जो संसार के संयोग और वियोग से रहित है, उसी का नाम योग है। जो आत्यन्तिक सुख है, उसके मिलन का नाम योग है। जिसे परमतत्त्व परमात्मा कहते हैं, उसके मिलन का नाम योग है। वह योग न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्त्तव्य है। धैर्यपूर्वक लगा रहनेवाला ही योग में सफल होता है।
परमेश्वर की प्राप्तिरूपी जिस लाभ को, पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त कर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और भगवत्प्राप्तिरूपी जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता, दुःख का उसे भान भी नहीं होता; क्योंकि भान करनेवाला चित्त तो मिट गया।
तथा इन्द्रियों से अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत्स्वरूप को तत्त्व से जानकर चलायमान नहीं होता, सदैव उसी में प्रतिष्ठित रहता है तथा-
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त भी उपराम हो जाता है, विलीन हो जाता है, मिट जाता है, उस अवस्था में 'आत्मना' - अपने आत्मा के द्वारा 'आत्मानम्'- परमात्मा को देखता हुआ 'आत्मनि एव' - अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। देखता तो परमात्मा को है लेकिन सन्तुष्ट अपने ही आत्मा से होता है। क्योंकि प्राप्तिकाल में तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है, किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपने ही आत्मा को उन शाश्वत ईश्वरीय विभूतियों से ओतप्रोत पाता है। ब्रह्म अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है, तो इधर आत्मा भी अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है। है तो, किन्तु अचिन्त्य भी है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह आपके उपभोग के लिये नहीं है। चित्त का निरोध और निरुद्ध चित्त के विलयकाल में परमात्मा का साक्षात्कार होता है और दर्शन के ठीक दूसरे क्षण उन्हीं ईश्वरीय गुणधर्मों से युक्त अपने ही आत्मा को पाता है, इसलिये वह अपने ही आत्मा में सन्तुष्ट होता है। यही उसका स्वरूप है। यही पराकाष्ठा है। www.yatharthgeeta.com
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक चलायमान नहीं होता, लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता, यही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की दी गयी है। दीपक तो उदाहरण मात्र है। आजकल दीपक का प्रचलन शिथिल पड़ रहा है। अगरबत्ती ही जलाने पर धुआँ सीधे ऊपर जाता है, यदि वायु में वेग न हो। यह योगी के जीते हुए चित्त का एक उदाहरण मात्र है। अभी चित्त भले ही जीता गया है, निरोध हो गया है; किन्तु अभी चित्त है। जब निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, तब कौन-सी विभूति मिलती है? देखें-"यथार्थगीता"
इस प्रकार योग के अभ्यास से विशेष रूप से वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है, विलीन-सा हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हुआ पुरुष योगयुक्त कहा जाता है।
।। ॐ ।। नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।
अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खानेवाले का सिद्ध होता है, न अत्यन्त सोनेवाले का और न अत्यन्त जागनेवाले का ही सिद्ध होता है।
इस प्रकार अपने आपको निरन्तर उसी चिन्तन में लगाता हुआ संयत मनवाला योगी मेरे में स्थितिरूपी पराकाष्ठावाली शान्ति को प्राप्त होता है। इसलिये अपने को निरन्तर कर्म में लगाएँ। यहाँ यह प्रश्न पूर्णप्राय है। अगले दो श्लोकों में वे बताते हैं कि परमानन्दवाली शान्ति के लिये शारीरिक संयम, युक्ताहार-विहार भी आवश्यक हैं-
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्रायः लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य है; किन्तु महापुरुषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय-संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का वास्तविक अर्थ है- 'ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी'। ब्रह्म का आचरण है नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया, जिसे करनेवाले 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्'- सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। इसे करते समय 'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'- बाहर के स्पर्श, मन और सभी इन्द्रियों के स्पर्श बाहर ही त्यागकर चित्त को ब्रह्म-चिन्तन में, श्वास-प्रश्वास में, ध्यान में लगाना है। मन ब्रह्म में लगा है तो बाह्य स्मरण कौन करे? यदि बाह्य स्मरण होता है तो अभी मन लगा कहाँ? विकार शरीर में नहीं, मन की तरंगों में रहते हैं। मन ब्रह्माचरण में लगा है तो जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम तक स्वाभाविक हो जाता है। अतः ब्रह्म के आचरण में स्थित रहकर) भयरहित और अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरणवाला मन को संयत रखते हुए, मुझमें लगे हुए चित्त से युक्त मेरे परायण होकर स्थित हो। ऐसा करने का परिणाम क्या होगा?-
Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।।
जो संसार के संयोग और वियोग से रहित है, उसी का नाम योग है। जो आत्यन्तिक सुख है, उसके मिलन का नाम योग है। जिसे परमतत्त्व परमात्मा कहते हैं, उसके मिलन का नाम योग है। वह योग न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्त्तव्य है। धैर्यपूर्वक लगा रहनेवाला ही योग में सफल होता है।
23 hours ago | [YT] | 248
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।
परमेश्वर की प्राप्तिरूपी जिस लाभ को, पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त कर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और भगवत्प्राप्तिरूपी जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता, दुःख का उसे भान भी नहीं होता; क्योंकि भान करनेवाला चित्त तो मिट गया।
1 day ago | [YT] | 243
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।।
तथा इन्द्रियों से अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत्स्वरूप को तत्त्व से जानकर चलायमान नहीं होता, सदैव उसी में प्रतिष्ठित रहता है तथा-
2 days ago | [YT] | 257
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त भी उपराम हो जाता है, विलीन हो जाता है, मिट जाता है, उस अवस्था में 'आत्मना' - अपने आत्मा के द्वारा 'आत्मानम्'- परमात्मा को देखता हुआ 'आत्मनि एव' - अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। देखता तो परमात्मा को है लेकिन सन्तुष्ट अपने ही आत्मा से होता है। क्योंकि प्राप्तिकाल में तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है, किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपने ही आत्मा को उन शाश्वत ईश्वरीय विभूतियों से ओतप्रोत पाता है। ब्रह्म अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है, तो इधर आत्मा भी अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और अमृतस्वरूप है। है तो, किन्तु अचिन्त्य भी है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह आपके उपभोग के लिये नहीं है। चित्त का निरोध और निरुद्ध चित्त के विलयकाल में परमात्मा का साक्षात्कार होता है और दर्शन के ठीक दूसरे क्षण उन्हीं ईश्वरीय गुणधर्मों से युक्त अपने ही आत्मा को पाता है, इसलिये वह अपने ही आत्मा में सन्तुष्ट होता है। यही उसका स्वरूप है। यही पराकाष्ठा है। www.yatharthgeeta.com
3 days ago | [YT] | 119
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ।।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक चलायमान नहीं होता, लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता, यही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की दी गयी है। दीपक तो उदाहरण मात्र है। आजकल दीपक का प्रचलन शिथिल पड़ रहा है। अगरबत्ती ही जलाने पर धुआँ सीधे ऊपर जाता है, यदि वायु में वेग न हो। यह योगी के जीते हुए चित्त का एक उदाहरण मात्र है। अभी चित्त भले ही जीता गया है, निरोध हो गया है; किन्तु अभी चित्त है। जब निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, तब कौन-सी विभूति मिलती है? देखें-"यथार्थगीता"
4 days ago | [YT] | 290
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।
इस प्रकार योग के अभ्यास से विशेष रूप से वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है, विलीन-सा हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हुआ पुरुष योगयुक्त कहा जाता है।
5 days ago | [YT] | 307
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Jagdish Sharma "BABA"
6 days ago | [YT] | 311
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।
अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खानेवाले का सिद्ध होता है, न अत्यन्त सोनेवाले का और न अत्यन्त जागनेवाले का ही सिद्ध होता है।
1 week ago | [YT] | 297
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।
इस प्रकार अपने आपको निरन्तर उसी चिन्तन में लगाता हुआ संयत मनवाला योगी मेरे में स्थितिरूपी पराकाष्ठावाली शान्ति को प्राप्त होता है। इसलिये अपने को निरन्तर कर्म में लगाएँ। यहाँ यह प्रश्न पूर्णप्राय है। अगले दो श्लोकों में वे बताते हैं कि परमानन्दवाली शान्ति के लिये शारीरिक संयम, युक्ताहार-विहार भी आवश्यक हैं-
1 week ago | [YT] | 268
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Jagdish Sharma "BABA"
।। ॐ ।।
प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।।
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्रायः लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्मचर्य है; किन्तु महापुरुषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय-संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का वास्तविक अर्थ है- 'ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी'। ब्रह्म का आचरण है नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया, जिसे करनेवाले 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्'- सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। इसे करते समय 'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'- बाहर के स्पर्श, मन और सभी इन्द्रियों के स्पर्श बाहर ही त्यागकर चित्त को ब्रह्म-चिन्तन में, श्वास-प्रश्वास में, ध्यान में लगाना है। मन ब्रह्म में लगा है तो बाह्य स्मरण कौन करे? यदि बाह्य स्मरण होता है तो अभी मन लगा कहाँ? विकार शरीर में नहीं, मन की तरंगों में रहते हैं। मन ब्रह्माचरण में लगा है तो जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम तक स्वाभाविक हो जाता है। अतः ब्रह्म के आचरण में स्थित रहकर) भयरहित और अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरणवाला मन को संयत रखते हुए, मुझमें लगे हुए चित्त से युक्त मेरे परायण होकर स्थित हो। ऐसा करने का परिणाम क्या होगा?-
1 week ago | [YT] | 218
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