Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

NAMO BUDDHAY
JAY BHIM

बुद्ध धम्म संघ को त्रिवार सिरसा नमन।

आप सभी चतु परिसा ( चतु परिषद अर्थात् भिक्खू, भिक्खूनी, उपासक, उपासिका) का आपके अपने Dhammadayado Buddha Sasan Youtube Channel पर हार्दिक स्वागत करते है।

सभी तक तथागत बुद्ध जी की वाणी वीडियो ,ऑडियो के ज़रिए पोहुचा सके।सभी धम्म लाभी हो। इस हेतु से...
इस चैनल पर
💠 तथागत सम्यक संबुद्ध जी
💠 सुत्त और उनके अर्थ
💠 भिक्खु ,भिक्खुनी द्वारा देसना
💠 बुद्ध और उनका धम्म
💠 जातक कथा
💠 धम्मपद -
💠 Buddha's thoughts
💠 परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एवम सभी महापुरुष की जीवनी।
और महत्वपूर्ण परियती धम्म की जानकारी पोहचा सभी को धर्म का लाभ हो। सभी बुद्ध संस्कृति में परियती सासन के कुछ विषय पर जानकारी प्रकाशित कर आप सभी निरीक्षण परीक्षण कर उसे अपनाएं ।

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#DHAMMADAYADO BUDDHA SASAN


Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

"मी ज्ञानाचा सागर उपसतो आहे. यावेळी मला इतर कशाचे भान नाही, पण ही शक्ती मला मिळवण्यात तुझाही वाटा आहे. तू माझा संसार शिवत बसली आहेस. आसवांचे पाणी घालून... माझं मनोबल वाढवीत आहेस, म्हणून मी बेभान मनानं ज्ञानाच्या तळगर्भाचा वेध घेतो आहे.

रमा तू माझ्या आयुष्यात आली नसती तर ? तर काय झालं असतं?" या आहेत, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांच्या 'रमाई' म्हणजेच रमाबाई आंबेडकरांबद्दलच्या भावना.

ज्या बाबासाहेब आंबेडकरांच्या ज्ञानाबद्दल साधा अंदाज लावणंही सामान्यांना शक्य होत नाही, त्यांनी त्यांच्या सहचारिणी असलेल्या रमाईंबद्दलचे हे शब्द बरंच काही सांगून जातात.

ज्ञानार्जन करताना बाबासाहेबांना इतर गोष्टींचा व्याप नको म्हणून रमाईंनी त्यांचं किती ओझं स्वतःच्या खांद्यावर घेतलं होतं, हेच यावरून स्पष्ट होतं.



रमाई भीमराव आंबेडकर यांच्या 128 व्या जयंती निमित्त हार्दिक
शुभेच्छा....
💐💐💐💐💐🙏🙏🙏🙏

4 weeks ago | [YT] | 54

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

माघपुण्णमि

माघ पूर्णिमा साधरणतः फरवरी के महिने में आती है। आज के ही दिन तथागत बुद्ध के समय की तीन महत्त्वपूर्ण घटनाओं का स्मरण किया जाता है।
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नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स । मैं उन भगवान अर्हत सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार करता/करती हूँ।
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नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा-सम्बुद्धस्स । मैं उन भगवान अर्हत सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार करता/करती हूँ।
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नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स । मैं उन भगवान अर्हत सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार करता/करती हूँ।
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अज्जयं माघपुण्णमी सम्पत्त। माघनक्खत्तेन, पुण्णचन्दो युत्तो। यत्थ तथागतो, अरहं सम्मासम्बुद्धो, चातुरङ्गिके सावकसन्निपाते, ओवादपाटिमोक्खं उद्दिसि । तदा हि उडूतेरसानि भिक्खुसतानि, सब्बेसंयेव खीणासावानं, सब्बे एहिभिक्खुका, सब्बेपि ते अनामन्तित्वा, भगवतो सन्तिकं आगता, वेळुवने कलन्दकनिवापे, माघपुण्णमियं, वड्डूमानकच्छायाय, तस्मिञ्च सन्निपाते भगवा, विसुद्धपोसाथं अकासि, ओवादपाटिमोक्खं उद्दिसि ।

अयं अम्हाकं भगवतो, एकोयेव सावकसन्निपातो अहोसि, चातुरङ्गिको, अड्डूतेरसनि भिक्खुसतानि, सब्बेसंयेव खीणासावानं।

मयन्दानि, इमं माघपुण्णमीनक्खत्तसमयं, तक्कालसदिसं सम्पत्ता, सुचिरपरिनिबुतम्पि तं भगवन्तं, समनुस्सरमाना, इमस्मिं तस्स भगवतो सक्खिभूते चेतिये, इमेहि दण्डदीपधूपपुप्फादिसक्कारेहि, तं भगवन्तं, तानि च अड्डूतेरसानि भिक्खुसतानि, अभिपूजयाम, साधु नो भन्ते भगवा, ससावकसङ्घने, सुचिरपरिनिब्बुतोपि, गुणेहि धरमानो, इसे सक्कारे पटिग्गण्हातु, अम्हाकं दीघरत्तं, हिताय सुखाय।

आज पवित्र-पावन माघ पूर्णिमा है। माघ नक्षत्र में पूर्ण चन्द्र है। अर्हत सम्यक सम्बुद्ध ने चारों ओर से आये हुये एकत्रित श्रावक सङ्घ को ओवाद-प्रातिमोक्ष का उपदेश किया। उस समय, सभी 1250 क्षीणाश्रव भिक्षु, आओ भिक्षु ! कहकर तथागत द्वारा उपसम्पादित, किसी के भी द्वारा निमंत्रित न किये हुये, भगवान् के पास आये, जहाँ भगवान् वेलुवन कलन्दक निवाप में ठहरे हुये थे, वह दिन माघ पूर्णिमा का था। उस समय विशुद्ध पूर्णिमा उपोसथ के दिन, उन भिक्षुओं की बैठक में ओवाद-प्रातिमोक्ष का उपदेश दिया। यह प्रथम प्रसंग था उन अर्हत सम्यक सम्बुद्ध के चारों ओर से आये हुये 1250 भिक्षु परिशुद्ध क्षीणाश्रव थे। अभी, हम इस एक ही तिथी को 'माघ पूर्णिमा' के दिन उन अर्हत् सम्यक सम्बुद्ध के प्रति श्रद्धा प्रकट करने एकत्रित हुयें है। यहाँ तक की वें बहुत समय पहले महापरिनिर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं। हम यहाँ साथ में दीप-धूप आदि वस्तूएँ लाकर अपने शरीर से उनके प्रति और उन 1250 परिशुद्ध क्षीणाश्रव भिक्षुओं के प्रति श्रद्धा-भाव, उनके शील-गुणों को आत्मसात करने का संकल्प कर, जैसे कि वें अभी इसी समय हमारे साथ हों। उनको उद्देशित कर बनाये गये इस प्रतिमा घर या विहार की तीन बार परिक्रमा कर अपने सौमनस्ययुक्त चित्त से श्रद्धा सुमन अर्पण करते हैं। यद्यपि वें बहुत पहले यहाँ से परिनिवृत्त हो चूकें हैं, परंतु हम अभी भी उनको उनके शील-गुणों के माध्यम से महसूस कर रहें हैं। अच्छा हो, वें हमारे इस पूजा को स्वीकार करें जो दीर्घकाल तक हमारे सुख एवं कल्याण के लिये सहाय्यक हों।

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4 weeks ago | [YT] | 72

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

धम्म ध्वज दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।।।
🙏🙏🙏🙏

1 month ago | [YT] | 95

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

महाप्रयाण दिवस
बोधिसत्व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या स्मृतिस विनम्र अभिवादन
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सम्यक संबुद्धांच्या आयु संस्काराला 'महापरिनिर्वाण' म्हणतात. महापरिनिर्वाण या संसारात फक्त सम्यक संबुद्धांच होतो. म्हणून सम्यक संबुद्धाशिवाय संसारात कुणालाही महापरिनिर्वाण शब्द वापरणे चुकीचे आहे. म्हणून आपण सर्वांनी ६ डिसेंबर बोधिसत्व डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या अंतिम आयु संस्काराला महापरिनिर्वाण दिवस असा शब्द वापरणे योग्य नाही. महाप्रयाण हा शब्द वापरणे योग्य आहे.
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3 months ago | [YT] | 94

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

मार्गशीर्ष पूर्णिमा// 4 दिसंबर 2025

3 months ago | [YT] | 113

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

20th INTERNATIONAL TIPITAKA CHANTING CEREMONY 2025, BODHGAYA, INDIA
2 DECEMBER TO 13 DECEMBER 2025
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Chief Organiser :- #India
Other Participants Country
#Thailand
#Srilanka
#Myanmar
#Laos
#Combodia
#Vietnam
#Nepal
#Indonesia
#Bangladesh
#America
#singapur

3 months ago | [YT] | 106

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

NAMO BUDDHAY

4 months ago | [YT] | 137

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

☸️अष्टमी उपोसथ दिन☸️
13 अक्टूबर 2025

4 months ago | [YT] | 83

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

देवोरोहण व अभिधम्म दिवस की सभी को शुभकामनायें🙏🙏🙏
बुद्ध ने दूसरे संप्रदायों के सन्यासियो को गंधम आम के पेड़ पर दो चमत्कार दिखाए-
कौशल राज्य की राजधानी श्रावस्ती में बुद्ध ने वर्षावास शुरू होने के एक दिन पहले यानी आठवें चंद्रमास की पूर्णिमा पर यमक पाटिहारिय प्रदर्शित किया, यमक का मतलब जोड़ा या दो का समूह तो इस तरह यमक पाटिहारिय का तात्पर्य दो चमत्कार से है और वो दो चमत्कार थे पानी के साथ आग ये चमत्कार दिखाते समय बुद्ध के शरीर के आधे ऊपरी भाग से पानी बरसने लगा जबकि शरीर के आधे भाग से आग निकलने लगी। ये दो चमत्कार केवल बुद्ध ही दिखा सकते थे। जहाँ परमत्थ (परमर्थ) ने ये चमत्कार दिखाया वो एक आम का पेड़ था, जिसका नाम गन्धम था जोकि श्रावस्ती में था । इस चमत्कार को दिखाने का कारण यह था की दूसरे सम्प्रदाय के कुछ शिष्यों ने बुद्ध को चुनौती दी। मानसिक शक्तिओ में प्रतियोगिता करने की वो जानते थे की बुद्ध ये दो चमत्कार केवल आम के पेड़ के नीचे ही दिखायेंगे इसीलिए दूसरे संप्रदाए के सभी सन्यासियो ने उस क्षेत्र के और उस क्षेत्र के आस पास के सभी आम के पेड़ कटवा दिए। और एक भी आम का पेड़ नहीं छोड़ा। लेकिन राजा प्रसेनजित के माली ने बुद्ध को एक आम पहले ही दान में दें दिया था। वो आम खाने के बाद बुद्ध ने उस आम के बीज को मिट्टी में दबा दिया और उसी जगह पर पानी से हाथ धोये । देखते ही देखते तो वो बीज बढ़कर पौधा बन गया तथा वो इतनी तेजी से फ़ैल गया और उसमें बहुत सारे फल लग गये।
बुद्ध तवतिंस देवलोक (स्वर्ग) में अपना वर्षावास बिताने और अपनी माँ को धम्म उपदेश देने के लिए गये--
यमक पाटिहारिय दिखाने के बाद बुद्ध अपनी माँ महारानी महामाया को धम्म देने के लिए तावतिंस देवलोक में वर्षावास बिताने गये। उनकी माँ महा माया जो उनको जन्म देने के सात दिन के बाद मृत्यु को प्राप्त हुईं। और तुसित देव लोक में एक पुरुष देवता के रूप मे उन्होंने जन्म लिया। तावतिंस देव लोक में बुद्ध परिक्षता पेड़ के नीचे पांडूकम्बल सिला आसन पर बैठे। देव लोक के सभी देवता और बुद्ध की माँ महामाया धम्म देसना सुनने के लिए इकट्ठे हुए। बुद्ध ने सभी को पूरे वर्षावास में अभिधम्म सिखाया। अभिधम्म सुनने के बाद बुद्ध की माँ सोतापन्न हो गयी और साथ ही साथ 8० लाख देवता भी आर्यपुग्गल हो गये।
बुद्ध तावतिंस देवलोक से धरती पर उतरे--
बुद्ध ने मोग्गलान थेर से कहा कि वो धरती पर वर्षा वास के अंत में यानी ग्यारवे चंद्रमास की पूर्णिमा पर संकिसा में उतरेगें जहाँ सारीपुत्र थेर ठहरे थे। उससे पहले ही तावतिंस देवलोक के राजा सक्क ने बुद्ध के उतरने सूचना विसनूकम्म देवपुत्र को दी, विसनूकम्म देवपुत्र ने तीन सीढियों का निर्माण किया। एक सोने की, एक चांदी की और एक हीरे मोती की सीढियों का निर्माण किया।
सोने की सीढियां बुद्ध के दाहिने तरफ जिस पर सभी देव उतर रहे थे। चांदी की सीढियां बुद्ध के बाहिने तरफ जिस पर सभी ब्रह्मदेव उतर रहे थे। और हीरे मोती की सीढियां जिस पर बुद्ध स्वयं थे सभी सीढियां सिनेरू पर्वत से शुरू हुई और संकिसा के द्वार पर आकर ख़त्म हुई। बुद्ध ने वर्षावास के अंतिम दिन पर महा ब्रह्मा के साथ जिन्होंने बुद्ध के ऊपर छतरी लगाई हुई थी और राजा सक्क जिन्होंने बुद्ध का भोजन पात्र लिया हुआ था। सभी के साथ धरती पर उतरे और देव पंचसिखारा वीणा बजाते हुए और गाते हुए उनके साथ आये। और साथ ही साथ में मातुली देवपुत्त जो बुद्ध के पवित्र चरणों में फूल बिछाते सीढियों से नीचे उतरे। बुद्ध ने धरती पर अपना पहला कदम संकिसा के द्वार पर रखा, उस स्थान को बाद में अचल चैत्य के नाम से जाना गया। जिसका अर्थ है बुद्ध के पद चिन्ह।
धरती पर कदम रखते समय बुद्ध ने ऊपर की ओर देखा तो देवलोक और ब्रह्मलोक प्रकाशित हुए, फिर बुद्ध ने नीचे की ओर देखा तो नरक लोक प्रकाशित हुआ। उस समय पर देवलोक , नरकलोक और मनुष्य लोक सभी एक दूसरे को देख सकते थे। और इस चमत्कार को बुद्ध का तीन लोक खोलना कहा गया वे तीन लोक देव लोक यमलोक और मनुष्यलोक हैं।
और सभी तीनों लोको के सत्व बुद्ध को देख सकते थे। उस समय पर सभी देव मनुष्य और जानवर यहाँ तक की छोटी से छोटी लाल काली चीटियाँ जिन्होंने बुद्ध को देखा उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जिन्होंने ये इच्छा न की हो वो भी बुद्ध बने।
ग्यारहवे चंद्रमास की पूर्णिमा को संकिसा पहुँचने पर सारिपुत्र थेर सबसे पहले बुद्ध से मिलने आये और उनके पीछे भिक्खुनी उपलवण्णा अरहंत थेरी बुद्ध से मिलने आईं। उस समय बुद्ध का जो लोग संकिसा के द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे थे उन लाखों लोगों को धम्म देशना दीं। धम्म देसना सुनने के बाद उस तक़रीबन 30 लाख आर्य पुग्गल की अवस्था को प्राप्त हुए। उस समय बुद्ध ने यह घोषणा की, कि बुद्ध के बाद प्रज्ञा (बुद्धिमता) में सारीपुत्त अरहंत थेर होंगे। इस ख़ास मौके पर वहां उपस्थित सभी लोग बुद्ध को भोजन दान देना चाहते थे जिसे देवोरोहण के नाम से जाना जाता है। उस समय बुद्ध से कोई कितना ही दूर क्यों न था, लेकिन किसी का भी भोजन बुद्ध के भिक्षापात्र से नीचे नहीं गिरा।

संकिसा बुद्ध शासन के लिए महत्त्व पूर्ण पवित्र स्थानों में से एक है। संकिसा को अचल चैत्य के नाम से चिन्हित किया गया। जहाँ बुद्ध ने तीनों लोकों के सत्वो को एक दूसरे को देखने का मौका दिया। और यही वो स्थान है, जहाँ सारिपुत्त अरहंत थेर के द्वारा सबसे पहले पृथ्वी पर अभिधम्म की देसना दी गयी। वर्तमान में इस स्थान में अशोक स्तंभ जिसके सिर पर हाथी बना है। इस स्थान की महत्वता को और भी बढ़ता है। ये महत्वपूर्ण अशोक स्तम्भ बुद्ध की माँ महामाया को तवातिंस देव लोक में अभिधम्म की देशना देने को दर्शाता है।
जो भी आज यहाँ इस कुशल कर्म में शामिल हुए वे सभी प्राप्त करे विसती अर्य मग्ग विसती सामान्य फल एक निबान इसी जीवन में प्राप्त हो |

5 months ago | [YT] | 119

Dhammadāyādo Buddha Sāsanaṃ

🪷☸️10 कुशल कर्म☸️🪷

5 months ago | [YT] | 70