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🙏💐 *जया एकादशी*💐🙏

धर्मराज युधिष्ठिर बोले - हे भगवन्! आपने माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यन्त सुंदर वर्णन किया। आप स्वदेज, अंडज, उद्भिज और जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए। इसका क्या नाम है, इसके व्रत की क्या विधि है और इसमें कौन से देवता का पूजन किया जाता है?

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन्! इस एकादशी का नाम 'जया एकादशी' है। इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रह्म हत्यादि पापों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है तथा इसके प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए। अब मैं तुमसे पद्मपुराण में वर्णित इसकी महिमा की एक कथा सुनाता हूँ।

देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे।

पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया। हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था।

इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप दे दिया। इंद्र ने कहा हे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो।

इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यन्त दु:खी हुए और हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहाँ उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी।

उस जगह अत्यन्त शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत बजते रहते। एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे।

दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी भोजन नहीं किया और न कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे। उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई।

हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ।

माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजा युधिष्ठिर ! इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।

🙏🌺 *जय श्री कृष्णा*🌺🙏

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1 week ago | [YT] | 5

Astro Shivay

🌼🙏 बसंत पंचमी — जब विद्या, वाणी और भाग्य स्वयं जाग्रत होते हैं 🙏🌼

बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं है।
यह वह सूक्ष्म संधि-काल है, जब प्रकृति, चेतना और विद्या एक ही तरंग में प्रवाहित होती हैं।

शास्त्र संकेत करते हैं कि
👉 इस दिन किया गया छोटा-सा भी सही उपाय, पूरे वर्ष तक प्रभाव देता है।

माँ सरस्वती की कृपा परिश्रम से पहले शुद्ध भाव देखती है।
इसी कारण बसंत पंचमी पर किए गए ये उपाय सामान्य दिनों से अलग और विशेष माने गए हैं।

🌼 1️⃣ मौन-संकल्प उपाय

(वाणी दोष, क्रोध, मानसिक अशांति, आवेग के लिए)

🕊️ बसंत पंचमी के दिन
सूर्योदय से दोपहर 12 बजे तक मौन रखें।

इस समय केवल मन में यह भाव रखें —

“माँ सरस्वती मेरी वाणी, विचार और बुद्धि को शुद्ध करें।”

✨ यह मौन तप नहीं, बल्कि वाणी-संस्कार है।
➡ सामान्य दिनों में नहीं, केवल बसंत पंचमी पर यह मौन विशेष फल देता है।

📚 2️⃣ विद्या-ग्रंथ जागरण उपाय

(छात्र, शिक्षक, साधक, प्रतियोगी परीक्षार्थी)

✔ अपनी पुस्तकें, डायरी, शास्त्र या मंत्र-पुस्तक
✔ पीले वस्त्र पर स्थापित करें
✔ हल्दी या केसर का तिलक लगाएं
✔ “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” का 11 बार जप करें

📖 इसे ग्रंथ-जागरण कहा गया है
➡ वर्ष में केवल एक बार, बसंत पंचमी को ही किया जाता है।

🪔 3️⃣ पीला दीपक विशेष प्रयोग

(करियर, निर्णय-शक्ति, कन्फ्यूज़न, आत्मविश्वास)

🪔 घी का दीपक जलाएं
👉 उसमें एक चुटकी हल्दी मिलाएं
👉 माँ सरस्वती के चित्र के सामने रखें

🕯️ 5 मिनट मौन में केवल दीपक को देखें
✨ यह प्रयोग उस दीप-तत्व को सक्रिय करता है
➡ जो बसंत पंचमी को ही सिद्ध माना गया है।

🌾 4️⃣ बालक-बालिका विद्या उपाय

(14 वर्ष तक के बच्चों के लिए)

📝 पीले काग़ज़ पर
👉 बच्चे से पहली बार “अ, आ” या कोई मंत्र लिखवाएं
👉 उस काग़ज़ को पुस्तक में सुरक्षित रखें

👶 इसे विद्यारंभ संस्कार का सूक्ष्म रूप कहा गया है
➡ विशेषतः बसंत पंचमी पर।

🌼 5️⃣ दान जो तुरंत असर दिखाता है

बसंत पंचमी पर दान करें —
✔ पीली दाल
✔ पीली मिठाई
✔ कॉपी–पेन

🙏 इस दिन किया गया दान
➡ सीधे सरस्वती-कृपा से जुड़ता है, इसलिए विलंब नहीं करता।

🕉️ शास्त्रों का सूक्ष्म संकेत

बसंत पंचमी पर
❌ कठोर व्रत नहीं
❌ कठिन साधना नहीं

बल्कि —
👉 शुद्ध भाव
👉 मौन
👉 पीला रंग
👉 विद्या का सम्मान

यही सबसे बड़ा उपाय है।

✨ विशेष सूचना
ये उपाय सामान्य दिनों में वही फल नहीं देते
जो बसंत पंचमी पर प्राप्त होता है।

🙏 माँ सरस्वती आप सभी को
शुद्ध वाणी, स्थिर बुद्धि और सन्मार्ग प्रदान करें। 🌼✨

अगर यह जानकारी उपयोगी लगे
👉 पोस्ट सेव करें
👉 विद्यार्थियों व अभिभावकों तक शेयर करें
👉 किसी विशेष समस्या के लिए कमेंट में “🙏” लिखें

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2 weeks ago | [YT] | 0

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*|| मौनी अमावस्या ||*
*18 जनवरी 2026 रविवार*

*मौनी अमावस्या का व्रत हर वर्ष माघ माह की अमावस्या तिथि पर रखा जाता है। इसे माघी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह व्रत 18 जनवरी रविवार को यह व्रत रखा जाएगा, और इसी दिन प्रयागराज महाकुंभ में अमृत स्नान भी रहेगा।*

*🌘मौनी अमावस्या व धार्मिक मान्यता-:*
* *धार्मिक ग्रंथों में अमावस्या तिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह दिन गंगा स्नान, दान और पितरों की पूजा के लिए समर्पित होता है। प्रत्येक अमावस्या का अपना विशेष महत्व होता है, लेकिन मौनी अमावस्या को इनमें सबसे खास माना गया है। इस दिन मौन रहकर व्रत करने की परंपरा है। इसे जप, तप और साधना के लिए सबसे उपयुक्त समय माना गया है।*

*🌘मौनी अमावस्या पर मौन रखने का कारण-:*
* *मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखने का विधान है। साधक इस दिन मौन रहकर व्रत करते हैं, जो मुख्यतः आत्मसंयम और मानसिक शांति के लिए किया जाता है। यह व्रत साधु- संतों के द्वारा भी किया जाता है, क्योंकि मौन रहकर मन को नियंत्रित करना और ध्यान में एकाग्रता लाना सरल हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, मौन व्रत से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसके माध्यम से वाणी की शुद्धता और मोक्ष की प्राप्ति संभव है। यह व्रत आत्मिक शांति और साधना में गहराई लाने का एक सशक्त माध्यम है//*

*🌘मौनी अमावस्या व्रत के नियम-:*
* *इस दिन प्रातःकाल गंगा स्नान करने का विशेष महत्व है। यदि गंगा स्नान संभव न हो तो घर में स्नान के पानी में गंगाजल की कुछ बूंदें डालकर स्नान करना चाहिए।*

* *स्नान के उपरांत भगवान सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए, उसके उपरांत पितरों का तर्पण करना चाहिए और भगवान के समक्ष पूजा उपासना करने के उपरांत मौन व्रत का संकल्प लेना चाहिए।*

* *व्रत के दौरान किसी प्रकार का बोलना वर्जित है। इस दिन ज्यादा समय मौन में बिताना चाहिए। ध्यान- जप इत्यादि करना काफी लाभदायक होता है। इस दिन फालतू- अनर्गल वार्तालाप तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए।तिथि समाप्त होने के बाद मौन व्रत पूर्ण करें एवं व्रत खोलने से पहले भगवन नाम का जाप करते हुए व्रत खोलें।*

* *मौनी अमावस्या का व्रत आत्मसंयम, शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। यह व्रत मन और वाणी को शुद्ध करता है और आत्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत को करने से मान- सम्मान की वृद्धि होती है और साधक की वाणी में मधुरता आती है। साथ ही, यह व्रत व्यक्ति के आंतरिक और बाहरी जीवन में संतुलन लाने में सहायक होता है।*

* *इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान- पुण्य करना बताया गया है। इस दिन किया हुआ दान-पुण्य कई गुना शुभ फल प्रदान करता है।*

* *मौनी अमावस्या का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्म- नियंत्रण और ध्यान के माध्यम से मानसिक और आत्मिक शांति प्राप्त करने का अवसर भी प्रदान करता है। मौनी अमावस्या पर विधिवत व्रत रखने से सकारात्मक ऊर्जा का विशेष प्रभाव आपके तन- मन व विचारों पर देखने को मिलेगा।*
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2 weeks ago | [YT] | 0

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तिल द्वादशी आज
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माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी कहा जाता है। इसे कूर्म द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तिल के दान का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में यह व्रत मकर संक्रांति के अगले दिन मनाया जाएगा। तिल द्वादशी न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है, बल्कि यह दरिद्रता दूर करने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला एक अमोघ अवसर भी है।

तिल द्वादशी 2026: तिथि और मुहूर्त
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वर्ष 2026 में तिल या कूर्म द्वादशी 15 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी।
माघ कृष्ण द्वादशी तिथि आरंभ: 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे से।
द्वादशी तिथि समाप्त: 15 जनवरी 2026 को रात 08:16 बजे तक।
उदयातिथि के अनुसार तिल द्वादशी और कूर्म द्वादशी व्रत 15 जनवरी को रखा जाएगा।

क्यों किया जाता है यह व्रत? जानें महत्व
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है, इसलिए यह उन्हें अत्यंत प्रिय है। महाभारत में उल्लेख है कि इस दिन तिल दान करने वाला व्यक्ति कभी नरक के दर्शन नहीं करता। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल के प्रयोग और दान से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का नाश होता है। तिल द्वादशी पर तिल दान करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक रोगों, जैसे कुष्ठ, अंधापन आदि से मुक्त रहता है। 

रोग और कष्टों से मिलती है मुक्ति
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धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है कि तिल द्वादशी का व्रत करने से व्यक्ति को कई जन्मों तक भयानक रोगों जैसे अंधापन, बहरापन, कोढ़ आदि से मुक्ति मिलती है। यह व्रत स्वास्थ्य, लंबी आयु और सदा निरोगी रहने का वरदान देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग तिल से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, तिल की चिक्की आदि बनाते और दान करते हैं। तिल दान करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर का फल मिलता है।

पूजा विधि
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इस दिन तिल का छह तरीकों यानी षटतिला से उपयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है: स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति/हवन, भोजन और दान।

स्नान: सुबह जल्दी उठकर पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।

संकल्प: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

पूजन: भगवान विष्णु के माधव रूप की मूर्ति को पंचामृत से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।

मंत्र जाप: पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जाप करें।

भोग: भगवान को तिल से बने पकवान या तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाएं।

दान: पूजा के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को तिल, कंबल, अनाज या स्वर्ण का दान करना बहुत फलदायी होता है।

तिल द्वादशी की कथा
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एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की परम भक्त थी और बहुत कठिन व्रत करती थी। उसने दान तो बहुत किया लेकिन कभी अन्न का दान नहीं किया। जब वह वैकुंठ गई, तो उसे वहां रहने के लिए कुटिया तो मिली लेकिन वह खाली थी। तब भगवान ने उसे बताया कि अन्न दान न करने के कारण ऐसा हुआ। तब उस ब्राह्मणी ने देव कन्याओं के कहने पर तिल द्वादशी का व्रत किया और तिल का दान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।

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3 weeks ago | [YT] | 1

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💐🙏 मकर संक्रांति 🙏💐

मकर संक्रांति (Makar Sankranti) सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे अलग हों, लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना।

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण हो ते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

मकर संक्रांति 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त:-

वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन का पुण्य काल दोपहर 03:13 बजे से आरंभ होगा। वहीं महा पुण्य काल दोपहर 03:13 बजे से शाम 04:58 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में किया गया स्नान-दान और पूजा कई गुना पुण्य फल प्रदान करती है। माना जाता है कि इस शुभ काल में दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व:-

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व अत्यंत गहन है। यह पर्व उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है, जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं। उत्तरायण को आध्यात्मिक उन्नति का काल माना गया है। इस समय किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल शीघ्र प्राप्त होता है।

शास्त्रों में उल्लेख है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती अथवा किसी भी पवित्र जल स्रोत में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का क्षय होता है। साथ ही ब्राह्मणों, साधुओं और दीन-दुःखी, निर्धन, जरूरतमंद लोगों को दान देने से भगवान सूर्य की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व:-

मकर संक्रांति का उल्लेख अनेक पौराणिक कथाओं में मिलता है। महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने उत्तरायण काल की प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण इस काल को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

कृषि प्रधान भारत में मकर संक्रांति का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह पर्व नई फसल के स्वागत का प्रतीक है। किसान इस दिन प्रकृति और सूर्य देव का आभार व्यक्त करते हैं। सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा, सत्य और तप का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन उनकी विशेष आराधना की जाती है।

मकर संक्रांति की पूजा विधि:-

मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही स्नान कर सकते हैं। स्नान करते समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि:।।

स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए तांबे का लोटा लें और उसमें स्वच्छ जल भरें। जल में पुष्प, तिल, गुड़ और रोली मिलाएं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। अर्घ्य देते समय श्रद्धा पूर्वक “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप करें। इसके पश्चात सूर्य देव को तिल के लड्डू, खिचड़ी और व्यंजन अर्पित करें। सूर्य चालीसा या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। अंत में भगवान सूर्य को प्रणाम कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना करें।

मकर संक्रांति पर दान का विशेष महत्व:-

मकर संक्रांति का पर्व दान-पुण्य के बिना अधूरा माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है, जिसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन दीन-दुःखी, असहाय और जरूरतमंदों की सेवा करने से भगवान सूर्य अत्यंत प्रसन्न होते हैं

अन्न और भोजन का दान : इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना मां अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना गया है।

वस्त्र दान : मकर संक्रांति के अवसर पर वस्त्र दान का भी विशेष महत्व है। गरीबों, वृद्धों और जरूरतमंदों को नए वस्त्र, सर्दी में कंबल या स्वेटर का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

🌼 मकर संक्रांति की शुभकामनाएं🌼

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🙏🌼 षटतिला एकादशी 🌼🙏

षटतिला एकादशी व्रत कथा!
एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से यही प्रश्न किया था और भगवान ने जो षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा: सो मैं तुमसे कहता हूँ। भगवान ने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।

प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताअओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।

भगवान ने आगे कहा: ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी।
वह ब्राह्मणी बोली: महाराज किसलिए आए हो?
मैंने कहा: मुझे भिक्षा चाहिए।

इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।

घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है?

इस पर मैंने कहा: पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली: आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।

उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।

अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है.

🙏🌼 जय श्री कृष्णा🌼🙏
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3 weeks ago | [YT] | 2

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लोहड़ी पर्व आज
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इस साल 13 जनवरी को लोहड़ी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाएगा। उत्तर भारत के पंजाब में इस त्यौहार का खास महत्व है। हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले यानी 13 जनवरी को लोहड़ी पर्व मनाया जाता है। लोहड़ी का पर्व पंजाब और पंजाबी समुदाय के लोगों का प्रमुख पर्व है। सिख धर्म के लोग इस त्योहार को बड़े की हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन शाम के समय पूजा की जाती है। सूखी लकड़ियां जलाई जाती हैं, जिसमे रेवड़ी, तिल, गुड़, मूंगफली, मक्का डालकर अग्नि की सात बार परिक्रमा की जाती है।

क्यों मनाया जाता है लोहड़ी का पर्व?
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लोहड़ी मुख्य रूप से फसल कटाई का त्योहार है, जो रबी की फसल (गेहूं, गन्ना, सरसों) की अच्छी पैदावार के लिए सूर्य देव और अग्नि देव का आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। सर्दियों के अंत और लंबे दिनों की शुरुआत का प्रतीक है और यह नए साल की शुरुआत, समृद्धि और परिवार के मिलन का जश्न मनाता है, जिसमें दुल्ला भट्टी और माता सती से जुड़ी लोककथाएं भी महत्वपूर्ण हैं। नवविवाहितों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए लोहड़ी विशेष होती है। भांगड़ा, गिद्धा, ढोल की थाप और सामूहिक नृत्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। यह त्योहार सिखाता है कि खुशी व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होती है। लोहड़ी हमें याद दिलाती है कि आधुनिकता की दौड़ में भी परंपराओं की आग बुझनी नहीं चाहिए।

लोहड़ी पूजा और अग्नि प्रज्वलित करने का शुभ मुहूर्त
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ज्योतिष गणना के अनुसार, लोहड़ी की पूजा और पवित्र अग्नि जलाने के लिए शाम का समय सबसे शुभ माना जाता है। इसलिए शाम के समय इस मुहूर्त पर अग्नि प्रज्जवित करें।

लोहड़ी पर बन रहा शुभ योग
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इस साल लोहड़ी पर सुकर्मा योग और चित्रा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। ऐसे में सुख-समृद्धि, धन-संपदा में वृद्धि हो सकती है।

लोहड़ी पूजा विधि
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• लोहड़ी पर्व को शाम के समय घर के बाहर या खुले स्थान पर लकड़ियां और उपले इकट्ठा करें।

• अब दुल्ला भट्टी की कहानी का स्मरण करें।

• इसके बाद शुभ मुहूर्त पर आग जला दें।

• अग्नि जलने के बाद तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और मक्का यानी पॉपकॉर्न आदि अर्पित करें।

• इसे अर्पित करने के साथ-साथ अग्नि की 7 या 11 बार परिक्रमा करें और परिवार की खुशहाली की कामना करें।

• पूजा के बाद रेवड़ी और मूंगफली का प्रसाद सभी में बांटें।

लोहड़ी क्यों मनाई जाती है? (दुल्ला भट्टी की कहानी)
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लोहड़ी को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है। लेकिन इन सभी में दुल्ला भट्टी की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। एक बार पंजाब में मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में एक लुटेरा रहता था जिसका नाम दुल्ला भट्टी था। वह एक ऐसा लुटेरा था, जो अमीरों के घर से लूट करके गरीबों के बीच बांट देता है। इसके साथ ही उसने एक अभियान चलाया था कि ऐसी गरीब लड़कियों का विवाह कराना था जिनके ऊपर शाही जमींदारों और शासकों की बुरी नजर होती है। कई बार इन लड़कियों को अगवा करके गुलाब बनाकर दासियों वाला व्यवहार किया था। ऐसी लड़कियों के लिए दुल्ला भट्टी लड़का ढूंढता था और उनका विवाह करवाया था।

एक बार की बात करें कि दुल्ला भट्टी को दो ऐसी बहनों का पता चला, जो काफी रूपवान थी। इन बहनों का नाम सुंदरी और मुंदरी थी। इन दोनों गरीब बहनों को जमींदार से अगवा करके अपने साथ ले आया। इसके बाद किसी तरह से दुल्ला भट्टी ने उनके लिए वर ढूंढे और उन दोनों बहनों को छुड़ाया और एक जंगल में लकड़ी इकट्ठा करके आग लगाई और दोनों बहनों का विवाह कराकर कन्यादान किया। इस घटना के बाद पूरे पंजाब में दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि दी गई। इसी के कारण दुल्ला भट्टी के साथ सुंदर मुंदरिए नामक लोकगीत गाया जाता है।

** लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं**

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3 weeks ago | [YT] | 1

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संकष्ट चतुर्थी, तिलकुटा चतुर्थी आज
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साल भर में 12 संकष्टी चतुर्थी व्रत आते हैं। इनमें से कुछ चतुर्थी साल की सबसे बड़ी चौथ में से एक हैं, उनमें से एक है सकट चौथ व्रत। सकट चौथ भगवान गणेश के सबसे महत्वपूर्ण पर्व में से एक है। हर साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन सकट चौथ का त्योहार मनाया जाता है।
सकट चौथ व्रत की महिमा से संतान की सभी चिंताएं दूर हो जाएंगी। भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। सकट चौथ वर्ष की शुरुआत में पड़ता है, इसलिए जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं। उन्हें पूरे वर्ष अनंत सुख, धन, सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

संकष्ट चतुर्थी की तिथि
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इसे संकष्टी चतुर्थी, सकट चौथ, तिलकुट चौथ, माघी चौथ, लंबोदर संकष्टी, तिलकुट चतुर्थी और संकटा चौथ आदि नामों से भी जाना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी का महत्व
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संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन की पूजा से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, और घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है। इस व्रत को रखने से न केवल संकटों से मुक्ति मिलती है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर देता है।

संकष्ट चौथ व्रत क्यों किया जाता है?
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सकट चौथ का दिन भगवान गणेश और सकट माता को समर्पित है। इस दिन माताएं अपने पुत्रों के कल्याण की कामना से व्रत रखती हैं। सकट चौथ के दिन भगवान गणेश की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है। इस पूरे दिन व्रत रखा जाता है।
रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यही कारण है कि सकट चौथ पर चंद्रमा दर्शन और पूजन का विशेष महत्व होता है। इस दिन गणपति जी को पूजा में तिल के लड्डू या मिठाई अर्पित करते हैं, साथ में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पारण करते हैं।

संकष्ट चौथ की पूजा विधि
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ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं।
इसके बाद सकट चौथ व्रत रखने का संकल्प करें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी और सकट माता की प्रतिमा की स्थापना करें।
सिंदूर का तिलक लगाएं। घी का दीपक जलाएं।
भगवान गणेश की प्रतिमा पर फूल, फल और मिठाइयां अर्पित करें।
पूजा में तिलकुट का भोग जरूर शामिल करें।
गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में बप्पा की आरती करें।
शंखनाद से पूजा पूर्ण करें।
प्रसाद खाकर अपने व्रत का पारण करें।
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💐🙏* पुत्रदा एकादशी *🙏💐

पौष मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी है, उसे बतलाता हूं; सुनो । महाराज - संसार के हित की इच्छा से में इसका वर्णन करता हूं। इस दिन विधि पूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। यह एकादशी सभी पापों को खत्म करने वाली है और इससे सभी कामनाएं पूरी होती हैं। बहुत पहले समय की बात है भद्वावती पुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। रानी और राजा का बस एक ही दुख था कि उनके कोई संतान नहीं थी। राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। इसलिए दोनों पति-पत्नी चिंता औरसौक में डूबे रहते थे। राजा के पितर भी राजा के इस दुख से दु्री तो क्योंकि उन्हें भी चिंता थी कि राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखाई देता, जो हम लोगों का तर्पण करेगा?

एक दिन राजा घोड़ेपर सवार हो वन में जा रहे थे। राजा के महल में किसीको भी इस बात का पता न था। राजा उस घने जंगल भ्रमण करने लगे। मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनाई पड़ती थी तो कहीं उल्लुओं की। अब दोपहर में राजाको भूख ओर लगी। वे पानी लेने के लिए आस पास देखने लगे, पास में ही उन्हें एक सरोवर दिखाई दिया, वहां मुनियों के बहुत-से आश्रम थे। यह देखते ही राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा, जो उत्तम फलकी सूचना दे रहा था।
इसके बाद सरोवर के तटपर वो मुनियों के पास गए और उनकी वंदना करने लगे। राजा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया तब राजा बोले-मनिदेव, आप कौन हैं और आप यहां क्यों आए हैं। सब सच-सच बताइए

मुनि बोले-राजन -हमलोग विश्वेदेव हैं, यहां माघ स्रान के लिए आए हैं। हम आपसे प्रसन्न हैं, आज ही 'पुत्रदा' नामकी एकादशी है, जो व्रत करने वाले मनुष्यों को पुत्र देती है। राजा ने कहा-अगर आप लोग प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिए। मुनि बोले-राजन्‌, आज के ही दिन पुत्रदा' नाम की एकादशी है | इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो। महाराज ने कहा कि भगवान्‌ केशव के प्रसाद से तुम्हें तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा। इस प्रकार विधि पूर्वक राजा ने व्रत किया। द्वादशी को इसका विधि-विधान से पारण किया। इसके फल स्वरूप रानी ने कुछ दिनों बाद गर्भ धारण किया और नौ माह बाद राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई। इस प्रकार जो इस एकादशी के व्रत को करेगा, उसे संतान की प्राप्ति होगी।

💐 जय श्री कृष्णा💐
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1 month ago (edited) | [YT] | 1

Astro Shivay

🙏💐 *मोक्षदा एकादशी*💐🙏

महाराज युधिष्ठिर ने कहा- हे भगवन! आप तीनों लोकों के स्वामी, सबको सुख देने वाले और जगत के पति हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देव! आप सबके हितैषी हैं अत: मेरे संशय को दूर कर मुझे बताइए कि मार्गशीर्ष एकादशी का क्या नाम है?

उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी क्या विधि है? कृपया मुझे बताएँ। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि धर्मराज, तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। इसके सुनने से तुम्हारा यश संसार में फैलेगा। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है। इसका नाम मोक्षदा एकादशी है।

इस दिन दामोदर भगवान की धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। अब इस विषय में मैं एक पुराणों की कथा कहता हूँ। गोकुल नाम के नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। वह राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था। एक बार रात्रि में राजा ने एक स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

प्रात: वह विद्वान ब्राह्मणों के पास गया और अपना स्वप्न सुनाया। कहा- मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट उठाते देखा है। उन्होंने मुझसे कहा कि हे पुत्र मैं नरक में पड़ा हूँ। यहाँ से तुम मुझे मुक्त कराओ। जब से मैंने ये वचन सुने हैं तब से मैं बहुत बेचैन हूँ। चित्त में बड़ी अशांति हो रही है। मुझे इस राज्य, धन, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े आदि में कुछ भी सुख प्रतीत नहीं होता। क्या करूँ?

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं! इस दु:ख के कारण मेरा सारा शरीर जल रहा है। अब आप कृपा करके कोई तप, दान, व्रत आदि ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए। उस पुत्र का जीवन व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार न कर सके। एक उत्तम पुत्र जो अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का उद्धार करता है, वह हजार मुर्ख पुत्रों से अच्छा है। जैसे एक चंद्रमा सारे जगत में प्रकाश कर देता है, परंतु हजारों तारे नहीं कर सकते। ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहाँ पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है। आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे।

ऐसा सुनकर राजा मुनि के आश्रम पर गया। उस आश्रम में अनेक शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। उसी जगह पर्वत मुनि बैठे थे। राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत किया। मुनि ने राजा से सांगोपांग कुशल पूछी। राजा ने कहा कि महाराज आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं, लेकिन अकस्मात मेरे च्ति में अत्यंत अशांति होने लगी है। ऐसा सुनकर पर्वत मुनि ने आँखें बंद की और भूत विचारने लगे। फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया है। उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया। उसी पापकर्म के कारण तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा।

तब राजा ने कहा ‍इसका कोई उपाय बताइए। मुनि बोले- हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प कर दें। इसके प्रभाव से आपके पिता की अवश्य नर्क से मुक्ति होगी। मुनि के ये वचन सुनकर राजा महल में आया और मुनि के कहने अनुसार कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया। इसके उपवास का पुण्य उसने पिता को अर्पण कर दिया। इसके प्रभाव से उसके पिता को मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो। यह कहकर स्वर्ग चले गए।

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का जो व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई व्रत नहीं है। इस कथा को पढ़ने या सुनने से वायपेय यज्ञ का फल मिलता है। यह व्रत मोक्ष देने वाला तथा चिंतामणि के समान सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है।

💐 *जय श्री हरि*💐
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