प्यारे दोस्तों आप सबसे एक अपील है। आप लोग short वीडियोज तो देखते ही हो थोड़ा समय लांग वीडियोज को भी दो। Youtube के एडसेंस से Revenue लांग वीडियोज से ही आता है। आप अगर इतना करेंगे तो हम और बेहतर करने का प्रयास करेंगे। आप लांग वीडियोज को देखें और उसपर कॉमेंट करके जरूर आएं। अगर हो सके तो अपने जानने वालों को भी share करें, इससे हमारी काफी मदद होगी। बाकी सभी को प्यार ❤️ आपका- आलोक
अब कोशिश रहेगी कि हफ्ते में तीन long वीडियोज तो आये ही। इसके साथ ही इस महीने के अंतिम से विशेषज्ञों के साथ live भी करने की योजना है। आपका प्यार बना रहे ❤️ - आपका आलोक
तुर्की पत्रकार यह़या बोस्टन के मुताबिक कहानी कुछ यूँ गढ़ी गई थी—
इजराइली PM नेतन्याहू ने अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप को यह कहकर युद्ध के लिए मनाया था कि, “बस ऊपर बैठे नेता यानि 'ख़ामेनई' को हटा दो… सिस्टम अपने आप ढह जाएगा, और जनता खुद ही बगावत कर देगी।”
यह सुनने में जितना आसान लगा था, ज़मीन पर उतना ही उल्टा निकला।
लगभग तीन हफ्ते गुजर गए हैं… न सत्ता बदली, न सड़कों पर कोई इंकलाब आया। हाँ, जंग ज़रूर सिमटकर Strait of Hormuz तक आ गई—जहाँ अब असली खेल तेल और रास्तों का है।
और ट्रंप? जो कभी ‘डीलमेकर’ कहलाते थे, अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से गुहार लगा रहे हैं कि किसी तरह यह समुद्री रास्ता फिर खुलवा दो। यानी, जो खेल शतरंज समझकर शुरू किया था, वो अब साँप-सीढ़ी का खेल बन चुका है।
सच तो यह है कि— जंग कोई ट्वीट नहीं होती, जिसे लिखकर माहौल बदल दिया जाए। आम इंसान को भी लड़ाई के लिए राज़ी करना आसान नहीं होता, देश तो बहुत दूर की बात है।
और जहाँ तक साजिशों की बात है… यह कहानी सिर्फ Epstein Files जितनी सीधी नहीं लगती, यहाँ कहीं न कहीं कबाला वाली रहस्यमयी पटकथा भी चल रही लगती है— जहाँ फैसले तर्क से नहीं, बल्कि भ्रम और विश्वास के अंधेरे में लिखे जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत कुछ होता तो है पर दिखता नहीं। अमेरिका और इजराइल ने जब ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया तो दोनों के अपने-अपने प्लान्स थे। अमेरिका की नजर ईंधन और हथियार बेचने पर जबकि इजराइल की नजर ग्रेटर इजराइल बनाने की थी पर अब पर्दा अब धीरे-धीरे हट रहा है, और पूरी बाज़ी समझ में आने लगी है।
क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री Hamad bin Jassim bin Jaber Al Thani ने खाड़ी देशों को एक गंभीर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि अगर Iran के खिलाफ युद्ध शुरू होता है, तो शुरुआत में United States सक्रिय भूमिका निभाएगा, लेकिन कुछ समय बाद खुद को पीछे खींच लेगा। इसके बाद वही अमेरिका दोनों पक्षों को हथियार बेचकर सबसे बड़ा लाभ कमाने वाला खिलाड़ी बन जाएगा।
इस पूरे खेल में असली कीमत खाड़ी देशों को चुकानी पड़ेगी। उनका आर्थिक खजाना खाली होगा, उनकी सैन्य और राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ेगी, और क्षेत्र अस्थिरता की ओर बढ़ेगा। जब लड़ने वाले सभी पक्ष थककर कमजोर हो जाएंगे, तब बाहरी शक्तियों के लिए अपने बड़े रणनीतिक एजेंडे—जैसे “Greater Israel” जैसी अवधारणाओं—को आगे बढ़ाना कहीं आसान हो जाएगा।
इसलिए खाड़ी देशों के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वे इस संघर्ष से खुद को दूर रखें। सीधे युद्ध में कूदने के बजाय, वे संतुलन बनाए रखें और स्थिति को भड़काने के बजाय नियंत्रित करने की कोशिश करें।
दरअसल, खाड़ी के अनुभवी और रणनीतिक सोच रखने वाले नेताओं के बीच अब यह चिंता साफ दिखाई देने लगी है कि अगर यह टकराव और गहराता है, तो इसका नुकसान पूरे क्षेत्र को उठाना पड़ेगा, जबकि इसका असली फायदा बाहरी ताकतों को मिलेगा—जो इस संघर्ष को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करेंगी।
मैंने पहले ही कहा था—अगर अमेरिका ईरान के ख़र्ग प्रायद्वीप स्थित तेल ठिकानों पर हमला करेगा, तो चीन चुप नहीं बैठेगा। उसका जवाब आएगा, और वह जवाब अब दिखने लगा है।
कल चीन के 26 लड़ाकू विमान ताइवान के आसमान में मंडराते हुए उसे चारों तरफ़ से दबाव में लेते दिखे। उसी समय उत्तर कोरिया ने भी मिसाइलें दागकर जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस को साफ़ संदेश दे दिया कि एशिया अब सिर्फ़ अमेरिका के इशारों पर नहीं चलेगा।
ईरान इस युद्ध में अकेला नहीं खड़ा है। उसके पीछे वे देश हैं, जिनकी धरती पर अमेरिका ने दशकों से अपने सैन्य अड्डे बना रखे हैं और जिन्हें अपनी शक्ति का मैदान समझता रहा है।
ईरान से दागी जा रही हर मिसाइल एक ही बात कह रही है—अमेरिका को अब पीछे हटना होगा। चीन और उत्तर कोरिया की चालें भी इसी संकेत को और स्पष्ट कर रही हैं।
अमेरिका को अपनी गलती का अंदाज़ा है। उसने इजरायल को ईरानी तेल टैंकरों पर हमला करने से रोकने की कोशिश की थी, लेकिन इजरायल शायद अब भी अपनी आक्रामकता से बाज़ आने को तैयार नहीं है।
यूरोप, नाटो और खाड़ी देश भी अब पहले जैसी एकजुटता के साथ अमेरिका के पीछे खड़े नहीं दिखते। उन्हें समझ आ चुका है कि इजरायल का अंधा समर्थन उन्हें महँगा पड़ा है। ट्रंप की धमकियाँ भी अब उन पर असर नहीं डाल पा रहीं।
दुबई में हालात तनावपूर्ण हैं। उड़ानें रद्द हो रही हैं। खाड़ी देशों ने इजरायल के समर्थन में अमेरिका को अरबों पेट्रो-डॉलर दिए, लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षा का भरोसा भी नहीं मिला।
अब समीकरण साफ़ दिख रहा है—अमेरिका जितना ईरान के तेल ठिकानों को निशाना बनाएगा, चीन उतनी ही ताकत से ताइवान पर दबाव बढ़ाएगा।
दुनिया की राजनीति अब एक शतरंज की बिसात जैसी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि यह बिसात ईरान और चीन ने मिलकर बिछाई है, और अमेरिका उसी में उलझता जा रहा है।
आधा महीना बीत चुका है। न ईरान की मिसाइलें खत्म हो रही हैं और न हॉर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने के कोई संकेत हैं।
कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर के पार जा चुकी हैं, और इस हफ्ते इनमें और उछाल आने की आशंका है।
इसी बीच भारत चुनावी मोड में प्रवेश कर रहा है।
एक थका हुआ नेता फिर वही पुराना रास्ता चुनेगा—कांग्रेस को कोसेगा, हिंदू–मुस्लिम की राजनीति करेगा। शायद उसके पास और कोई विकल्प नहीं बचा है।
चुनाव वाले पाँच राज्य अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित हैं। वे अंग्रेजी समझते हैं, हिंदी पट्टी से बाहर हैं और वैश्विक हालात को बेहतर तरीके से पढ़ सकते हैं।
संभव है कि यह मोदी की आख़िरी बड़ी राजनीतिक लड़ाई हो।
Alok Tripathi Show
प्यारे दोस्तों आप सबसे एक अपील है। आप लोग short वीडियोज तो देखते ही हो थोड़ा समय लांग वीडियोज को भी दो। Youtube के एडसेंस से Revenue लांग वीडियोज से ही आता है। आप अगर इतना करेंगे तो हम और बेहतर करने का प्रयास करेंगे। आप लांग वीडियोज को देखें और उसपर कॉमेंट करके जरूर आएं। अगर हो सके तो अपने जानने वालों को भी share करें, इससे हमारी काफी मदद होगी। बाकी सभी को प्यार ❤️
आपका- आलोक
9 hours ago | [YT] | 550
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Alok Tripathi Show
वीडियो आ गया है। लिंक 👇
https://youtu.be/DIGp_jIxtfg
14 hours ago | [YT] | 356
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Alok Tripathi Show
वीडियो का लिंक 👇
https://youtu.be/ddsS8NnHHY8
1 day ago | [YT] | 1,252
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Alok Tripathi Show
किये गए वादे के अनुसार पहला वीडियो आ चुका है। देखिए और हाँ कमेंट करके आइयेगा😃
1 day ago | [YT] | 76
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Alok Tripathi Show
अब कोशिश रहेगी कि हफ्ते में तीन long वीडियोज तो आये ही। इसके साथ ही इस महीने के अंतिम से विशेषज्ञों के साथ live भी करने की योजना है। आपका प्यार बना रहे ❤️
- आपका आलोक
2 days ago | [YT] | 2,061
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Alok Tripathi Show
तुर्की पत्रकार यह़या बोस्टन के मुताबिक कहानी कुछ यूँ गढ़ी गई थी—
इजराइली PM नेतन्याहू ने अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप को यह कहकर युद्ध के लिए मनाया था कि,
“बस ऊपर बैठे नेता यानि 'ख़ामेनई' को हटा दो… सिस्टम अपने आप ढह जाएगा, और जनता खुद ही बगावत कर देगी।”
यह सुनने में जितना आसान लगा था, ज़मीन पर उतना ही उल्टा निकला।
लगभग तीन हफ्ते गुजर गए हैं…
न सत्ता बदली, न सड़कों पर कोई इंकलाब आया।
हाँ, जंग ज़रूर सिमटकर Strait of Hormuz तक आ गई—जहाँ अब असली खेल तेल और रास्तों का है।
और ट्रंप?
जो कभी ‘डीलमेकर’ कहलाते थे, अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से गुहार लगा रहे हैं कि किसी तरह यह समुद्री रास्ता फिर खुलवा दो।
यानी, जो खेल शतरंज समझकर शुरू किया था, वो अब साँप-सीढ़ी का खेल बन चुका है।
सच तो यह है कि—
जंग कोई ट्वीट नहीं होती, जिसे लिखकर माहौल बदल दिया जाए।
आम इंसान को भी लड़ाई के लिए राज़ी करना आसान नहीं होता, देश तो बहुत दूर की बात है।
और जहाँ तक साजिशों की बात है…
यह कहानी सिर्फ Epstein Files जितनी सीधी नहीं लगती,
यहाँ कहीं न कहीं कबाला वाली रहस्यमयी पटकथा भी चल रही लगती है—
जहाँ फैसले तर्क से नहीं, बल्कि भ्रम और विश्वास के अंधेरे में लिखे जाते हैं।
2 days ago | [YT] | 361
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Alok Tripathi Show
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बहुत कुछ होता तो है पर दिखता नहीं। अमेरिका और इजराइल ने जब ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया तो दोनों के अपने-अपने प्लान्स थे। अमेरिका की नजर ईंधन और हथियार बेचने पर जबकि इजराइल की नजर ग्रेटर इजराइल बनाने की थी पर अब पर्दा अब धीरे-धीरे हट रहा है, और पूरी बाज़ी समझ में आने लगी है।
क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री Hamad bin Jassim bin Jaber Al Thani ने खाड़ी देशों को एक गंभीर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि अगर Iran के खिलाफ युद्ध शुरू होता है, तो शुरुआत में United States सक्रिय भूमिका निभाएगा, लेकिन कुछ समय बाद खुद को पीछे खींच लेगा। इसके बाद वही अमेरिका दोनों पक्षों को हथियार बेचकर सबसे बड़ा लाभ कमाने वाला खिलाड़ी बन जाएगा।
इस पूरे खेल में असली कीमत खाड़ी देशों को चुकानी पड़ेगी। उनका आर्थिक खजाना खाली होगा, उनकी सैन्य और राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ेगी, और क्षेत्र अस्थिरता की ओर बढ़ेगा। जब लड़ने वाले सभी पक्ष थककर कमजोर हो जाएंगे, तब बाहरी शक्तियों के लिए अपने बड़े रणनीतिक एजेंडे—जैसे “Greater Israel” जैसी अवधारणाओं—को आगे बढ़ाना कहीं आसान हो जाएगा।
इसलिए खाड़ी देशों के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यही है कि वे इस संघर्ष से खुद को दूर रखें। सीधे युद्ध में कूदने के बजाय, वे संतुलन बनाए रखें और स्थिति को भड़काने के बजाय नियंत्रित करने की कोशिश करें।
दरअसल, खाड़ी के अनुभवी और रणनीतिक सोच रखने वाले नेताओं के बीच अब यह चिंता साफ दिखाई देने लगी है कि अगर यह टकराव और गहराता है, तो इसका नुकसान पूरे क्षेत्र को उठाना पड़ेगा, जबकि इसका असली फायदा बाहरी ताकतों को मिलेगा—जो इस संघर्ष को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करेंगी।
2 days ago | [YT] | 391
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Alok Tripathi Show
मैंने पहले ही कहा था—अगर अमेरिका ईरान के ख़र्ग प्रायद्वीप स्थित तेल ठिकानों पर हमला करेगा, तो चीन चुप नहीं बैठेगा। उसका जवाब आएगा, और वह जवाब अब दिखने लगा है।
कल चीन के 26 लड़ाकू विमान ताइवान के आसमान में मंडराते हुए उसे चारों तरफ़ से दबाव में लेते दिखे। उसी समय उत्तर कोरिया ने भी मिसाइलें दागकर जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस को साफ़ संदेश दे दिया कि एशिया अब सिर्फ़ अमेरिका के इशारों पर नहीं चलेगा।
ईरान इस युद्ध में अकेला नहीं खड़ा है। उसके पीछे वे देश हैं, जिनकी धरती पर अमेरिका ने दशकों से अपने सैन्य अड्डे बना रखे हैं और जिन्हें अपनी शक्ति का मैदान समझता रहा है।
ईरान से दागी जा रही हर मिसाइल एक ही बात कह रही है—अमेरिका को अब पीछे हटना होगा। चीन और उत्तर कोरिया की चालें भी इसी संकेत को और स्पष्ट कर रही हैं।
अमेरिका को अपनी गलती का अंदाज़ा है। उसने इजरायल को ईरानी तेल टैंकरों पर हमला करने से रोकने की कोशिश की थी, लेकिन इजरायल शायद अब भी अपनी आक्रामकता से बाज़ आने को तैयार नहीं है।
यूरोप, नाटो और खाड़ी देश भी अब पहले जैसी एकजुटता के साथ अमेरिका के पीछे खड़े नहीं दिखते। उन्हें समझ आ चुका है कि इजरायल का अंधा समर्थन उन्हें महँगा पड़ा है। ट्रंप की धमकियाँ भी अब उन पर असर नहीं डाल पा रहीं।
दुबई में हालात तनावपूर्ण हैं। उड़ानें रद्द हो रही हैं। खाड़ी देशों ने इजरायल के समर्थन में अमेरिका को अरबों पेट्रो-डॉलर दिए, लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षा का भरोसा भी नहीं मिला।
अब समीकरण साफ़ दिख रहा है—अमेरिका जितना ईरान के तेल ठिकानों को निशाना बनाएगा, चीन उतनी ही ताकत से ताइवान पर दबाव बढ़ाएगा।
दुनिया की राजनीति अब एक शतरंज की बिसात जैसी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि यह बिसात ईरान और चीन ने मिलकर बिछाई है, और अमेरिका उसी में उलझता जा रहा है।
आधा महीना बीत चुका है। न ईरान की मिसाइलें खत्म हो रही हैं और न हॉर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने के कोई संकेत हैं।
कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर के पार जा चुकी हैं, और इस हफ्ते इनमें और उछाल आने की आशंका है।
इसी बीच भारत चुनावी मोड में प्रवेश कर रहा है।
एक थका हुआ नेता फिर वही पुराना रास्ता चुनेगा—कांग्रेस को कोसेगा, हिंदू–मुस्लिम की राजनीति करेगा। शायद उसके पास और कोई विकल्प नहीं बचा है।
चुनाव वाले पाँच राज्य अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित हैं। वे अंग्रेजी समझते हैं, हिंदी पट्टी से बाहर हैं और वैश्विक हालात को बेहतर तरीके से पढ़ सकते हैं।
संभव है कि यह मोदी की आख़िरी बड़ी राजनीतिक लड़ाई हो।
और जैसा कि कहा गया है—
लाज़िम है कि हम देखेंगे।
3 days ago | [YT] | 1,278
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Alok Tripathi Show
कृपया वीडियो को देखें और कमेंटबॉक्स में अपनी राय जरूर दें ❤️
1 week ago | [YT] | 360
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