SWAR SANGEET - Unit of B.R.A. Music College

This College is created by the blessings of great ustad Jaswant Singh Bhawara Ji, especially for the classical music lovers & students or anyone in the music field. you can find here all the information regarding classical music theory and practical. You can also contact us for any kind of information regarding classical music, vocal & instrumental.

The premier educational College is doing yeoman service to promote, preserve, and progress Indian classical art forms of music.


Aims and objectives of the Trust

To conduct and research classes in Indian classical Hindustani classical Music (Vocal, Instrumental), Folk music, Modern music, according to the courses offered by various universities and welfare activities.

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ਰਾਗ ਭੀਮ ਪਲਾਸੀ ਦਾ ਰਾਗ ਪਰੀਚੈ

2 weeks ago (edited) | [YT] | 4

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ਸਤਿਕਾਰ ਯੋਗ ਉਸਤਾਦਾ ਦੇ ਉਸਤਾਦ ਉਸਤਾਦ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਜੀ ਪੰਜਾਬ ਘਰਾਣੇ ਦੇ ਮਹਾਨ ਤਬਲਾਵਾਦਕ

2 weeks ago (edited) | [YT] | 7

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आड़ा चार ताल भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक महत्वपूर्ण ताल है, जिसमें कुल 14 मात्राएं होती हैं। इन्हें सात विभागों में बांटा जाता है, और प्रत्येक विभाग में दो मात्राएं होती हैं। इस ताल में ताली (तालियों) और खाली (मौन) की विशेषताएं होती हैं, जो इसकी लय और संरचना को निर्धारित करती हैं।

आड़ा चार ताल की संरचना:

मात्राएं: 14 मात्राएं

विभाग: 7 विभाग (प्रत्येक में 2 मात्राएं)

ताली: 1, 3, 7, और 11वीं मात्राओं पर ताली लगती है।

खाली: 5, 9, और 13वीं मात्राओं पर खाली होती है।


बोल (Theka):

आड़ा चार ताल के बोल इस प्रकार होते हैं:

धिं तिरकिट / धी ना / तू ना / क त्ता / तिरकिट धी / ना धी / धी ना

ठेका का उदाहरण:

आड़ा चार ताल का ठेका इस प्रकार होता है:

मात्रा: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14

बोल: धिं तिरकिट / धी ना / तू ना / क त्ता / तिरकिट धी / ना धी / धी ना

चिन्ह: X 2 0 3 0 4 0

लयकारी :

आड़ा चार ताल में लयकारी के विभिन्न रूप होते हैं, जैसे ठाह (एकगुन), दुगुन, तिगुन, और चौगुन। इनमें बोलों की गति और संख्या में परिवर्तन होता है, जिससे ताल की जटिलता और विविधता बढ़ती है।

1 year ago | [YT] | 4

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ਸਰੰਦਾ ਸਾਜ਼ ਗਜ਼ ਨਾਲ ਵਜਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਗੁਰਮਤਿ ਸੰਗੀਤ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਸਮੇਂ ਸਰੰਦਾ ਸਾਜ਼ ਪ੍ਰਚਲਿਤ ਹੋਇਆ। ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਸਾਜ਼ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਆਪ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਸਿੱਖ ਅਜਾਇਬਘਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਰੱਖੇ ਹੋਏ ਸਰੰਦੇ ਨੂੰ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਅਮਰਦਾਸ ਜੀ ਦਾ ਸਰੰਦਾ ਦੱਸਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹਿਮਾਚਲ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਦੇ ਮੰਡੀ ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਇਕ ਇਤਿਹਾਸਕ ਗੁਰਦੁਆਰੇ ਵਿੱਚ ਰੱਖੇ ਗਏ ਸਰੰਦੇ ਨੂੰ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਵੱਲੋਂ ਬਣਾਇਆ ਸਰੰਦਾ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਮਹੰਤ ਸ਼ਾਮ ਸਿੰਘ ਜੀ 70 ਸਾਲ ਤੱਕ ਇਸ ਸਾਜ਼ ਨਾਲ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਕੀਰਤਨ ਕਰਦੇ ਰਹੇ।

ਸਮੇਂ ਦੀ ਤੌਰ ਨਾਲ ਸਿਤਾਰ, ਮੈਂਡੋਲਿਨ ਤੇ ਵਾਇਲਨ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਜਰਮਨ ਸਾਜ਼ ਵਾਜੇ (ਹਰਮੋਨੀਅਮ) ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਹੁਣ ਆਮ ਗੱਲ ਹੈ। ਪੁਰਾਣੇ ਰਾਗੀ ਆਟੇ ਵਾਲਾ ਧਾਮਾ ਵਰਤਦੇ ਸਨ, ਜਦਕਿ ਹੁਣ ਵਾਲੇ ਜੱਥੇ ਆਧੁਨਿਕ ਤਕਨੀਕ ਨਾਲ ਬਣੇ ਤਬਲੇ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਆਟੇ ਵਾਲੇ ਕਈ ਤਬਲਾ ਵਾਦਕ ਧਰੁਪਦ ਧਮਾਰ ਸ਼ੈਲੀ ਦੇ ਮਾਹਰ ਸਨ। ਤੰਤੀ ਸਾਜ਼ਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਚਲਨ ਨੂੰ ਮੁੜ ਹਰਮਨ ਪਿਆਰਾ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਜਵੱਦੀ ਟਕਸਾਲ ਲੁਧਿਆਣਾ ਦੇ ਬਾਨੀ ਸਵਰਗੀ ਸੰਤ ਸੁੱਚਾ ਸਿੰਘ ਦਾ ਅਹਿਮ ਰੋਲ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਨਾਂ ਦੇ ਜਾਨਸ਼ੀਨ ਬਾਬਾ ਅਮੀਰ ਸਿੰਘ ਵੀ ਓਥੇ ਸਥਾਪਤ ਗੁਰਸ਼ਬਦ ਸੰਗੀਤ ਅਕੈਡਮੀ ਰਾਹੀਂ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਤੰਤੀ ਸਾਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਕੀਰਤਨ ਦੀ ਸਿਖਲਾਈ ਦੇ ਕੇ ਵਡਮੁੱਲਾ ਯੋਗਦਾਨ ਪਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸੇ ਤਰਾਂ, ਸ੍ਰੀ ਭੈਣੀ ਸਾਹਿਬ ਵਿਖੇ ਨਾਮਧਾਰੀ ਪੰਥ ਵੱਲੋਂ ਵੀ ਸਮੁੱਚਾ ਕੀਰਤਨ ਤੰਤੀ ਸਾਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਹੀ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਗੁਰਮਤਿ ਸੰਗੀਤ ਅਕੈਡਮੀ ਅਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਪਟਿਆਲਾ ਵੀ ਇਸ ਬੰਨੇ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਉਪਰਾਲੇ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਹ ਚੰਗੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਅਕਾਸ਼ਵਾਣੀ ਉੱਤੇ ਆਡੀਸ਼ਨ ਸਮੇਂ ਵਾਜੇ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਦੀ ਮਨਾਹੀ ਹੈ ਅਤੇ ਟੈਸਟ ਤਾਨਪੂਰੇ ਸਮੇਤ ਤੰਤੀ ਸਾਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਹੀ ਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਤੰਤੀ ਸਾਜ਼ਾਂ ਦੀ ਪੁਨਰ ਸੁਰਜੀਤੀ ਲਈ ਇਹ ਸ਼ੁੱਭ ਸੰਕੇਤ ਹੈ

1 year ago | [YT] | 5

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   ਪਖਾਵਜ ਜਾਂ ਮਿਰਦੰਗ    ਗੁਰਮਤਿ ਸੰਗੀਤ ਪਰੰਪਰਾ ਦੇ ਅੰਤਰਗਤ ਕੀਤਰਨਕਾਰਾਂ ਵਲੋਂ ਪਖਾਵਜ/ਮਿਦੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਯੋਗ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। 'ਮ੍ਰਿਦੰਗ' ਦਾ ਸ਼ਾਬਦਿਕ ਅਰਥ ਹੈ 'ਮਿੱਟੀ ਦਾ ਸਰੀਰ'। ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਸਾਹਿਬ ਅਕਸਰ ਪਖਾਵਜ ਵਜਾਇਆ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਨਿੱਜੀ ਮਿਦੰਗ ਭਾਈ ਗੁਰਬਖ਼ਸ਼ ਨੂੰ ਆਸ਼ੀਰਵਾਦ ਰੂਪ ਵਿਚ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕੀਤੀ, ਜਿਹੜੀ ਕਿ ਅੱਜ ਗੁਰਦਆਰਾ ਮ੍ਰਿਦੰਗਾਵਲੀ ਸਾਹਿਬ ਵਿਖੇ ਸੁਸ਼ੋਵਿਤ ਹੈ।

ਇਹ ਸਾਜ਼ ਦੋਵਾਂ ਹੱਥਾਂ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਵਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਲੱਕੜ ਦੇ ਖਾਲੀ ਖੋਲ ਤੋਂ ਬਣਿਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇਸਦੀ ਲੰਬਾਈ ਤਿੰਨ ਫੁੱਟ ਤੱਕ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਪਖਾਵਜ ਨੂੰ ਚਮੜੇ ਦੇ ਬਣੇ ਪਰਦਿਆਂ ਨਾਲ ਢੱਕਿਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਚਮੜੇ ਦੀਆਂ ਹੀ ਬੱਧਰੀਆਂ ਨਾਲ ਕੱਸਿਆ ਜਾਦਾ ਹੈ। ਪਖਾਵਜ ਦੇ ਖੱਬੇ ਪਾਸੇ ਆਟੇ ਦੀ ਪਰਤ ਲਗਾ ਕੇ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਭਾਰੀ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਸੱਜੇ ਪਾਸੇ ਕਾਲੀ ਸ਼ਿਆਹੀ ਦੀ ਪਰਤ ਚੜਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

ਪਖਾਵਜ ਦੀ ਵਾਦਨ ਸ਼ੈਲੀ ਵੀ ਜੋੜੀ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੀ ਖੁੱਲੇ ਬੋਲਾਂ ਵਾਲੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਵਰਤਮਾਨ ਸਮੇਂ ਗੁਰਮਤਿ ਸੰਗੀਤ ਵਿਭਾਗ ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ, ਪਟਿਆਲਾ ਵਲੋਂ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਦੁਬਾਰਾ ਇਸ ਸਾਜ਼ ਦੀ ਸਾਂਭ-ਸੰਭਾਲ, ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਪੁਨਰਸੁਰਜਿਤੀ ਲਈ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਉਪਰਾਲੇ ਕੀਤੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। 

1 year ago (edited) | [YT] | 3

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किशोरी अमोनकर: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक प्रमुख गायिका
* प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण: किशोरी अमोनकर का जन्म 10 अप्रैल 1931 को हुआ था। वह प्रसिद्ध जयपुर-अतरौली घराने की गायिका मोगुबाई कुर्डीकर की बेटी थीं। उन्होंने अपनी माँ से ही संगीत की शिक्षा प्राप्त की और बाद में अनंत मनोहर जोशी और खुशी मोहम्मद खान जैसे दिग्गजों से भी सीखा।
* संगीत शैली: उनकी गायकी में जयपुर घराने की विशुद्धता के साथ-साथ उनकी अपनी मौलिकता और भावुकता का अद्भुत संगम था। वह ख़याल, ठुमरी और भजन गायन में पारंगत थीं। उनकी आवाज़ में एक गहराई और तीव्रता थी जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
* योगदान और उपलब्धियाँ: किशोरी अमोनकर ने अपने संगीत के माध्यम से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
* निधन: 3 अप्रैल 2017 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी संगीत विरासत आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
प्रमुख बिंदु:
* जन्म: 10 अप्रैल 1931
* निधन: 3 अप्रैल 2017
* घराना: जयपुर-अतरौली
* गायन शैली: ख़याल, ठुमरी, भजन
* पुरस्कार: पद्म भूषण, पद्म विभूषण
* विशेषता: भावपूर्ण गायकी, मौलिकता, गहराई
किशोरी अमोनकर एक ऐसी संगीत साधिका थीं जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से लोगों के दिलों को छुआ और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक नई पहचान दी।

1 year ago | [YT] | 1

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कर्नाटक संगीत के 72 मेलकर्ता रागों के नाम:
कर्नाटक संगीत में 72 मेलकर्ता राग होते हैं, जिन्हें "जनक राग" भी कहा जाता है। इन रागों से अनगिनत रागों का निर्माण होता है।
मेलकर्ता रागों को 12 चक्रों में विभाजित किया गया है:
* इंदु चक्र
* नेत्र चक्र
* अग्नि चक्र
* वेद चक्र
* बाण चक्र
* ऋतु चक्र
* ऋषि चक्र
* वासु चक्र
* ब्रह्म चक्र
* दिसी चक्र
* रुद्र चक्र
* आदित्य चक्र
प्रत्येक चक्र में 6 राग होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं:
इंदु चक्र:
* शंकराभरणम
* गौरीमनोहरि
* हनुमतोड़ी
* हरिकांबोजी
* मध्यावती
* कल्याणी
नेत्र चक्र:
* शिवरंजनी
* खरहरेपणम
* हतकम्बरी
* धातुवर्ती
* गंगारसक
* रागवर्धनी
अग्नि चक्र:
* सारंगम
* केदारगौला
* धनाश्री
* स्यामकल्याणी
* वसंतश्री
* मलयागौरी
वेद चक्र:
* कनकंगी
* रत्नांगी
* गौरीप्रिया
* गीतम
* शिवमोग्गा
* धवळाम्बरी
बाण चक्र:
* नागस्वरम
* खांडेता
* कोकिलप्रिया
* सुप्रभातम
* हेमवती
* श्रीरंगम
ऋतु चक्र:
* ज्ञानप्रिया
* विजयश्री
* जयंतसेन
* विजयकेशवी
* शिवकल्याणी
* हेमवंतम
ऋषि चक्र:
* धीरशंकराभरणम
* शास्ता
* सुषलिंगम
* घनरागम
* वागेश्री
* गौरीमनोहरि
वासु चक्र:
* भोगवर्धनी
* शालिनी
* कांबोजी
* शांता
* अनुश्री
* ऋषभप्रिया
ब्रह्म चक्र:
* मधुवंतम
* रामप्रिया
* गोविंदप्रिया
* विजयश्री
* चित्राम्बरी
* सुभद्रा
दिसी चक्र:
* केदार
* अटलांटा
* दीपक
* सारंगम
* भैरवी
* कल्याणी
रुद्र चक्र:
* गौतम
* शिवप्रिया
* ध्रुपद
* नाट्या
* कल्याणी
* केदारगौला
आदित्य चक्र:
* तानरंगिणी
* चक्रवाकम
* सुषलिंगम
* हेमवंतम
* धीरशंकराभरणम
* Ната भैरवी
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कुछ मेलकर्ता रागों के नामों में भिन्नताएं हो सकती हैं, क्योंकि विभिन्न संगीत विद्वानों ने उन्हें अलग-अलग नाम दिए हैं।

1 year ago | [YT] | 2

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सारंगी।


भारतीय शास्त्रीय संगीत में सारंगी एक प्रमुख वाद्य यंत्र है जो अपने मधुर और गहरे स्वरों के लिए प्रसिद्ध है। इसका उपयोग विशेष रूप से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में किया जाता है।

सारंगी का वर्णन

1. **आकृति और संरचना**: सारंगी एक तंतुवाद्य (string instrument) है, जो लकड़ी से बना होता है और इसमें तीन मुख्य तार (main strings) होते हैं। इसके अलावा, 35-40 अतिरिक्त रेजोनेटर तार (sympathetic strings) भी होते हैं, जो बजाने पर सह-ध्वनि उत्पन्न करते हैं। सारंगी के तारों को घोड़ों के बाल से बने धनुष (bow) की सहायता से बजाया जाता है।

2. **ध्वनि और स्वभाव**: सारंगी की ध्वनि बहुत ही मधुर और मानवीय स्वर के निकट मानी जाती है। इसके स्वर गहरे होते हैं, जो इसे गेयता प्रदान करते हैं। यह विभिन्न प्रकार की भावनाओं को व्यक्त करने में सक्षम है, जो इसे गायन और वादन दोनों के लिए उपयुक्त बनाता है।

3. **बजाने की विधि**: सारंगी को बजाने के लिए इसे वादक की गोद में रखा जाता है और धनुष से तारों को खींचा जाता है। उंगलियों के नाखूनों से तारों को दबाकर विभिन्न स्वरों का निर्माण किया जाता है।

सारंगी की उत्पत्ति

सारंगी की उत्पत्ति का सटीक इतिहास अस्पष्ट है, लेकिन इसे प्राचीन भारतीय संगीत के सबसे पुराने वाद्य यंत्रों में से एक माना जाता है। यह माना जाता है कि सारंगी का विकास राजस्थानी लोक संगीत के वाद्यों से हुआ है। इसका नाम 'सारंगी' संस्कृत के शब्द 'सारंग' से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'रंगीन' या 'बहुरंगी', जो इसके ध्वनि की विविधता को दर्शाता है।

सारंगी के प्राचीन रूप 'रावणहत्था' का उल्लेख भारतीय पौराणिक कथाओं में भी मिलता है, जिसे भगवान शिव के द्वारा बजाया गया था। आधुनिक स्वरूप की सारंगी मुग़ल काल के दौरान विकसित हुई और तब से यह भारतीय शास्त्रीय संगीत का अभिन्न अंग बन गई।

सारंगी के प्रसिद्ध वादक

भारतीय संगीत में कई प्रसिद्ध सारंगी वादक हुए हैं, जिन्होंने इसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित बनाया। इनमें उस्ताद सुल्तान खान, पंडित राम नारायण, और उस्ताद सागिरुद्दीन खान जैसे महान कलाकार शामिल हैं। इन वादकों ने सारंगी को वैश्विक मंच पर भी मान्यता दिलाई है।

सारंगी का भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक महत्वपूर्ण स्थान है और इसकी ध्वनि आज भी श्रोताओं के हृदय को छूने में सक्षम है।।

1 year ago | [YT] | 3

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72 मेलकर्ताओं के नाम।
पंडित वेंकटमखी ने 72 मेलकृत रागों की एक प्रणाली विकसित की जिसे "72 मेलकर्ता राग" के रूप में जाना जाता है। यह प्रणाली दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत में महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहां 72 मेलकर्ता रागों की सूची दी गई है:

1. कनकांगी
2. रत्नांगी
3. गणमूर्ती
4. वनस्पति
5. मानवती
6. तनरूपि
7. सेनावती
8. हनुमतोडि
9. धेनुका
10. नाटकप्रिय
11. कोकिलाप्रिय
12. रूपवती
13. गायकप्रिय
14. वकुलाभरणम
15. मयामालवगौला
16. चक्रवाकम
17. सूर्यकान्तम
18. हातकम्भरी
19. झंकारध्वनि
20. नटभैरवि
21. किरवाणी
22. खरहरप्रिय
23. गौरीमनोहरी
24. वरुणप्रिय
25. माररंजनि
26. चारुकेशी
27. सरसांगी
28. हरिकाम्भोजि
29. धीरसंकराभरणम
30. नागानंदिनी
31. यागप्रिय
32. रागवर्धिनी
33. गंगेयभूषनी
34. वागधीस्वरी
35. सुलिनी
36. चलनाट
37. सालगम
38. जलार्णवम्
39. झलावरालि
40. नवनीतम
41. पावनि
42. रघुप्रिया
43. गवाम्बोधि
44. भावप्रिय
45. शुभपन्तुवरालि
46. षड्विदमार्गिणी
47. सुवर्णांगी
48. दिव्यमणि
49. धवलाम्बरि
50. नमनारायणी
51. कामवर्धिनी
52. रामप्रिय
53. गमनाश्रम
54. विश्वम्भरी
55. श्यामलांगी
56. षण्मुखप्रिय
57. सिम्हेन्द्रमध्यमम्
58. हेमावती
59. धर्मावती
60. नीतिमति
61. कांतामणि
62. ऋषभप्रिय
63. लाटांगी
64. वाचस्पति
65. मेचकल्याणी
66. चित्राम्बरि
67. सुचरित्र
68. ज्योतिस्वरूपिणी
69. धातुवर्धनी
70. नासिकाभूषणी
71. कोसलम्
72. रसिकप्रिय

ये 72 मेलकर्ता राग कर्नाटक संगीत की एक महत्वपूर्ण और आधारभूत संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं। #swarsangeet #bramusiccollege

1 year ago (edited) | [YT] | 3