 - गोत्र कर्म-
- जिस कर्म के उदय से उच्च य़ा नीच कुल की प्राप्ति होती है, उसे गोत्र कर्म कहते हैं l
उदाहरण :-
यह कर्म का स्वभाव एक कुम्हार (potter) के समान है, जिस तरह एक कुम्हार एक ही मिट्टी के कुछ छोटे तो कुछ बड़े बर्तन बनाता है l उसी तरह गोत्र कर्म जीव कि ऊँची या नीची अवस्था बनाता है l
गोत्र कर्म कि 2 प्रकृतियाँ हैं :-
१- उच्च गोत्र कर्म :-
इसके उदय से जीव लोक-पूजित, धार्मिक, बड़े घरों में जन्म लेता है l अच्छा आचरण रखने वाले, पाप न करने वाले, अपनी-प्रशंसा व दूसरों की निंदा न करने वाले आदि जीव इस गोत्र में जन्म लेते हैं l
२- नीच गोत्र कर्म :-
इसके उदय से जीव का जन्म लोक-निन्दित, हिंसक, दुराचारी, दरिद्री आदि कुलों में होता है l
हिंसा, चोरी, झूठ, घमंड, स्व-प्रशंसा,पर-निंदा करने वाले इस गोत्र में जन्म लेते हैं l
देव व भोग-भूमि के मनुष्यों का उच्च गोत्र होता है,
नारकी और त्रियंचों का नीच गोत्र होता है, और
कर्म-भूमि के मनुष्यों के दोनों गोत्र होते हैं l
-प्रकृतियाँ:- गोत्र कर्म की 2 प्रकृतियाँ होती हैं l
-श्रेणी :- अघातिया कर्म l
-प्रभाव :- कुल में जन्म l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अगुरुलघुत्व गुण l
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- २० कोड़ा-कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- 8 मुहूर्त l
8 - अंतराय कर्म-
जिस कर्म के उदय से किसी भी सही या अच्छे काम को करने में बाधा/दिक्कत उत्त्पन्न होती है, उसे अंतराय कर्म कहते हैं l
उदाहरण :-
जैसे दो भाई हैं, एक ने सोचा कि मंदिरजी में चटाइयां रखके आयेंगे, किन्तु दूसरे ने मना कर दिया l एक बच्चा रोटी खा रहा है, और बन्दर रोटी छीन कर ले गया इत्यादि अंतराय कर्म के उदाहरण समझे जा सकते हैं l
बंध के कारण :-
किसी को लाभ नहीं होने देना, नौकर-चाकर को धर्म सेवन नहीं करने देना, दान देने वाले को रोकना, दुसरो को दी जाने वाली वस्तु में विघ्न पैदा करना इत्यादि अंतराय कर्म के बंध के कारण बतलाये हैं l
इसी कर्म के उदय में आने के कारण भगवान आदिनाथ को कई महीने तक आहार नहीं मिला था l
-प्रकृतियाँ:- अन्तराय कर्म की 5 प्रकृतियाँ होती हैं l
-श्रेणी :- घातिया कर्म l
-प्रभाव :- दान आदि में बाधा होना l
-इसके नाश होने पर उत्त्पन्न गुण :- अनन्तवीर्य गुण
-उत्कृष्ठ(ज्यादा से ज्यादा) स्थिति :- 30 कोड़ा-कोड़ी सागर l
-जघन्य(कम से कम) स्थिति :- अन्तर्मुहुर्त l
https://chat.whatsapp.com/HuTdoAofXz4AxlKjoo58n6
1 month ago | [YT] | 0
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
*💡1) आश्रव किसे कहते है ?*
*👉उत्तर : जीव की शुभाशुभ योग प्रवृत्ति से आकृष्ट होकर कर्म वर्गणा का आना अर्थात् जीवरूपी तालाब में पुण्य-पाप रूपी कर्म-जल का आगमन*
*आश्रव कहलाता है।*
*💡2) आश्रव के मुख्य भेद कितने हैं ?*
*👉उत्तर : आश्रव के मुख्य भेद २ हैं -*
*१. द्रव्य आश्रव, २. भाव आश्रव l*
*💡3) द्रव्याश्रव किसे कहते है ?*
*उत्तर : जीव में शुभाशुभ कर्मों का आगमन होना द्रव्याश्रव कहलाता है। जैसे कालसौकरिक कसाई*
*💡4) भावाश्रव किसे कहते है ?*
*👉उत्तर : कर्मों के आगमन में कारण रूप जीव के जो राग एवं द्वेषयुक्त अध्यवसाय हैं, उसे भावाश्रव कहते है।*
*💡5) संवर किसे कहते है ?*
*👉उत्तर : जीव में आते हुए कर्मों को व्रत-प्रत्याख्यान आदि के द्वारा रोकना, अर्थात् जीव रूपी तालाब में आश्रव रूपी नालों से कर्म रूपी पानी के आगमन को त्याग-प्रत्याख्यान रूपी पाल(दीवार) द्वारा रोकना, संवर कहलाता है।*
💡6) संवर के मुख्य भेद कितने हैं ?
👉उत्तर : संवर के मुख्य भेद २ है - द्रव्य संवर तथा भाव संवर ।
💡7) द्रव्य संवर किसे कहते है ?
👉उत्तर : शुभाशुभ कर्म पुद्गलों को रोकना द्रव्य संवर है।
💡8) भाव संवर किसे कहते है ?
👉उत्तर : शुभाशुभ कर्मों को रोकने में कारणभूत जीव के जो अध्यवसाय हैं, उसे भाव संवर कहते है।
💡9) निर्जरा किसे कहते है ?
👉उत्तर : आत्मा के साथ बंधे हुए कर्मों का देशतः क्षय होना या अलग होना,निर्जरा कहलाता है।
💡10) निर्जरा के मुख्य कितने प्रकार हैं ? नाम लिखो ।
👉उत्तर : निर्जरा के मुख्य दो प्रकार हैं -
(१) द्रव्यनिर्जरा, (२) भाव निर्जरा ।
11) उक्त परिभाषा में "देशतः" शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है ?
उत्तर : उक्त परिभाषा में "देशतः" शब्द का प्रयोग ही उपयुक्त है क्योंकि मोक्षतत्त्व का अर्थ भी निर्जरा (कर्मों की) होता है, किन्तु वहाँ सर्व कर्मों की निर्जरा होती है, जबकि निर्जरा तत्त्व में आंशिक रुप से यानि देशतः कर्मों की निर्जरा होती है।
12) द्रव्य निर्जरा किसे कहते है ?
उत्तर : बंधे हुए कर्मों का अल्पांश रूप से क्षय होना द्रव्य निर्जरा है।
13) भाव निर्जरा किसे कहते है ?
उत्तर : बंधे हुए कर्मों को आंशिक रूप से क्षय करने में कारण रूप जीव के जो विशुद्ध अध्यवसाय है, उसे भाव निर्जरा कहते है ।
14) निर्जरा के अन्य भेद कौनसे हैं ?
उत्तर : निर्जरा के अन्य २ भेद हैं - सकाम निर्जरा तथा अकाम निर्जरा ।
15) सकाम निर्जरा किसे कहते है ?
उत्तर : आत्मिक गुणों को पैदा करने के लक्ष्य से जिस धर्मानुष्ठान का आचरण सेवन किया जाय अर्थात् अविरत सम्यग्दृष्टि जीव, देशविरत श्रावक तथा सर्वविरत मुनि महात्मा, जिन्होंने सर्वज्ञोक्त तत्त्व को जाना है और उसके परिणाम स्वरूप जो धर्माचरण किया है, उनके द्वारा होने वाली
निर्जरा सकाम निर्जरा है।
16) अकाम निर्जरा किसे कहते है ?
उत्तर : सर्वज्ञ कथित तत्त्वज्ञान के प्रति अल्पांश रूप से भी अप्रतीति वाले जीव-अज्ञानी तपस्वियों की अज्ञानभरी कष्टदायी क्रियाएँ तथा पृथ्वी, वनस्पति पंच स्थावर काय जो सर्दी-गर्मी को सहन करते हैं, उन सबसे जो निर्जरा होती है, वह अकाम निर्जरा कहलाती है।
17) बंध किसे कहते है ?
उत्तर : जीव के साथ नीर-क्षीरवत् कर्म वर्गणाएँ संबद्ध हो, उसे बंध कहते हैं l
18) बंध के दो प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर : बंध के दो प्रकार हैं -
(१) द्रव्य बंध, (२) भाव बंध ।
19) द्रव्य बंध किसे कहते है ?
उत्तर : आत्मा के साथ कर्म पुद्गलों का परस्पर एकमेक, सम्बद्ध होना, द्रव्य बंध है।
20) भाव बंध किसे कहते है ?
उत्तर : कर्म को बांधने में जीव का जो राग-द्वेष युक्त आत्म-परिणाम है, वह भाव बंध है।
*🙏-श्री नवतत्त्व प्रकरण*
🙏🌻🌻🌻🥀🌻🌻🌻🙏
https://chat.whatsapp.com/IQJLvTIlcQ410UzK0q0HjP
1 month ago | [YT] | 0
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
**अपनी स्वयं की आत्मा से संबंधित अकल्पनीय तथ्य - .**
____________________________
**सम्पूर्ण चौदह राजू लोक एक ब्रह्माण्ड है जिसकी ऊंचाई 14 राजू है। असंख्याती योजन का एक राजू होता है। इस सम्पूर्ण लोक में निगोद के जीव खचाखच भरे हुए हैं।**
**अनन्त काल पूर्व हम सभी निगोद में रह चुके हैं जिसका विस्तृत विवेचन निगोद से संबंधित लेख में किया गया था। वर्तमान में निगोद से निकलकर त्रस पर्याय में आये कितना समय बीत चुका है , यह तो विशिष्ट ज्ञानी ही बतला सकते हैं। यदि निगोद में से निकलने के बाद 2000 सागरोपम की अवधि में मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है तो वापस निगोद में ही जाना पड़ेगा।**
**सम्पूर्ण लोक में असंख्यात गोले है। एक-एक गोले में असंख्यात निगोद है। एक-एक निगोद में अनन्तानन्त जीव है। इस प्रकार लोक में अनन्तानन्त जीव है। उनमें से अनन्तानन्त जीव तो अभी तक निगोद से बाहर ही नहीं निकले हैं अतः उनको अव्यवहार राशि के निगोदिया जीव कहते हैं। एक बार निकलने के बाद वापस निगोद में जाने वाले जीवों को व्यवहार राशि के निगोद कहते हैं।**
**जैन दर्शन के अनुसार सबसे अधिक दु:ख जन्म-मरण का माना जाता है। एक निगोद का जीव सामान्य मनुष्य के एक श्वासोच्छवास जितने समय में 17.5 बार जन्म-मरण कर लेता है। इसकी गणना की जाती है तो एक दिन में 1966080 बार जन्म-मरण अर्थात् एक वर्ष में 70 करोङ से भी अधिक बार जन्म-मरण कर लेता है।**
**इससे स्पष्ट हो जाता है कि हमने भी अपने निगोद की अवस्था में एक वर्ष में इतने जन्म-मरण किये तो अनन्त काल में कितने जन्म-मरण किए। क्या ऐसी स्वयं के जीवन के लिए गणित की गणना करना और हमारी बुद्धि से स्वीकार किया जाना संभव है ? वास्तविक स्थिति तो यही है। इससे मनुष्य भव की दुर्लभता का ज्ञान होता है
**ऐसा जीवों से संबंधित विवेचन संसार के किसी भी अन्य दर्शन में नहीं मिलता है। ऐसी आश्चर्य जनक और अद्-भूत तथा अकल्पनीय जानकारी के आधार पर केवलज्ञानी ( सर्वज्ञ ) के केवलज्ञान की विशालता की हम तो मात्र कल्पना ही कर सकते हैं।**
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
1 month ago | [YT] | 0
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
* *जिज्ञासा-समाधान*
*प्रश्न 1.मनुष्यत्व प्राप्ति में बाधक कारण क्या है?*
उत्तर. 1.एकेन्द्रिय से पचेंन्द्रिय तक नाना गोत्र वाली जातियों में जन्म लेना
2. देवलोक, नरकों, आसुरी काया में जन्म लेना
3. तिर्यनच गति में जन्म लेना
4. क्षत्रिय, राजा आदि की तरह संसार दशा से अविरक्त रहना
5. जन्म मरन के भंवर जाल से मुक्त होने की इच्छा नहीं करना
6. कर्मो के संग से सम्मुढ़,दुःखित, और अत्यंत वेदना से युक्त होने se
7. मनुष्य गति निरोधक कर्मों का क्षय होने पर भी उस अनुरूप आत्म शुद्धि का अभाव
उपरोक्त कारणों से मनुष्यत्व प्राप्त नहीं होता है
*प्रश्न 2. धर्म श्रवण में विघ्न रूप कारण क्या है?*
उत्तर. मनुष्यता के बाद सद्धर्म श्रवण को परम दुर्लभ बताया है, धर्म श्रवण में विघ्न रूप 13 कारण बताए हैं
1. आलस्य 2. मोह 3. अवज्ञा या अवर्ण वाद 4. अहंकार 5. क्रोध 6. प्रमाद 7. कृपणता 8. भय 9. शोक 10. अज्ञान 11. व्याकुलता 12. कुतूहल 13. क्रीड़ा
*प्रश्न 3. धर्म श्रद्धा की दुर्लभता का क्या कारण हैं?*
उत्तर. धर्म का श्रवण प्राप्त हो जाने पर भी उस पर श्रद्धा होना परम दुर्लभ है क्योंकि
1. बहुत से लोग न्याय मार्ग को सुनकर भी उससे विचलित हो जाते हैं
2. सद्धर्म ,सदशास्त्र ,सतत्त्व ,की बात जान- सुन कर भी उस पर श्रद्धा, &प्रतीति, रुचि नहीं करता हैं
3. सद्गुरु, सत्संग के अभाव में अथवा अज्ञानियों के संग से कुधर्म के प्रति श्रद्धा हो जाती है
*प्रश्न 4.धर्म (संयम) में पुरूषार्थ को दुर्लभ बताया है क्यों?*
उत्तर. 1.धर्म को जानना, सुनना और श्रद्धा करना एक बात है और उस पर आचरण करना अलग
2. सद्धर्म का आचरण करने में चरित्र मोह का क्षयोपशम, प्रबल संवेग, प्रशम,निर्वेद, प्रबल आस्था, आत्म बल, संकल्प शक्ति, संतोष, आरोग्य, उत्साह आदि अनिवार्य है!,ये सब में नहीं होते हैं अतः संयम में पुरुषार्थ को दुर्लभ बताया है
*5.इन दुर्लभ चार अंगों की प्राप्ति का अनन्तर फल क्या है*
उत्तर. 1. नये आते हुए कर्मों को रोक कर अनाश्रव को प्राप्त होता है, पुराने कर्मों की निर्झरा करता है
2. कषाय- कलुषता का नाश हो जाता है, धर्म में स्थिरता होने पर घृत सिक्त अग्नि की तरह तप त्याग एवं चारित्र से परम तेजस्विता को प्राप्त कर लेता है
3. कर्म के मिथ्यात्व आदि हेतुओ को दूर करके क्षमा आदि धर्म सम्पत्ति से संयम की वद्धि करता है, वह शरीर को छोड़ने के बाद सीधा ऊर्ध्व गमन करता है (या तो अनुत्तर विमानों या सीधा मोक्ष में जाता है l
*6.इन दुर्लभ चार अंगों की प्राप्ति का परम्परागत फल क्या है*
उत्तर. 1. विविध व्रत नियम आदि के आचरण से महनीय रिद्धि संपन्न देव होते हैं वे उत्तरोत्तर (स्थिति, प्रभाव, सुख, लेश्या आदि की अधिकता) समृद्धि के द्वारा चंद्र,सूर्य की भाँति दीप्ति मान होते हैं
2. वे देव इच्छा अनुसार रूप बनाने में समर्थ होते हैं, ऊर्ध्व कल्पों में सुदीर्घ काल तक रहते हैं
3. वे देव अपनी काल मर्यादा (आयु )पूरी होने पर वहां से च्युत होते हैं और मनुष्य योनि पाते हैं, जहां वे दशा अंग भोग सामग्री से युक्त स्थान में जन्म लेते हैं यथा-1.क्षेत्र, वस्तु, स्वर्ण, पशु-दास 2. मित्र 3. ज्ञाति
4. उच्च गोत्र 5.सुवर्ण 6.निरोग 7.महाप्रज्ञ 8.विनीत 9.यशस्वी 10. शक्तिमान
उपरोक्त चार अंगों को दुर्लभ जान कर जो साधक संयम धर्म को अंगीकार करते हैं, तदनंतर तपस्या से कर्मो को क्षय कर शाश्वत सिद्ध (मुक्त)
हो जाते हैं
*सन्दर्भ.श्री उत्तराध्ययन सूत्र,अ.3*
https://chat.whatsapp.com/HuTdoAofXz4AxlKjoo58n6
1 month ago | [YT] | 1
View 0 replies
Jain Dharm Activity.(RJ)
*दसलक्षण पर्व की समाप्ति पर इस पुनीत क्षमापना दिवस के अवसर पर हम परिवार सहित आप सभी से ह्रदय की गहराइयों से क्षमा मांगतें है*
*प्रथम क्षमा* -
_प्रभु से,_
जिनकी हम विधिवत अर्चना नही कर पा रहे हैं।
*द्वितीय क्षमा*-
_गुरु से,_
जिनके प्रत्यक्ष दर्शन ,वंदन वैय्यावृत्ति आदि नही कर पा रहे हैं।
*तृतीय क्षमा*
_जिनवाणी मां से,_
जिनकी बताये गए मार्ग पर हम द्रुढ़ता पूर्वक चल नही रहे हैं।
*चतुर्थ क्षमा* -
_प्रकृति से, बेजुबान जीवों से,_
जिनके प्रति हम सदैव गैर जिम्मेदार बने रहते हैं।
*पांचवी क्षमा* -
_समाज से,_
जिनके बनाये गये नियमों की हम अवहेलना करते रहते हैं।
*छठवीं क्षमा* -
_देश से,_
जिसके प्रति हम अपने कर्त्तव्यों से अनजान बने रहते हैं।
*सातवीं क्षमा* -
_अपने से बडों के प्रति,_
जिनकी बातों को हम अनसुना करते हैं।
*आठवीं क्षमा* -
_अपने से छोटे से,_
जिनको हम कमतर आंक कर उपेक्षा करते रहते हैं।
*नवमीं क्षमा* -
_अपने सभी रिश्तेदारों से,_
जिनका आदर अनादर हम चेहरे देख कर करते हैं।
*दसवीं क्षमा* -
_अपने उन सभी मित्रों से,_
जिनकी अच्छी बातें भी हमें बुरी लगती हैं।
*हम पूर्णतः प्रयास करेंगे कि उपर जिन जिन से क्षमा मांगी गई है उनके प्रति हम संवेदनशील बनें और हमारी गलतियों का प्रतिशत दिन प्रतिदिन, वर्ष दर वर्ष ,कम होता जाये यही हमारी सबके प्रति सच्ची क्षमा होगी*।
🙏🙏🙏🙏
4 months ago | [YT] | 0
View 0 replies
Load more