It is a platform, where we try to provide references for all Jain religious activities that are performing in our home town. So that anybody can take ideas from these activities.. they can perform like so beautifully.. :-) This Channel is managed by Roopal Jain from Bhilwara Rajasthan..:-)
Jain Dharm Activity.(RJ)
*णमोकार मन्त्र प्रश्नोत्तरी:*
*प्रश्न ( 1) जैन धर्म का मूल मंत्र कौन सा है ?*
_उत्तर ~ महामंत्र णमोकार_
*प्रश्न (2 ) महामंत्र णमोकार का शुद्ध पाठ किस प्रकार* *है ?*
_उत्तर ~ णमो अरिहंताणं_
_णमो सिद्धाणं_
_णमो आइरियाणं_
_णमो उवज्झायाणं_
_णमो लोए सव्व_ _साहूणं_
*प्रश्न (3) इस महामंत्र का अर्थ क्या है ?*
_उत्तर ~ णमो = नमस्कार_
_अरिहंताणं =_ _अरिहंतों को_
_णमो = नमस्कार_
_सिद्धाणं = सिद्धों को_
_णमो = नमस्कार_
_आइरियाणं =_ _आचार्यों को_
_णमो = नमस्कार_
_उवज्झायाणं =_ _उपाध्यायों को_
_णमो = नमस्कार_
_लोए = लोक के_
_सव्व = सभी_
_साहूणं = साधुओं_ _को_
_अर्थात् ~ लोक के सभी अरिहंतों को , सिद्धों को , आचार्यों को , उपाध्यायों_ _को , और सर्व साधुओं को नमस्कार हो_
*प्रश्न (४) अरिहंत परमेष्ठी किन्हें कहते हैं ?*
_उत्तर~ जिन्होंने चार घातिया कर्मों का क्षय करके_ _अनंत चतुष्टय को प्राप्त किया है । 18 दोषों से रहित हैं , तथा जो वीतराग , सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं , उन्हें अरिहंत परमेष्ठी कहते_ _हैं_
*प्रश्न (5) सिद्ध परमेष्ठी किन्हें कहते हैं ?*
_उत्तर ~ जिन्होंने आठों कर्मों का क्षय करके अनंत दर्शन - ज्ञानादि 8 विशेष गुणों को प्राप्त किया है ।_ _शरीर से रहित (अशरीरी) हैं , और जो ऊर्ध्वलोक के अंत में शास्वत रूप से सिद्ध_ _शिला पर विराजमान हैं , उन्हें सिद्ध परमेष्ठी कहते_ _हैं।_
*प्रश्न (6) आचार्य परमेष्ठी किन्हें कहते हैं ?*
_उत्तर ~ जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं , और करवाते हैं । ऐसे संघ के नायक और शिक्षा ~ दीक्षा प्रदाता तथा प्रायश्चित देने वाले गुरू को आचार्य परमेष्ठी कहते हैं ।_
*प्रश्न (7) उपाध्याय परमेष्ठी किन्हें कहते हैं ?*
_उत्तर ~ वे मुनिराज जो रत्नत्रयात्मक चारित्र का पालन करते हुए , संघ के साधुओं को पठन-पाठन के अधिकारी होते हैं । तथा 11 अंग और 14 पूर्व के ज्ञाता होते हैं । उन्हें उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं ।_
*प्रश्न (8) साधु परमेष्ठी किन्हें कहते हैं ?*
_उत्तर ~ जो पंचेन्द्रियों के विषयों की आशा नहीं करते हैं । ज्ञान , ध्यान व तप में लीन रहते हैं । और आरंभ तथा परिग्रह से रहित हैं ।_ _इस प्रकार पूर्ण दिगंबर मुद्रा को धारण करने वाले मुनिराज को साधु परमेष्ठी_ _कहते हैं ।_
*प्रश्न (9) णमोकार मंत्र में कुल कितने पद हैं ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में कुल पांच पद हैं ।_
*प्रश्न (10) णमोकार मंत्र में प्रथम पद कौन सा है ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में प्रथम पद_
_" णमो अरिहंताणं " है ।_
*प्रश्न (11) णमोकार मंत्र में दूसरा पद कौन सा है ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में दूसरा पद_
_" णमो सिद्धाणं " है ।_
*प्रश्न (12) णमोकार मंत्र में तीसरा पद कौन सा है ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में तीसरा पद_
_" णमो आइरियाणं " है_
*प्रश्न (13) णमोकार मंत्र में चतुर्थ पद कौन सा है ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में चतुर्थ पद_
_" णमो उवज्झायाणं "है ।_
*प्रश्न (14) णमोकार मंत्र में पंचम् पद कौन सा है ?*
_उत्तर ~ णमोकार मंत्र में_ _पंचम् पद_
_" णमो लोए सव्व साहूणं " है ।_
*प्रश्न (15) णमोकार मंत्र के पंचम पद में " लोए " और " सव्व " शब्द अलग से क्यों लिखे गए हैं । क्योंकि पहले के 4 पदों में यह शब्द नहीं है ?*
_उत्तर ~ ठीक है , णमोकार मंत्र के पहले चार पदों में " लोए " और " सव्व " शब्द नहीं है । किंतु " णमो_ _लोए सव्व साहूणं " यह णमोकार मंत्र का पंचम और अंतिम पद हैं । अतः इन्हें यहां लिखा गया है ।_
*प्रश्न (16) णमोकार मंत्र के पंचम पद में " लोए " और " सव्व " शब्द लिखने का प्रयोजन क्या है ?*
_उत्तर ~ यह सर्व प्रसिद्ध है कि " सव्व" शब्द अंत दीपक है । साथ ही " लोए " शब्द को भी अंत दीपक बनाया_ _जा सकता है । कारण इन दोनों शब्दों को णमोकार मंत्र के पांचों पदों के साथ_ _लगाकर अर्थ निकाला जाता_ _है ।_
*प्रश्न (17) अंत दीपक किसे* *कहते हैं ?*
_उत्तर ~ वह शब्द जिसका प्रयोग जिस स्थान पर हुआ है , उसके पहले वाले समस्त पदों में जिसका उपयोग हो सके । किंतु अंतिम पद से आगे उस शब्द का उपयोग न हो , उसे अंत दीपक कहते हैं । जैसे ~ सयोग केवली । इसमें सयोग शब्द अंत दीपक है । अर्थात् सयोग शब्द का उपयोग_ _आगे के चौदहवें अयोगकेवली गुणस्थान_ _में नहीं हो सकता_ । _किंतु सयोग_
_केवली गुणस्थान के पहले_ _वाले सभी गुणस्थानों में सयोग शब्द का उपयोग_ _हो सकता है ।_ _क्योंकि वे सभी योग से_ _सहित हैं , किंतु केवलज्ञानी_ _नहीं है । अतः सयोग केवली शब्द का_ _उपयोग नीचे नहीं किया गया_ _है । यह उदाहरण मात्र_ _है_ , _और उदाहरण एक देश हुआ करता है ।_
_केवली के दो ही भेद हैं_ _~(1) सयोग केवली (2) अयोग केवली_
*प्रश्न (18) अंत दीपक शब्दों को लगाकर णमोकार मंत्र का अर्थ किस प्रकार से समझें ?*
_उत्तर ~ देखिए , इस प्रकार समझते हैं ~~~_
_(1) लोक के सभी अरिहंतों को नमस्कार हो ।_
_(2) लोक के सभी सिद्धों को नमस्कार हो ।_
_(3) लोक के सभी आचार्यों को नमस्कार हो ।_
_(4) लोक के सभी उपाध्यायों को नमस्कार हो ।_
_(4) लोक के सभी साधुओं को नमस्कार हो ।_
*प्रश्न (19) (लोए) लोक शब्द लगाने का प्रयोजन क्या है ?*
_उत्तर ~ (1) लोक शब्द लगाने से पांचों परमेष्ठी लोक में हीं रहते हैं , अलोक में_ _नहीं , इसकी सिद्धि होती है ।_
_(2) सिद्ध परमेष्ठी सहित तीन कम नौ करोड़ मुनीराजों की बंदना हो जाती है ।_
*प्रश्न (20) (सव्व) सभी कहने से ! सब परमेष्ठी की संज्ञा में आ जायेंगे , और वंदनीय भी हो जायेंगे ?*
_उत्तर ~ नहीं , क्योंकि ! णमोकार मंत्र के सभी पद गुणवाचक हैं , और जैन दर्शन में सम्यक्त्व और संयम की गुण संज्ञा की गई है । अर्थात् जो सम्यक्त्व सहित संयमी हैं । उन्हें ही तीन कम नौ करोड़ मुनिराजों की संख्या में लिया गया है । अतः यह दोष नहीं आएगा !_
*प्रश्न (21) महामंत्र णमोकार में प्रथम शब्द " णमो " है , और अंतिम शब्द " साहूणं " है । इसमें कुछ विशेषता है क्या ?*
_उत्तर ~ हां - हां ! महामंत्र णमोकार का हर शब्द विशेष ही है ! प्रथम शब्द " णमो " है , और " णमो " का अर्थ नमस्कार होता है । नमस्कार अर्थात् विनय और विनय मोक्ष का द्वार कहा गया है ! ( विणयं मोक्खद्दारं ) । तथा नमस्कार करने से उच्च गोत्र की प्राप्ति होती है ( उच्चैर्गोत्रं प्रणते: ) ! और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उच्च गोत्र की परम आवश्यकता होती है । कारण नीच गोत्र के उदय वाला मुनि दीक्षा नहीं ले सकता है , अर्थात् साधु नहीं बन सकता है , और साधु बने बिना मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती है । अतः णमो शब्द अपने आप में विशेष ही है ।_
*प्रश्न (22) " साहूणं " शब्द की क्या सार्थकता है , उसे भी बताइए ?*
_उत्तर ~ " साहूणं " शब्द तो बीज है , और बीज के बिना वृक्ष की परिकल्पना नहीं की जा सकती है । वृक्ष_ _मैं ही फल लगा करते हैं और साधु रूपी बीज से उत्पन्न साधना रूपी वृक्ष पर ही मोक्ष फल लगता है । कारण साधु बने बिना अर्थात् दीक्षा लिए बिना ! साधु परमेष्ठी , उपाध्याय परमेष्ठी , आचार्य परमेष्ठी , अरिहंत परमेष्ठी और सिद्ध परमेष्ठी नहीं बना जा सकता है ।_
*प्रश्न (23) मोक्ष प्राप्त करने के लिए पांच पद में से किस पद को धारण करने की आवश्यकता है ?*
_उत्तर ~ पांचवां और अंतिम पद साधु परमेष्ठी का !_
*प्रश्न (24) साधु पद को ही धारण करने की* *आवश्यकता क्यों है ?*
_उत्तर ~साधु पद को धारण करके ही ! साधना और तपस्या के बल पर शुक्लध्यान के द्वारा चार घातिया कर्मों का नाश करके अनंत चतुष्टय से युक्त अरिहंत पद को प्राप्त किया जाता है । और फिर चार अघातिया कर्मों का भी नाश करके वह सिद्ध पद को_ _प्राप्त हो जाते हैं ।_
*प्रश्न (25) मोक्ष प्राप्ति के लिए आचार्य और उपाध्याय पद को धारण करना भी आवश्यक है क्या ?*
_उत्तर ~ नहीं , क्योंकि ! चत्तारि दंडक पाठ में अरिहंत , सिद्ध , साधु और_ _केवली प्रणीत धर्म को ही लिया गया है । अर्थात् आचार्य और उपाध्याय_ _पद को साधु पद में ही गर्भित किया गया है । तथा आचार्य और उपाध्याय पद शिक्षा - दीक्षा और प्रायश्चित की व्यवस्था के पद हैं । अतः_ _मोक्ष प्राप्ति के लिए आचार्य और उपाध्याय पद को धारण करना आवश्यक_ _नहीं है ?_
*प्रश्न (26) णमोकार महामंत्र* *की रचना किन्होंने* *की है ?*
_उत्तर ~ णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है ! यह अनादि काल से है ।_
*प्रश्न (27) णमोकार महामंत्र का क्या कभी अंत* *होता है ?*
_उत्तर ~ नहीं ! णमोकार महामंत्र का कभी भी अंत नहीं होता है । यह अनिधन है । अर्थात् इसका कभी अंत_ _नहीं होगा , यह अनंतकाल तक रहेगा । इसीलिए इस_ _मंत्र का दूसरा नाम अनादि_ _-अनिधन मंत्र भी है !_
*प्रश्न (28) णमोकार महामंत्र को सबसे पहले कब* *लिखा गया था ?*
_उत्तर ~ द्वितीय शताब्दी में ! अर्थात् वर्तमान इतिहास के अनुसार आज से लगभग_ _2000 वर्ष पहले !_
*प्रश्न (29) णमोकार महामंत्र को सबसे पहले किन्होंने लिखा था ?*
_उत्तर ~ आचार्य पुष्पदंत जी_ _महाराज ने ।_
*प्रश्न (30) णमोकार महामंत्र को सबसे पहले किस ग्रंथराज में लिखा गया था ?*
_उत्तर ~ षट्खण्डागम अर्थात् धवल जी ग्रंथराज में !_
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Jain Dharm Activity.(RJ)
🙏🏻 चातुर्मास में पालन करने योग्य नियम.. 🙏🏻
❇️ यह नियम हमेशा पालन करने योग्य बताए गए हैं, लेकिन यदि आप हमेशा पालन नहीं करते हैं, तो कम से कम इन चार महीनों में अवश्य पालन करें...
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(१) हमेशा एक नवकार मंत्र की माला फेरें (जाप करें)।
(२) देव, गुरु और धर्म को तीन बार वंदना करें।
(३) भोजन करते समय थाली में जूठन न छोड़ें।
(४) भोजन करते समय मौन रहें।
(५) भोजन करने से पहले पांच नवकार मंत्र का जाप करें।
(६) पान, तंबाकू और फांकी (गुटका) की मर्यादा (सीमित/त्याग) करें।
(७) सचित्त (सजीव/कच्चे) फूल और कच्चे सलाद का त्याग करें।
(८) प्रतिदिन १० मिनट सद्-साहित्य (धार्मिक पुस्तकों) का वाचन करें।
(९) चार महीने कंदमूल (जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां जैसे आलू, प्याज आदि) का त्याग करें।
(१०) चार महीने अष्टमी और पाखी (चौदस) के दिन हरी सब्जी (लीलोतरी) का त्याग करें।
(११) चार महीने अष्टमी और पाखी के दिन प्रतिक्रमण करें।
(१२) चार महीने रोज १ सामायिक करें।
(१३) टीवी और सिनेमा देखने की मर्यादा (सीमा) तय करें।
(१४) चार महीने ब्रह्मचर्य का पालन करें अथवा उसकी मर्यादा रखें।
(१५) इन चार महीनों में नए कपड़े नहीं खरीदूंगा/खरीदूँगी।
(१६) शहद, मक्खन, मैदा, ब्रेड और चीज़ का त्याग करें।
(१७) सोने से पहले चार लोगस्स का काउस्सग्ग (ध्यान) करें।
(१८) हमेशा दानपेटी में यथाशक्ति दान दें।
(१९) गुस्से (क्रोध) का त्याग करें।
(२०) हमेशा सुपात्र दान (योग्य व्यक्ति को दान देने) की भावना भाएँ।
(२१) रात्रि भोजन का त्याग करें।
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🪷 यदि आप स्वयं कुछ न भी कर पाएँ, तो भी इसे दूसरों को भेज सकते हैं। ऐसा करने पर भी उनके पुण्य का आंशिक लाभ आपको मिल सकता है... क्योंकि जैन धर्म में कहा गया है कि— करने वाले, करवाने वाले और उसका अनुमोदन (समर्थन) करने वाले, तीनों को एक समान फल प्राप्त होता है.. 🙏🏻
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Jain Dharm Activity.(RJ)
*सम्यक दर्शन किसका नाम।*
*(इतना भी हल्का ओर छोटा मत समझे)*
*1. जैन धर्म का मूल है सम्यक दर्शन।*
*2. मोक्ष महल की पेहली सीढ़ी का नाम है सम्यक दर्शन।*
*3. अनादि के मिथ्यात्व को मिटाने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*4. अपूर्व अवसर का नाम है सम्यक दर्शन।*
*5. सातिशय पुण्य का नाम है सम्यक दर्शन।*
*6. आंशिक वीतराग भाव की उत्पत्ति नाम है सम्यक दर्शन।*
*7. व्रत तप संयम नियम आदि का मूल है सम्यक दर्शन।*
*8. सुख का मूल है सम्यक दर्शन।*
*9. अरिहंत भगवान ने जैसा जाना है वस्तु स्वरूप को वैसा का वैसा जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*10. आत्मा की आंशिक अनुभूति का नाम है सम्यक दर्शन।*
*11. चार में से एक अनंतानुबंधी कषाय चौकड़ी के अभाव में ही होता है सम्यक दर्शन।*
*12. मोक्ष की नक्की मुहर का नाम है सम्यक दर्शन।*
*13. अर्द्ध पुदगल परावर्तन के अंदर मुक्ति की निश्चित प्राप्ति का नाम है सम्यक दर्शन।*
*14. नरक,पशु, स्त्री,नपुसक में तो जन्म होता ही नही पर देव मनुष्य पर्याय में भी उच्च कुल ही मिलता है उसका नाम है सम्यक दर्शन।*
*15. व्रत तप नियम संयम आदि का सच्चा आदर भाव तद रूप आचरण का भाव का नाम है सम्यक दर्शन।*
*16. ८ अंग सहित होता है सप्त भय रहित होता है सम्यक दर्शन।*
*17. ज्ञेय (राग विकारी भाव) ज्ञान का ही परिणमन है जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*18. वस्तु स्वतंत्रता को जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*19. पर से एकत्व ममत्व,कर्तुत्व,भोक्तृत्व से सदा के लिए छुटने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*20. दृष्टि का विषय है सम्यक दर्शन।*
*21. चारित्र जन्य अशुद्धि को यथावत जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*22. स्वभाव के सन्मुख अस्थिरता जन्य विकल्प भी सहज विनशेंगे ऐसी स्थिरता धैर्य का नाम है सम्यक दर्शन।*
*23. अनंत ज्ञानियों से सच्चे परिचय का नाम है सम्यक दर्शन।*
*24. सच्चे देव शास्त्र गुरु की सच्ची पहचान का नाम है सम्यक दर्शन।*
*25. सच्चे देव शास्त्र गुरु की सच्ची भक्ति पूजन स्तुति आराधना का नाम है सम्यक दर्शन।*
*26. मानो मिला मोक्ष ही हो ऐसी सच्ची प्रतीति का नाम है सम्यक दर्शन।*
*27. चारो गति में होता है सम्यक दर्शन।*
*28. केवल संगी पंचेंद्रीय को ही होता है सम्यक दर्शन।*
*29. नर भव की सार्थकता का नाम है सम्यक दर्शन।*
*30. वस्तु स्वरूप को यथावत जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*31. इष्ट अनिष्ट ना कोई जग में केवल और केवल ज्ञायक त्रिकाली ध्रुव ही इष्ट दिखे उसका नाम है सम्यक दर्शन।*
*32. सम्यक दर्शन तो पर्याय है जो ध्रुव के आश्रय करेगी तो टिकेगी आदरणीय तो त्रिकाली ध्रुव ही है।*
*33. आत्मा की अनंत महिमा का नाम है आत्मा की ना की सम्यक दर्शन की।*
*34. पुरुष के जाने बिना पुरुषार्थ कैसा आत्मा को जाने बिना आत्म कल्याण कैसा? आत्मा (पुरुष) की पहचान का नाम ही है सम्यक दर्शन।*
*35. जैसे 1 अंक के बिना सब शुन्य शून्य है 1. के साथ एक एक शून्य दस गुना है वैसा ही 1. आत्मा की कीमत है सम्यक दर्शन।*
*36. एक ज्ञान सधे तो सब सधे एक है तो सब है ज्ञान का ज्ञान ही है सम्यक दर्शन।*
*37. एक करोड़ का हीरा गटर में गिरा लेकिन हीरे के अंदर गटर की गंदगी प्रवेश नहीं करती आप इस श्रद्धान पर उसे उठा लेते हो ऐसे ही आत्मा में कितनी हि मलिनता होवे पर मेरे में वह मलिनता नहीं आती मैं तो हर समय शुद्ध हूं यह दृष्टि का नाम है सम्यक दर्शन।*
*38. जैसे मेले की भिड़ में छोता बच्चा मां की उंगली पकड़ निर्भार निर्विकल्प रहकर मेले का आनंद लेता है वैसे ही जग मोहियो के बीच रह के आत्म भान से निश्चिंत रहने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*39. संशय विभ्रम अनद्य विषय रहित होता है सम्यक दर्शन।*
*40. निश्चयाभास व्यवहाराभास उभयाभास रहित है सम्यक दर्शन।*
*41. सच्चा धर्म ध्यान, सामायिक होने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*42 . पुण्य पाप राग भाव कर्म जनित भाव को यथावत जान के घटाने उद्यम का नाम है सम्यक दर्शन।*
*43. जैसे हंस दूध और पानी को अलग कर दूध ग्रहण करता है वैसे ज्ञानी वीतराग भाव का ही आदर करते है बढ़ाते है।*
*44. पंच परावर्तन में अज्ञान वश मोह वश घूम कर अनादि से रूले अब मोक्ष पर्यन्त ना घूमने ना रुकने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*45. सच्चीदानंद घन हूं प्रभु हूं तीन लोक का नाथ हूं मेरा आनंद मेरा सुख का धाम मै ही हूं, हूं का नाम है सम्यक दर्शन।*
*46. भेद विज्ञान की कला है सम्यक दर्शन।*
*47. सिद्ध की जाती का हूं के भान का नाम है सम्यक दर्शन।*
*48. अनेकांत मय धर्म प्रमाण मय वस्तु का यथावत भाली प्रकार से जानने का नाम है सम्यक दर्शन।*
*49. सम्यक अभिप्राय एक वीतराग भाव ज्ञायक भाव आत्म भाव सहज भाव ही आदरणीय जहा हो उसका नाम है सम्यक दर्शन।*
*50. इंद्रियातीत अतीन्द्रिय आनंद ज्ञान का आंशिक भान का नाम है सम्यक दर्शन।*
*51. जैसे मछली जल में प्यासी वैसे ही सम्यक दर्शन बीना जीव सुख समुद्र में अनादि से गोते खाते हुए का प्यासा की प्यासा।*
*52. सम्यक दृष्टि स्यादवादी होता है।*
🔰🤼♂️🔰🤼♂️🔰🤼♂️🔰🤼♂️
*सम्यग्दर्शन की महिमा आने पर जीव को सम्यग्दृष्टि बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए,,,🙏🏽*
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Jain Dharm Activity.(RJ)
* आषाढ़ अष्टान्हिका पर्व महामहोत्सव*
इस बार पर्व 9 दिन के,दशमी तिथि दो आ रही हैं, 21 जुलाई से 29 जुलाई तक, 🙏
*सरव पर्व मे बड़ो अठाई परव*
_प्रश्न -1_
_अष्टान्हिका पर्व एक वर्ष मे_ _कितनी बार आता है और कौन_ कौनसे मास मे आता है पूजन की एक लाइन भी लिखो ⁉️
*उत्तर -अष्टान्हिका पर्व एक वर्ष मे तीन बार आता है आषाढ़़, फाल्गुन, कार्तिक मास मे आते है । नंदीश्वर श्री जिनधाम,* *बावन पुंज करौं ।*
_प्रश्न -2_
_अष्टान्हिका पर्व मे कौनसा विधान करते है ⁉️_
*उत्तर - अष्टान्हिका पर्व में मुख्यतः सिद्धचक्र विधान या नंदीश्वर विधान किया जाता है ।*
_प्रश्न -3_
_मैनासुंदरी ने कौनसा विधान किया था क्यों किया था ⁉️_
*उत्तर -मैनासुन्दरी ने श्रीपाल जी आदि 700 रोगियों के कुष्ठ रोग निवारण के लिए सिद्धचक्र विधान किया था ।*
_प्रश्न -4_
_सिद्धचक्र विधान मे कुल कितने अर्घ चढ़ते है ⁉️_
*उत्तर - सिद्धचक्र विधान मे कुल 2040 अर्घ चढ़ते है ।*
_प्रश्न -5_
_सिद्धचक्र विधान मे किनकी आराधना की जाती है ⁉️_
*उत्तर -सिद्धचक्र विधान मे अनंत सिद्ध परमेष्ठी की आराधना की जाती है ।*
_प्रश्न -6_
_नंदीश्वर द्वीप मे कुल कितने जिनालय है ⁉️_
*उत्तर -नंदीश्वर द्वीप मे कुल 52 जिनालय है ।*
_प्रश्न -7_
_मनुष्य कौनसे पर्वत को पार नहीं कर सकता है ⁉️_
*उत्तर -मानुषोत्तर पर्वत को मनुष्य पार नहीं कर सकता है ।*
_प्रश्न -8_
_सिद्धचक्र विधान मे पहले दिन कितने अर्घ चढ़ते है ⁉️_
*उत्तर -सिद्धचक्र विधान मे पहले दिन आठ अर्घ चढ़़ते है ।*
_प्रश्न -9_
_विदेहक्षेत्र मे कितने तीर्थंकर होते है ⁉️_
*उत्तर -विदेहक्षेत्र मे 160 तीर्थंकर होते है अजितनाथ भगवान के समय मे 170 तीर्थंकर हुए ।*
_प्रश्न -10_
_इस बार अष्टान्हिका पर्व कौनसी तिथि से शुरू हुए ⁉️_
*उत्तर आषाढ़ शुक्ल अष्टमी से शुरू होकर पूर्णिमा तक है ।*
_प्रश्न -11_
_नंदीश्वर द्वीप एक दिशा मे कितने करोड़़ किलोमीटर विस्तृत है ⁉️_
*उत्तर -नंदीश्वर द्वीप एक दिशा में 9, 83, 040 करोड़़ किलोमीटर विस्तृत है ।*
_प्रश्न -12_
_नंदीश्वर द्वीप मे प्रत्येक जिनालय का आकार कितना होता है ⁉️_
*उत्तर -लम्बाई -100 योजन*
*चौड़ाई -50 योजन*
*ऊंचाई -75 योजन*
_प्रश्न -13_
_52 अकृत्रिम चैत्यालयों में कितनी प्रतिमा होती है ⁉️_
*उत्तर -5616 जिन प्रतिमा होती है ।*
_प्रश्न -14_
_नंदीश्वर द्वीप कितना बड़ा होता है ⁉️_
*उत्तर -नंदीश्वर द्वीप 163करोड़*
*84 लाख महायोजन का और* *एक महायोजन होता है 6000*
*कि. मी. का ।*
_प्रश्न -15_
_प्रत्येक चैत्यालय की लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई बताओ ⁉️_
*उत्तर -4800 कि.मी.लम्बाई*
*2400 कि. मी. चौड़ाई*
*_3600 कि. मी. ऊंचाई_*
*यानि के पूरे भारत से भी ज्यादा विशाल हर मंदिर है ।*
_प्रश्न -16_
_प्रत्येक गर्भ गृह मे_
_कितनी-कितनी प्रतिमा और_ _कितनी- कितनी मीटर ऊँची है_
*उत्तर -प्रत्येक गर्भ गृह मे हलकी*
*मुस्कान बिखेरती 108-108* *प्रतिमाऐं है वो भी 500 धनुष ऊँची है यानि* *क़ुतुबमीनार से भी दस गुना ऊँची वो भी खड्गासन नहीं पद्मासन है ।*
_प्रश्न -17_
_सौधर्म आदि कल्पों के 12 इंद्र भवनत्रिक व अन्य देवों के साथ चारों दिशाओं मे कितने घंटे_ _पूजा करने के बाद दिशा_
_बदलते है लगातार कितने घंटे तक पूजा -अर्चना करते है ⁉️_
*उत्तर -चारो दिशाओं मे 6-6 घंटे (दो -दो पहर ) पूजा करने के बाद दिशा बदलते है और* *लगातार 192 घंटे पूजा - अर्चना करते है ।*
_प्रश्न -18_
_प्रत्येक चैत्यालय के मुख्य द्वार की ऊंचाई और चौड़ाई कितनी होती है ⁉️_
*उत्तर -उसके प्रत्येक का मुख्य द्वार 768 कि. मी. ऊँचा , यानि माउंट एवरेस्ट से भी सौ गुना ज्यादा ऊँचा, 384 कि. मी. चौड़ा होता है ।*
_प्रश्न -19_
_नंदीश्वर द्वीप मे पूजन की अपेक्षा देवों के द्वारा चौबीस घंटे भगवान की आराधना लेकिन मनुष्यों के द्वारा क्यों नहीं हो सकती है ⁉️_
*उत्तर -भरत क्षेत्र मे दिन और रात्रि का आवागमन चलता*
*रहता है और नंदीश्वर द्वीप पर दिन व रात्रि का भेद नहीं होता, इसीलिए चारों निकायों के देव* *चौबीस घंटे भगवान की आराधना कर सकते है हम सबकी शक्ति हो तो आप भी चौबीस घंटे आराधना कर* *सकते है ! लेकिन काल दोष के कारण ऐसा नहीं हो पाता है ।*
_प्रश्न -20_
_कोटि शशि भानु दुति तेज छिप जात है महा वैराग -परिणाम ठहरात है ⁉️_
*उत्तर -करोड़ो सूर्य का तेज़ जिन बिम्ब के तेज़ के आगे दीपक की तरह प्रतीत होता है !*
_प्रश्न -21_
_नंदीश्वर श्री जिनधाम बावन पुंज करौं ! वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरौं ⁉️_
*उत्तर -नंदीश्वर द्वीप के 52 मंदिरों के 52 अर्घ चढ़ाओ आठ दिन तक ये शाश्वत प्रतिमाएं है इनको मन मे धारण कर आनंद का भाव धरो ।*
_प्रश्न -22_
_लाला नख मुख नयन स्याम अरू श्वेत है स्याम रंग भौंह सिर -केश छवि देत है ⁉️_
*उत्तर -नंदीश्वर द्वीप के मंदिरो मे जो प्रतिमाएं है उनके होंठ व नाखून लाल रंग के होते है तथा भौंह व केश काले होते है नयन काले और सफेद होते है*
_प्रश्न -23_
_नंदीश्वर द्वीप मे अंजनगिरि और दधिमुख पर्वतो की संख्या कितनी होती है ⁉️_
*उत्तर -अंजनगिरि चार पर्वत, दधिमुख पर्वत 16 होते है !ये सब चारो दिशाओ मे होते है*
_प्रश्न -24_
_नंदीश्वर द्वीप की एक दिशा मे कुल कितने चैत्यालय है ⁉️_
*उत्तर -13 चैत्यालय*
_प्रश्न -25_
_अंजन गिरी की कुल ऊंचाई कितने योजन है ⁉️_
*उत्तर -84 लाख योजन*
_प्रश्न -26_
_नंदीश्वर द्वीप मे स्थित प्रतिमा कौनसे आसान वाली और कितने धनुष ऊचाई वाली है ⁉️_
*उत्तर -पदमाशन, 500 धनुष ऊँची*
_प्रश्न -27_
_दधिमुख पर्वत किनके मध्य स्तिथ है ⁉️_
*उत्तर -अशोक, सप्तछन्द, चम्पक, आम्रवन के मध्य*
_प्रश्न -28_
_नंदीश्वर द्वीप मे कुल चइतालयो की संख्या और कुल प्रतिमाओं की संख्या कितनी है ⁉️_
*उत्तर -52 जिनालय, 5616 प्रतिमा*
_प्रश्न -29_
_सैल बत्तीस एक सहस योजन कहे --ये किस पर्वत के लिए लिखा है साथ ही इनकी कुल संख्या और ऊंचाई लिखें ⁉️_
*उत्तर -रतिकर पर्वत, 32, 1000योजन ऊँचे*
_प्रश्न -30_
_नंदीश्वर द्वीप पूजन के लेखक कौन है ⁉️_
*उत्तर -कविवर धानत राय जी*
_प्रश्न -31_
_नंदीश्वर द्वीप की एक दिशा का विस्तार कितना है ⁉️_
*उत्तर -163 करोड़ 84 लाख योजन*
_प्रश्न -32_
_नंदीश्वर द्वीप मे क्या विजयार्ध पर्वत है ⁉️_
*उत्तर -विजयार्ध पर्वत नहीं है !*
_प्रश्न -33_
_नंदीश्वर स्तिथ पर्वत किस_ _आकार के होते है ⁉️_
*उत्तर -ढोल के आकार के है !*
_प्रश्न -34_
_नंदीश्वर द्वीप मे लाल वर्ण के पर्वत कौनसे होते है ⁉️_
*उत्तर -रतिकर पर्वत*
_प्रश्न -35_
_नंदीश्वर द्वीप के प्रत्येक चैत्यालय मे कितनी प्रतिमा होती है ⁉️_
*उत्तर - 108 प्रतिमा होती है*
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प्रश्नोत्तरी
✍️संकलनकर्ता पंडित जी भरत उपाध्याय सांगली
.....
🍎1-प्रश्न-आहार कितने प्रकार का होता है ?
🍎उत्तर-आहार चार प्रकार का होता है- अशन, पान, खाद्य और सद्य।
🍎2-प्रश्न-रस कितने प्रकार के और कौन - २ से हैं ?
🍎उत्तर-रस छः होते हैं- कड़वा, कषायला, चरपरा, मीठा, खट्टा एवं नमकीन ।
🍎3-प्रश्न- पात्रांग कल्पवृक्ष क्या करते हैं ?
🍎उत्तर-पात्रांग जाति के वृक्ष सोने एवं रत्नों से बने हुए भंगार, कचक्र, कलशा, थाली, करवा आदि बर्तन दिया करते हैं।
🍎4-प्रश्न- वस्त्रांग कल्पवृक्ष क्या देते हैं ?
🍎उत्तर-वस्त्रांग जाति के वृक्ष कोमल, बारीक एवं बहुमूल्य रेशमी दुपट्टा एवं पहनने के लिए कपड़े देते हैं।
🍎5-प्रश्न- ये कल्पवृक्ष किस प्रकार के हैं?
🍎उत्तर- ये कल्पवृक्ष न तो वनस्पति हैं, न ही देवों द्वारा निर्मित हैं, ये पृथ्वीकायिक हैं, अनादिनिधन हैं तथा स्वभाव से ही फल देने वाले हैं।
🍎6-प्रश्न- भोगभूमि की पृथ्वी कैसी है ?
🍎उत्तर-भोगभूमि में मूंगा, सोना, हीरा, चन्द्रमा एवं नीलरत्न आदि से सुशोभित रहने वाली पाँचों रंग की सुगन्धित पृथ्वी है।
🍎7-प्रश्न- वहाँ प्राणी किस प्रकार से जन्म लेता है और क्या पान करता है ?
🍎उत्तर-वहाँ पर उत्पन्न होने के बाद प्राणी सात दिन तक अपना मुंह ऊपर को किए हुए पड़े रहते हैं एवं अपने अंगूठे से उत्पन्न दिव्य रस का पान किया करते हैं। वे गर्भ में भी नौ महीने तक रत्नों से बने हुए घर के सामन रहते हैं फिर सुख से उत्पन्न होते हैं, उनका जन्म युगलिया होता है।
🍎8-प्रश्न- वे किस प्रकार वृद्धि को प्राप्त करते हैं ?
🍎उत्तर- वे सात दिनों तक पृथ्वी पर रेंकते हैं, तीसरे सप्ताह में उठ खड़े होते हैं, मीठे शब्द करते हैं, चौथे सप्ताह में पैरों को स्थिर रखते हैं, पांचवें सप्ताह में कला, ज्ञान आदि गुणों से पूर्ण हो जाते हैं छठवें सप्ताह में पूर्ण यौवन प्राप्त हो जाता है।
🍎9-प्रश्न-उनकी मृत्यु किस प्रकार होती है ?
🍎उत्तर-युगलिया के जन्म के बाद माता को छींक आकर और पिता को जम्भाई आकर उनकी मृत्यु हो जाती है।
🍎10-प्रश्न- उनकी आयु कितनी होती है ?
🍎उत्तर-उनकी आयु तीन पल्य की होती है।
🍎11-प्रश्न- भोगभूमि के जीव मरकर कहाँ जाते हैं ?
🍎उत्तर-भोगभूमि में उत्पन्न होने वाले सब आर्य पात्र दान से उत्पन्न महासुखों का उपभोग कर मन्द कषाय रूप भावों से मरकर स्वर्ग जाते हैं।
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प्रश्नोत्तरी
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🍎 1-प्रश्न- प्रतिक्रमण का क्या लक्षण है ?
🍎उत्तर - "मेरा दोष मिथ्या हो" गुरु से ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना अथवा दिवस और पाक्षिक संबंधी प्रतिक्रमण करना प्रतिक्रमण कहलाता है।
🍎2-प्रश्न- तदुभय प्रायश्चित किसे कहते हैं ?
🍎उत्तर - आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों करना तदुभय प्रायश्चित है।
🍎3-प्रश्न-विवेक से क्या अभिप्राय है ?
🍎उत्तर - संसक्त हुए अन्न पान और उपकरण आदि का विभाग करना विवेक प्रायश्चित है।
🍎4-प्रश्न-व्युतसर्ग किसे कहते हैं ?
🍎उत्तर - कायोत्सर्ग आदि करना व्युत्सर्ग है।
🍎5-प्रश्न- तप प्रायश्चित किसे कहते हैं ?
🍎उत्तर- अनशन, अवमौदर्य आदि करना तप प्रायश्चित है।
🍎6- प्रश्न-छेद प्रायश्चित किसे कहते हैं ?
🍎उत्तर - दिन, पक्ष, महीना आदि की दीक्षा का छेद करना छेद प्रायश्चित है।
🍎7-प्रश्न-परिहार प्रायश्चित से क्या आशय है ?
🍎उत्तर - दिन, पक्ष, महीना आदिनियत समय के लिये संघ से पृथक कर देना परिहार कहलाता है।
🍎8-प्रश्न-उपस्थापना प्रायश्चित क्या है ?
🍎उत्तर - संपूर्ण दीक्षा छेदकर फिर से नवीन दीक्षा देना उपस्थापना प्रायश्चित है।
🍎10-प्रश्न-विनय तप के ४ भेद कौन से हैं?
🍎उत्तर - "ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः" (१) ज्ञान विनय (२) दर्शन विनय (३) चारित्र विनय और (४) उपचार विनय ये विनय के ४ भेद हैं।
🍎11-प्रश्न- ज्ञान विनय किसे कहते हैं ?
🍎उत्तर - बहुत आदर से मोक्ष के लिये ज्ञान का ग्रहण करना, अभ्यास करना और स्मरण करना आदि ज्ञान विनय तप है।
2 months ago | [YT] | 0
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मंगल shringar
मस्तक का भूषण गुरु आज्ञा, चूड़ामणि तो रागी माने।।
सत्-शास्त्र श्रवण है कर्णों का, कुण्डल तो अज्ञानी जाने ॥१॥
हीरों का हार तो व्यर्थ कण्ठ में, सुगुणों की माला भूषण।
कर पात्र-दान से शोभित हो, कंगन हथफूल तो है दूषण।।२।।
जो घड़ी हाथ में बंधी हुई, वह घड़ी यहीं रह जायेगी।
जो घड़ी आत्म-हित में लागी, वह कर्म बंध विनशायेगी ॥३॥
जो नाक में नथुनी पड़ी हुई, वह अन्तर राग बताती है।
श्वास-श्वास में प्रभु सुमिरन से, नासिका शोभा पाती है।।४।।
होठों की यह कृत्रिम लाली, पापों की लाली लायेगी।
जिसमें बँधकर तेरी आत्मा, भव-भव के दुःख उठायेगी ।।५।।
होठों पर हँसी शुभ्र होवे, गुणियों को लखते ही भाई।
ये होठ तभी होते शोभित, तत्त्वों की चर्चा मुख आई॥६॥
क्रीम और पाउडर मुख को, उज्ज्वल नहिं मलिन बनाता है।
हो साम्यभाव जिस चेहरे पर, वह चेहरा शोभा पाता है॥७॥
आँखों में काजल शील का हो, अरु लज्जा पाप कर्म से हो।।
स्वामी का रूप बसा होवे, अरु नाता केवल धर्म से हो ।।८।
जो कमर करधनी से सुन्दर, माने उस सम है मूढ़ नहीं।
जो कमर ध्यान में कसी गई, उससे सुन्दर है नहीं कहीं।।९।।
पैरों में पायल ध्वनि करतीं, वे अन्तर द्वन्द्व बताती हैं।
जो चरण चरण की ओर बढ़े, उनके सन्मुख शरमाती हैं॥१०॥
जड़ वस्त्रों से तो तन सुन्दर, रागी लोगों को दिखता है।
पर सच पूछो उनके अन्दर, आतम का रूप सिसकता है ।।११।।
जब बाह्य मुमुक्षु रूप धार, ज्ञानाम्बर को धारण करता।
अत्यन्त मलिन रागाम्बर तज, सुन्दर शिवरूप प्रकट करता ॥१२॥
एकत्व ज्ञानमय ध्रुव स्वभाव ही, एक मात्र सुन्दर जग में।
जिसकी परिणति उसमें ठहरे, वह स्वयं विचरती शिवमग में ।।१३।।
वह समवसरण में सिंहासन पर, गगन मध्य शोभित होता/ गगन मध्य ही तिष्ठाता
रत्नत्रय के भूषण पहने, अपनी प्रभुता को प्रगटाता ।।१४।।
पर नहीं यहाँ भी इतिश्री, योगों को तज स्थिर होता।
अरु एक समय में सिद्ध हुआ, लोकाग्र जाय अविचल होता ॥१५॥
Artist - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
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प्रश्नोत्तरी
✍️संकलनकर्ता पंडित जी भरत उपाध्याय ...
🔆1-प्रश्न- परिग्रह सुख का कारण हो सकता है क्या?
🔆उत्तर-नहीं, यदि अग्नि ठंडी हो जाये, विष अमृत हो जाये और आकाश में बिजली स्थिर हो जाये तो परिग्रही जीव भी सुखी हो सकता है।
🔆2-प्रश्न- जघन्य श्रावक का लक्षण बतलाओ।
🔆उत्तर- जो अपने धन के दो भाग परिवार के लिये, तीन भाग संचय के लिये और दसवाँ भाग दान के लिये रखता है, वह जघन्य श्रावक माना गया है।
🔆 3-प्रश्न-मध्यम श्रावक का लक्षण बतलाओ।
🔆उत्तर - जो अपनी आय के तीन भाग कुटुम्ब के लिये, दो भाग खजाने के लिये और छठवाँ भाग दान के लिये रखता है, वह मध्यम श्रावक माना गया है।
🔆4-प्रश्न-उत्तम श्रावक का लक्षण बतलाओ।
🔆उत्तर- जो अपने धन के दो भाग कुटुम्ब के लिये, तीसरा भाग खजाने के लिये और चौथा भाग दान धर्म के लिये रखता है, वह उत्तम श्रावक है।
🔆 5-प्रश्न-श्रावक का लक्षण बतलाओ।
🔆उत्तर -देवशास्त्रगुरुवांच भक्तो दानदयान्वितः ।
मदाष्ठ व्यसनैहींनः श्रावकः कथितो जिनैः ।।
अर्थ- जो देव, शास्त्र और गुरु का भक्त हो, दान और दया से सहित, आठ मद व सप्त व्यसनों से रहित हो, उसे श्रावक कहा है।
🔆6-प्रश्न- धरोहर किसके पास रखी जाती है?
🔆उत्तर - धर्म के ज्ञाता, कुलीन, सत्य व्यवहारी, न्यायवान, व्रतों से सुशोभित, सदाचार में तत्पर, क्रोध रहित, शुद्ध और बहुकुटुम्बी मनुष्य के पास ही धन, आभूषणादि चाँदी, सोना, घोड़ा तथा हाथी आदि वस्तुएँ धरोहर रूप में रखी जाती है। अन्यथा वे निःसंदेह नष्ट हो जाती है।
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प्रश्नोत्तरी
✍️संकलनकर्ता पंडित जी भरत उपाध्याय .......
🔆1-प्रश्न -अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, सहित जीवों की उत्पत्ति के स्थान बताओ?
🔆उत्तर - अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, सहित जीवों की उत्पत्ति नरकायु में होती है।
🔆2-प्रश्न-अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ, किसके समान है ?
🔆उत्तर - अप्रत्याख्यान क्रोध- पृथ्वी रेखा के समान अप्रत्याख्यान मान- हड्डी समान भाव अप्रत्याख्यान माया- मेढ़े के सींग समान भाव अप्रत्याख्यान लोभ - गाड़ी के ओंगण के समान
🔆3-प्रश्न-अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, और लोभ सहित जीवों की उत्पत्ति के स्थान बताओ।
🔆उत्तर - अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, और लोभ सहित जीवों की उत्पत्ति तिर्यंचायु में होती है।
🔆4-प्रश्न- प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ, किसके समान है ?
🔆उत्तर - प्रत्याख्यान क्रोध - धूलि रेखा के समान प्रत्याख्यान मान- काष्ठ समान भाव प्रत्याख्यान माया- गोमूत्र समान भाव प्रत्याख्यान लोभ शरीर के मैल समान
🔆 5-प्रश्न-प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ, सहित जीवों की उत्पत्ति के स्थान बताओ?
🔆उत्तर - प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ, सहित जीवों की उत्पत्ति मनुष्यायु में होती है।
🔆6-प्रश्न-संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ, किसके समान है ?
🔆उत्तर- संज्वलन क्रोध- जल रेखा के समान संज्वलन मान- बेंत के समान भाव संज्वलन माया- खुरपे के समान भाव संज्वलन लोभ हल्दी के रंग समान
🔆7-प्रश्न- संज्वलन प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान और अनंतानुबंधी कषायों का वासनाकाल कितना है ?
🔆उत्तर - संज्वलन कषाय का वासनाकाल अंतर्मुहूर्त है, प्रत्याख्यान कषाय का एक पक्ष अप्रत्याख्यान कषाय का छह महीना तथा अनंतानुबंधी का संख्यात, असंख्यात और अनन्तभव है।
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प्रश्नोत्तरी
✍️संकलनकर्ता पंडित जी भरत उपाध्याय सांगली
.......
📚1-प्रश्न-द्रव्यमोक्ष किसको कहते हैं ?
📝उतर-ज्ञानावरणादि आठों कर्मों से आत्मा का पृथक् हो जाना द्रव्यमोक्ष है।
📚2-प्रश्न-भावमोक्ष किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-कर्म आगमन के कारणभूत राग-द्वेषादि भावों का नाश हो जाना भावमोक्ष है।
📚3-प्रश्न-पुण्य किसको कहते हैं ?
📝उत्तर-जो आत्मा को पवित्र करता है अथवा पवित्रता की ओर ले जाता है, वह पुण्य कहलाता है।
📚 4-प्रश्न-पुण्य के कितने भेद हैं ?
📝उत्तर-पुण्य के दो भेद हैं-भाव पुण्य और द्रव्य पुण्य।
📚5-प्रश्न-द्रव्य पुण्य किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-कर्मजन्य पुण्य प्रकृतियों को द्रव्य पुण्य कहते हैं।
📚6-प्रश्न-भाव पुण्य किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-जीव के जिन परिणामों से शुभ कर्म प्रकृतियों का आगमन होता है, वह परिणाम भाव पुण्य है।
📚7-प्रश्न-पाप किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-जो आत्मा को शुभ क्रियाओं में नहीं जाने देता, जो आत्मा का पतन करता है, वह पाप कहलाता है।
📚8-प्रश्न-पाप के कितने भेद है ?
📝उत्तर-पाप के दो भेद हैं-भाव पाप और द्रव्य पाप।
📚9-प्रश्न-भाव पाप किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-मिथ्यात्व आदि जीव के परिणामों को भाव पाप कहते हैं ?
📚10-प्रश्न-द्रव्य पाप किसे कहते हैं ?
📝उत्तर-मिथ्यात्वादि अशुभ कर्म प्रकृतियों को द्रव्य पाप कहते हैं।
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