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4 days ago | [YT] | 3

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1 week ago | [YT] | 14

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इंतजार हुआ खत्म
2 फरवरी से प्रतिदिन सुबह 11 बजे
हमारा NaKhRe Vlogs शुरू हों रहा है।

1 week ago | [YT] | 8

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दो साल के बाद एक नए अंदाज में दिखाने अपने NaKhRe
कुछ नया शुरु करते है। जुड़े रहिएगा।
साथ आपका काम हमारा।

4 weeks ago | [YT] | 4

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करवा चौथ में छलनी, सींक और करवा का महत्व
#करवाचौथ दो शब्दों से मिलकर बना है- 'करवा' यानि 'मिट्टी का बर्तन' और 'चौथ' यानि 'गणेश जी की प्रिय तिथि चतुर्थी'। करवा चौथ में पूजा के दौरान छलनी, सींक, करवा और दीपक का इस्तेमाल होता है।

कलश और #थाली का प्रतीकात्मक महत्व….

करवाचौथ की पूजा में मिट्टी या तांबे के कलश से चन्द्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। पुराणों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कलश में सभी ग्रह-नक्षत्रों और तीर्थ का निवास होता है। इतना ही नहीं ये भी कहा जाता है कि कलश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सभी नदियों, सागरों, सरोवरों एवं तैतीस कोटि देवी-देवता भी विराजते हैं। पूजा की थाली में रोली,चावल,दीपक, फल, फूल, पताशा, सुहाग का सामान और जल से भरा कलश रखा जाता है। करवा के ऊपर मिटटी के बड़े दीपक में जौ या गेहूं रखे जाते हैं। जौ समृद्धि, शांति, उन्नति और खुशहाली का प्रतीक होते हैं।

#दीपक और #छलनी का प्रतीकात्मक महत्व….

दीये की रोशनी का करवा चौथ में विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर सूर्य का बदला हुआ रूप अग्नि माना जाता है। माना जाता है कि अग्नि को साक्षी मानकर की गई पूजा सफल होती है। प्रकाश को ज्ञान का प्रतीक भी कहा जाता है। ज्ञान प्राप्त होने से मन से अज्ञानता रूपी सभी विकार दूर होते हैं। दीपक नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर भगाता है। महिलाएं दिन के अंत में पहले छलनी से चंद्रमा को देखकर और फिर तुरंत अपने पति को देखकर अपना व्रत खोलती हैं। करवा चौथ में सुनाई जानेवाली वीरवती की कथा से जुड़ा हुआ है। बहन वीरवती को भूखा देख उसके भाइयों ने चांद निकलने से पहले एक पेड़ की आड़ में छलनी में दीप रखकर चांद बनाया और बहन का व्रत खुलवाया।

#करवा का प्रतीकात्मक महत्व….

करवा का अर्थ है 'करवा' यानी मिट्टी का बर्तन जिसे भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। भगवान गणेश जल तत्व के कारक हैं और करवा में लगी नली(टोंटी) भगवान गणेश की सूंड का प्रतीक है। इस दिन मिट्टी के करवा में जल भरकर पूजा में रखना शुभ माना जाता है।

#सींक किसका प्रतीक….

करवा चौथ व्रत की पूजा में सींक का होना बहुत ज़रूरी होता है। ये सींक मां करवा की शक्ति का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार मां करवा के पति का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। तब उन्होंने कच्चे धागे से मगर को बांध दिया और यमराज के पास पहुंच गईं। वे उस समय चित्रगुप्त के खाते देख रहे थे। करवा ने सात सींक लेकर उन्हें झाड़ना शुरू किया जिससे खाते आकाश में उड़ने लगे। करवा ने यमराज से अपने पति की रक्षा करने के लिए कहा, तब उन्होंने मगरमच्छ को मारकर करवा के पति की जान बचाई और उन्हें लंबी उम्र का वरदान दिया।

3 months ago | [YT] | 1

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करवा चौथ की कहानी... परम्परागत कथा (रानी #वीरवती की कहानी):

बहुत समय पहले वीरवती नाम की एक सुन्दर लड़की थी। वो अपने सात भाईयों की इकलौती बहन थी।

उसकी शादी एक राजा से हो गई। शादी के बाद पहले करवा चौथ के मौके पर वो अपने मायके आ गई। उसने भी करवा चौथ का व्रत रखा लेकिन पहला करवा चौथ होने की वजह से वो भूख और प्यास बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वह बेताबी से चांद के उगने का इन्तजार करने लगी। उसके सातों भाई उसकी ये हालत देखकर परेशान हो गये। वे अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्यार करते थे। उन्होंने वीरवती काव्रत समाप्त करने की योजना बनाई और पीपल के पत्तों के पीछे से आईने में नकली चांद की छाया दिखा दी। वीरवती ने इसे असली चांद समझ लिया और अपना व्रत समाप्त कर खाना खा लिया।

रानी ने जैसे ही खाना खाया वैसे ही समाचार मिला कि उसके पति की तबियत बहुत खराब हो गई है। रानी तुरंत अपने राजा के पास भागी। रास्ते में उसे भगवान शंकर पार्वतीदेवी के साथ मिले। पार्वती देवी ने रानी को बताया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है क्योंकि उसने नकली चांद देखकर अपना व्रत तोड़ दिया था। रानी ने तुरंत क्षमा मांगी।
पार्वती देवी ने कहा, ''तुम्हारा पति फिर से जिन्दा हो जायेगा लेकिन इसके लिये तुम्हें करवा चौथ का व्रत कठोरता से संपन्न करना होगा। तभी तुम्हारापति फिर से जीवित होगा।'' उसके बाद रानी वीरवती ने करवा चौथ का व्रत पूरी विधि से संपन्न किया और अपने पति को दुबारा प्राप्त किया।

इस पर्व से संबंधित अनेक कथाएं प्रसिध्द हैं जिनमें सत्यवान और सावित्री की कहानी भी बहुत प्रसिध्द है।

शास्त्रों के मुताबिक इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत कोई दूसरा नहीं है। व्रत का ये विधान बेहद प्राचीन है। कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी करवाचौथ का उपवास किया था। इस व्रत के देवता चंद्रमा मानेगए हैं। इसके पीछे भी एक कहानी है।

कहा जाता है कि जब अर्जुन तप करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए थे तो द्रौपदी परेशान हो गई। तब कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथका व्रत रखने और चांद कि पूजा करने कि सलाह दी थी।
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एक थी वीरो कुड़ी जो सात भाइयो की इकलोती बहन थी उसके सात भाई उससे बहुत प्यार करते थे जब उनकी इकलोती बहन वीरो कुड़ी की शादी हो गयी थो करवा-चौथ का व्रत आया | उसने अपनी सातो भाभियों के साथ करवा-चौथ का व्रत रखा इस व्रत मे पानी नहीं पिया जा सकता है, जब तक चाँद को रात मे अरक न दे दिया जाये, वीरो के भाइयो को चिंता हो गयी की उनकी लाडली बहन पानी और खाना नहीं खाया है और उसको बहुत प्यास लगी होगी होगी तो वीरो के भाइयो नै मिलकर एक योजना बनायीं और घास और फूस इकठा करके एक टीला बनाया और उसमे आग लगा दी और अपनी बहन वीरो के पास गये और कहने लगे बहन तेरा चंद्रमा निकल आया है और अरक देके पानी पी लो वीरो कहने लगी की मेरी भाभियों का चंदमा तो निकला नही है,तो मेरा चंद्रमा कैसे निकल आया है भाइयो नै कहा तेरा चंद्रमा निकल आया है, तो भाइयो के समझाने पर वीरो कुड़ी नै अरक देकर पानी पी लिया,जैसे ही उसने पानी पिया तो उसके पति का सिर सुइयों से भर गया और वह बेहोश हो गया | ऐसा देखकर वीरो कुड़ी नै अपने पति का सिर अपनी गोद मे रख लिया और धीरे-धीरे सुइया निकालने लगी | जब दुबारा करवा चौथ का व्रत आया तो करवा बिकने नीचे आया |

करवा ले लो, करवा ले लो, करवा ले लो, करवा ले लो

ऐसा सुन कर दासी बोली रानी जी नीचे करवा बिकने को आया है,आप जा कर ले आओ तब तक मे राजा जी का सिर अपनी गोद मे रखती हू रानी जब करवा लेने नीचे गयी तो दासी ने राजा की आखरी सुई निकाल दी राजा होश मे आते ही दासी को रानी समझ गये जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई ,जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई जब रानी ऊपर आयी तो देखा राजा जी ने दासी को ही रानी समझ लिया है और उसको दासी और रानी तब से दासी के काम करने लगी काम काम करते-करते वह मुह मे बोलती थी जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई | जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई

जब राजा ने जब ये सुना तो उसने रानी से पूछा की दासी यह मुह मे क्या बोलती है तो उसने कहा पागल है ऐसी हे कुछ बोलती रहती है | एक दिन जब राजा शिकार खेलने के लिये जाने लगा तो उसने रानी से पूछा तेरे लिये क्या लाऊ और दासी से भी पूछा की तुम्हारे लिये क्या लाऊ तो रानी ने कहा मेरे लिये गहने और सजने का सामान ले के अयिगा और दासी ने कहा मेरे लिये गुडिया ले के आना जब राजा से शिकार से वापस आयी तो रानी के लिये गहने और दासी के लिये गुडिया लाया | रानी गुडियों के साथ खेलती और बोलती जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई | जो रानी थी वो दासी हुई और दासी रानी हुई |

राजा ने यह सुनकर रानी से पूछा यह क्या बोलती है रानी के उतर न देने पर राजा ने दासी को अपने पास बुलाकर कर पूछा तुम ये क्या बडबड करती रहती है हो तो रानी ने कहा मे हे आपकी रानी हू और सारी कहानी सुना दी की वो करवा-चौथ का दिन था मे करवा लेने नीचे गयी थी दासी ने आपकी आखरी सुई निकाल दी और आप इसी ही अपनी रानी समझ बैठे |

राजा ये सब सुन कर क्रोधित हो गया, और दासी को कारावास मे डलवा दिया |
तो जो रानी थी वो रानी हुई और जो दासी थी वो दासी हो गयी |

#करवाचौथ अरक देते समय गीत

सीर धडी ,
पैर कड़ी,
अरक देन्दी,
सरव सुहागन
चौबारे खड़ी|

सर्व सुहागन कर्वड़ा,
ए कटती ना तेरी ना,
कुम्भ च्राख्रा फेरी ना,
ग्वान्द पैर पायीं ना,
सुई च धागा पाई ना,

रुथ्दा मनियें ना,
सुथरा जगाईं ना,
बाहें प्यारी वीरा,
चंद चद्दे ते पानी पीना,
ले वीरो कुरिये कर्वड़ा
ले सर्व सुहागन कर्वड़ा|
जय माता दी 🙏🌹🙏जय श्री सीताराम!🙏🌹🙏

4 months ago | [YT] | 0

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*10/10/2025 शुक्रवार*. *करवा चौथ विशेष*
*कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि रात्रि 07:38 बजे तक है, इसके पश्चात पंचमी तिथि है*

*आज संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत है, जिसे करक चतुर्थी या करवा चौथ के नाम से भी जाना जाता है*

*सबसे पहले चावल के आटे में हल्दी मिलाकर करवे को इससे रंग लीजिए*

*मिट्टी के एक करवे में गंगाजल मिलाकर जल भर लीजिए। इसमें थोड़े से चावल और एक सिक्का डाल दीजिए*

*दूसरे वाले करवे में अनाज, गुलगुले, चावल के आटे की गोलियां बनाकर इसे भर लें, कुछ लोग गेहूं, खील, कुछ लोग बताशे और आटे की गोलियां बनाकर रखते हैं*

*करवा चौथ पूजन मंत्र*

*1). करकं क्षीर संपूर्णा तोय पूर्ण मयापि वा*

*ददामि रत्न संयुक्तं चिरंजीवतु मे पति:*
*इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्या द्विजसत्तमे*

*2). वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ*
*निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा*

*3). देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परम् सुखमम*
*सन्तान देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे*

*4). ओम श्रीं श्रीं श्रीं सह चंद्राय नमः*

*5). ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:*

*6). ऊँ दधि शंख तुषाराभं क्षीरो दार्णव संभवम. नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम*

*पति का नाम लेते हुए एक सफेद फूल या वस्त्र अर्पित कीजिए*

*पश्चात चंद्रमा की रक्षा स्तुति बोलिए*

*7). "क्षीरोदार्णव सम्भूत आत्रेय गोत्र समुद्भव:. गृहाणार्ध्यं शशांकेदं रोहिण्य सहितो मम"*

*8). "सौम्यरूप महाभाग मंत्रराज द्विजोत्तम। मम पूर्वकृतं पापं ओषधे क्षमस्व मे।"*

*अर्घ्य देने के बाद चंद्रमा की तीन बार परिक्रमा कीजिए और नमस्कार कीजिए*

*राशि अनुसार वस्त्र, श्रृंगार*

*मेष राशि- लाल रंग की चूड़ियां और वस्त्र*

*वृषभ राशि- सिल्वर, गुलाबी और पीले कलर की चूड़ियां और साड़ी*

*मिथुन राशि- हरे रंग की चूड़ियां और वस्त्र*

*कर्क राशि- पिंक कलर की चूड़ियां और साड़ी*

*सिंह राशि- लाल, पीली या नारंगी कलर की चूड़ियां और वस्त्र*

*कन्या राशि- हरे रंग की साड़ी और चूड़ियां*

*तुला राशि- गुलाबी रंग अथवा गाजरी रंग की चूड़ियां और वस्त्र*

*वृश्चिक राशि- मैरून या रेड कलर के वस्त्र और चूड़ियां*

*धनु राशि- पीले और लाल रंग की मिली जुली चूड़ियां और वस्त्र*

*मकर राशि- हल्के गुलाबी या हरे रंग की चूड़ियां और वस्त्र*

*कुंभ राशि- मिश्रित रंग की चूड़ियां और वस्त्र*

*मीन राशि- मल्टी कलर की चूड़ियां और गोल्डन या रेड कलर की साड़ी*

श्रृंगार सामान- सुहागिन महिलाओं को करवा चौथ के दिन किसी को भी अपने सुहाग या श्रृंगार से जुड़े सामान शेयर नहीं करने चाहिए

*धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले सरगी के सेवन के साथ शुरू होता है, और रात में चंद्रमा को देखने और उसे अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है*

*परंपरा के अनुसार, महिलाएं अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं*

*सरगी खाने का जिनके घर पर रिवाज नहीं है, उन्हें एक दिन पहले ज्यादा खाने से बचना चाहिए*

*भूलकर भी तामसिक चीजों का सेवन एक दिन पहले न करें*
*व्रत से पहले नींबू पानी पिएं*
*शाम के खाने में चावल, दाल, दलिया, और हर सब्जियों को शामिल करें*
*सूखे मेवे का सेवन करें*
*सेवइयां का सेवन करें*
*मीठी मठरी का सेवन करें*

*लहसुन, प्याज को खाने में एक दिन पहले और एक दिन बाद शामिल न करें*
*इससे व्रत खंडित हो सकता है*

*करवा चौथ व्रत की बहुत बहुत शुभकामनाएं और बधाइयां*
🍀🌹🌷🌻🪻🍁🪷🌹🍀

4 months ago | [YT] | 2

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भगवान गणेशजी की एक अनसुनी कथा।
अद्भुत देव, जिन्होंने शस्त्र उठाए बिना ही शत्रुओं को कर दिया ढेर।

विकटो नाम विख्यात: कामासुरविदाहक:।
मयूरवाहनश्चायं सौरब्रह्मधर: स्मृत:।।

भगवान श्री गणेश का ‘विकट’ नामक प्रसिद्ध अवतार कामासुर का संहारक है वह मयूर वाहन एवं सौरब्रह्म का धारक माना गया है।

भगवान विष्णु जब जालन्धर के वध हेतु वृंदा का तप नष्ट करने गए थे, उसी समय उनके शुक्र से अत्यंत तेजस्वी कामासुर पैदा हुआ।

कामासुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा प्राप्त कर तपस्या के लिए वन में गया। वहां उसने पच्ञाक्षरी मंत्र का जप करते कठोर तपस्या प्रारंभ की। भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए उसने अन्न, जल का त्याग कर दिया। दिन-प्रतिदिन उसका शरीर क्षीण होता गया तथा तेज बढ़ता गया। दिव्य सहस्त्र वर्ष पूरे होने पर भगवान शिव प्रसन्न हुए।

आशुतोष ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने के लिए कहा। कामासुर भगवान शिव के दर्शन कर कृतार्थ हो गया।

उसने भगवान शंकर के चरणों में प्रणाम कर वर-याचना की- ‘प्रभो! आप मुझे ब्रह्माण्ड का राज तथा अपनी भक्ति प्रदान करें। मैं बलवान, निर्भय एवं मृत्युंजयी होऊं।’

भगवान शिव ने कहा, ‘‘यद्यपि तुमने अत्यंत दुर्लभ तथा देव-दुखद वर की याचना की है तथापि मैं तुम्हारी कामना पूरी करता हूं।’’
कामासुर प्रसन्न होकर अपने गुरु शुक्राचार्य के पास लौट आया तथा उन्हें शिव दर्शन तथा वर प्राप्ति का समस्त समाचार सुनाया। शुक्राचार्य ने संतुष्ट होकर महिषासुर की रूपवती पुत्री तृष्णां के साथ उसका विवाह कर दिया।

उसी समय समस्त दैत्यों के समक्ष शुक्राचार्य ने कामासुर को दैत्यों का अधिपति बना दिया। सभी दैत्यों ने उसके अधीन रहना स्वीकार कर लिया।
कामासुर ने अत्यंत सुंदर रतिद नामक नगर में अपनी राजधानी बनाई। उसने रावण, शम्बर, महिष बलि तथा दुर्मद को अपनी सेना का प्रधान बनाया। उस महाअसुर ने पृथ्वी के समस्त राजाओं पर आक्रमण कर उन्हें जीत लिया।

फिर वह स्वर्ग पर चढ़ दौड़ा। इंद्रादि देवता उसके पराक्रम के आगे नहीं ठहर सके। सभी उसके अधीन हो गए। वर के प्रभाव से कामासुर ने कुछ ही समय में तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त कर लिया। उसके राज्य में समस्त धर्म-कर्म नष्ट हो गए। चारों तरफ झूठ, छल-कपट का ही साम्राज्य स्थापित हो गया। देवता, मुनि और धर्म परायण लोग अतिशय कष्ट पाने लगे।
महर्षि मुद्रल की प्रेरणा से समस्त देवता और मुनि मयूरेश क्षेत्र में पहुंचे।

वहां उन्होंने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गणेश जी की पूजा की। देवताओं की उपासना से प्रसन्न होकर मयूरवाहन भगवान गणेश प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं से वर मांगने के लिए कहा। देवताओं ने कहा, ‘‘प्रभो! हम सब कामासुर के अत्याचार से अत्यंत कष्ट पा रहे हैं। आप हमारी रक्षा करें।’’

तथास्तु! कह कर भगवान विकट अंतर्धान हो गए। मयूर-वाहन भगवान विकट ने देवताओं के साथ कामासुर के नगर को घेर लिया। कामासुर भी दैत्यों के साथ बाहर आया। भयानक युद्ध होने लगा। उस भीषण युद्ध में कामासुर के दो पुत्र शोषण और दुप्पूर मारे गए।

भगवान विकट ने कामासुर से कहा, ‘‘तूने शिव वर के प्रभाव से बड़ा अधर्म किया है। यदि तू जीवित रहना चाहता है तो देवताओं से द्रोह छोड़कर मेरी शरण में आ जा अन्यथा तुम्हारी मौत निश्चित है।’’

कामासुर ने क्रोधित होकर अपनी भयानक गदा भगवान विकट पर फैंकी। वह गदा भगवान विकट का स्पर्श किए बिना पृथ्वी पर गिर पड़ी। कामासुर मूर्छित हो गया। उसके शरीर की सारी शक्ति जाती रही।

उसने सोचा, ‘‘इस अद्भुत देव ने जब बिना शस्त्र के मेरी ऐसी दुर्दशा कर दी जब शस्त्र उठाएगा तो क्या होगा?’’ वह अंत में भगवान विकट की शरण में आ गया। मयूरेश ने उसे क्षमा कर दिया। देवता और मुनि भयमुक्त हो गए। तीनों दिशाओं में उनकी जय-जयकार होने लगी।

8 months ago | [YT] | 17