पराशर ज्योतिष संस्थान सनातन धर्म और भारतीय ज्योतिष के प्रति समर्पित संस्थान है. इस संस्थान के बैनर तले हज़ारो साल पुरानी सनातन धर्म और संस्कृति को वर्तमान युग के परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश होगी.
सिंह संक्रान्ति शुक्रवार यानि 16 अगस्त 2024 को है.
पुण्य काल की अवधि सुबह 11:49 से शाम 06:20 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि अपराह्न 04:10 से शाम 06:20 बजे के बीच है.
इस दौर में सूर्य नारायण या भगवान् विष्णु की आराधना-पूजा की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना चाहिए.
भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह से सिंह संक्रांति को जोड़ा जाता है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन भगवन विष्णु ने नरसिंह के रूप में इस दिन राक्षस हिरण्यकश्यप का वध किया था. इसलिए इस त्योहार में भगवान विष्णु, सूर्य देव और भगवान नरसिम्हा की पूजा की जाती है.
माना जाता है कि सिंह संक्रांति के दौरान किया गया श्राद्ध पितरों को लंबे समय तक तृप्त करता है. पितरों को जल अर्पण के बाद गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, तांबा, गुड़, घी आदि का दान बहुत शुभ माना गया है.
मिथुन संक्रान्ति शनिवार यानि 15 जून 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि सुबह 05:34 से दोपहर 12:21 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि सुबह 05:34 से 07:50 बजे के बीच है. इस दौर में आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना चाहिए.
मिथुन संक्रान्ति को भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में माता पृथ्वी के वार्षिक मासिक धर्म चरण के रूप में मनाया जाता है, जिसे 'राजा पारबा' या रज पर्व भी कहा जाता है. इसे 'अंबुबाची मेला' के नाम से जानते हैं.
इस पर्व में यही माना जाता है कि भूदेवी को तीन दिन तक मासिक धर्म आया हुआ होता है और फिर चौथे दिन भूदेवी को स्नान कराया जाता है. सिलबट्टे को भूदेवी का रूप माना जाता है इस पर्व में धरती माता की पूजा की जाती है. इस दिन सील बट्टे को दूध व पानी से नहलाया जाता है। साथ ही हल्दी, चंदन, सिंदूर व फूल से सजाया जाता है। पूजा के बाद कपड़े के दान का विशेष महत्व माना जाता है. सभी मौसमी फलों का भेट भूदेवी को चढ़ाया जाता है. इस दिन किसी भी रूप में चावल ग्रहण नहीं किए जाते हैं. उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर में आज भी विष्णु की पत्नि भूदेवी की चांदी की प्रतिमा विराजमान है.
हिंदू पंचांग के अनुसार मिथुन संक्रांति सौर माह के तीसरे महीने आषाढ़ में आती है. उत्तर भारत में इस महीने मानसूनी वर्षा शुरू होती है. कदाचित इसीलिए इस दिन पूर्वजों को विशेष श्राद्ध दी जाती है.
मिथुन संक्रांति को 'ग्रीष्म संक्रांति' भी कहा जाता है. इस दिन, सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी पड़ती हैं. इस दिन, दिन का समय सबसे लंबा होता है.
वृषभ संक्रान्ति मंगलवार यानि 14 मई 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 11:00 से शाम 06:04 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि अपराह्न 03 :52 से 06:04 बजे के बीच है. इस दौर में आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना अति उत्तम रहता है.
वृषभ संक्रान्ति को भगवान शिव के नंदी से भी जोड़ा जाता है. धर्म के प्रतीक नंदी की पूजा-आराधना हमें संतान प्राप्ति व अर्थ प्राप्ति में विशेष मदद करता है. इसलिए आज का दिन नंदी रूप वृषभ की सजीव पूजा अवश्य करें. संभव हो तो गाय व नंदी का दान करें इससे इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति होगी.
वृषभ संक्रान्ति को विष्णुपति भी कहा जा सकता है. भगवान विष्णु की पूजा-आराधना इस संसार में पुष्टि के लिए अति उत्तम मानी जाती है. इसलिए वृषभ संक्रान्ति में विष्णु की किसी रूप में पूजा-आराधना अभीष्ट है.
मीन संक्रान्ति बृहस्पतिवार यानि मार्च 14, 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 12:46 से शाम 06:29 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 12:46 से 02:46 बजे के बीच है. इस दौर में भगवान् सूर्यनारायण की अर्घ्य-पूजा अगले एक माह में आरोग्य, मान-सम्मान व कार्य-व्यापार के लिए उत्तम होगा. आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है.
अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना अति उत्तम रहता है.
अंत में दान के योग्य व्यक्ति को यथाशक्ति गेहूँ, गुड़ और लाल वस्त्र का दान करें.
कुम्भ संक्रान्ति कल मंगलवार यानि 13 फरवरी 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल - 09:51 ए एम से 03:54 पी एम (अवधि - 06 घण्टे 03 मिनट्स)
महा पुण्य काल - 02:00 पी एम से 03:54 पी एम (अवधि - 01 घण्टा 53 मिनट्स).
इस बार यहां सूर्य-शनि का युग्म भी है इसलिए दुनिया भर में सरकारों का जबरदस्त विरोध देखने को मिलेगा. पिता-पुत्र, अधिकारी-कर्मचारी के बीच भी विरोध के स्वर तीखे हो सकते हैं. इसलिए इस पुण्यकाल में यथासंभव शनि महाराज का उपाय करें. मसलन साधारण, विकलांग व वंचित लोगों को दान करें और आम लोगों की समस्याओं के प्रति सहानभूति पूर्वक रवैया रखें. महापुण्य काल में गायत्री महामंत्र या महा मृत्युंजय मंत्र से हवन करें. आभार.
मित्रो, आपके "पराशर बोले" चैनल के सदस्यों की संख्या शनैः-शनैः ही अंततः 10,000 से ज्यादा हो गया है. इसके लिए ह्रदय से आप सब का बहुत-बहुत आभारी हूं! सादर प्रणाम!!!
मित्रो, कोरोना हम सबको एक विशेष संदेश देने के लिए उपस्थित हुआ है. जैसे हमारे शरीर की एक सुनिश्चित क्षमता है. जब हम ज्यादा खाना खा लेते हैं तो हमें अपच हो जाता है और हमारा शरीर वायु विकार से लेकर तमाम गड़बड़ियां सूचित करने लगता है और हम सचेत हो जाते हैं. जो नहीं सचेत होते वे बेहद दुःख में जीते हैं या जल्दी ही अपने रोगों के साथ इस दुनिया से विदा हो जाते हैं.
पिछले कई दशकों से हम सब इस धरा यानि प्रकृति से केवल लेने में लगे हुए हैं और भूल गए हैं कि इस प्रकृति या इस ब्रहमांड की एक देने की एक निश्चित क्षमता है. आपने कई लोगों से सुना होगा कि जब यह धरती रहने लायक नहीं बचेगी तो हम किसी अन्य धराओं पर चले जाएंगे, मसलन चंद्र-मंगल या किसी और. अस्सी के दशक से इस तरह की बातें समाज के संपन्न लोगों के मुंह से सुना है. उसमें से अधिकांश अब नहीं बचे लेकिन जो बचे हैं वे अब इन वाक्यों की व्यर्थता को समझ रहे होंगे. अमेरिका व हमारे देश के भी कई संपन्न लोग आज भी इसे ठीक से समझ नहीं रहे. एलन मस्क जैसे लोग ऐसे ही लोग हैं. मूलतः एलन मस्क जैसे लोग अपने अहंकार में ऐसा सोचते हैं. इन लोगों ने परिवार-समाज से हमेशा लिया है और दिया बहुत कम. इस परिप्रेक्ष्य में आप सब से निवेदन है कि अपने वर्ष के संकल्प में तय करें कि हमें समाज या इस प्रकृति से कम से कम लेना है और ज्यादा से ज्यादा देना है.
वर्ष 2022 के ग्रह नक्षत्र भी इसी तरह के संकेत दे रहे हैं. नव वर्ष में कल से गुरु शतभिषा नक्षत्र में गोचर शुरू कर रहे हैं और मार्च के बाद पूर्व व उत्तरा भाद्रपद नामक नक्षत्रों से गुजरेंगे. शतभिषा के देव वरुण देव कहे गए हैं और ये इंद्र के पूर्व स्वर्ग के राजा थे. वरुण बेहद सख्त व न्यायप्रिय देव हैं और फिलहाल समुद्र व जल के देव के रूप में जाने जाते हैं. इनके हाथ में अंकुश व दंड हमेशा होता है. फलतः ये हमें हमारी गलतियों के लिए तुरंत दंड देते हैं. इसलिए गुरु के अगले दो माह के गोचर में गलत करने वाले अनेक लोग उनके दंड के शिकार हो सकते हैं. सभ्यता के विकास के साथ जैसे जैसे समाज में तकनीक व आधुनिकता का दौर बढ़ा तो हमने इंद्र जैसे व्यक्ति को स्वर्ग का राजा बना दिया जिन्हें अत्यधिक भोग व विलास के कारण कई बार स्वर्ग छोड़ना पड़ा. ये आज के के भोग व विलास के दौर के अच्छे उदाहरण हैं. इंद्र (सूर्य ) पूर्व दिशा के स्वामी हैं और ये देश के राजा को सूचित करते हैं और हमारे अति अहंकार को सूचित करते हैं. इसीलिए सत्ता में रहने वाला व्यक्ति बहुत जल्दी अहंकारी हो जाता है और अपने अहंकार के कारण पदच्युत होता है. उधर वरुण (शनि) पश्चिम दिशा के स्वामी हैं और बेहद परिश्रम के बाद आवश्यक देने में विश्वास करते हैं.
पूर्वा भाद्रप्रद के देव शिव के एक रूप अजैकपाद को बताया गया है. ये त्याग व तपस (सरलता) के देवता हैं. ये हमें अग्नि या सूर्य के माध्यम से त्याग व सरल जीवन जीने का बोध देते हैं. हम मनुष्यों को समझाने के लिए इनको एक पैर के बकरी वाले जीव के रूप में दिखाया गया है. आप सब को पता होगा कि बकरी मामूली घास-भुस पर निर्भर होती है और बदले में हमें भरपूर दूध व मांस देती है. मूलतः इस दौर में हमें बकरी की तरह जीने की आदत सीखनी है जिसमें हम प्रकृति से बेहद कम लेकर समाज या प्रकृति को वापिस सम में आने में मदद कर सकें. जो ऐसा करेगा वो इस अगले दौर का विजेता होगा. इसके बाद गुरु उत्तर भाद्रपद से गुजरेंगे जिसके भी देव शिव के एक अन्य रूप समुद्री सर्प के रूप में अहीर बुधन्य को माना गया है. ये भी हमें त्याग व सरल जीवन का संदेश देते हैं. ये केवल संयोग नहीं कि ये तीनों नक्षत्र शनि व गुरु की अंतिम दो राशियों में पड़ता है और हमें इस दुनिया से ऊपर उठकर परलोक के बारे में सोचने के लिए बाध्य करता है. शनि की राशि में गुरु का नक्षत्र व गुरु की राशि में शनि का नक्षत्र का यही मतलब है. वैसे भी जब भी शनि व गुरु एक साथ राशिमंडल की अंतिम चार राशियों में आते हैं तो हमें प्रकृति के संतुलन के बारे में सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
अतः 2022 के वर्ष को त्याग व सरल जीवन के रूप में अपनाये ताकि आपके जीवन में कोई बड़ा कष्ट न आए. अग्नि की पूजा हम अग्नि होम के माध्यम से कर सकते हैं या सूर्य को किसी रूप में याद कर सकते हैं. सूर्य को याद आप सुबह-सुबह सूर्य नमस्कार या गायत्री के जाप से कर सकते हैं.
आप सब को नव वर्ष की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं! आपके लिए नववर्ष मंगलमय हो!!!!
इंसान अच्छे-बुरे स्वभाव के साथ जन्म लेता है। अज्ञानता से बुरे स्वभाव का पोषण होता है जबकि आंतरिक शुद्धता से अच्छे स्वभाव में वृद्धि होती है। दो ध्रुवों पर खड़े ये स्वभाव धीरे-धीरे हमारे शरीर पर भी कब्जा कर लेते हैं। हालांकि बुरी आदतें आसानी से ज्यादा से ज्यादा संसाधनों को अपने पक्ष में कर लेती हैं। इस काम में आतंरिक-बाह्य प्रकृति भी भी बुरे स्वभाव का समर्थन करती रहती है। इसीलिए इस दुनिया में रावण बनना बहुत आसान है। लेकिन जो प्रकृति आरंभिक चरणों में बुरी आदतों का कदम दर कदम समर्थन कर रही होती है वही एक समय के बाद अचानक साथ छोड़ देती है। इसीलिए आरंभिक चरणों में बुरी आदतों का कदम दर कदम समर्थन कर रहे बाहरी दुनिया के अपने लोग बुरे लोगों का साथ छोड़ जाते हैं पर अपने अहंकार में दुष्ट लोग अपनी कमियां देख नहीं पाते और रावण की तरह उनका पतन हो जाता है।
दूसरी ओर अच्छी आदतों वाले लोग लगातार प्रकृति का समर्थन पाते रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें प्रकृति से कितना लेना है। अगर कोई गलती करते हैं तो प्रारंभिक दौर से ही प्रकृति उन्हें दंडित कर उस दिशा में बढ़ने से रोक देती है। हालांकि इसके कारण आरम्भिक दौर में अच्छे लोग दुनिया की नजर में असफल साबित होते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। राजा दशरथ जब उन्हें कच्ची उम्र में ही राजगद्दी देना चाहते थे तो प्रकृति ने रानी केकई के माध्यम से न केवल उन्हें रोक दिया बल्कि उनके चहेते राम को 14 वर्ष के लिए जंगल भिजवा दिया। अगर राम मुख्यधारा के समाज से बाहर नहीं जाते व जीवन की वास्तविकताओं का सामना न किया होता वे मुख्यधारा के समाज में आदर्श राजा के रूप में नहीं जाते। बाल्मीकि ने अपने रामयण में राम के आदर्श राजा के रूप को ही सामने रखा है। उत्तर के समाज ने उन्हें भगवान बना दिया अन्यथा वे मर्यादा पुरुषोत्तम व आदर्श राजा के अलावा अन्य उदाहरण के रूप हमारे सामने नहीं होते!
ये सर्वकालिक सच्चाई है किसी एक काल की नहीं। इसीलिए हमारे तुलसी रामायण व पुराणों में भी प्रत्येक कल्प में राम की मौजूदगी की बात दर्ज है।
अन्आय कालों की तरह आज का समाज भी राम-रावण के द्वंद से गुजर रहा है और हम भी अपने स्वभाव के अनुसार अपने-अपने राम व रावण का अनुसरण करने के लिए अभिशप्त हैं।
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में महाकाली
- अंधकार से प्रकाश की ओर -
दुर्गा सप्तशती का उद्गम स्रोत ऋग्वेद का रात्रि सूक्त है. इस सूक्त में रात्रि देवी की स्तुति की गई है. महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित सूक्त का भावार्थ --
ॐ, सर्वव्यापी देवी ने इस सृष्टि में जीवों की रचना करने के बाद उनके कर्मों के फल देने के लिए इस ब्रहमांड को अपने असंख्य वरदानों और महिमा से परिपूर्ण कर दिया. 1.
यह देवी अमर हैं. वे इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं. वे उर्ध्व दिशा में बढ़ने वाले संसारिकता के वृक्ष और नीचे की ओर जाने वाली भ्रम की लताओं में विद्यमान हैं. ज्ञान के प्रकाश से वे अज्ञान रूपी अन्धकार को समाप्त करने वाली हैं. 2.
परिशुद्ध चेतना रूपी रात्रि देवी स्वयं उत्पन्न होने के बाद प्रातः काल की देवी - अपनी बहन उषा को प्रकट करती हैं जो अविद्या रूपी अंधकार को विनष्ट करती हैं. 3.
वे रात्रि देवी हम सबों पर प्रसन्न हों. उनके आने से ही हम सभी अपने-अपने घरों में वैसे ही गहरी नींद में सोते हैं जैसे पक्षी आनंद पूर्वक अपने-अपने घोसले में विश्राम करते हैं. 4.
माता की स्नेहिल और प्रेममय गोद में सभी मनुष्य, गाय, घोड़े, आकाश में उड़ने वाले पक्षी, कीट-पतंग और अन्य प्राणी शांतिपूर्वक सोते हैं. 5.
हे रात्रि देवी, आप हम सबों पर कृपा करें कि हम सभी वासना रूपी मादा भेड़िया (अहंकार, और अविद्या पर अवलंबित सूक्ष्म कामनाएं ) से मुक्त हो जाएं. हमें आप चोर (काम, क्रोध, मोह, लोभ इत्यादि ) से छुटकारा दिलाएं और इस संसार -सागर के पार उतार दें. आप मुक्तिदायिनी माता हैं. 6.
हे रात की अधिष्ठात्रि देवी - उषा! यह सर्वव्यापी अन्धकार हमें चारों ओर से घेरे हुए है. अपने भक्तों का भार हटाने वाली देवी कृपा करके हमें अविद्या (अज्ञान ) से मुक्त करें. 7.
हे रात्रि देवी! आप एक दुधारी गाय के सामान हैं. अपनी प्रार्थना के द्वारा मैं आप कि कृपा पाना चाहता हूं. हे प्रकाशवान आकाश (ब्रहम का आकाश तत्व ) की पुत्री, आप की कृपा से मैंने अपने शत्रुओं (काम, क्रोध, राग-द्वेष इत्यादि ) को जीत लिया है. आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिए. 8.
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सिंह संक्रान्ति शुक्रवार यानि 16 अगस्त 2024 को है.
पुण्य काल की अवधि सुबह 11:49 से शाम 06:20 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि अपराह्न 04:10 से शाम 06:20 बजे के बीच है.
इस दौर में सूर्य नारायण या भगवान् विष्णु की आराधना-पूजा की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना चाहिए.
भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह से सिंह संक्रांति को जोड़ा जाता है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन भगवन विष्णु ने नरसिंह के रूप में इस दिन राक्षस हिरण्यकश्यप का वध किया था. इसलिए इस त्योहार में भगवान विष्णु, सूर्य देव और भगवान नरसिम्हा की पूजा की जाती है.
माना जाता है कि सिंह संक्रांति के दौरान किया गया श्राद्ध पितरों को लंबे समय तक तृप्त करता है. पितरों को जल अर्पण के बाद गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, तांबा, गुड़, घी आदि का दान बहुत शुभ माना गया है.
2 years ago (edited) | [YT] | 9
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मिथुन संक्रान्ति शनिवार यानि 15 जून 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि सुबह 05:34 से दोपहर 12:21 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि सुबह 05:34 से 07:50 बजे के बीच है. इस दौर में आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना चाहिए.
मिथुन संक्रान्ति को भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में माता पृथ्वी के वार्षिक मासिक धर्म चरण के रूप में मनाया जाता है, जिसे 'राजा पारबा' या रज पर्व भी कहा जाता है. इसे 'अंबुबाची मेला' के नाम से जानते हैं.
इस पर्व में यही माना जाता है कि भूदेवी को तीन दिन तक मासिक धर्म आया हुआ होता है और फिर चौथे दिन भूदेवी को स्नान कराया जाता है. सिलबट्टे को भूदेवी का रूप माना जाता है इस पर्व में धरती माता की पूजा की जाती है. इस दिन सील बट्टे को दूध व पानी से नहलाया जाता है। साथ ही हल्दी, चंदन, सिंदूर व फूल से सजाया जाता है। पूजा के बाद कपड़े के दान का विशेष महत्व माना जाता है. सभी मौसमी फलों का भेट भूदेवी को चढ़ाया जाता है. इस दिन किसी भी रूप में चावल ग्रहण नहीं किए जाते हैं. उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर में आज भी विष्णु की पत्नि भूदेवी की चांदी की प्रतिमा विराजमान है.
हिंदू पंचांग के अनुसार मिथुन संक्रांति सौर माह के तीसरे महीने आषाढ़ में आती है. उत्तर भारत में इस महीने मानसूनी वर्षा शुरू होती है. कदाचित इसीलिए इस दिन पूर्वजों को विशेष श्राद्ध दी जाती है.
मिथुन संक्रांति को 'ग्रीष्म संक्रांति' भी कहा जाता है. इस दिन, सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी पड़ती हैं. इस दिन, दिन का समय सबसे लंबा होता है.
2 years ago (edited) | [YT] | 16
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वृषभ संक्रान्ति मंगलवार यानि 14 मई 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 11:00 से शाम 06:04 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि अपराह्न 03 :52 से 06:04 बजे के बीच है. इस दौर में आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है. अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना अति उत्तम रहता है.
वृषभ संक्रान्ति को भगवान शिव के नंदी से भी जोड़ा जाता है. धर्म के प्रतीक नंदी की पूजा-आराधना हमें संतान प्राप्ति व अर्थ प्राप्ति में विशेष मदद करता है. इसलिए आज का दिन नंदी रूप वृषभ की सजीव पूजा अवश्य करें. संभव हो तो गाय व नंदी का दान करें इससे इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति होगी.
वृषभ संक्रान्ति को विष्णुपति भी कहा जा सकता है. भगवान विष्णु की पूजा-आराधना इस संसार में पुष्टि के लिए अति उत्तम मानी जाती है. इसलिए वृषभ संक्रान्ति में विष्णु की किसी रूप में पूजा-आराधना अभीष्ट है.
2 years ago | [YT] | 21
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मीन संक्रान्ति बृहस्पतिवार यानि मार्च 14, 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 12:46 से शाम 06:29 बजे तक है. जबकि महा पुण्य काल की अवधि दोपहर बाद 12:46 से 02:46 बजे के बीच है. इस दौर में भगवान् सूर्यनारायण की अर्घ्य-पूजा अगले एक माह में आरोग्य, मान-सम्मान व कार्य-व्यापार के लिए उत्तम होगा. आंतरिक सूर्य नारायण की आराधना गायत्री-जाप से की जा सकती है.
अर्घ्य-पूजा के बाद गायत्री मंत्र से हवन करना अति उत्तम रहता है.
अंत में दान के योग्य व्यक्ति को यथाशक्ति गेहूँ, गुड़ और लाल वस्त्र का दान करें.
2 years ago | [YT] | 25
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कुम्भ संक्रान्ति कल मंगलवार यानि 13 फरवरी 2024 को मनाई जाएगी.
पुण्य काल - 09:51 ए एम से 03:54 पी एम (अवधि - 06 घण्टे 03 मिनट्स)
महा पुण्य काल - 02:00 पी एम से 03:54 पी एम (अवधि - 01 घण्टा 53 मिनट्स).
इस बार यहां सूर्य-शनि का युग्म भी है इसलिए दुनिया भर में सरकारों का जबरदस्त विरोध देखने को मिलेगा. पिता-पुत्र, अधिकारी-कर्मचारी के बीच भी विरोध के स्वर तीखे हो सकते हैं. इसलिए इस पुण्यकाल में यथासंभव शनि महाराज का उपाय करें. मसलन साधारण, विकलांग व वंचित लोगों को दान करें और आम लोगों की समस्याओं के प्रति सहानभूति पूर्वक रवैया रखें. महापुण्य काल में गायत्री महामंत्र या महा मृत्युंजय मंत्र से हवन करें. आभार.
2 years ago | [YT] | 29
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मित्रो, आपके "पराशर बोले" चैनल के सदस्यों की संख्या शनैः-शनैः ही अंततः 10,000 से ज्यादा हो गया है. इसके लिए ह्रदय से आप सब का बहुत-बहुत आभारी हूं! सादर प्रणाम!!!
4 years ago | [YT] | 106
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मित्रो, कोरोना हम सबको एक विशेष संदेश देने के लिए उपस्थित हुआ है. जैसे हमारे शरीर की एक सुनिश्चित क्षमता है. जब हम ज्यादा खाना खा लेते हैं तो हमें अपच हो जाता है और हमारा शरीर वायु विकार से लेकर तमाम गड़बड़ियां सूचित करने लगता है और हम सचेत हो जाते हैं. जो नहीं सचेत होते वे बेहद दुःख में जीते हैं या जल्दी ही अपने रोगों के साथ इस दुनिया से विदा हो जाते हैं.
पिछले कई दशकों से हम सब इस धरा यानि प्रकृति से केवल लेने में लगे हुए हैं और भूल गए हैं कि इस प्रकृति या इस ब्रहमांड की एक देने की एक निश्चित क्षमता है. आपने कई लोगों से सुना होगा कि जब यह धरती रहने लायक नहीं बचेगी तो हम किसी अन्य धराओं पर चले जाएंगे, मसलन चंद्र-मंगल या किसी और. अस्सी के दशक से इस तरह की बातें समाज के संपन्न लोगों के मुंह से सुना है. उसमें से अधिकांश अब नहीं बचे लेकिन जो बचे हैं वे अब इन वाक्यों की व्यर्थता को समझ रहे होंगे. अमेरिका व हमारे देश के भी कई संपन्न लोग आज भी इसे ठीक से समझ नहीं रहे. एलन मस्क जैसे लोग ऐसे ही लोग हैं. मूलतः एलन मस्क जैसे लोग अपने अहंकार में ऐसा सोचते हैं. इन लोगों ने परिवार-समाज से हमेशा लिया है और दिया बहुत कम. इस परिप्रेक्ष्य में आप सब से निवेदन है कि अपने वर्ष के संकल्प में तय करें कि हमें समाज या इस प्रकृति से कम से कम लेना है और ज्यादा से ज्यादा देना है.
वर्ष 2022 के ग्रह नक्षत्र भी इसी तरह के संकेत दे रहे हैं. नव वर्ष में कल से गुरु शतभिषा नक्षत्र में गोचर शुरू कर रहे हैं और मार्च के बाद पूर्व व उत्तरा भाद्रपद नामक नक्षत्रों से गुजरेंगे. शतभिषा के देव वरुण देव कहे गए हैं और ये इंद्र के पूर्व स्वर्ग के राजा थे. वरुण बेहद सख्त व न्यायप्रिय देव हैं और फिलहाल समुद्र व जल के देव के रूप में जाने जाते हैं. इनके हाथ में अंकुश व दंड हमेशा होता है. फलतः ये हमें हमारी गलतियों के लिए तुरंत दंड देते हैं. इसलिए गुरु के अगले दो माह के गोचर में गलत करने वाले अनेक लोग उनके दंड के शिकार हो सकते हैं. सभ्यता के विकास के साथ जैसे जैसे समाज में तकनीक व आधुनिकता का दौर बढ़ा तो हमने इंद्र जैसे व्यक्ति को स्वर्ग का राजा बना दिया जिन्हें अत्यधिक भोग व विलास के कारण कई बार स्वर्ग छोड़ना पड़ा. ये आज के के भोग व विलास के दौर के अच्छे उदाहरण हैं. इंद्र (सूर्य ) पूर्व दिशा के स्वामी हैं और ये देश के राजा को सूचित करते हैं और हमारे अति अहंकार को सूचित करते हैं. इसीलिए सत्ता में रहने वाला व्यक्ति बहुत जल्दी अहंकारी हो जाता है और अपने अहंकार के कारण पदच्युत होता है. उधर वरुण (शनि) पश्चिम दिशा के स्वामी हैं और बेहद परिश्रम के बाद आवश्यक देने में विश्वास करते हैं.
पूर्वा भाद्रप्रद के देव शिव के एक रूप अजैकपाद को बताया गया है. ये त्याग व तपस (सरलता) के देवता हैं. ये हमें अग्नि या सूर्य के माध्यम से त्याग व सरल जीवन जीने का बोध देते हैं. हम मनुष्यों को समझाने के लिए इनको एक पैर के बकरी वाले जीव के रूप में दिखाया गया है. आप सब को पता होगा कि बकरी मामूली घास-भुस पर निर्भर होती है और बदले में हमें भरपूर दूध व मांस देती है. मूलतः इस दौर में हमें बकरी की तरह जीने की आदत सीखनी है जिसमें हम प्रकृति से बेहद कम लेकर समाज या प्रकृति को वापिस सम में आने में मदद कर सकें. जो ऐसा करेगा वो इस अगले दौर का विजेता होगा. इसके बाद गुरु उत्तर भाद्रपद से गुजरेंगे जिसके भी देव शिव के एक अन्य रूप समुद्री सर्प के रूप में अहीर बुधन्य को माना गया है. ये भी हमें त्याग व सरल जीवन का संदेश देते हैं. ये केवल संयोग नहीं कि ये तीनों नक्षत्र शनि व गुरु की अंतिम दो राशियों में पड़ता है और हमें इस दुनिया से ऊपर उठकर परलोक के बारे में सोचने के लिए बाध्य करता है. शनि की राशि में गुरु का नक्षत्र व गुरु की राशि में शनि का नक्षत्र का यही मतलब है. वैसे भी जब भी शनि व गुरु एक साथ राशिमंडल की अंतिम चार राशियों में आते हैं तो हमें प्रकृति के संतुलन के बारे में सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
अतः 2022 के वर्ष को त्याग व सरल जीवन के रूप में अपनाये ताकि आपके जीवन में कोई बड़ा कष्ट न आए. अग्नि की पूजा हम अग्नि होम के माध्यम से कर सकते हैं या सूर्य को किसी रूप में याद कर सकते हैं. सूर्य को याद आप सुबह-सुबह सूर्य नमस्कार या गायत्री के जाप से कर सकते हैं.
आप सब को नव वर्ष की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं! आपके लिए नववर्ष मंगलमय हो!!!!
4 years ago | [YT] | 90
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इंसान अच्छे-बुरे स्वभाव के साथ जन्म लेता है। अज्ञानता से बुरे स्वभाव का पोषण होता है जबकि आंतरिक शुद्धता से अच्छे स्वभाव में वृद्धि होती है। दो ध्रुवों पर खड़े ये स्वभाव धीरे-धीरे हमारे शरीर पर भी कब्जा कर लेते हैं। हालांकि बुरी आदतें आसानी से ज्यादा से ज्यादा संसाधनों को अपने पक्ष में कर लेती हैं। इस काम में आतंरिक-बाह्य प्रकृति भी भी बुरे स्वभाव का समर्थन करती रहती है। इसीलिए इस दुनिया में रावण बनना बहुत आसान है। लेकिन जो प्रकृति आरंभिक चरणों में बुरी आदतों का कदम दर कदम समर्थन कर रही होती है वही एक समय के बाद अचानक साथ छोड़ देती है। इसीलिए आरंभिक चरणों में बुरी आदतों का कदम दर कदम समर्थन कर रहे बाहरी दुनिया के अपने लोग बुरे लोगों का साथ छोड़ जाते हैं पर अपने अहंकार में दुष्ट लोग अपनी कमियां देख नहीं पाते और रावण की तरह उनका पतन हो जाता है।
दूसरी ओर अच्छी आदतों वाले लोग लगातार प्रकृति का समर्थन पाते रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें प्रकृति से कितना लेना है। अगर कोई गलती करते हैं तो प्रारंभिक दौर से ही प्रकृति उन्हें दंडित कर उस दिशा में बढ़ने से रोक देती है। हालांकि इसके कारण आरम्भिक दौर में अच्छे लोग दुनिया की नजर में असफल साबित होते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। राजा दशरथ जब उन्हें कच्ची उम्र में ही राजगद्दी देना चाहते थे तो प्रकृति ने रानी केकई के माध्यम से न केवल उन्हें रोक दिया बल्कि उनके चहेते राम को 14 वर्ष के लिए जंगल भिजवा दिया। अगर राम मुख्यधारा के समाज से बाहर नहीं जाते व जीवन की वास्तविकताओं का सामना न किया होता वे मुख्यधारा के समाज में आदर्श राजा के रूप में नहीं जाते। बाल्मीकि ने अपने रामयण में राम के आदर्श राजा के रूप को ही सामने रखा है। उत्तर के समाज ने उन्हें भगवान बना दिया अन्यथा वे मर्यादा पुरुषोत्तम व आदर्श राजा के अलावा अन्य उदाहरण के रूप हमारे सामने नहीं होते!
ये सर्वकालिक सच्चाई है किसी एक काल की नहीं। इसीलिए हमारे तुलसी रामायण व पुराणों में भी प्रत्येक कल्प में राम की मौजूदगी की बात दर्ज है।
अन्आय कालों की तरह आज का समाज भी राम-रावण के द्वंद से गुजर रहा है और हम भी अपने स्वभाव के अनुसार अपने-अपने राम व रावण का अनुसरण करने के लिए अभिशप्त हैं।
ॐ तत् सत्
4 years ago | [YT] | 66
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parashar bole - class room
दीपस्य प्रकाशः न केवलं भवतः गृहम् उज्ज्वालयतु जीवनम् अपि!
दीपों का प्रकाश न केवल आपके घर को बल्कि आपके जीवन को भी प्रकाशित करे!
शुभ दिवाली!!!
4 years ago | [YT] | 35
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parashar bole - class room
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में महाकाली
- अंधकार से प्रकाश की ओर -
दुर्गा सप्तशती का उद्गम स्रोत ऋग्वेद का रात्रि सूक्त है. इस सूक्त में रात्रि देवी की स्तुति की गई है. महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित सूक्त का भावार्थ --
ॐ, सर्वव्यापी देवी ने इस सृष्टि में जीवों की रचना करने के बाद उनके कर्मों के फल देने के लिए इस ब्रहमांड को अपने असंख्य वरदानों और महिमा से परिपूर्ण कर दिया. 1.
यह देवी अमर हैं. वे इस सृष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं. वे उर्ध्व दिशा में बढ़ने वाले संसारिकता के वृक्ष और नीचे की ओर जाने वाली भ्रम की लताओं में विद्यमान हैं. ज्ञान के प्रकाश से वे अज्ञान रूपी अन्धकार को समाप्त करने वाली हैं. 2.
परिशुद्ध चेतना रूपी रात्रि देवी स्वयं उत्पन्न होने के बाद प्रातः काल की देवी - अपनी बहन उषा को प्रकट करती हैं जो अविद्या रूपी अंधकार को विनष्ट करती हैं. 3.
वे रात्रि देवी हम सबों पर प्रसन्न हों. उनके आने से ही हम सभी अपने-अपने घरों में वैसे ही गहरी नींद में सोते हैं जैसे पक्षी आनंद पूर्वक अपने-अपने घोसले में विश्राम करते हैं. 4.
माता की स्नेहिल और प्रेममय गोद में सभी मनुष्य, गाय, घोड़े, आकाश में उड़ने वाले पक्षी, कीट-पतंग और अन्य प्राणी शांतिपूर्वक सोते हैं. 5.
हे रात्रि देवी, आप हम सबों पर कृपा करें कि हम सभी वासना रूपी मादा भेड़िया (अहंकार, और अविद्या पर अवलंबित सूक्ष्म कामनाएं ) से मुक्त हो जाएं. हमें आप चोर (काम, क्रोध, मोह, लोभ इत्यादि ) से छुटकारा दिलाएं और इस संसार -सागर के पार उतार दें. आप मुक्तिदायिनी माता हैं. 6.
हे रात की अधिष्ठात्रि देवी - उषा! यह सर्वव्यापी अन्धकार हमें चारों ओर से घेरे हुए है. अपने भक्तों का भार हटाने वाली देवी कृपा करके हमें अविद्या (अज्ञान ) से मुक्त करें. 7.
हे रात्रि देवी! आप एक दुधारी गाय के सामान हैं. अपनी प्रार्थना के द्वारा मैं आप कि कृपा पाना चाहता हूं. हे प्रकाशवान आकाश (ब्रहम का आकाश तत्व ) की पुत्री, आप की कृपा से मैंने अपने शत्रुओं (काम, क्रोध, राग-द्वेष इत्यादि ) को जीत लिया है. आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिए. 8.
- स्वामी ज्योतिर्मयानंद
4 years ago | [YT] | 82
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