दिगंबर जैनाचार्य श्री १०८ विद्यासागरजी महाराज के आदर्शों के डिजिटल संग्रहकोष - " विद्यावंशी चैनल " पर आपका स्वागत है ! यहाँ आप पाएंगे आचार्य श्री के अद्वितीय विचार, उद्देश्य, प्रवचन, भजन, जीवन में सफलता के मंत्र और उनकी आध्यात्मिक धारा से अपरिहार्य सब कुछ। आचार्य श्री जी के आशीर्वाद से प्राचीन भारतीय संस्कृति को जीवित करने हेतु शिक्षा, चिकित्सा, हथकरघा, हस्तशिल्प आदि कई क्षेत्रों में प्रकल्प प्रारंभ हुए हैं। विद्यावंशी किरण बनकर, विद्या सूर्य की रोशनी से संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करने के उद्देश्य से भक्तों द्वारा संचालित किया जा रहा है।
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
मैंने सुना है एक दिन आचार्य महाराज रोज की तरह स्वाध्याय में लीन थे। लोग दर्शन करने आ-जा रहे थे, सभी चावल चढ़ाते जा रहे थे। इतने में अचानक सभी को चावल चढ़ाते देखकर एक बच्चे ने अपने हाथ में रखी हुई चाकलेट चढ़ा दी। बच्चे के भोलेपन पर सभी हँसने लगे। बात आई-गई हो गई। इस घटना के स्मरण से आज भी मन उद्वेलित हो उठता है। यदि हम भी ऐसे वीतरागी गुरु को पाकर बच्चों के समान सरलता व सहजता से संसार में प्रिय मालूम पड़ने वाली वस्तुओं का त्याग करने के लिए तत्पर हो जाएँ तो मुक्ति के मार्ग पर चलना कठिन कहाँ है?
✍🏻 मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
विद्यावंशी🌈
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1 week ago | [YT] | 1,816
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
उस दिन शाम का समय था। आचार्य महाराज मन्दिर के बाहर खुली दालान में विराजे थे। थोड़ी देर तत्व-चर्चा होती रही। उस पवित्र और शान्त वातावरण में आचार्य महाराज का सामीप्य पाकर हम सभी बहुत खुश थे। फिर सामायिक का समय हो गया। आचार्य महाराज वहाँ से उठकर भीतर मन्दिर में चले गए। बाहर किसी ने मुझसे कहा कि भीतर की बिजली जला आओ। आचार्य श्री ने यह बात सुन ली। मैंने जैसे ही भीतर कदम रखा कि भीतर से वे बोल उठे - ‘हाँ भाई, भीतर की बिजली जला लो।'
उनका आशय आन्तरिक आत्म-ज्योति के प्रकाश से था। मैं अवाक् खड़ा रह गया। उनके द्वारा कही गई वह बात बोध-वाक्य बन गई, जो हमें आज भी आत्म-ज्योति जलाए रखने के लिए निरन्तर प्रेरित करती है।
कुण्डलपुर(1977)
✍🏻 मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
विद्यावंशी🌈
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2 months ago | [YT] | 1,884
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
सुना था कि आहार में वे रस बहुत कम लेते हैं। सो देख रहा था कि ऐसा कौन-सा रस उनके भीतर झर रहा है, जो बाहर के रस को गैरजरूरी किए दे रहा है। एक गहरी आत्म-तृप्ति जो उनके चेहरे पर बरस रही है वही भीतरी-रस की खबर दे रही थी और मैं जान गया कि रस सब भीतर है। ये भ्रम है कि रस बाहर है। तभी तो बाहर से लवण का त्याग होते हुए भी उनका लावण्य अद्भुत है। मधुर रस से विरक्त होते हुए भी उनमें असीम माधुर्य है। देह के दीप में तेल (स्नेह) न पहुँचने पर भी उनमें आत्मस्नेह की ज्योति अमंद है। सारे फल छोड़ देने के बाद भी हम सभी लोगों के लिए, वे सचमुच, बहुत फलदायी हो गए हैं।उनकी संतुलित आहार-चर्या देखकर लगा कि शरीर के प्रति उनके मन में कोई गहन अनुराग नहीं है। वे उसे मात्र सीढ़ी मानकर आत्मा की ऊँचाइयाँ छूना चाहते हैं। शरीर धर्म का साधन है। उनकी कोशिश उसे समर्थ बनाए रखकर शान्तभाव से आत्म-साधना करने की है। सोच रहा था कि शरीर को इस तरह आत्मा से अलग मानकर उसका सम्यक्र उपयोग करना कितना सार्थक, किन्तु कितना दुर्लभ है I आहार पूरा होने पर लोगों का आनंदित होना और जय-जयकार के बीच उनका इस सबसे निर्लिप्त रहकर मुस्कराते हुए लौटना, अनायास ही साधु की भ्रामरी वृत्ति का स्मरण करा देता है।उनके आहार ग्रहण करके लौटने के बाद जाने कितनी देर तक मैं वही सिर झुकाए खड़ा रहा, जब ख्याल आया तो देखा कि वे बहुत आगे/बहुत दूर निकल गए हैं। इतने आगे कि उन तक पहुँचने के लिए मुझे पूरी जिन्दगी उनके पीछे चलना होगा।
✍🏻 मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
कुण्डलपुर(1976)
विद्यावंशी🌈
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2 months ago | [YT] | 1,606
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
अमरकंटक से पेन्ड्रा विहार में
अचानक आचार्यश्री के पाँव में
होने लगा असहनीय दर्द,
कुछ दूरी पर बैठ गये शिष्य
इसीलिए कि- गुरु के ध्यान में न आये कोई विघ्न,
निस्पृही संत हुए स्वयं में लीन
तभी एक व्यक्ति आया।
हाथ में छोटी-सी लकड़ी लिए
सिर पर पगड़ी बाँधे हुए करने लगा हठ
“गुरु भगवंत के दर्शन करके ही जाऊँगा
किसी प्रकार का विघ्न नहीं करूंगा
मात्र इस लकड़ी से पैर को छूने दो
इतनी-सी भावना पूरी कर लेने दो।”
शिष्यों ने सोचा
लाया है जड़ी-बूटी,
सोचा... इसे जाने दो
जाकर किया भावों से प्रणाम
ज्यों ही लकड़ी पैर से स्पर्श की
तत्काल गायब हुआ दर्द ही!
बाहर आया, देखा सबने
लेकिन अदृश्य हो गया पल में,
ढूँढा आसपास हर जगह
लेकिन कहीं मिला नहीं वह…
समझ गये सब
मनुज नहीं, था देव वह!
“अहो! व्रतमिदं जैनं देवानामपि पूजितम्”
चाहते जिन्हें देव मनुज सभी,
किंतु गुरु की कुछ चाहत नहीं
तन-मन से परे
निज चेतन की भी चाहत नहीं,
जो अपना ही है उसकी चाह क्या?
और जो अपना है नहीं उसे अपनाना क्या?
✍🏻 आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
विद्यावंशी🌈
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2 months ago | [YT] | 1,327
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
बचपन से विद्या के धारक,
आप विद्याधर कहलाये।
बड़े हुए तो ज्ञानसागर में समा गये,
ग्रंथों के गहने धारण कर,
स्वयं निग्रंथ बन गये।
तब विद्या के सागर कहलाये।
आपको ज्ञानसागर कहूँ या विद्यासागर कहूँ,
या पंचम युग के अर्हत् गुण रत्नाकर कहूँ,
भक्ति में डूबा मन जो कहे वो कहूँ।
✍🏻 आर्यिका श्री १०५ पूर्णमति माता जी
विद्यावंशी🌈
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3 months ago | [YT] | 1,050
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
उत्तम क्षमा धर्म के धारी गुरूवर
सन् 1976 ,कुंडलपुर दमोह का अद्भुत संस्मरण-जब आचार्य श्री की आँखों में खून उतर आया था , ऐसा हुआ क्या था की आँखों में इतनी ज़्यादा तख़लीफ़ हो गई
उत्तम क्षमा धर्म की जय 🚩
विद्यावंशी🌈
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4 months ago | [YT] | 376
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
यह पावन दिवस… केवल एक समाधि दिवस नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की अमर गाथा का पुनः स्मरण है।
🪔 ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या – 27 मई 2025
✨ पूज्य दादागुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के ५३वें समाधि दिवस पर,
उनके चरणों में अनन्त बार नमोस्तु, नमोस्तु,नमोस्तु 🙏🏻🚩
जहाँ गुरु के नाम से शिष्य पहचाने जाते हैं,
वहीं आज शिष्य के नाम से गुरु भी
सकल विश्व में अमर हो गए हैं।
एक ऐसी अनुपम जोड़ी…
जो केवल धर्म का इतिहास नहीं,
धर्म का भविष्य गढ़ गई।
आज प्रतीत होता है,
जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
स्वर्ग में अपने गुरु से कह रहे हों —
"गुरुदेव, जो आपने कहा था…
उसे जीवन बना लिया।
संघ को गुरुकुल बनाया,
और अब वह गुरुकुल समयसागर जी के सान्निध्य में आगे बढ़ेगा…"
यह पाँच दशकों से अधिक की साधना,
न केवल आत्मकल्याण का मार्ग बनी,
बल्कि लाखों आत्माओं की दिशा और दशा बदल गई।
आज का दिन श्रद्धा का, संकल्प का, समर्पण का है।
इस गुरु-शिष्य परंपरा की चिरंजीवी लौ
युगों-युगों तक प्रज्वलित रहे…
यही प्रार्थना है।
✍🏻 विद्यावंशी 🌈
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7 months ago | [YT] | 386
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
🎯 विद्यालय जाये बिना विद्या नहीं आती, विद्या आयी है कि नहीं इसकी जानकारी के लिए परीक्षा होती है।
कक्षा-१२ वीं का आज परिणाम घोषित हुआ है।“विद्यार्थी जीवन आगे का कैसा होना चाहिए?” आचार्य श्री के अनमोल सूत्र जिनका पालन आपको जीवन कि नई ऊंचाइयों तक लेकर जाएगा
आचार्य श्री के सूत्र, विद्यार्थी जीवन कैसा हो ? 👇🏻
vidyasagar.guru/quotes/anya-sankalan/vidyaarthiyon…
विद्यावंशी 🌈
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7 months ago | [YT] | 430
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
"जिनकी मुस्कान मात्र से दुखों का अंधकार छँट जाए,
जिनकी दृष्टि भर से समय जैसे ठहर जाए,
और जिनके चरण पड़ते ही निर्जन वन भी तीर्थ बन जाए —
वे ही हैं इस युग के तपोमूर्ति, संयम के साक्षात स्वरूप,
हम सबके आराध्य, हमारे हृदय में बसने वाले,
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज।
बोलिए आचार्य भगवन की — जय हो! 🚩🙏
✍🏻 विद्यावंशी 🌈
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8 months ago | [YT] | 1,462
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Vidyavanshi - Shri Vidyasagar ji Maharaj
आदिम तीर्थंकर प्रभो ! आदिनाथ मुनिनाथ,
आधि-व्याधि अघ मद मिटे, तुम पद में मम माथ
वृषका होता अर्थ है, दयामयी शुभ धर्म
वृष से तुम भरपूर हो, वृष से मिटते कर्म
दीनों के दुर्दिन मिटे, तुम दिनकर को देख
सोया जीवन जागता, मिटता अघ अविवेक
शरण चरण हैं आपके, तारण तरन जिहाज
भव दधि तट तक ले चलो, करुनाकर जिनराज ॥
आदिब्रह्मा, सृष्टिकर्ता, युग निर्माता — मेरे बड़े बाबा का जन्म और तप कल्याणक महापर्व ।
देवाधिदेव 1008 श्री आदिनाथ भगवान की जय हो! 🚩
जिन बड़े बाबा के अतिशयकारी चरणों में स्वयं आचार्य श्री ने अपनी असीम श्रद्धा अर्पित की , जिनके प्रति उनका भक्ति-भाव इतना गहरा था कि हर श्वास में बड़े बाबा का नाम बसता था ,
उनकी कृपा से ही हमारे जीवन को सत्य और संयम का मार्ग मिला है।
बड़े बाबा की इस महिमा को न कोई शब्दों में बाँध सकता है, न कोई माप सकता है।
आज इस महापर्व पर हम सभी बड़े बाबा के चरणों में नतमस्तक होकर,
आचार्य श्री की उस अद्भुत भक्ति को प्रणाम करते हैं, जिसने हमें सही राह दिखाई।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्हं नमः 🙏
जय हो आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अद्वितीय भक्ति को 🚩
विद्यावंशी 🌈
9 months ago | [YT] | 805
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