✨ विदेह की गली ✨
विदेह - यानी जो देह से बंधा न हो, जो शरीर की सीमाओं से और भौतिक संसार के मोह से परे हो। हमारी पूरी ज़िंदगी इसी देह की जरूरतों, इसके सुख-दुख, इसके रूप-रंग और इसके अहंकार में उलझी रहती है। लेकिन 'विदेह की गली' वह आध्यात्मिक रास्ता है, जहाँ शरीर का शोर बिल्कुल शांत हो जाता है और केवल आत्मा की आवाज़ सुनाई देती है।
यह वह गली नहीं है जो ईंट और पत्थरों से बनी हो या किसी शहर में खुलती हो; यह वह अंतर्यात्रा है जो सीधे आपके अपने भीतर उतरती है। हमारे धर्मग्रंथों में और ओशो जैसे विचारकों के दर्शन में बार-बार यही कहा गया है कि असली मुक्ति तब मिलती है जब इंसान 'मैं एक शरीर हूँ' के भ्रम से आज़ाद हो जाता है।
राजा जनक को भी 'विदेह' कहा जाता था, क्योंकि एक विशाल साम्राज्य का राजा होते हुए भी, राजपाट और भौतिक सुखों के बीच रहते हुए भी, वे भीतर से पूरी तरह मुक्त और अनासक्त (Detached) थे।
स्वागत है विदेह की गली में -
जहाँ देह समाप्त होती है और चेतना आरंभ होती है। 🌿
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