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Ayurveda Darshan

आजकल बहुत से लोगों की Ultrasound या FibroScan रिपोर्ट में Fatty Liver निकलता है, और सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्या यह ठीक हो सकता है? अच्छी बात यह है कि फैटी लिवर के अधिकांश मामलों में सुधार संभव है, खासकर यदि समय रहते ध्यान दिया जाए। जितना शुरुआती ग्रेड होगा, उतनी जल्दी और बेहतर रिकवरी की संभावना रहती है।

1️⃣ Grade 1 Fatty Liver – सबसे आसानी से ठीक होने वाला
यह फैटी लिवर की शुरुआती अवस्था होती है, जिसमें लीवर में हल्की मात्रा में चर्बी जमा होती है। अधिकतर लोगों को कोई लक्षण नहीं होते और रिपोर्ट में संयोग से पता चलता है। यदि इस समय वजन नियंत्रित कर लिया जाए, तला-भुना भोजन कम किया जाए, रोजाना वॉक की जाए और शुगर-कॉलेस्ट्रॉल कंट्रोल रखा जाए, तो यह पूरी तरह सामान्य हो सकता है। यह सबसे reversible stage मानी जाती है।

2️⃣ Grade 2 Fatty Liver – सावधानी जरूरी
इस अवस्था में लीवर में चर्बी अधिक मात्रा में जमा होने लगती है और कुछ लोगों में SGPT/SGOT भी बढ़ सकते हैं। यदि व्यक्ति इस समय भी लापरवाही करे तो बीमारी आगे बढ़ सकती है। लेकिन सही खानपान, नियमित व्यायाम, मोटापा कम करना और डॉक्टर की सलाह से यह भी काफी हद तक ठीक हो सकता है। कई मरीजों में 3 से 6 महीने में अच्छा सुधार देखा जाता है।

3️⃣ Grade 3 Fatty Liver – गंभीर लेकिन सुधार संभव
Grade 3 में लीवर में फैट काफी बढ़ जाता है और सूजन या fibrosis शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इस समय मरीज को पेट भारी लगना, कमजोरी, गैस, थकान जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन यदि समय पर उपचार लिया जाए तो सुधार संभव है। इसमें अधिक अनुशासन, लंबा इलाज और नियमित जांच की जरूरत होती है।

4️⃣ Grade 4 Fatty Liver – रिपोर्ट को सही समझना जरूरी
कुछ रिपोर्टों में Grade 4 लिखा मिलता है, लेकिन अक्सर यह शब्द advanced fibrosis या cirrhosis जैसी स्थिति की ओर संकेत कर सकता है, खासकर FibroScan रिपोर्ट में। ऐसी अवस्था में केवल फैट नहीं बल्कि लीवर में कठोरता भी हो सकती है। यहाँ “पूरी तरह नया जैसा लीवर” होना कठिन हो सकता है, लेकिन बीमारी को रोकना, लीवर को स्थिर रखना, complications से बचाना और कार्यक्षमता सुधारना संभव होता है।

🍁 कौन सा ग्रेड कितने समय में सुधर सकता है?
Grade 1 वाले मरीजों में 2 से 4 महीने में सुधार दिख सकता है। Grade 2 में 3 से 6 महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। Grade 3 में 6 महीने से 1 साल तक मेहनत करनी पड़ सकती है। यदि fibrosis या cirrhosis है, तो लक्ष्य लंबे समय तक नियंत्रण और progression रोकना होता है।

🤔 केवल ग्रेड देखकर फैसला न करें
सिर्फ Ultrasound grade देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। साथ में SGPT, SGOT, Lipid Profile, Sugar, Platelet Count, FibroScan, वजन, कमर का आकार और जीवनशैली भी देखना जरूरी है। कई बार Grade कम होता है लेकिन नुकसान ज्यादा होता है, और कई बार Grade ज्यादा दिखता है लेकिन सुधार तेजी से हो सकता है।

🍁सबसे जरूरी इलाज क्या है?
फैटी लिवर का सबसे बड़ा इलाज दवा नहीं, बल्कि जीवनशैली सुधार है। वजन कम करना, रोज 30–45 मिनट चलना, चीनी कम करना, तली चीजें छोड़ना, शराब से दूरी, नींद सुधारना और तनाव कम करना बहुत प्रभावी उपाय हैं। सही समय पर ध्यान देने से लीवर दोबारा स्वस्थ होने की अच्छी क्षमता रखता है।

यदि सरल शब्दों में कहें तो Grade 1 और Grade 2 फैटी लिवर सबसे आसानी से ठीक हो सकते हैं। Grade 3 में भी अच्छा सुधार संभव है। Grade 4 या cirrhosis जैसी अवस्था में स्थिति संभालना, आगे नुकसान रोकना और जीवन की गुणवत्ता सुधारना मुख्य लक्ष्य होता है। इसलिए रिपोर्ट आते ही घबराने की जगह सही कदम उठाना सबसे जरूरी है।



Dr Aarif Malik
Ayurveda Consultant
More than 7+ Years of Experience
YouTube - "Ayurveda Darshan" & "Dr Aarif Malik"
Whatsapp No 070177 87033
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)

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2 weeks ago | [YT] | 1

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CKD (Chronic Kidney Disease) में अधिकतर रोगी कहते रहते हैं कि “मुझे खून की कमी है लेकिन यह कितना भी इलाज करुं, ठीक नहीं हो रही है।”रोगियों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि CKD में एनीमिया बहुत आम है—खासकर stage 3–5 में। इसका कारण एक नहीं, बल्कि कई parallel mechanisms होते हैं।
CKD (क्रॉनिक किडनी डिजीज) में एनीमिया के कुछ मुख्य कारण है-

1. एरिथ्रोपोइटिन (EPO) की कमी- EPO एक हार्मोन है जो किडनी द्वारा उत्पादित होता है। यही hormone bone marrow को RBC (red blood cells) बनाने का signal देता है और इस प्रकार लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन को उत्तेजित करता है। CKD में, किडनी की कार्यक्षमता कम होने से EPO का उत्पादन कम हो जाता है, जिससे लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन कम होता है। परिणामस्वरूप रोगी में normocytic normochromic anemia मिलती है।

2. आयरन की कमी- आयरन की कमी भी CKD में एनीमिया का एक आम कारण है। शरीर में आयरन होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं हो पाता है। क्योंकि CKD में inflammation होने के कारण hepcidin बढ़ता है। इसके प्रभाव से न तो iron gut से अवशोषित होता है और न ही stores से release होता है। परिणामस्वरूप iron available नहीं होता जिससे anemia होती है। आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन कम होता है।

3. विटामिन बी12 और फोलेट की कमी- डायलिसिस के कारण विटामिन बी12 और फोलेट की कमी होती है। साथ ही खान-पान में परहेज से भी इनकी कमी होती है जो CKD में एनीमिया का कारण हो सकती है।

4. किडनी की सूजन- किडनी की सूजन से लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन कम हो सकता है। CKD में chronic low-grade inflammation होने के कारण
cytokines (IL-6 आदि) बढ़ते हैं जिसके कारण
bone marrow suppression, RBC lifespan कम और hepcidin बढ़ता है। इनके सम्मिलित प्रभाव से एनीमिया बढ़ती जाती है।

5. सामान्य रूप से RBC life 120 दिनों की होती है
CKD में toxins (uremia) के कारण RBC जल्दी टूटते हैं और फिर उनकी life कम होकर 60–80 दिन ही रह जाती है।

6. CKD के कारण खून में toxins जमा होते हैं जिनसे bone marrow function suppress होकर एनीमिया होती है।

7. दवाओं का प्रभाव- कुछ दवाएं, जैसे कि एन्जियोटेंसिन-कॉनवर्टिंग एन्जाइम (ACE) इन्हिबिटर्स, एनीमिया का कारण हो सकती हैं।

CKD में एनीमिया के लक्षण:
- थकान
- कमजोरी
- सांस लेने में कठिनाई
- हृदय की धड़कन बढ़ना
- सिरदर्द

CKD में एनीमिया के लिए टेस्ट -
Hb कम
Ferritin normal/high (inflammation के कारण misleading)
TSAT कम
EPO कम

CKD में एनीमिया का इलाज:
- EPO की पूर्ति (ESA therapy)
- आयरन की पूर्ति
- विटामिन बी12 और फोलेट की पूर्ति
- Inflammation का इलाज
- दवाओं का समायोजन जैसे मंडूर भस्म, पुनर्नवा मंडूर इत्यादि
- डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लेंटेशन (अंतिम चरण में)

इस बारे में किसी तरह की शंका या प्रश्न या फिर कोई नई जानकारी हो तो बिना संकोच कमेंट करें। परामर्श/इलाज के इच्छुक व्यक्तिगत संपर्क करें। फेसबुक पर इलाज असंभव है।

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2 weeks ago | [YT] | 0

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📢 डायबिटीज को हल्के में मत लीजिए! (Don’t ignore Diabetes)
डायबिटीज का इलाज (Treatment) एक जैसा नहीं होता —
यह पूरी तरह निर्भर करता है:
✔️ Fasting Blood Sugar (FBS)
✔️ Post Prandial Blood Sugar (PPBS)
✔️ HbA1c (3 महीने का औसत शुगर लेवल)

⚠️ हर मरीज अलग होता है, इसलिए दवा और डोज भी अलग होती है।
💡 समय पर जांच (Regular Monitoring) + सही इलाज = बेहतर नियंत्रण (Better Control)

👉 आज ही अपनी शुगर जांच कराएं और सुरक्षित रहें!
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2 weeks ago | [YT] | 1

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बहुत से लोग हैरान होकर पूछते हैं कि हमने तो कोई खाने पीने में गलती नहीं की, फिर किडनी में पथरी कैसे बन गई।
वास्तव में पथरी अचानक एक दिन में नहीं बनती, बल्कि धीरे-धीरे महीनों या वर्षों में बनती है। जब पेशाब में कैल्शियम, ऑक्सलेट, यूरिक एसिड, फॉस्फेट जैसे खनिज तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर में पानी की कमी होने लगती है, तब मूत्र गाढ़ा हो जाता है। इस गाढ़े मूत्र में छोटे-छोटे क्रिस्टल बनने लगते हैं। यही क्रिस्टल आपस में जुड़कर धीरे-धीरे पथरी का रूप ले लेते हैं। गर्मियों में कम पानी पीना, बार-बार पसीना आना, पेशाब रोकना, अधिक नमक खाना, जंक फूड, बार-बार संक्रमण, मोटापा, मधुमेह, परिवार में हिस्ट्री और कुछ हार्मोनल या मेटाबॉलिक समस्याएँ पथरी बनने का खतरा बढ़ा देती हैं।

🍁 पथरी कितने प्रकार की होती है?
किडनी स्टोन सभी लोगों में एक जैसे नहीं होते।
• सबसे सामान्य पथरी Calcium Oxalate Stone होती है, जो अधिकांश मरीजों में पाई जाती है।
• दूसरी प्रकार Uric Acid Stone है, जो यूरिक एसिड बढ़ने वाले लोगों में अधिक देखी जाती है।
• तीसरी Struvite Stone होती है, जो बार-बार पेशाब के संक्रमण से बनती है।
• चौथी Cystine Stone है, जो दुर्लभ होती है और अक्सर आनुवंशिक कारणों से बनती है।
कई मरीजों में मिश्रित प्रकार की पथरी भी पाई जाती है। पथरी का प्रकार जानना जरूरी है, क्योंकि आगे की रोकथाम उसी पर निर्भर करती है।

🔥 किडनी पथरी के लक्षण क्या होते हैं?
कुछ लोगों में पथरी लंबे समय तक बिना लक्षण के रहती है और जांच में पता चलती है। लेकिन जब पथरी हिलती है या मूत्रनली में फँसती है, तब कमर के एक तरफ अचानक तेज दर्द शुरू होता है, जो पेट के नीचे, जांघ या जननांग क्षेत्र तक जा सकता है। दर्द लहरों में आता है और मरीज बेचैन हो जाता है। पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब आना, खून आना, मतली, उल्टी, बुखार या पेशाब रुकना भी हो सकता है। यदि बुखार के साथ दर्द हो तो यह गंभीर स्थिति हो सकती है।

💐 कौन सी जांच जरूरी होती है?
पथरी की सही जानकारी के लिए जांच बहुत महत्वपूर्ण है। Ultrasound KUB सबसे सामान्य और आसानी से उपलब्ध जांच है, जिससे किडनी, यूरेटर और ब्लैडर की स्थिति देखी जाती है। यदि पथरी छोटी हो या स्पष्ट न दिखे तो NCCT KUB (CT Scan) सबसे सटीक जांच मानी जाती है। Urine Routine Test से संक्रमण, खून या क्रिस्टल की जानकारी मिलती है। Blood Tests जैसे Creatinine, Urea, Uric Acid, Calcium आदि से किडनी की कार्यक्षमता और कारणों का पता चलता है। यदि पथरी निकल जाए तो उसकी जांच (Stone Analysis) भविष्य में दोबारा पथरी रोकने में मदद करती है।

🍁 आयुर्वेद में किडनी पथरी का इलाज
आयुर्वेद में किडनी स्टोन को अश्मरी कहा गया है। आयुर्वेद के अनुसार जब मूत्रवह स्रोतस में विकृति होती है और दोषों के कारण मूत्र में कण जमने लगते हैं, तब अश्मरी बनती है।
👉 उपचार का उद्देश्य पथरी को छोटा करना, गलाना, मूत्रमार्ग से बाहर निकालना, दर्द कम करना और दोबारा बनने से रोकना होता है।
👉 आयुर्वेद में औषधि, आहार, जल सेवन और दिनचर्या को साथ लेकर इलाज किया जाता है।

🍁 आयुर्वेद की उपयोगी दवाएँ
किडनी पथरी में कुछ प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधियाँ उपयोग की जाती हैं, जैसे
• पाषाणभेद, जो पथरी में पारंपरिक रूप से प्रसिद्ध है।
• गोक्षुर मूत्रमार्ग और सूजन में लाभकारी माना जाता है।
• वरुण छाल मूत्राशय व पथरी रोगों में उपयोगी मानी जाती है।
• पुनर्नवा सूजन और जलधारण की समस्या में सहायक है।
• इसके अलावा चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुलु, हजरुल यहूद भस्म, नीरूरी (भुम्यामलकी) आदि चिकित्सक की सलाह से दिए जाते हैं।
दवा का चुनाव पथरी के आकार, स्थान, दर्द, संक्रमण और रोगी की प्रकृति देखकर किया जाता है। स्वयं दवा लेना उचित नहीं है।

🤔 कितना समय लगता है?
यह प्रश्न हर मरीज पूछता है कि कितने दिन में पथरी ठीक होगी। इसका उत्तर पथरी के आकार और स्थान पर निर्भर करता है। यदि पथरी 3 से 5 mm की है तो कई बार पर्याप्त पानी, दवा और समय से 2 से 6 सप्ताह में निकल सकती है। 5 से 8 mm की पथरी में अधिक समय लग सकता है। बड़ी पथरी, फँसी हुई पथरी या बार-बार दर्द देने वाली पथरी में लेजर या अन्य प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है। आयुर्वेदिक उपचार में छोटे स्टोन में सामान्यतः 1 से 3 महीने तक समय लग सकता है, लेकिन हर मरीज अलग होता है।

🔥 कब तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए?
यदि कमर दर्द बहुत तेज हो, पेशाब बंद हो जाए, बुखार आ जाए, पेशाब में खून अधिक आए, उल्टी लगातार हो, कमजोरी बढ़े, या Creatinine बढ़ा हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। यदि एक ही किडनी हो या पहले से किडनी की बीमारी हो, तब देर करना खतरनाक हो सकता है।

किडनी की पथरी एक सामान्य लेकिन दर्दनाक समस्या है। सही समय पर जांच, पथरी का आकार जानना, उचित इलाज चुनना और जीवनशैली सुधारना सबसे महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद छोटे और शुरुआती मामलों में सहायक हो सकता है, लेकिन बड़े स्टोन, संक्रमण या रुकावट में आधुनिक चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है। सही मार्गदर्शन से अधिकांश मरीज पूर्ण राहत पा सकते हैं।

Dr Aarif Malik
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2 weeks ago | [YT] | 0

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फैटी लिवर का मतलब है लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होना। एक सामान्य लिवर और फैटी लिवर के बीच का अंतर हम इन आसान बिंदुओं से समझ सकते हैं:

1. देखने में कैसा बदलाव आता है?
• रंग: एक स्वस्थ लिवर गहरे लाल या भूरे रंग का होता है। लेकिन जब इसमें चर्बी जमा हो जाती है, तो इसका रंग बदलकर पीला (Yellowish) होने लगता है।
• आकार: चर्बी की वजह से लिवर में सूजन आ जाती है, जिससे वह अपने सामान्य आकार से बड़ा हो जाता है। इसे डॉक्टर 'लिवर बढ़ना' (Hepatomegaly) भी कहते हैं।
• बनावट: स्वस्थ लिवर छूने में कोमल और चिकना होता है, जबकि फैटी लिवर थोड़ा तेलीय (Greasy) और सख्त महसूस हो सकता है।

2. अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में कैसा दिखता है?
जब आप अल्ट्रासाउंड करवाते हैं, तो डॉक्टर रिपोर्ट में कुछ खास शब्द लिखते हैं:
• चमकदार लिवर (Bright Liver): चर्बी की वजह से लिवर अल्ट्रासाउंड की स्क्रीन पर सामान्य से ज्यादा सफेद या चमकता हुआ दिखाई देता है।
• धुंधलापन: लिवर के अंदर की नसें उतनी साफ नजर नहीं आतीं जितनी एक स्वस्थ लिवर में आती हैं।

फैटी लिवर की स्थिति को अगर विस्तार से समझें, तो यह केवल चर्बी जमा होने की बात नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग की बनावट और कार्यक्षमता में आने वाला एक बड़ा बदलाव है।
साधारण शब्दों में, हमारा लिवर शरीर की वह फैक्ट्री है जो खून को साफ करती है और खाने को ऊर्जा में बदलती है। जब हम अपनी जरूरत से ज्यादा कैलोरी, चीनी या कार्बोहाइड्रेट का सेवन करते हैं, तो लिवर उस अतिरिक्त ऊर्जा को फैट (Triglycerides) के रूप में जमा करने लगता है। एक स्वस्थ लिवर में चर्बी की मात्रा न के बराबर होती है, लेकिन जब लिवर के कुल वजन का 5% से 10% हिस्सा चर्बी बन जाता है, तो उसे फैटी लिवर कहा जाता है।

👉 दिखने के नजरिए से बात करें तो सबसे पहला बड़ा बदलाव इसके रंग और बनावट में आता है।
एक सामान्य, सेहतमंद लिवर गहरे लाल या कत्थई रंग का होता है और इसकी सतह एकदम चिकनी होती है। जैसे-जैसे इसमें फैट जमा होता है, इसका लाल रंग फीका पड़ने लगता है और यह पीला या हल्का मटमैला दिखने लगता है। चूंकि फैट तेल जैसा होता है, इसलिए लिवर की सतह भी चिपचिपी और चिकनी (Greasy) हो जाती है। इसके साथ ही, लिवर के अंदर की कोशिकाएं (Cells) फूलने लगती हैं, जिससे पूरे लिवर का आकार बढ़ जाता है। यही कारण है कि फैटी लिवर वाले कई लोगों को पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में भारीपन या हल्का दर्द महसूस होता है, क्योंकि बढ़ा हुआ लिवर अपनी जगह से बाहर फैलने की कोशिश करता है।
समय के साथ यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। अगर केवल चर्बी जमा है, तो इसे 'सिंपल स्टीटोसिस' कहते हैं, जिसमें लिवर को ज्यादा नुकसान नहीं होता। लेकिन जब यह चर्बी लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह लिवर की कोशिकाओं में जलन और सूजन (Inflammation) पैदा करने लगती है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में 'स्टीटोहेपेटाइटिस' कहा जाता है। इस दौरान लिवर न केवल पीला और बड़ा होता है, बल्कि अंदरूनी तौर पर उसमें छोटे-छोटे घाव या जख्म बनने शुरू हो जाते हैं। अगर सावधानी न बरती जाए, तो ये जख्म सख्त टिश्यू में बदल जाते हैं, जिसे 'फाइब्रोसिस' कहते हैं। अंत में, लिवर अपनी कोमलता खोकर पत्थर जैसा सख्त और छोटा हो जाता है, जिसे 'सिरोसिस' कहा जाता है।

🔥 राहत की बात यह है कि लिवर शरीर का इकलौता ऐसा अंग है जो खुद को दोबारा ठीक करने (Regenerate) की अद्भुत क्षमता रखता है। शुरुआती चरणों में, यानी जब लिवर सिर्फ पीला और भारी हुआ है, तब सही परहेज, नियमित व्यायाम और वजन घटाकर इसे वापस पूरी तरह स्वस्थ, लाल और कोमल बनाया जा सकता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह पलटी जा सकती है, बस इसके लिए अनुशासित जीवनशैली की जरूरत होती है।

लिवर से जमा चर्बी को धीरे-धीरे कम करने के लिए खान-पान में कुछ खास बदलाव करना सबसे असरदार तरीका है। लिवर की सेहत सुधारने के लिए नीचे दी गई चीजें बहुत मददगार साबित होती हैं:

👉 फाइबर और साबुत अनाज का सेवन
लिवर की सफाई के लिए फाइबर बहुत जरूरी है। आप अपनी डाइट में ओट्स (Oats), दलिया, ब्राउन राइस और मोटे अनाज जैसे रागी या बाजरा शामिल करें। इनमें मौजूद फाइबर शरीर में इंसुलिन के स्तर को संतुलित रखता है, जिससे लिवर में नया फैट जमा होना कम हो जाता है और पुराना फैट धीरे-धीरे कम होने लगता है।

🍁 हरी पत्तेदार सब्जियां और फल
पालक, ब्रोकली, मेथी और बथुआ जैसी सब्जियां लिवर के लिए वरदान हैं। इनमें मौजूद क्लोरोफिल और एंटीऑक्सीडेंट्स लिवर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। फलों में पपीता और सेब बहुत फायदेमंद हैं। पपीता खासतौर पर लिवर की कार्यक्षमता बढ़ाता है और चर्बी को गलाने में सहायक होता है। इसके अलावा, खट्टे फल जैसे नींबू और संतरा विटामिन-C से भरपूर होते हैं, जो लिवर की कोशिकाओं की मरम्मत करते हैं।

🔥 सही तेल और सूखे मेवे
फैटी लिवर का मतलब यह नहीं कि आप फैट पूरी तरह बंद कर दें, बल्कि आपको 'सही फैट' चुनना चाहिए। जैतून का तेल (Olive Oil) लिवर के एंजाइम्स को बेहतर बनाता है। साथ ही, अखरोट और अलसी के बीजों (Flax seeds) में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो लिवर की सूजन को कम करने में बहुत प्रभावी है। दिन भर में मुट्ठी भर सूखे मेवे खाना लिवर के लिए अच्छा रहता है।

🍁 लहसुन और हल्दी का उपयोग
भारतीय रसोई के ये दो मसाले लिवर के सबसे अच्छे दोस्त हैं। लहसुन में 'एलिसिन' होता है जो लिवर को साफ करने वाले एंजाइम्स को सक्रिय करता है। वहीं, हल्दी में मौजूद 'curcumin' (करक्यूमिन) लिवर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को ठीक करने और सूजन घटाने का काम करता है। रोज रात को दूध में चुटकी भर हल्दी या सुबह खाली पेट लहसुन की एक कली का सेवन बहुत लाभ पहुंचाता है।

🍁 ग्रीन टी और पर्याप्त पानी
ग्रीन टी में 'कैटेचिन' नाम का एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो रिसर्च के अनुसार लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद करता है। इसके साथ ही, दिन भर में कम से कम 3-4 लीटर पानी पिएं। पानी शरीर से टॉक्सिन्स को फ्लश आउट करता है, जिससे लिवर पर काम का बोझ कम होता है।

इन चीजों से बचें:
लिवर को ठीक करने के लिए जितना जरूरी सही खाना है, उतना ही जरूरी कुछ चीजों को छोड़ना है। ज्यादा चीनी (मिठाइयां, कोल्ड ड्रिंक), मैदा (बिस्किट, पिज्जा, समोसा) और शराब से पूरी तरह परहेज करें। ये चीजें लिवर में जाकर सीधे चर्बी में बदल जाती हैं।

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3 weeks ago | [YT] | 0

Ayurveda Darshan

किडनी हमारे शरीर की “प्राकृतिक फिल्टर मशीन” है, जो खून से गंदगी (toxins) और अतिरिक्त पानी निकालकर पेशाब के जरिए बाहर करती है। जब यह क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है, तो इसे किडनी रोग (Kidney Disease) कहा जाता है। इस स्थिति को सही तरीके से समझने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण जांच होती है—eGFR।

🔬 eGFR क्या बताता है?
eGFR यानी estimated Glomerular Filtration Rate—यह एक ऐसा आंकड़ा है जो बताता है कि आपकी किडनी प्रति मिनट कितना खून साफ कर पा रही है। इसे सीधे मशीन से नहीं नापा जाता, बल्कि खून में क्रिएटिनिन, आपकी उम्र और लिंग के आधार पर गणना करके निकाला जाता है।
सरल भाषा में समझें तो:
👉 eGFR जितना ज्यादा होगा, किडनी उतनी बेहतर काम कर रही है
👉 eGFR जितना कम होगा, किडनी की क्षमता उतनी कम हो रही है

📊 eGFR के आधार पर किडनी की स्थिति कैसे समझें?
• अगर eGFR 90 या उससे ज्यादा है, तो किडनी सामान्य मानी जाती है (हालांकि अन्य जांच भी देखी जाती हैं)।
• अगर eGFR 60 से 89 के बीच है, तो हल्की कमी मानी जाती है, जो अक्सर बिना लक्षण के होती है।
• जब eGFR 45 से 59 के बीच आता है, तो इसे मध्यम स्तर की कमी कहा जाता है—इस स्टेज पर सावधानी जरूरी हो जाती है।
• 30 से 44 के बीच आने पर किडनी की समस्या और गंभीर मानी जाती है।
• अगर eGFR 15 से 29 तक गिर जाए, तो यह गंभीर किडनी रोग है और डॉक्टर की नियमित निगरानी बहुत जरूरी होती है।
👉 और जब eGFR 15 से कम हो जाता है, तो यह किडनी फेल्योर का संकेत होता है, जिसमें डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है।

⚠️ eGFR कम क्यों होता है?
किडनी की कार्यक्षमता कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सबसे आम कारण हैं मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप (BP)। लंबे समय तक शुगर या BP कंट्रोल में न रहने पर किडनी धीरे-धीरे खराब होने लगती है।
इसके अलावा:
• बार-बार painkiller दवाओं का सेवन
• किडनी की सूजन (glomerulonephritis)
• शरीर में पानी की कमी (dehydration)
• कुछ hereditary (अनुवांशिक) रोग
भी eGFR को कम कर सकते हैं।

🔍 Creatinine और eGFR में क्या अंतर है?
बहुत से लोग सिर्फ “क्रिएटिनिन” देखकर ही किडनी का अंदाजा लगा लेते हैं, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं बताता।
👉 क्रिएटिनिन सिर्फ एक नंबर है
👉 eGFR उस नंबर को समझकर किडनी की असली क्षमता बताता है
कई बार क्रिएटिनिन थोड़ा-सा बढ़ा हुआ दिखता है, लेकिन eGFR काफी कम निकलता है—जो छिपी हुई किडनी समस्या का संकेत हो सकता है।

🧠 एक महत्वपूर्ण मेडिकल बात
किसी एक बार eGFR कम आने से घबराने की जरूरत नहीं होती।
👉 जब eGFR लगातार 3 महीने से ज्यादा समय तक 60 से कम रहता है, तभी इसे Chronic Kidney Disease (CKD) माना जाता है।

⚕️ किन लक्षणों पर ध्यान दें?
शुरुआती स्टेज में किडनी रोग के लक्षण नहीं भी हो सकते हैं। लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, ये संकेत दिख सकते हैं:
• पैरों या चेहरे पर सूजन
• पेशाब में झाग (protein leakage)
• बार-बार पेशाब आना या कम होना
• थकान, कमजोरी
• भूख कम लगना

🛡️ किडनी को कैसे बचाएं?
किडनी की बीमारी से बचाव पूरी तरह संभव है, अगर समय रहते सावधानी बरती जाए:
• ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रित रखें
• बिना जरूरत painkiller दवाएं न लें
• पर्याप्त पानी पिएं (लेकिन किडनी रोग में डॉक्टर से पूछकर)
• साल में कम से कम एक बार किडनी जांच (Creatinine + eGFR + Urine test) कराएं

🧾 एक आसान उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति का क्रिएटिनिन 1.3 mg/dl है—जो देखने में ज्यादा गंभीर नहीं लगता।
लेकिन जब eGFR निकाला गया, तो वह 52 आया।
👉 इसका मतलब है कि किडनी की कार्यक्षमता मध्यम स्तर तक कम हो चुकी है (Stage 3)।
👉 अगर सिर्फ क्रिएटिनिन देखकर छोड़ दिया जाए, तो बीमारी छिपी रह सकती है।

eGFR किडनी की सेहत का सबसे भरोसेमंद संकेतक है।
👉 सिर्फ “रिपोर्ट नॉर्मल है” सुनकर संतुष्ट न हों—eGFR को समझना जरूरी है।
👉 समय पर जांच और सही जीवनशैली से किडनी रोग को रोका या धीमा किया जा सकता है।

Dr Aarif Malik
B.A.M.S
Ayurveda Consultant
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3 weeks ago | [YT] | 0

Ayurveda Darshan

चिंता : मधुमेह चुपके से खराब कर रहा है लिवर
लैंसेट की स्टडी ‘डायफिब-लिवर 2026’ में हुआ खुलासा

नई दिल्ली, एजेंसी। भारत में मधुमेह के करोड़ों मरीजों के लिए एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। मेडिकल जर्नल लैंसेट की स्टडी ‘डायफिब-लिवर 2026’ के मुताबिक, भारत में टाइप 2 मधुमेह के शिकार हर लोग अनजाने में सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में हैं।
नए आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ आदतें ही नहीं, बल्कि समय पर जांच की कमी भी भारतीयों के लिवर को खोखला कर रही है। अब तक माना जाता था कि मधुमेह मुख्य रूप से आंखों (रेटिनोपैथी), किडनी (नेफ्रोपैथी) और नसों (न्यूरोपैथी) को नुकसान पहुंचाती है। लेकिन इस स्टडी ने लिवर की बीमारी (लिवर फाइब्रोसिस) को आधिकारिक तौर पर मधुमेह की चौथी बड़ी जटिलता घोषित कर दिया है। इस सर्वे में भारत के नौ हजार लोगों की जांच की गई, नतीजों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है।
स्टडी के अनुसार, भारत में मधुमेह वाले 26 फीसदी वयस्क (हर चार में से एक) लिवर फाइब्रोसिस से पीड़ित हैं। इनमें से 14 फीसदी लोग गंभीर स्थिति में हैं, जबकि पांच फीसदी लोग संभावित सिरोसिस के करीब पहुंच चुके हैं, फिर भी उनमें बीमारी के कोई बाहरी लक्षण नहीं दिख रहे हैं।

👉 किसे है ज्यादा खतरा
जो लोग 10 साल से ज्यादा समय से शुगर के मरीज हैं।
मोटे लोगों में लिवर खराब होने का खतरा दोगुना है।
पतले मरीजों में उम्र बढ़ने के साथ लिवर खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।
जिन मरीजों में किडनी की कार्यक्षमता कम हो।

🔥 रूटीन चेकअप में शामिल हो लिवर स्कैन
विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है, जब राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लिवर की स्क्रीनिंग को अनिवार्य कर देना चाहिए। जैसे मधुमेह के मरीज हर साल अपनी आंखों और किडनी की जांच करवाते हैं, वैसे ही उन्हें फाइब्रोस्कैन या सीरम बायोमार्कर टेस्ट करवाना चाहिए।
लिवर अक्सर तब तक दर्द महसूस नहीं होने देता, जब तक कि वह 70–80 फीसदी खराब न हो जाए। अगर किसी को मधुमेह है तो अपने लिवर की खामोश चोट को नजरअंदाज न करें।

👉 क्यों खास है स्टडी
इस खास सर्वे के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों से कुल 9,202 लोगों (ज्यादातर वयस्क) के डेटा की जांच की गई।
लिवर फाइब्रोसिस 26 फीसदी मधुमेह मरीजों में पाया गया, यानी लगभग हर चार में से एक व्यक्ति इससे ग्रस्त है।
लिवर की जांच के लिए फाइब्रोस्कैन (वीसीटीई) जैसा स्कैन और खून की जांच भरोसेमंद तरीके हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट सही आने के बावजूद लिवर के अंदर घाव (स्कारिंग) हो सकते हैं। इसे ‘बर्न-आउट’ स्थिति कहा जाता है, जहां लिवर में जमा फैट तो कम हो जाता है, लेकिन वह अंदर से पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका होता है।

Dr Aarif Malik
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3 weeks ago | [YT] | 0

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सावधान! लू से लापरवाही हो सकती है जानलेवा
डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक से बचने को अपनाएं सावधानियां

वाराणसी (काशीवार्ता):
भीषण गर्मी के बीच चल रही लू (हीट वेव) लोगों के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है। तेज गर्म हवाओं और बढ़ते तापमान के कारण लू लगने, डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। समय रहते बचाव और उपचार न होने पर यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है।
चौकाघाट स्थित राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय के कार्यचिकित्सा एवं पंचकर्म विभाग के पूर्व चिकित्सक डॉ. अजय कुमार ने काशीवार्ता से बातचीत में बताया कि गर्मी में अधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी और लवण की कमी हो जाती है, जिससे शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाता है और लू लगने का खतरा बढ़ जाता है।
उनके अनुसार, अत्यधिक प्यास लगना, मुंह सूखना, तेज बुखार, शरीर में जलन, चक्कर आना, उल्टी, नाड़ी और सांस का तेज चलना, कमजोरी तथा बेहोशी जैसी स्थिति लू के प्रमुख संकेत हैं। कई बार पसीना अत्यधिक आता है या अचानक बंद हो जाता है, जो गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है।

🍁 बचाव के लिए बरतें ये सावधानियां:
तेज धूप और गर्म हवाओं से बचना सबसे जरूरी है।
बाहर निकलते समय सिर को ढकें।
सूती और हल्के रंग के कपड़े पहनें, काले या सिंथेटिक कपड़ों से बचें।
धूप में निकलने से पहले पानी, शिकंजी या आम पन्ना पीकर निकलें और साथ में पानी जरूर रखें।
खाली पेट बाहर न जाएं।
गर्मी से आने के तुरंत बाद ठंडा पानी पीने या अचानक ठंडे कमरे में जाने से बचें।

🍁 आयुर्वेदिक उपाय कारगर:
डॉ. अजय कुमार ने बताया कि आयुर्वेद में लू से बचाव के कई सरल उपाय बताए गए हैं—
कच्चे आम का पन्ना
नारियल पानी
नींबू की शिकंजी
खस, ब्राह्मी, चंदन, गुलाब व केवड़ा के शरबत
ये सभी शरीर को ठंडक देते हैं।
छाछ, लस्सी, गन्ने का रस और सत्तू का सेवन लाभकारी है।
ककड़ी, तरबूज, खरबूजा, संतरा, अनार जैसे फलों का सेवन करें।
भोजन में पुदीना, सौंफ, धनिया, जीरा व काला नमक शामिल करें।
हल्का और सुपाच्य भोजन जैसे खिचड़ी, दाल का सूप लेना बेहतर है।

🍁 सलाह:
अत्यधिक गर्मी में मांसाहार, चाय, शराब और ज्यादा मसालेदार भोजन से परहेज करें।
साथ ही चंदन का लेप शरीर पर लगाने से भी शीतलता मिलती है।

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4 weeks ago | [YT] | 0

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“डॉक्टर साहब, ये गैस है या दिल का दर्द?”❓
मरीज अक्सर कहते हैं—“सीने में जलन हो रही है… कभी ऊपर पेट में दर्द उठता है… समझ नहीं आता ये गैस है, दिल का है या लिवर का।” यही सबसे बड़ी उलझन है, क्योंकि सीने और ऊपरी पेट का हिस्सा शरीर का ऐसा क्षेत्र है जहाँ कई अंगों के दर्द एक-जैसे महसूस हो सकते हैं। इसलिए केवल जगह देखकर फैसला करना मुश्किल होता है; दर्द का स्वभाव, समय और उससे जुड़े लक्षण ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।
आज के इस पोस्ट में आपको एक आसान तरीका मिल जाएगा जिससे आप समझ पाएंगे कि कौन सा दर्द आपको उठ रहा है। और आप एक निर्णय ले पाएंगे कि किस चिकित्सक के पास जाना है आपको
तो पढ़िए पूरी पोस्ट-

❤️ दिल का दर्द – कब सतर्क हो जाएँ?
अगर मरीज बताता है—“सीने में दबाव है, जैसे कोई वजन रखा हो… चलने या सीढ़ी चढ़ने पर बढ़ जाता है… पसीना आ रहा है, घबराहट हो रही है, दर्द हाथ या जबड़े तक जा रहा है”—तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह Angina Pectoris या Myocardial Infarction का संकेत हो सकता है। ऐसे में घर पर अंदाज़ा लगाने की जगह तुरंत ECG और डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है।

🔥 “जलन ज्यादा है” – क्या यह एसिडिटी है?
कई बार मरीज कहता है—“खाने के बाद या लेटने पर सीने में जलन बढ़ जाती है, खट्टी डकार आती है।” यह स्थिति अक्सर Gastroesophageal Reflux Disease यानी एसिडिटी से जुड़ी होती है। इसमें दर्द से ज्यादा “burning sensation” होता है, और antacid लेने या सीधा बैठने से राहत मिल जाती है। यह सबसे आम कारण है, लेकिन बार-बार होने पर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

🥗 “तैलीय खाना खाया और दर्द उठा” – गॉलब्लैडर की ओर इशारा
कुछ मरीज बताते हैं—“तेल-मसालेदार खाना खाने के बाद दाहिनी तरफ ऊपर पेट में तेज दर्द हुआ, जो कंधे या पीठ तक चला गया।” यह क्लासिक लक्षण Gallstones यानी गॉलब्लैडर स्टोन का हो सकता है। इसके साथ उल्टी या मिचली भी हो सकती है, और दर्द आमतौर पर episodic होता है।

🍺 “खाली पेट या गैस जैसा दर्द” – अल्सर या अपच
जब मरीज कहता है—“पेट के बीच में जलन है, खाली पेट बढ़ती है या खाने से कुछ फर्क पड़ता है, गैस और डकार भी है”—तो यह Peptic Ulcer Disease या सामान्य अपच (gas) की ओर संकेत करता है। यह दर्द अक्सर chronic pattern में होता है और जीवनशैली से जुड़ा होता है।

🧬 “लिवर का दर्द है क्या?” – एक आम भ्रम
अधिकांश लोग हर दाहिने ऊपरी पेट के दर्द को लिवर से जोड़ देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि लिवर की बीमारियों में तेज दर्द कम होता है। Hepatitis या fatty liver में आमतौर पर हल्का भारीपन, कमजोरी, भूख कम लगना या पीलिया जैसे लक्षण होते हैं—ना कि अचानक तेज दर्द।

⚖️ दर्द का व्यवहार पहचानें
अगर मरीज खुद समझना चाहे, तो एक आसान तरीका है—“दर्द का व्यवहार” देखें। लेटने से बढ़े तो एसिडिटी, चलने से बढ़े तो दिल का शक, तैलीय खाने के बाद बढ़े तो गॉलब्लैडर, और खाली पेट बढ़े तो अल्सर की संभावना ज्यादा होती है। यानी जगह से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दर्द कब और कैसे बदल रहा है।

“गैस समझकर नजरअंदाज न करें”
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सीने के दर्द को कभी भी केवल “गैस” मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार हार्ट अटैक भी गैस जैसा महसूस होता है और देर होने पर जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए अगर दर्द नया है, बार-बार हो रहा है या लक्षण गंभीर हैं, तो जांच (ECG, LFT आदि) कराना ही सुरक्षित रास्ता है।

Dr Aarif Malik
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1 month ago | [YT] | 0

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लिवर भोजन पचाने में मदद करता है। शरीर से जहरीले तत्व बाहर करता है। जरूरी पोषक तत्वों को जमा करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। उम्र के विभिन्न पड़ाव पर लिवर की जरूरतें बदलती रहती हैं, जिनकी अनदेखी करना लिवर की सेहत पर भारी पड़ता है। कैसे बचें, आइए जानें…

1️⃣ 20 से 29 साल : मजबूत नींव का समय
इस उम्र में सामाजिक मेलजोल अधिक होता है। शराब, जंक फूड व मीठा अधिक खाया जाता है, जो लिवर कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या करें:
▪ शराब का सेवन न करें
▪ जंक व प्रोसेस्ड फूड से बचें, मीठा कम खाएं
▪ हेपेटाइटिस ए और बी के टीके लगवाएं, ताकि लिवर संक्रमण से बचा जा सके
▪ खूब पानी पिएं, ताकि शरीर से विषैले पदार्थ निकल जाएं

2️⃣ 30-39 साल : मेटाबोलिज्म अब वजन प्रबंधन
इस उम्र में करियर, खानपान संबंधी लापरवाही और पारिवारिक तनाव मेटाबोलिज्म को धीमा बना सकता है। पेट पर वसा बढ़ने से लिवर पर दबाव बढ़ता है। वहीं तनाव भी ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाकर लिवर को नुकसान पहुंचाता है।
क्या करें:
▪ वजन काबू रखें
▪ बिना डॉक्टरी सलाह प्रोटीन पाउडर, स्टेरॉयड व सप्लीमेंट्स न लें
▪ फाइबरयुक्त चीजें अधिक खाएं, जिससे पेट संबंधी समस्याओं की दिक्कत कम होती है

3️⃣ 40 से 49 साल : जांच व दवाओं में सतर्कता
इस उम्र में फैटी लिवर और मेटाबोलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है। बिना लक्षण के भी नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस होने की आशंका बढ़ जाती है। इंसुलिन संवेदनशीलता कम होने से लिवर पर वसा जमने का खतरा बढ़ जाता है।
क्या करें:
▪ समय-समय पर लिवर फंक्शन टेस्ट कराएं, खासकर जब डायबिटीज व वजन अधिक हो
▪ बिना सलाह दर्द निवारक दवाएं न लें

4️⃣ 50 से 59 साल : कोलेस्ट्रॉल और ऑक्सीडेटिव लिवर नियंत्रण
इस पड़ाव पर लिवर की खुद को रिपेयर करने की क्षमता कम होने लगती है।
क्या करें:
▪ स्वस्थ वसा का चुनाव करें
▪ सैचुरेटेड फैट जैसे घी, मक्खन कम खाएं
▪ ओमेगा-3 युक्त चीजें जैसे मछली, अखरोट, अलसी खाएं
▪ उच्च वसा युक्त चीजें लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं, इसे काबू रखना जरूरी है
▪ बिना जरूरत दवाएं न लें
▪ फाइबर व एंटीऑक्सीडेंट युक्त चीजें खाएं
▪ रंग-बिरंगी सब्जियां व फल ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम करते हैं
▪ ओमेगा एंटीऑक्सीडेंट्स से डार्क चॉकलेट, ग्रीन टी जैसे पदार्थ भी लें

5️⃣ 60 के बाद
बुढ़ापे में लिवर का आकार और रक्त प्रवाह दोनों कम हो जाते हैं। दवाओं के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ जाती है।
क्या करें:
▪ घर का बना ताजा भोजन करें
▪ बाहर का खाना कम करें और सैचुरेटेड फैट कम से कम लें
▪ 7-8 घंटे की नींद जरूर लें
▪ कैफीन युक्त चीजें कम लें
▪ जहरीले रसायनों से बचें (जैसे सफाई केमिकल, कीटनाशक आदि)

🍁 ये आदतें हर उम्र में रखें साथ
▪ चीनी व रिफाइंड चीजों से दूरी रखें
▪ अच्छी क्वालिटी का प्रोटीन जैसे दालें, अंडा, पनीर खाएं
▪ स्वस्थ वसा विकल्प चुनें, ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त चीजें जैसे अखरोट, अलसी खाएं
▪ दवाओं का अधिक सेवन न करें, खासकर बिना डॉक्टरी सलाह
▪ लिवर सिरोसिस के बड़े कारण शराब व धूम्रपान से दूरी रखें
▪ दर्द निवारक दवाओं का अधिक इस्तेमाल न करें
▪ खूब पानी पिएं, हाइड्रेशन से लिवर का कार्य बेहतर होता है

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1 month ago | [YT] | 0