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Sant Rampal Ji is the Tatvadarshi Sant on earth to date : who is providing scriptures based worship . There are four sequential fundamental conditions which have to be fulfilled to worship to attain spiritual benefits....
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Understand the knowledge given by Sant Rampal Ji Maharaj . Develop full faith in the fact that , Lord Kabir ( Kabir Saheb Ji ) is Supreme God . Take initiation from Sant Rampal Ji Maharaj and do worship as ordained by Sant Rampal Ji . Follow the rules laid down by Sant Rampal Ji very strictly ...
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spiritual boy Gulshan 123
अगर मुझे जीवन में कोई सच्चा मिला है,
तो वो है मेरे गुरु जी। 😢🙇🏼♀️🥺
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4 days ago | [YT] | 10
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spiritual boy Gulshan 123
🥹🤲बहुत प्यारा दृश्य है ये। जहां नकली गुरु और पंडित लोग आम जनता से दूरी बनाकर रखते हैं वहीं संत रामपाल जी महाराज सबको अपनापन देते हैं प्यार देते हैं प्रेम से गले लगाते हैं। हम कितने सौभाग्यशाली हैं जो हमें संत रामपाल जी महाराज गुरु रूप में साक्षात परमपिता परमात्मा प्राप्त हुए ❤️
#santrampaljimaharaji
#Viral
#Trending
@SaintRampalJiMaharaj
1 week ago | [YT] | 8
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spiritual boy Gulshan 123
@SaintRampalJiMaharaj
1 week ago | [YT] | 19
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spiritual boy Gulshan 123
"दामन पर लगाए लाख दाग, कोई सच्चा पाया ना।
खूब करी कोशिश बदनाम, कोई कर पाया ना।
आज न्याय और सत्य की जीत का दिन है। परमात्मा की महिमा अपरंपार है। 🚩"
SaintRampalJi #TruthWins #Justice #SpiritualAwakening #VictoryOfTruth #SaintRampalJiMaharaj
@SaintRampalJiMaharaj @FactfulDebates @AlKabirIslamic @SatlokAshramNewsChannel @AlKabirIslamic @RealStory99 @SatlokAshramBetul @SatlokAshram @SATrueStoryOfficial
2 weeks ago | [YT] | 15
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spiritual boy Gulshan 123
अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
📖📖📖📖📖
जीने की राह पार्ट - 16
पृष्ठ: 36-39
"संगत का प्रभाव तथा विश्वास प्रभु का"
एक गाँव में एक व्यक्ति के विवाह को दस बारह वर्ष हो चुके थे। संतान नहीं हुई थी। उसी गाँव से बाहर लगभग दो कि.मी. की दूरी पर एक आश्रम था। उसमें एक सिद्ध संत रहता था। वह गाँव में से भिक्षा माँगकर लाता था। उसको तीन-चार या अधिक दिन खाता रहता था । एक दिन वह उस घर से भिक्षा लेने गया जिस व्यक्ति को संतान नही थी । स्त्री-पुरूष दोनों ने साधु जी से पुत्र प्राप्ति के लिए चरण पकड़कर प्रार्थना की। साधु ने कहा कि एक शर्त पर संतान हो सकती। स्त्री-पुरुष ने पूछा कि बताओ । साधु ने कहा कि प्रथम पुत्र उत्पन्न होगा । दो वर्ष होने के पश्चात् मुझे चढ़ाना होगा। उसे मैं अपना उत्तराधिकारी बनाऊँगा। आपको मंजूर हो तो बताओ। उसके पश्चात् लड़की होगी। फिर एक पुत्र होगा। दोनों ने उस शर्त को स्वीकार कर लिया। साधु के आशीर्वाद से दसवें महीने पुत्र हुआ। दो वर्ष का होने पर साधु को सौंप दिया। उस समय स्त्री फिर गर्भवती थी। उसने कन्या को जन्म दिया। फिर एक पुत्र और हुआ। जिस कारण से साधु की महिमा और अधिक हो गई। उस आश्रम में युवा लड़कियों का प्रवेश निषेध था। जब वह लड़का सोलह वर्ष का हुआ तो एक दिन गुरु जी को छाती में स्तन के पास फोड़ा हो गया। जिस कारण साधु जी दर्द के कारण व्याकुल रहने लगा। जड़ी-बूटी बनाकर उस फोड़े पर लगाई। चार-पाँच दिन में वह फोड़ा फूटकर ठीक हुआ। तब साधु सामान्य हुआ। कुछ दिन के पश्चात् साधु को बुखार हो गया। वृद्धावस्था व बुखार के कारण उत्पन्न कमजोरी की वजह से चलने-फिरने में असमर्थ हो गया। साधु ने उस शिष्य को कभी गाँव में मिक्षा लेने नहीं भेजा था। यह विचार करके कि कहीं जवान लड़का गाँव में लड़कों के साथ बैठकर बुरी संगत में पड़कर कोई गलती न कर दे।
कहीं विवाह करने की प्रेरणा न हो जाए। परंतु उस दिन विवश होकर साधु ने अपने शिष्य से कहा कि बेटा! भिक्षा माँगकर ला और गाँव में प्रथम गली में चौथे घर से जो मिले, उसे लेकर आ जाना, आगे मत जाना। लड़का गुरूजी के आदेशानुसार उसी घर के द्वार पर गया और बोला, अलख निरंजन ! उस घर से एक 14 वर्षीय लड़की भिक्षा डालने के लिए द्वार पर आई तो साधु लड़का उस लड़की की छाती की ओर गौर से देख रहा था। लड़की ने देख लिया कि साधु की दृष्टि में दोष है। लड़की बोली कि ले बाबा भिक्षा। साधु बोला, हे माई की बेटी! तेरी छाती पर दो फोड़े हुए हैं। आप आश्रम में आ जाना। तेरे फोड़े गुरू जी ठीक कर देंगे। हे माई की बेटी! आपको - बहुत पीड़ा हो रही होगी। मेरे गुरू जी को तो एक ही फोड़े ने दुःखी कर रखा था। यह बात लड़के साधु से सुनकर लड़की का अंदाजा और दृढ़ हो गया कि यह साधु नेक नहीं है। लड़की ऊँची-ऊँची आवाज में बोलने लगी कि अपनी माँ-बहन के फोड़े ठीक करा ले, बदतमीज! तेरे को जूती मारूंगी। यह कहकर लड़की ने पैर की जूती निकाल ली और बोली चला जा यहाँ से, फिर कभी मत आना। शोर सुनकर लड़की की माता भी द्वार पर आई और पूछा कि बेटी! क्या बात है? लड़की ने उस साधु की करतूत माता को बताई। माता ने पूछा कि बाबा जी! कहाँ से आये हो? लड़के साधु ने बताया कि इस आश्रम से आया हूँ। मेरे गुरू जी बीमार हो गए हैं, चलने-फिरने में असमर्थ हैं। इसलिए पहली बार मुझे भिक्षा लाने भेजा है। मैं उनका शिष्य हूँ। मैंने तो इस बहन से पूछा था कि तेरी छाती पर दो फोड़े हैं, बहुत दुःखी हो रही होगी। मेरे गुरू जी को तो एक ही फोड़ा हुआ था, दिन-रात दर्द से व्याकुल रहते थे। वे औषधि जानते हैं। आप गुरू जी के पास जाकर फोड़े ठीक करा लो। वह साधु लड़का उसी स्त्री का बेटा था जो साधु को चढ़ा रखा था। वह लड़की उस साधु बाबा की छोटी बहन थी। माता ने बताया कि यह तेरा भाई है जो हमने साधु को चढ़ा रखा है। यह - दुनियादारी की खराब बातों से बचा है। इसको कुछ भी पता नहीं है। जो दोष बेटी तुझे लगा, वह इस तेरे भाई में नहीं है। यह तो पाक-साफ आत्मा से बोल रहा था। तूने गाँव के चंचल युवकों वाली शरारत के अनुसार विचार करके धमकाया। माई ने बताया कि साधु जी! मेरी बेटी की छाती पर फोड़े नहीं हैं। ये दूधी हैं, देख! जैसे मेरी छाती पर हैं। इसका विवाह करेंगे। इसको संतान उत्पन्न होगी। तब इन दूधियों से इसके बच्चे दूध पीऐंगे। साधु बच्चा बोला, हे माई! इसका विवाह कब होगा? कब इसको संतान होगी? भाई ने बताया कि कभी तीन - चार वर्ष के पश्चात् विवाह करेंगे । फिर दो-तीन वर्ष पश्चात् संतान होगी।
साधु लड़के ने आध्यात्मिक दुष्टिकोण से विचार किया कि परमात्मा को जन्म लेने वाले बच्चे की कितनी चिंता है। उसके जन्म से 7-8 वर्ष पूर्व ही दूध पीने वस्था कर रखी है। क्या हमारे खाने की व्यवस्था आश्रम में नहीं करेगा? तो गुरु-शिष्य उस परमात्मा के भरोसे बेटे हैं। आज के बाद मिला मौगना बंद विचार कर रहा था कि भाई ने पुष्ग, बावा जी! क्या चिंता कर रहे हो? साधु बी कि माई चिंता समाप्त। यह कहकर भिक्षा सहित झोली (थैला) गली में फेंककर आफ खाली हाथ आया तो गुरु जी ने पूछा कि मिक्षा क्यों नहीं लाया? झोली किसी ने सी वीक्या? बताया कि गुरु जी। जब परमात्मा बच्चे के जन्म लेने से 7-8 करेगा। इसलिए मैं झोली गली में फेंक आया। साधु समझ गया कि यह कामचोर रास्ते में झोली फैंककर आ गया कि रोज मिक्षा लेने जाना पड़ेगा। साधु विवश था, कुछ नहीं बोला। सोचा कि कल में दुःखी-सुखी होकर जैसे-तैसे स्वयं भिक्षा लाऊँगा।
जब साधु बालक झोली तथा भिक्षा गली में फैंककर आश्रम में चला गया तो परमात्मा ने नगर के कुछ व्यक्तियों में प्रेरणा की कि बड़े बाबा अस्वस्थ हैं। छोटे बाबा को किसी ने कुछ कह दिया, वह भिक्षा व झोली दोनों फैंककर चला गया। साधु भूखा है, बच्चा भी भूखा रहेगा। यह विचार करके अच्छा भोजन तैयार किया। खीर-फुल्के- दाल बनाकर पहले एक लेकर पहुँचा और साधु से कहा कि छोटा बाबा जी किसी के कहने पर रुष्ट होकर भिक्षा नहीं लाया। झोली-भिक्षा फैंक आया। आप भोजन खाओ। साधु ने चेला खाएगा। साधु भोजन खाने लगा। इतने में दूसरा हलवा-पुरी-छोले लेकर आ गया। इस प्रकार लगभग दस व्यक्ति गाँव के यही विचार करके भोजन लेकर आश्रय में पहुँचे। चेला बोला कि वाह भगवान! हमें पता नहीं था कि आप कितने अच्छे हो। इसीलिए आपके नाम की चिंता कम भोजन की अधिक रहती थी। गाँव वालों ने नम्बर बाँध लिया कि एक दिन एक घर से साधुओं का भोजन भेजा जाए। ऐसा ही हुआ।
शिक्षा:- जैसी संगत, वैसी रंगत। अपना दोष दूसरे में दिखता है। परमात्म पर विश्वास बिना भक्त अधूरा है। माँगकर खाना भी शास्त्रविरूद्ध है क्योंकि यदि भक्त की श्रद्धा तथा भावना सच्ची है तो परमात्मा व्यवस्था कर देता है। परंतु गृहस्थी के कर्म करके भोजन ग्रहण करना सर्वोत्तम है। साधु-संत का कर्म सत्संग करना भक्ति करना है। यदि सच्ची श्रद्धा से करता है तो उसे माँगने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। संत गरीबदास जी ने परमात्मा कबीर जी से प्राप्त ज्ञान से अपनी अमृतवाणी में कहा है कि :-
"वैराग प्रकरण के अंग से कुछ वाणी"
गरीब, नट पेरणा कांजर सांशी मांगत हैं भठियारे।
जाकी तारी लागी तत् में मोति देत उधारे ।। (3)
गरीब, द्रोपद सुता के चीर बढ़ाए बिन ही ताने काते।
सकल मनोरथ पूर्ण साहिब तुम क्यों मांगन जाते ।। (2)
गरीब, आप तें आवै रत्न बराबर मांग्या आवै लोहा।
लक्षण नहीं जोग के जोगी जा बस्या बन खोहा।। (6)
गरीब को कारण कि कुकरा (कुत्ता) रातभर फिर आते।
ये तो लक्षण नहीं जो के बाणा बिदल जाते।। (10)
गरीब जिनको आत्मज्ञान नहीं है मांरी ३ माई।
चावल चून इकट्ठा कर व्याज वधा जाई ।। (24)
गरीब जो मांगै सो मड़वा कहिये दर-दर फिरे अज्ञानी।
योगी योग सम्पूर्ण जिसका जो मांग न पीने पानी।। (41)
गरीब, कद नारद जमात चलाई व्यास न टुकड़ा मांग्या।
वसीष्ठ विश्वामित्र ज्ञानी शब्द विहंगम जाग्या।। (50)
गरीब, कबीर पुरुष के बालद आई नौ लख बोडी लाहा।
केशव से बणजारे जिस के देवै यज्ञ जुलाहा ।। (55)
भावार्थ :- उपरोक्त वाणियों का भाव है कि जो सत्य मक्ति शास्त्र अनुकूल नहीं करते, वे साधु वेश बनाकर ऐसे माँगते फिरते हैं जैसे कुत्ता टूक-रोटी के लिए सत्तर घरों में जाता है। जैसे अन्य जाति वाले नट-पेरणें, कांजर व सांशी लोग रोटी के लिए भटकते थे। यदि साधु भी ऐसे ही करता है तो उसकी साधना में त्रुटि है। परमेश्वर कबीर जी अपना दैनिक कर्म जुलाहे का करते थे तथा सत्य साधना भी करते थे व सत्संग भी करते थे। सत्य भक्ति करने वाले की परमात्मा कैसे सहायता करता है, यह प्रमाण स्वयं कबीर जी ने दिया है।
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आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे। संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।
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2 weeks ago | [YT] | 15
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spiritual boy Gulshan 123
अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
📖📖📖📖📖
जीने की राह पार्ट - 14
पृष्ठ: 34-35
“विशेष संगम”
काम (Sex) प्रक्रिया को विशेष विवेक के साथ समझें। पति-पत्नी मिलन को समाज मान्यता देता है कि आप दोनों परस्पर संतान उत्पन्न करो। सबके माता-पिता ने संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया को जिसे संभोग कहते हैं, किया। जिससे अपना तथा अपने भाई-बहनों का जन्म हुआ। तो विचार करें कि यह क्रिया कितनी पवित्र तथा अच्छी है जिससे अपने को अनमोल मानव शरीर मिला है। कोई डॉक्टर बना, कोई सैनिक, कोई मंत्री तो कोई इंजीनियर बना है। कोई किसान बना है जिसने सबको अन्न दिया। कोई मजदूर बना जिसने आपके महल खड़े किए। कोई कारीगर बना। मानव शरीर में हम भक्ति-दान-धर्म के कर्म करके अपने जीवन का कल्याण कर सकते हैं। संभोग क्रिया यह है। इसको कितना ही कपड़ा ओढ़ाकर रागनी गाकर, फिल्मी गाने गा-सुनाकर मलिन वासना रूप दे दी जाती है। यह पर्दे में करना सभ्यता है। पशु-पक्षी प्रजनन क्रिया करते हैं जो खुले में करते हैं जो अच्छा-सा नहीं लगता। मानव सभ्य प्राणी है। उसको पर्दे में तथा मर्यादा में रहकर सभ्यता को बनाए रखना है।
उपरोक्त विचार पढ़कर आपमें किसी भी बहन-बेटी-बहू की ओर देखकर अश्लील विचार उत्पन्न नहीं हो सकते। यही क्रिया दादा-दादी ने की जिससे अपने पिता जी का जन्म हुआ। नाना-नानी ने की, जिससे माता जी का जन्म हुआ। जिन माता-पिता ने अपने को उत्पन्न किया, पाला-पोसा। कितने अच्छे हैं अपने माता-पिता जिनकी उत्पत्ति भी काम क्रिया से हुई, तो यह क्या अश्लील है? इसको खानाबदोश लोग अश्लीलता के रूप में पेश कर अश्लील रंग देकर समाज में आग लगाते हैं।
❖ देश के संविधान में प्रावधान है कि यदि कोई पुरुष किसी स्त्री से छेड़छाड़ करता है तो उसे तीन वर्ष की सजा हो जाती है। यदि किसी स्त्री से रेप करता है तो दस वर्ष की सजा होती है। कानून का ज्ञान होने से इंसान बुराई-दुराचार से डरता है। कानून का ज्ञान होना आवश्यक भी है। इस तरह के पाप काल बहा करवाता है।
❖ फिल्म नहीं देखनी है :- फिल्म बनावटी कहानी होती है जिसे देखते समय हम भूल जाते हैं कि जो इनके पात्र हैं, वे रोजी-रोटी के लिए धंधा चला रहे हैं। करोड़ों रुपये एक फिल्म में काम करने के लेते हैं। भोले युवक विवेक खोकर उनके फैन बन जाते हैं। वे अपना धंधा चला रहे हैं, आप मूर्ख बनकर सिनेमा देखने में धन व्यर्थ करते हैं। जिस हीरोइन के लिए आप पागल होते हैं, आप उनके घर जाकर देखें, वे आपको पानी भी नहीं पिलाएँगे। चार-पाँच दूर खड़ी होंगी। विचार करें कि मैं लड़डू खा रहा हूँ और आप देख रहे हो। आप कह रहे हो कि वाह! लड़डू बड़े स्टाइल से खा रहा है। आपको क्या मिला? यही दशा फिल्मी एक्टर्स तथा दर्शकों की है।
❖ हमने अपनी सोच बदलनी है :-
➤ जैसे हम अश्लील मूर्तियाँ देखते हैं तो अश्लीलता उत्पन्न होती है क्योंकि उस उत्तेजक मूर्ति ने अंदर चिंगारी लगा दी, पेट्रोल सुलगने लगा। ऐसी तस्वीरों को तिलांजलि दे दें।
➤ जैसे हम देशभक्तों की जीवनी पढ़ते हैं और मूर्ति देखते हैं तो हमारे अंदर देशभक्ति की प्रेरणा होती है। ऐसी तस्वीर घर में हों तो कोई हानि नहीं।
➤ यदि हम साधु-संत-फकीरों तथा अच्छे चरित्रवान नागरिकों की जीवनी पढ़ते सुनते हैं तो सर्व दोष शांत होकर हम अच्छे नागरिक बनने का विचार करते हैं।
संत तथा सत्संग की अति आवश्यकता है जहाँ अच्छे विचार बताए जाते हैं।
➤ हम अपनी छोटी-सी बेटी को स्नान कराते हैं, वस्त्र पहनाते हैं। इस प्रकार घर पर बहू बनकर आती है। अब न्याय करो कि यह शुद्ध विचार से विचारने की बात है। इस प्रकार विवेक करने से खानाबदोश विचार नष्ट हो जाते हैं। साधु भाव उत्पन्न हो जाते हैं।
➤ समाचार पत्रों में भी इतनी अश्लील तस्वीरें छपती हैं जो युवाओं को असामान्य कर देती हैं। कुछ कपड़ों की प्रसिद्धि में लड़कियाँ केवल अंडरवियर तथा ब्रा (ब्रैजियर) पहनती हैं जो गलत है। इसी प्रकार पुरुष भी अंडरवियर (कच्छे) की प्रसिद्धि के लिए केवल चड्डी पहनकर खड़े दिखाई देते हैं जो महानता का प्रतीक है। इनको बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकारों की आवश्यकता है जो संवैधानिक तरीके से इस प्रकार की अश्लीलता को बंद कराने के लिए संघर्ष करें तथा मानव को चरित्रवान, दयावान बनाने के लिए अच्छी पुस्तकें उपलब्ध कराएँ। सत्संग की व्यवस्था कराएँ।
➤ अच्छे विचार सुनने वाले बच्चे संयमी होते हैं। देखने में आता है कि जिस बेटी का पति विवाह के कुछ दिन पश्चात फौज अथवा नौकरी पर चला गया। लगभग आठ-नौ महीने छुट्टी पर नहीं आता। कुछ बेटियाँ तो अपने पति रोजगार के लिए विदेश चले जाते हैं और तीन वर्ष तक भी नहीं लौटते। वे बेटियाँ संयम से रहती हैं। किसी गैर-पुरुष को स्वप्न में भी नहीं देखती। ये उत्तम खानदान की बेटियाँ हैं। पुरुष भी इतने दिन संयम में रहता है। वे बच्चे अच्छे घर के हैं। असल खानदान के होते हैं। जो भटके होते हैं, वे तांक-झांक करते रहते हैं। सिर के बालों की नई स्टाइल से कटिंग करवाकर काले-पीले चश्मे लगाकर गली-गली में कुत्तों की तरह फिरते हैं। वे खानाबदोश होते हैं। वे किसी गलत हरकत को करके बसे-बसाए घर को उजाड़ देते हैं क्योंकि वे किसी की बहन-बेटी को ऊल-जलूल इशारे करेंगे जिससे झगड़ा होगा। लड़ाई का रूप न जाने कहाँ तक विशाल हो जाए। किसी की मृत्यु भी हो सकती है। उस एक भटके ने दो घरों का नाश कर दिया। इसलिए अपने बच्चों को बचपन से ही सत्संग के वचन सुनाकर विचारवान तथा चरित्रवान बनाना चाहिए।
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3 weeks ago | [YT] | 8
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spiritual boy Gulshan 123
अनमोल पुस्तक
जीने की राह पढ़िए……………)
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जीने की राह पार्ट - 15
पृष्ठ: 35-36
"चरित्रवान की कथा"
एक शुकदेव ऋषि थे। वे श्री वेदव्यास के पुत्र थे। एक दिन वे दीक्षा लेने के उद्देश्य से राजा जनक जी के पास मिथिला नगरी में गए। राजा जनक ने कहा कि शुकदेव कल सुबह नाम दूँगा। उनके ठहरने की व्यवस्था अलग भवन में कर दी। एक सुंदर युवती को ऋषि जी की सेवा में परीक्षा लेने के उद्देश्य से भेजा। युवती शुकदेव जी के पलंग पर पैरों की और बैठ गई। ऋषि जी ने पैर सिकोड़कर और मोड़ लिए। युवती ऋषि जी की ओर निकट हुई तो उठकर खड़े हो गए। कहा कि हे बहन! आप अच्छे घर की बेटी दिखाई देती हो। कृपा कमरे से बाहर जाऐं, नहीं तो मैं चला जाता हूँ। लड़की चली गई। राजा जनक से बताया कि सुच्चा व्यक्ति है। ऐसे-ऐसे हुआ। सुबह राजा जनक जी ने ऋषि शुकदेव जी से पूछा कि आपसे मिलने स्त्री आई थी, आपने उसे अंगिकार न करके अच्छे संयम का प्रदर्शन किया है। आप संयमी व्यक्ति हैं। धन्य हैं आपके माता-पिता।
* कबीर परमेश्वर जी के विचार इनसे भी उच्च तथा श्रेष्ठ हैं। वे कहते हैं कि ऋषि शुकदेव भी आत्मज्ञानी नहीं था क्योंकि जब युवती शुकदेव के पलंग पर बैठी तो शुकदेव ने उसे स्त्री समझकर अपने शरीर से छूने नहीं दिया और खड़ा होकर बाहर जाने की तैयारी कर दी। इससे स्पष्ट है कि शुकदेव जी को आत्म ज्ञान नहीं था। विचार करें कि यदि युवती के स्थान पर युवक बैठ जाता तो शुकदेव जी क्या करते? वे उससे कुशल-मंगल पूछते और पलंग छोड़कर खड़े नहीं होते। कहते कि भईया! पलंग एक ही है, आप पलंग पर विश्राम करो, मैं नीचे पृथ्वी पर आसन लगा लेता हूँ। यदि युवक सभ्य होता तो कहता कि नहीं ऋषि जी! आप पलंग पर विराजो, मैं पृथ्वी पर विश्राम करूंगा। परंतु युवती होने के कारण ऋषि शुकदेव को काम दोष के कारण भय लगा।
कबीर परमेश्वर जी ने बताया है कि स्त्री तथा पुरूष आत्मा के ऊपर दो वस्त्र हैं। जैसे गीता अध्याय 2 श्लोक 22 में कहा कि अर्जुन! जीव शरीर त्यागकर नया शरीर धारण कर लेता है, इसे मृत्यु कहते हैं। यह तो ऐसा है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए पहन लेता है। इसलिए आत्म तत्व को जान।
उदाहरण :- एक गाँव में सांग (स्वांग) मण्डली आई। कई दिनों तक सांग किया। पुराने जमाने में सांग के नाटक में पुरूष ही स्त्री का अभिनय किया करते थे। एक लड़का अपने साथी के साथ पहली बार सांग देखने गया। सांग में एक लड़के को लड़की के वस्त्र पहना रखे थे। छाती भी युवा लड़की की तरह बना रखी थी। प्रथम बार गए लड़के ने अपने साथी (जो कई बार सांग देख चुका था) से कहा कि देख ! कितनी सुंदर लड़की है। साथी बोला, यह लड़की नहीं लड़का है। परंतु प्रथम बार गया लड़का मानने को तैयार नहीं था। उसको अपने मित्र की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। सांग के समाप्त होने के पश्चात् सांगी अपने उस स्थान पर गए जहाँ ठहरे हुए थे। दोनों लड़के भी उनके साथ वहीं गए। उस लड़के ने जो लड़की का स्वांग बनाए हुए था, अपने स्त्री वाले वस्त्र उतारकर खूंटी पर टाँग दिये। छाती से बनावटी दूधी उतारकर बैग में डाल दी। कच्छे-कच्छे में स्नान करने चला गया। यह देखकर नए दर्शक को विश्वास हुआ कि वास्तव में यह लड़का है। अगले दिन उस लड़के दर्शक को वह लड़की के वेश में लड़के में लड़की वाली मलीन वासना दिल में नहीं आई। उसे लड़का दिखाई दे रहा था। इसी प्रकार यदि शुकदेव ऋषि को अध्यात्म विवेक से आत्म ज्ञान होता तो उसे स्त्री नहीं आत्मा रूप में पुरूष समझकर कहता कि आप पलंग पर विराजो, मैं पृथ्वी पर विश्राम करता हूँ। साधु, संत, फकीर इस विचारधारा से जीवन जीते हैं। साधना करके मोक्ष प्राप्त करते हैं।
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spiritual boy Gulshan 123
⚜️ हनुमान जी ने रामचरितमानस के सुंदरकांड, दोहा 6 की चौपाई 4 में कहा है: प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
इस चौपाई का रहस्य जानने के लिए देखिए @SantRampalJiMaharaj यूट्यूब चैनल
@SaintRampalJiMaharaj
3 weeks ago | [YT] | 2
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spiritual boy Gulshan 123
⚜️ हनुमान जी को मोक्ष की प्राप्ति रामचंद्र की भक्ति से मिली या फिर वह राम कोई और था जिसकी भक्ति हनुमान जी करते थे? जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल
3 weeks ago | [YT] | 3
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spiritual boy Gulshan 123
हनुमान जी को माता सीता का पता करके लंका से वापिस आते समय ऋषि रूप में कौन मिले थे? जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj यूट्यूब चैनल
3 weeks ago | [YT] | 2
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