"सत्संग सेवा स्वाध्याय"
👉सत चित आनंद स्वरूप
👉तत् त्वम् असि
👉अहम् ब्रह्मास्मि
👉अयम् आत्मा ब्रह्म
👉प्रज्ञानं ब्रह्म
संपर्क सूत्र
+91 97208 10713
उपनिषद् ll श्रीमद्भागवतगीता ll वेदांतरसामृत ll आत्मज्ञान ll ब्रह्मज्ञान ll आध्यात्मिक सत्संग
चैनल को subscribe कर इस ज्ञान के प्रवाह में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करे !
Subscribe to the Channel and offer your contribution to spreading knowledge and divinity!
ज्ञान कैसे प्राप्त करें
आत्म ज्ञान कैसे प्राप्त करें
ब्रह्म ज्ञान कैसे प्राप्त करें
दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त करें
आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त करें
ज्ञान की प्राप्ति
प्रातः काल ज्ञान
ज्ञान प्राप्त करें आसानी से
आसानी से ज्ञान प्राप्त
ज्ञान प्राप्त करने का आसान तरीका
ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है
ज्ञान की बातें,
ज्ञान
ज्ञान महत्व
सर्व ज्ञान
आत्म ज्ञान
सत्य की खोज आत्मज्ञान
आत्म ज्ञान कैसे प्राप्त करें
आध्यात्मिक ज्ञान अर्थात आत्म ज्ञान कैसे प्राप्त करें ?
सत्संग में जुड़ने हेतु संपर्क जानकारी:-
(केवल सत्संग हेतु संपर्क करें)
___________
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
15 hours ago | [YT] | 4
View 1 reply
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
समाधि में वृत्ति निरोध के लिए अभ्यास की आवश्यकता है। परमेश्वर्य में आत्माकार वृत्ति के लिए वृत्ति की आवश्यकता है। इष्ट तन्मयतामें इष्टाकार वृत्ति के लिए भक्ति की आवश्यकता है। विषय सुख में संयमाकार वृत्ति के लिए धर्म की आवश्यकता है।परंतु ब्रह्मात्मा के ज्ञान में इनमें से किसी साधन की आवश्यकता नहीं है ।बस जानो और सुख लूटो।कश्मीरीशैव स्वातंत्र्यता वादी है।वैष्णव लोग पारतंत्र्य वादी हैं।देवता वादी उपासना वादी है।और धर्मवादी विधि वादी है।परंतु वेदांत में न कोई विधि है न निषेध। यह तो वस्तु को जैसी है वैसी समझना, जानना, मात्र है।इसमें पूर्व पक्षी का प्रश्न है -शास्त्र उसे कहते हैं जो शासन करें,वेदांत कौन सा शासन करता है।तो सिद्धांती उत्तर देता है -वेदांत में शंसन (वास्तु बोध) ही शास्त्र का लक्षण है शासनात शास्त्रम। तथा शंसनात् शास्त्रम ।दोनों शास्त्र के लक्षण है ।वेदांत कर्म शास्त्र की तरह पुण्य में लगता नहीं, और पाप से रोकता नहीं ।वह तो आत्मा के यथार्थ स्वरूप का बोधन कराकर प्रयोजन दुख निवृत्ति, और परमानंद की प्राप्ति की पूर्ति करता है। दशमस्त्वंसि वह दसवां पुरुष यही है ,वह तू है। इस प्रकार का बोध है यह। जैसे कोई राजकुमार भीलों में मिलकर अपने को भूल मानने लगे ,और कोई जानकार उसे बोध कराए कि तू भील नहीं है ,तू राजकुमार है ।इस प्रकार का बोध है यह।
16 hours ago | [YT] | 1
View 1 reply
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
16 hours ago | [YT] | 3
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
16 hours ago | [YT] | 4
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
16 hours ago | [YT] | 2
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
सृष्टि की सभी बदलने वाली वस्तुओं में एक ही अपरिवर्तनशील चैतन्य तत्त्व विद्यमान है, अन्य कुछ भी नहीं है, द्रष्टा और दृश्य जो कुछ भी है, सब कुछ चैतन्य तत्त्व ही है। सबके अन्दर यह चैतन्य तत्त्व ही विद्यमान रहने पर भी ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह घट-वस्त्रादि रूप में ही परिवर्तित हो गया है। इसी साक्षात्कार की अनुभूति को ज्ञान कहते हैं। यह अनुभूति शरीर और इन्द्रिय आदि पर नियंत्रण रखने से और सद्गुरु की उपासना, उनके उपदेशों के श्रवण, चिन्तन, मनन और निदिध्यासन करने से होती है ॥१३॥
- निरालम्ब उपनिषद
17 hours ago | [YT] | 2
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
इन्द्रियों द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं। जिस क्रिया को ‘मैं करता हूँ इस भावपूर्वक (अध्यात्म निष्ठा से ) किया जाता है, वही कर्म है। कर्त्तापन और भोक्तापन के अहंकार के द्वारा फल की इच्छा से किये गये बन्धन स्वरूप नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, व्रत, तप, दान आदि 'कर्म अकर्म’ कहलाते हैं॥११-१२॥
- निरालम्ब उपनिषद
17 hours ago | [YT] | 2
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
जाति (शरीर के) चर्म, रक्त, मांस, अस्थियों और आत्मा की नहीं होती। उसकी (मानव, पशु-पक्षी या ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जाति की) प्रकल्पना तो केवल व्यवहार के निमित्त की गई है ॥१०॥
- निरालम्ब उपनिषद
17 hours ago | [YT] | 0
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
आपका आनंद कहां है ?विषय भोग में तो कुछ कम करना पड़ेगा। व्यक्ति में तो उसे खुश करना पड़ेगा। यदि हृदय ईस्ट देश में आपका आनंद है तो बाहर कर्म की आवश्यकता नहीं होगी, किंतु मानसिक सेवा करनी पड़ेगी। आनंद जहां होगा वहां राग होगा और जहां नहीं होगा वहां से वैराग्य हो जाएगा। अतः उपासना से संसार से वैराग्य हो जाएगा। यदि आपका आनंद अपने में है तो जो भी अनात्म है उसी से वैराग्य हो जाएगा। वैराग्य की पराकाष्ठा यह है कि आनंद के लिए दूसरे भोग्य की जरूरत ना हो, और अपने में भोक्तापने का अभिमान ना हो। वही रसोदय की अवस्था है। तब आनंद के लिए ना कुछ करना धरना पड़ेगा ,और न उसके नास का भय होगा। स्वतः सिद्ध आत्मा आनंदस्वरूप है इसलिए आनंद के लिए उसे किसी भोक्ता, भोग्य, कर्म, उपासना ,ध्यान, समाधि ,की आवश्यकता नहीं है ।यह कश्मीरी शैवों का जो परमेश्वरीय रूप आनंद है वह भी वृत्ति तक ही है इसलिए वह भी विनाशी ही है ।जब चिन्मात्र की प्रधानता से विचार करते हैं तो जो दृश्य है वह जड़ हो जाता है ,और जो दृष्टा है वह चेतन हो जाता है। इंद्रियवान होना चेतन का लक्षण नहीं है। जो अपने को और दूसरे को जाने सो चेतन और जो अपने को तथा दूसरे को न जाने सो जड़। जो चिन्मात्र है वह भेद को, परिच्छिन्नता को जानता है परंतु जानने वाला भेद रूप नहीं है। वह अखंड है भेद उसमें मिथ्या ही प्रतीत हो रहा है ।चिन्मात्र के विवेक से असंगता उत्पन्न होगी। यदि सन्मात्र का विचार करोगे तो अद्वितीय सत् में कहीं मृत्यु है ही नहीं।आधार आधैय की कल्पना से विनर्मुक्त सन्मात्र है। ज्ञाता ज्ञेय की कल्पना से विर्निमुक्त चीन्मात्र है। भोक्ता भोग्य की कल्पना से विनिर्मुक्त आनंद मात्र है। जो सतमात्र है वहीं चिन् मात्र और आनंद मात्र है ।इसलिए इसमें समाधि और विक्षेप जड़ और चेतन उपभोक्ता और भोग्य का कोई भेद नहीं है।
1 day ago | [YT] | 4
View 0 replies
उपनिषद् | श्रीमद्भागवतगीता | वेदांतरसामृत
1 day ago | [YT] | 4
View 0 replies
Load more