*प्रिय सज्जनों भारतीय सेना में धर्मगुरु भर्ती की तैयारी कैसे करें ? धर्मशास्त्र की परीक्षा और साक्षात्कार के लिये सनातन धर्म के समस्त व्रत, पर्व,त्यौहार और यज्ञ अनुष्ठानों की सम्पूर्ण पूजा विधि, व्रत,पर्व,त्यौहारों की कथा और प्रवचन,तथा उनको क्यों मनाया जाता है,कब मनाया जाता है,उनका क्या महत्त्व है,उनसे हमारे जीवन को क्या मैसेज और शिक्षा मिलती है । तथा धर्म शास्त्र से सम्बन्धित प्रश्न उत्तर, इन सब की जानकारी प्राप्त करने के लिये हमारे You tube चैनल को सब्सक्राइब करें, और घंटी का निशान दबाकर All कर दें । धन्यवाद*
Praveen Krishna Shastri: Motivational Speaker
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5 days ago | [YT] | 15
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Praveen Krishna Shastri: Motivational Speaker
गुरुबर रामकृष्ण और परम् शिष्य विवेकानन्द :
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गुरुवर रामकृष्ण परमहंस जी कठिन रोग से पीड़ित थे। उन्हें खाँसी बहुत आती थी और वे खाना भी नहीं खा सकते थे। स्वामी विवेकानंद जी (नरेन/ नरेंद्र) अपने गुरु जी की हालत से बहुत चिंतित थे। एक दिन की बात है की परमहंस जी ने विवेकानंद जी को अपने पास बुलाया और बोले - "नरेंद्र, तुझे वो दिन याद है, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था ? तूने दो- दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खा लिया है, ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई को परोस दें। हैं न ?" नरेंद्र ने रोते- रोते "हाँ" में सर हिला दिया।।
रामकृष्ण जी फिर बोले-- "यहां मेरे पास जब मंदिर आता, तब अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहन लेता था। परन्तु मैं भी झट जान जाता कि तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, माखन- मिश्री खिलाता था; है ना?" नरेंद्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई।।
अब परमहंस जी ने फिर मुस्कुराए और प्रश्न पूछा - "कैसे जान लेता था मैं यह बात ? कभी सोचा है तूने ?" नरेंद्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे। गुरुवर स्मित हास्य के साथ बोले --"बता तो, मैं तेरी आंतरिक स्थिति को कैसे जान लेता था ?" नरेंद्र जी के विनम्र उत्तर-- "क्योंकि आप अंतर्यामी हैं गुरुदेव।।"
गुरुदेव जी आगे पूछ बैठे-- "अंतर्यामी किसे कहते हैं ?" नरेंद्र का उत्तर-- "जो सबके अंदर को झांककर देखने की क्षमता रखते हैं !!" गुरुदेव मुस्कुराते हुए बोले-- "कोई किसी दूसरे की अंदर में जाकर कैसे उसका अंदरूनी बात को जान सकता है ?" नरेंद्र जी की तुरन्त जवाब-- "जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।" परमहंस जी बोल पड़े-- "अर्थात मैं तेरे अंदर भी बैठा हूँ ?" नरेंद्र जी का स्वीकारोक्ति-- "जी, बिल्कुल गुरुजी, आप मेरे हृदय में समाये हुए हैं।।"
रामकृष्ण जी भावुक होकर कहे-- "नरेंद्र बेटे, तुम ठीक पकड़ा। तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूँ। तेरे हर दुःख- दर्द को एहसास कर सकता हूँ। तेरी भूख का भी अहसास कर लेता हूँ। क्या तेरी तृप्ति मुझ तक नहीं पहुँचती होगी ?" नरेंद्र के मुख से आश्चर्य पूरित शब्द-- "तृप्ति !" गुरुदेव की अभिव्यक्ति-- "हाँ नरेन, तुम ठीक सुना-- 'तृप्ति! जब तू भोजन करता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वो मुझे तृप्त नहीं करती होगी ? अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है, अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यों के भीतर बैठा सबकुछ भोगता है। मैं एक नहीं, हज़ारों मुखों से खाता हूँ। याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम- रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है, कंही भी अलगाव नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही, तब भी जीऊंगा, तेरे माध्यम से जीऊंगा, तुझ में हर वक्त रहूँगा।।"
उपलब्ध गुरुज्ञान :
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"गुरु अपने शिष्य के प्रति इतनी भावुक व दयावान होते हैं कि, शिष्य की हर उलझन को वे भली भांति महसूस कर लेते हैं। लेकिन शिष्य इन सब बातों से बे- खबर होता है। वह अपनी उलझनें गुरु के आगे गाता रहता है और भूल जाता है कि गुरु से कोई बात छिप सकती है क्या ? गुरु आखिर भगवान् का स्वरूप ही तो है। इसलिये गुरुज्ञान से बढ़कर ज्ञान नहीं, गुरु है अंतर्यामी के स्वरूप-- ये सिर्फ 'स्तुति' नहीं, सर्वथा प्रमाणित सत्य है।।"
1 week ago | [YT] | 9
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Praveen Krishna Shastri: Motivational Speaker
श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन निम्न तिथि में होने जा रहा है समस्त कथा प्रेमी भक्तजन सादर आमंत्रित हैं । 🌹❤🙏🙏
2 weeks ago | [YT] | 10
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Praveen Krishna Shastri: Motivational Speaker
https://youtu.be/NYIEue8joi8
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2 weeks ago | [YT] | 15
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2 weeks ago | [YT] | 12
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1 month ago | [YT] | 17
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https://youtu.be/1AjgUXmpDwg
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1 month ago | [YT] | 14
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https://youtu.be/LXepLbCqgOg?si=Pkzfq...
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1 month ago | [YT] | 11
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https://youtu.be/9-inxEhTTio
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1 month ago | [YT] | 12
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Praveen Krishna Shastri: Motivational Speaker
📕श्री गीता जयन्ती और गीता की महिमा-📕
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यह प्रश्न होता है कि 'श्री गीता जयन्ती मार्गशीर्ष शुल्क एकादशी को ही क्यों मनायी जाती है ? इसी दिन भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रति गीता का उपदेश दिया था, इसका क्या प्रमाण है ?' इसके लिये हमें महाभारत के युद्धारम्भ एवं पितामह भीष्म के परलोक गमन के कालपर दृष्टिपात करना आवश्यक है-महाभारत, भीष्मपर्व के अध्याय २, श्लोक २३-२४ में लिखा है कि कार्तिक की पूर्णिमा के चन्द्रमा को देखकर श्री वेदव्यास जी ने धृतराष्ट्र से कहा कि निकट भविष्य में बड़ा भयंकर युद्ध होनेवाला है; क्योंकि चन्द्रमा का रूप अग्नि के समान लाल, कान्तिहीन और अलक्ष्य दिखायी पड़ता है । महाभारत, अनुशासनपर्व के १६७ वें अध्याय के २७वें-२८वें श्लोकों में वर्णन आता है कि भीष्म जी ने माघ शुल्क अष्टमी के दिन अपने शरीर का परित्याग किया था । श्री भीष्म जी बहुत दिनोंतक शरशय्यापर पड़े रहे । इस हिसाब से माघ शुल्क पक्ष या पौष शुल्क पक्ष में तो गीता जयन्ती हो नहीं सकती, प्रत्युत मार्गशीर्ष में ही हो सकती है ।
यदि शुल्क पक्ष न मानकर कृष्ण पक्ष ही गीता जयन्ती का काल मान लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि महाभारत, द्रोणपर्व में वर्णन है कि चौदहवें दिन की रात्रि में जो संग्राम हुआ था, उस समय घोर अन्धकार था, प्रज्वलित दीपकों ( मशालों ) के प्रकाश में ही वह युद्ध हुआ था ( देखिये अ○ १६३ ); वहाँ अँधेरे में अपने-पराये का ज्ञान न रहने से लोग अपने पक्ष के वीरों का भी संहार करने लगे । तब अर्जुन ने युद्ध बंद करके विश्राम करने की आज्ञा दे दी ( देखिये अ○ १८४ ) । इस प्रकार की अन्धकारमयी रात्रि कृष्ण पक्ष में ही रहती है । इस हिसाब से गीता के प्राकट्य का समय कृष्ण पक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि गीता युद्धारम्भ के पहले ही कही गयी थी और उक्त चौदहवें दिन की रात्रि के युद्ध के समय में से तेरह दिन घटानेपर शुल्क पक्ष ही सिद्ध होता है ।
यदि कहें कि 'एकादशी के दिन ही गीता कही गयी, इसका क्या प्रमाण है ?' तो इसका उत्तर यह है कि उक्त चौदहवें दिन की रात्रि में आधी रात के पश्चात् चन्द्रमा के उदय होनेपर पुनः युद्ध आरम्भ हुआ था । वहाँ का चन्द्रमा का वर्णन कृष्ण पक्ष की नवमी के जैसा है; क्योंकि अर्धरात्रि के बाद चन्द्रोदय अष्टमी के पूर्व हो नहीं सकता । अतः उस युद्ध की रात्रि को पौष कृष्ण पक्ष की नवमी मानें तो उससे तेरह दिन घटानेपर मार्गशीर्ष शुल्क एकादशी ही ठहरती है ।
यदि यह मानें कि प्राचीन काल की गणना में शुल्क पक्ष पहले गिना जाता था, कृष्ण पक्ष बाद में-इस न्याय से मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी की रात्रि में युद्ध हुआ तो इसमें कोई विरोध नहीं है । उस काल से भी १३ दिन घटानेपर तिथि मार्गशीर्ष शुल्क एकादशी ही ठहरती है ।
इसके सिवा एकादशी का दिन पर्वकाल है और मार्गशीर्ष का महीना सबसे उत्तम माना गया है, जिसके लिये स्वयं भगवान् ने गीता में कहा है-'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्' ( १० । ३५ ) । इन सब प्रमाणों के आधारपर ही अनेक पण्डितों ने यह निर्णय किया है कि मार्गशीर्ष शुल्क एकादशी को ही युद्ध आरम्भ हुआ था और उसी दिन भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रति गीतोपदेश दिया था ।*
संसार में अध्यात्म विषयक ग्रन्थ गीता के समान और कोई नहीं है । गीतापर जितनी टीकाएँ, भाष्य और अनुवाद नाना प्रकार की भाषाओं और लिपियों में मिलते हैं, उतने दूसरे किसी धार्मिक ग्रन्थपर नहीं मिलते । गीताप्रेस, गोरखपुर में ही संस्कृत, हिंदी, गुजराती, बँगला, मराठी, उर्दू, अरबी, फारसी, गुरुमुखी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी आदि अनेक भाषाओं और लिपियों में मूल तथा भाषा टीका मिलाकर ९०० से अधिक गीताओं का संग्रह है ।
गीता की महिमा जो पद्मपुराण में मिलती है, उसे देखनेपर मालूम होता है कि गीता के सदृश महिमा दूसरे किसी ग्रन्थ की नहीं । गीता की महिमा महाभारत में स्वयं वेदव्यास जी ने भी कही है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनिःसृता ।।
( भीष्मपर्व ४३ । १ )
'गीता का ही अच्छी प्रकार से गान-श्रवण, कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण करना चाहिये; अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवान् के साक्षात् मुखकमल से निकली हुई है ।'
सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः ।
सर्वतीर्थमयी गंगा सर्ववेदमयो मनुः ।।
( भीष्मपर्व ४३ । २ )
'जैसे मनु जी सर्ववेदमय हैं, गंगा सकल तीर्थमयी है और श्री हरि सर्वदेवमय हैं, इसी प्रकार गीता सर्वशास्त्रमयी है ।'
भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च ।
सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ।।
( भीष्मपर्व ४३ । ५ )
'महाभारतरूपी अमृत के सर्वस्व गीता को मथकर और उसमें से सार निकालकर भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन के मुख में उसका हवन किया है ।'
गीता सारे उपनिषदों का सार है । शास्त्र में बतलाया है-
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।।
'सम्पूर्ण उपनिषद् गायें हैं, गोपालनन्दन श्री कृष्ण उनको दुहनेवाले ( ग्वाला ) हैं, अर्जुन बछड़ा हैं और गीता प्रेमी सात्त्विक बुद्धियुक्त भगवत्जन उनसे निकले हुए महान् गीतामृतरूपी दूध का पान करनेवाले हैं ।'
सम्पूर्ण शास्त्रों में गीता को सर्वोपरि माना गया है । कहा है-
एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीत-मेको देवो देवकीपुत्र एव ।
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ।।
'श्री देवकीनन्दन श्री कृष्ण का कहा हुआ गीता ग्रन्थ ही एक सर्वोपरि शास्त्र है, श्री कृष्ण ही एकमात्र सर्वोपरि देव हैं, उनके जो नाम हैं, वे ही सर्वोपरि मन्त्र हैं और उन परमदेव की सेवा ही एकमात्र सर्वोपरि कर्म है ।'
गीता गंगा से भी बढ़कर है । गंगा में स्नान करने का तो अधिक-से-अधिक फल स्नान करनेवाले की मुक्ति बताया गया है; अतः गंगा में स्नान करनेवाला तो स्वयं ही मुक्त हो सकता है, वह दूसरों को मुक्त नहीं कर सकता । किंतु गीतारूपी गंगा में स्नान करनेवाला तो स्वयं मुक्त होता है और दूसरों को भी मुक्त कर सकता है ।
गीता की भाषा भी मधुर, सरल, अर्थ और भावयुक्त है । अतएव सभी माता-बहिनों और भाइयों को प्रतिदिन कम-से-कम एक अध्याय का पाठ तो अर्थ और भाव समझते हुए अवश्य करना ही चाहिये ।
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जय श्री कृष्ण 🙏
1 month ago | [YT] | 4
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